शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-३
-> underप॒`
गृह्णातिपञ्च॑गृही॒तं-> underही॒- `पृष॑-
दाज्यं॒ ज्योति॑रसि वि॒श्वरू॑पं॒ विश्वे॑षां दे॒वानाꣳ॑ समि॒दिति॑ वैश्वदे॒वꣳ हि पृष॑दाज्यं॒
Bars in :
दाज्यं॒-> underज्यं॒ज्योति॑रसिवि॒श्वरू॑पं॒-> underवि॒, underपं॒विश्वे॑षांदे॒वानाꣳ॑-> underदे॒समि॒दिति॑-> underदि॒वैश्वदे॒वꣳ-> underदे॒हिपृष॑दाज्यं॒-> underज्यं॒
धार॑यन्ति स्रुचो॒ यदा॒ प्रदी॑प्त इ॒ध्मो भ॑वति ॥ ६॥ अथ॑ जु॒होति॑ । त्वꣳ सो॑म तनू॒कृ-
Bars in :
धार॑यन्तिस्रुचो॒-> underचो॒- `
कां० ३, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० २६ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४४६
रही। इसलिए वह इनको यहाँ यज्ञ में भाग देता है जिससे वे फलीभूत हो जायें। पशु मनुष्यों के
पीछे हैं; चिड़ियाँ, ओषधियाँ और वनस्पतियाँ देवों के पीछे हैं। इस प्रकार यहाँ जो कुछ है, सभी
को यज्ञ में भाग मिलता है। देव और मनुष्य दोनों पितरों के साथ पीते हैं। पहले यह प्रत्यक्ष रूप
से पीते थे, अब परोक्ष रूप से पीते हैं ।।२६।।
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
जो दीक्षा लेता है वह सबको दीक्षित करता है। क्योंकि वह यज्ञ को दीक्षित करता है।
यह यज्ञ ही सब-कुछ है। जिस यज्ञ के लिए उसने दीक्षा ली थी उसको समाप्त करके मानो वह
सबको युक्त कर देता है ॥१॥
वैसर्जन आहुति इसलिये दी जाती है। चूंकि वह इस सब का विसर्जन करता है इसलिये
इसका नाम वैसर्जन है। इसलिये जिस किसी ने व्रत लिया हो वह पीछे से (यजमान को) छुए।
यदि कहीं जाना हो तो न सही। जब वह आहुति देता है तो सबका विसर्जन करता है ॥२॥
वैसर्जन आहुतियां क्यों दी जाती हैं ? यज्ञ विष्णु है। उस (विष्णु) ने देवों के लिए इस
विक्रान्ति (शक्ति) को विचक्रमे अर्थात् प्राप्त किया, जो इस समय उनको प्राप्त है—पहले पद
से इस (भूलोक) को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, अन्तिम से द्युलोक को। इसी विक्रान्ति को यज्ञ
यजमान के लिए प्राप्त कराता है जब यजमान यज्ञ करता है। इसीलिये वैसर्जन आहुतियां दी
जाती हैं ॥३॥
तीसरे पहर वेदी में कुश रखकर, व्रत के दूध का आधा भाग यजमान और उसकी स्त्री
को देकर शाला में आते हैं, समिधा को रखते हैं और उपयमनी को बनाते हैं। (अध्वर्यु) घी को
(गार्हपत्य की) अग्नि पर रखता है। स्रुच् को मांजता है। यजमान सोम राजा को अपनी गोद
में लेता है। अध्वर्यु सोम-गौ के पद की रेणु को गार्हपत्य के पीछे फेंकता है जिससे उसकी प्रतिष्ठा
