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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

३१८ शतपथ ब्राह्मण

रु॒द्राव॒सं तेन॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्यव॒सेन॒ वा॒ऽअध्वानं॒ यन्ति॒ तदेन॑ꣳ सावस॒मे-
वान्त्व॒वार्त्तित॒ यत्र॑-यत्रास्य॒ चरणं॒ तद॒न्वत्र॒ ह वा॒ऽअस्य॒ परो॒ मूज॒वद्भ्यश्च॑रणं॒ तस्मा॑-
दाह॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्य॑व॒ततधन्वा॒ पिना॑कावस॒ इत्यहि॑ꣳसन्नः शि॒वो॒ऽतीही॑-
त्ये॒वैतदा॑ह॒ कृत्तिवासा॒ इति॒ निष्षापयत्ये॒वैनमेतत्स्वप॒न्न हि॒ न कं च॒न हिन॒स्ति
तस्मा॑दाह॒ कृत्तिवासा॒ इति॑ ॥ १७॥ अथ॒ दक्षि॑णाम्बा॒हुमन्वा॑व॒र्त्तन्ते॑ । ते॒ प्रती॑चं॒
पुन॒राय॑न्ति॒ पुन॒रेत्या॒प उप॑स्पृशन्ति रुद्रि॒येणैव॒ वा॒ऽएतद्व्य॑चारिषुः शान्तिराप॒स्तद॒द्भिः
शान्त्या॑ शमयन्ते ॥ १८॥ अथ॒ केशश्म॒श्रु व॑पते । स॒मारो॒प्याग्नी॒ऽउद॑व॒सायि॒व श्वो॒तेन॑
यज॑ते॒ न हि॒ तद॒वक॑ल्पते॒ यदु॑त्तरवे॒दाव॒ग्निहोत्रं॑ जुहु॒यात्तस्मा॑दु॒द्वस्य॑ति गृ॒हानिवा॑-
निर्मि॒थ्याग्नी॑ पौर्णमा॒सेन॑ यजत॒ऽउत्स॑न्नय॒ज्ञ-इव॒ वा॒ऽएष॒ यच्चातुर्मा॒स्यान्यथैष॒ कॢप्तः॑
प्रति॑ष्ठितो य॒ज्ञो यत्पौ॑र्णमा॒सं तत्कॢप्ते॒नैवैतद्य॒ज्ञेना॒न्तः प्रति॑तिष्ठति॒ तस्मा॑दु॒द्वस्य॑-
ति॒ ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [६.२.] ॥ ॥
अ॒क्षय्यं॑ꣳ ह॒ वै सु॒कृतं॒ चातुर्मास्यया॒जिनो॑ भवति । संवत्सरं॑ꣳ हि॒ त्रय॑ति॒