हो, क्योंकि पैरों से ही तो प्रतिष्ठा होती है (आदमी पैरों के बल ही खड़ा होता है) ॥४॥
कुछ लोग (इस रेणु के) चार भाग करते हैं। चौथाई भाग को उस उपयमनी में रखते
हैं जहाँ से आहवनीय लेते हैं। चौथाई भाग अक्ष में लगाते हैं। चौथाई भाग को (अग्नीध्रीय
अग्नि की) उपयमनी पर रखते हैं और एक-चौथाई को गार्हपत्य के पीछे फेंकते हैं ॥५॥
परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। उसको बिल्कुल गार्हपत्य के पीछे ही फेंकना चाहिए।
घी को साफ करके जुहू और उपभृत में चार चमचे लेता है—पृषदाज्य (जमे हुए घी) के पांच
चमचे इस मन्त्र से—"ज्योतिरस विश्वरूपं विश्वेषां देवानाँ समित्" (यजु० ५।३५)—"तू
विश्वरूप ज्योति है, सब देवताओं की समिधा या ज्वाला।" क्योंकि पृषदाज्य सब देवों का है।
जब ईंधन प्रदीप्त हो जाता है तो स्रुचों को रखते हैं ॥६॥
अब वह आहुति देता है— "त्वं सोम तनूकृद्भ्यो द्वेषेभ्योऽन्यकृतेभ्यऽउरु यन्तासि वरूथँ
स्वाहा" (यजु० ५।३५)—"हे सोम, तू शरीरों को कष्ट देनेवाले, दूसरों द्वारा किये हुए द्वेषों से
बचानेवाला है। बहुत प्रकार से नियन्ता है। तू हमारे यज्ञरूपी घर की रक्षा कर।" इस प्रकार
४५० शतपथ ब्राह्मण
तिष्ठायां॑ प्रतितिष्ठत्ये॒तेने॒मं लो॒कꣳ स्पृ॑णुते ॥ ७॥ अथाग्नवे द्वितीयामाहु॑तिं जुहो-
ति । जुषाणोऽअङ्गिर॒ाऽज्यस्य॑ वेतु स्वाहेत्येष उ ह्वैत॒दुवाच रक्षोभ्यो वै बिभेमि
यथा॒ मान्त॑रा नाष्ट्रा रक्षाꣳसि॒ न हिꣳस॒न्नेवं॑ मा कनीयाꣳसमेव॒ बधात्कृत्वातिनय-
त स्तो॒कमेव॒ स्तोको॒ द्यप्तुरिति॑ त॒मेतत्कनीयाꣳसमेव॒ बधात्कृत्यात्यनयत्स्तो॒कमेव॒
स्तोको॒ द्यप्तू रक्षोभ्यो भीषा तस्मादग्नवे द्वितीयामाहुतिं जुहोति ॥ ८॥ उ॒द्यच्छ-
न्तीध्मम् । उ॒पयच्छन्त्युपयम॒नीरथाहाग्नये॒ प्रह्रिय॒माणायानु॑ब्रूहि सोमाय प्रणीयमा-
नायेति वाग्नये प्रह्रियमाणाय॒ानुब्रूहीति॑ त्वे॒व ब्रूयात् ॥ ९॥ आददते ग्राव्णः । द्रो-
णकलशं वायव्यानीध्मं कार्ष्मर्यमयान्परिधीनाश्ववालं प्रस्तर॑मे॒तद्द्वौ विधृती त्-
र्बर्हिरुपसंनद्धं भवति वपाश्रपणी रशनेऽअरणीऽअधिमन्थनः शकलो वृषणौ
तत्समादा॒य प्राञ्च॒ आयन्ति स एष॒ ऊर्ध्वो य॒ज्ञ एति॑ ॥ १०॥ तद॒ग्न्यत्सु वाचयति ।
अग्ने॒ नय॑ सुप॒था रा॒येऽअ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा-
णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते नम॑उक्तिं विधेमेत्यग्निमेवैतत्पुरस्तात्करोत्यग्निः पुरस्तान्नाष्ट्रा
रक्षाꣳस्यपघ्नन्नेत्यथाभयेनानाष्ट्रेण हरन्ति तऽआयन्त्यागच्छन्त्याग्नीध्रं तमाग्नीध्रे निद-
धाति ॥ ११॥ स निहि॑ते जुहोति । अ॒यं नोऽअ॒ग्निर॑वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर॑ एतु
प्रभि॒न्दन् । अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु वाज॑साताव॒यं शत्रू॑ञ्जयतु जूर्ष॑माणः स्वाहेति॒ तदे-
तेनैवैतस्मिन्नन्तरिक्षे प्रतिष्ठायां प्रतितिष्ठत्येतेनै॒तं लो॒कꣳ स्पृ॑णुते ॥ १२॥ तदेव नि-
दध॑ति ग्रावा॑णः । द्रोणकलशं वायव्यान्येतरमादावायन्ति तदुत्तरेणाहवनीयमुप-
सादयन्ति ॥ १३॥ प्रोक्ष॑णीर॒ध्वर्यु॒राद॑त्ते । स॒ इध्ममेवाग्रे प्रोक्षत्यथ वेदिम॒थास्मि॑ ब-
र्हिः प्रयच्छ॑न्ति तत्पुरस्तादन्वञ्च॒ासादय॑ति तत्प्रोक्ष्योपनिनीय विस्रꣳस्य ग्रन्थिमाश्र्व-
वालः प्रस्तर् उपसंनद्धो भव॑ति तं गृह्णाति गृहीत्वा प्रस्तर॑मेकवृद्बर्हि स्तृणाति
स्तीर्त्वा॑ बर्हिः कार्ष्मर्यमयान्परिधीन्परि॑दधाति परिधाय परिधीत्समिधावभ्यादधा-
त्यभ्याधाय॑ समिधौ ॥ १४॥ अथ जुहोति । उ॒रु विष्णो वि॒क्रमस्वोरु क्षया॑य न॒-
कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ४५१
वह इस पृथिवी पर प्रतिष्ठा लाभ करता है और इस लोक को प्राप्त करता है ॥७॥
अब वह अप्तु (अर्थात् तीव्रगामी सोम) के लिए दूसरी आहुति देता है—‘‘जुषाणोऽअप्तु-
राज्यस्य वेतु स्वाहा’’ (यजु० ५।३५)—‘‘तेज सोम हमारे घी को स्वीकार करे।’’ उस (सोम) ने
ही तो कहा था कि ‘मुझे राक्षसों से भय लगता है कि दुष्ट राक्षस मुझे मार्ग में हानि न पहुँचावें।
इसलिए मुझे छोटा करके ले चलो कि मैं उनके वध के लिए अति सूक्ष्म हो जाऊँ। मुझे बूँद के
रूप में ले चलो।’ क्योंकि बूँद अप्तु अर्थात् तेज होती हैं, इसलिए वध के लिए अतिसूक्ष्म करके
वह राक्षसों के डर से उसको बूँद के रूप में लेते हैं क्योंकि बूँद तेज होती है। इसीलिए वह तेज
सोम के लिए दूसरी आहुति देता है ॥८॥
वे जलती हुई समिधा को उठाते हैं और उपयमनी पर रखते हैं। तब वह होता से
कहता है—‘लिये जाती हुई अग्नि के लिए मन्त्र बोल।’ या ‘लिये जाते हुए सोम के लिए।’
परन्तु ऐसा कहना चाहिए कि ‘लिये जाती हुई अग्नि के लिए’ ॥६॥
अब वह (सोम कुचलने के) पत्थरों को, द्रोण कलश को, वायव्यों को (लकड़ी की
कूँडियों को ‘वायव्य’ कहते हैं), (बीस) समिधाओं को, कार्ष्मण्य लकड़ी की परिधियों को,
अश्वबाल घास के प्रस्तरों को, ईख की विधृतियों को लेता है। कुश को उससे बाँधते हैं। दो
वपाश्रपणी (कार्ष्मण्य लकड़ी की शलाकायें जिन पर भूनते हैं), दो रस्सियां, दो अरणी, अधि-
मन्थन लकड़ी, दो वृषण इन सबको लेकर वे आगे (आग्नीध्र तक) जाते हैं। इस प्रकार यज्ञ
ऊँचा उठता है ॥१०॥
जब वे आगे चलते हैं तो वह (यजमान से) यह बँचवाता है—‘‘अग्ने नय सुपथा रायेऽ-
अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम’’
(यजु० ५।३६, ऋ० १।१६६।१)—‘हे अग्नि देव, जो तू सब कर्मों को जानता है, हमको धन के
लिए ठीक मार्ग पर चला। हमको बहकानेवाले पाप से बचा। हम तेरी बहुत प्रार्थना करते हैं।’
इस प्रकार वह अग्नि को आगे करता है। अग्नि ही दुष्ट राक्षसों को मारती चलती है। वे उसको
भय-रहित और हानि-रहित मार्ग से ले जाते हैं। वे चलते हैं और आग्नीध्र तक पहुँचते हैं, और
अध्वर्यु आग्नीध्र कुण्ड में अग्नि रख देता है ॥११॥
अब वह रखकर आहुति देता है इस मन्त्र से—‘‘अयं नोऽअग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर
ऽएतुप्रभिन्दन्। अयं वाजान् जयतु वाजसातावयं॒ शत्रून् जयतु जर्हृ॑षाणः स्वाहा’’ (यजुर्वेद
५।३७)—‘‘यह अग्नि हमारे लिए चौड़ा मार्ग बनावे। संग्रामों को भेदता हुआ आगे चले। अन्न-
सेवन में यह अन्नों को जीते, वेग से आगे बढ़कर वह शत्रुओं को जीते।‘’ इसके द्वारा वह अन्तरिक्ष
में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है और उस लोक को प्राप्त करता है ॥१२॥
वे सोम कुचलने के पत्थरों, द्रोण कलश और वायव्यों को उसी स्थान पर रख देते हैं;
और चीजों को लेकर वे आगे चलते हैं और आहवनीय के उत्तर में रख देते हैं ॥१३॥
अध्वर्यु प्रोक्षणी को लेता है। पहले समिधा पर जल छिड़कता है, फिर वेदी पर। तब वे
उसको कुश दे देते हैं। वह (इस कुश) को इस प्रकार रखता है कि गांठ पूर्व की ओर रहे। तब
उस पर जल छिड़कता है। जो जल बचा उसे कुशों की जड़ पर छिड़ककर और गांठ को खोल-
कर अश्वबाल घास के प्रस्तर को कुश से बाँधकर वह उसको लेता है और प्रस्तर को लेकर कुशा
की एक तह बिछा देता है। कुश को बिछाने के पश्चात् कार्ष्मय की परिधियों को आग पर रखता
है। परिधियों को रखकर दो समिधाओं को रखता है और दो समिधाओं को रखकर—॥१४॥
इस मन्त्र से आहुति देता है—‘‘उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि। घृतं घृतयोने
४५२ शतपथ ब्राह्मण
स्कृ॒धि । घृ॒तं घृ॑तपोने पिब॒ प्र-प्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहेति॒ तदे॒तेनै॒वैतस्यां॑ दि॒वि
प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठत्ये॒तेनै॒तं लो॒कँ स्पृणुत॒ यदे॒तया जु॒होति॑ ॥ १५ ॥ यद्वेव वि॒द्भ्र-
ष्ट्य॒र्चा जु॒होति॑ । कनी॑याꣳस॒ वाऽए॒नम॑मेतदधात्कृत्वात्यने॑षु स्तो॒कमे॒व स्तो॒को ह्य-
न्तुस्तमे॒तदु॑भय॒ प्राप्य य॒ज्ञ्वैष तं करोति यज्ञमे॒व य॒ज्ञो हि वि॒द्भ्रुस्तस्मा॑द्विद्भ्रष्ट्य॒र्चा
जु॒होति॑ ॥ १६ ॥ अथासाद्य॒ स्रुचः॑ । अ॒प उप॑स्पृश्य राजानं प्रपादयति तद्यदासाद्य॑
स्रुचोऽ॒प उप॑स्पृश्य राजानं प्रपादय॑ति वज्रो वाऽआज्यꣳ रेतः सोमो नेद्वज्रेणाज्ये-
न रेतः सो॒मꣳ हि॑निसानी॑ति॒ तस्मादासाद्य॒ स्रुचोऽ॒प उप॑स्पृश्य राजानं प्रपादय॑ति
॥ १७ ॥ स दक्षिणस्य हविर्धानस्य नीडे कृ॒ष्णाजि॑नम॒स्तृणा॑ति । तदे॒ममासा॑दयति
दे॒व स॑वितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तꣳ रक्ष॑स्व॒ मा त्वा दभ॒न्निति॒ तदे॒मं दे॒वायै॒व स॑वि॒त्रे प॒-
रिद॑दाति गु॒प्त्यै ॥ १८ ॥ अथानुसृत्यॊप॑तिष्ठते । ए॒तत्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाꣳऽउ॑-
पागा इ॒दम॒हं मनु॒ष्या॒न्त्स॒ह रा॒यस्पोषे॒णेत्य॑ग्नीषोमौ वाऽए॒तमन॑र्त्तम॒भ्य॒ञ्चाद॑धाते यो
दीक्षत॒ऽआग्ना॑वैष्ण॒वꣳ ह्य॑दो दीक्षणी॒यꣳ ह॒विर्भव॑ति॒ यो वै वि॒ष्णुः सोमः॑ स ह॒वि-
र्वाऽए॒ष दे॒वानां॑ भवति॒ यो दीक्ष॑ते॒ तदे॒नमन्त॑र्त्तम॒भ्य॒ञ्चाद॑धाते॒ तत्प्रत्य॒क्षꣳ सोमा-
न्निर्मुच्यते॒ यदा॒हैतत्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाꣳऽउ॑पागा इ॒दम॒हं मनु॒ष्या॒न्त्स॒ह रा॒य-
स्पोषे॒णेति॒ भूमा॒ वै रा॒यस्पोषः॑ स॒ह भू॒म्नेत्ये॒वैतदाह॑ ॥ १९ ॥ अथोपनिष्क्रा॑मति ।
स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य पाशा॑न्मुच्ये॒ऽइति॑ वरुणपा॒शे वाऽए॒षोऽन्त॑र्भवति॒ योऽन्यस्या-
संस्तत्प्रत्य॒क्षं व॑रुणपाशा॑न्निर्मुच्यते॒ यदा॑ह॒ स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य पाशा॑न्मच्ये॒ऽइति॑
॥ २० ॥ अथेत्याहवनीये॑ स॒मिधम॒भ्याद॑धाति । अग्ने॑ व्रतपा॒स्त्वे व्र॑तपा इ॒त्य॒ग्निर्हि
दे
कां० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १५-२१ शतपथब्राह्मण / ४५३
पिंब प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑” (यजु० ५।३८)—“हे विष्णु, फैल-फूटकर कदम भर। हमारे घर
के लिए फैल-फूटकर स्थान दे। तू घृत की योनि है, घृत पी और यज्ञपति को आगे बढ़ा।” इस
प्रकार वह द्यौलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है और इस आहुति को देकर द्यौलोक की प्राप्ति
कर लेता है ॥१५॥
विष्णु-सम्बन्धी मन्त्र से आहुति देने का अर्थ यह है कि इस प्रकार उन्होंने (सोम को)
इतना सूक्ष्म कर लिया कि आक्रमणों से बच सके और बूंद के रूप में ले गये, क्योंकि बूंद अप्तु
अर्थात् तीव्रगामी होता है। रक्षा करने के बाद उसको यज्ञ-सम्बन्धी बनाता है क्योंकि विष्णु ही
यज्ञ है। इसलिए वह विष्णु के मन्त्र से आहुति देता है ॥१६॥
स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श करके सोम राजा का (हविर्धान में) प्रवेश कराते
हैं। स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श करके सोम राजा को हविर्धान में क्यों ले जाते हैं ?
इसलिए कि घी वज्र है और सोम रेत या वीर्य है। वह स्रुचों को रखकर और जल को स्पर्श
करके सोम राजा को इसलिए ले जाते हैं कि कहीं सोम-वीर्य और घी-वज्र को हानि न पहुँच
जाय ॥१७॥
दक्षिणी हविर्धान के नीड में मृगचर्म बिछाता है और उसपर सोम को बिठाल देता है,
इस मन्त्र से—“दे॒व स॑वितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तँ॒ रक्ष॑स्व॒ मा त्वा॑ दभन्” (यजु० ५।३९)—“हे सविता
देव, यह तेरा सोम है। तू इसकी रक्षा कर। कोई तुझको हानि न पहुँचावे।” इस प्रकार वह
रक्षा के हेतु सोम को सविता के हवाले कर देता है ॥१८॥
उसको हाथ से छोड़कर उसकी उपासना करता है—“ए॒तत्त्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाँ२
ऽउपागा॑ऽइ॒दम॒हं म॑नु॒ष्यान्त्स॒ह रा॒यस्पोषेण॑” (यजु० ५।३९)—“हे देव सोम, तू देव होकर दूसरे
देवों से मिला और मैं धन की वृद्धि के लिए मनुष्यों से मिला।” जो दीक्षा लेता है उसको अग्नि-
सोम अपने जबड़ों के बीच में लेते हैं। वह दीक्षा की आहुति अग्नि और विष्णु की होती है। जो
विष्णु है वह सोम ही है। जो दीक्षा लेता है वह देवताओं की हवि होता है। इस प्रकार उन्होंने
उसको अपने जबड़ों के बीच दाब लिया। यह जो 'एतत् त्वं देव सोम' आदि मन्त्र पढ़ा, मानो
वह इससे सोम से मुक्त होगा। 'रायस्पोषः' का अर्थ है चीजों का बाहुल्य। 'रायस्पोषेण' का
तात्पर्य है 'बाहुल्य के साथ' ॥१९॥
अब वह यह मन्त्रांश पढ़कर हविर्धान से निकल आता है—“स्वाहा॒ निर्वरु॑णस्य॒ पाशा॒न्
मुच्ये” (यजु० ५।३६)—“मैं वरुण के फंदों से छूटता हूँ।” जो दूसरे के मुंह में है वह मानो
वरुण के फंदे में है। इसलिए जब वह कहता है 'स्वाहा निर्वरुणस्य' इति, तब मानो वह वरुण के
फंदे से छूटता है ॥२०॥
अब इस प्रकार आहवनीय में समिधा को रखता है—“अग्ने॒ व्रत॑पास्त्वे व्र॒तपाः” (यजु०
५।४०)—“हे व्रत के पालनेवाले अग्नि, तुझ पर, हे व्रत के पालनेवाले।” अग्नि देवों का व्रत-
पति है। इसलिए कहा 'अग्ने व्रतपाः' आदि। अब कहता है—“या तव॑ तनूर्मय्यभूदे॒षा सा त्वयि॒
यो मम॑ तनू॒स्त्वय्यभूदि॒यँ॒ सा मयि॑ । यथा॒यथं नौ व्रतपते व्र॒तान्यनु॑ मे दीक्षां दी॒क्षाप॑तिरमँ॒स्तानु॒
तप॒स्तप॑स्पतिः” (यजु० ५।४०)—“जो तेरी सत्ता मुझमें थी वह तुझमें हो। जो मेरी सत्ता
तुझमें थी वह मुझमें हो। हे व्रतपते, हम दोनों के व्रत ठीक-ठीक हो गये। दीक्षा के पति ने मेरी
दीक्षा स्वीकार कर ली। तप के पति ने मेरा तप स्वीकार कर लिया।” इस प्रकार वह अग्नि
से मुक्त हो जाता है और अपनी ही सत्ता से यज्ञ करता है। अब वे उसका अन्न खाते हैं क्योंकि
अब वह मनुष्य है। अब वे उसका नाम लेते हैं क्योंकि अब वह मनुष्य है। पहले वे इसका अन्न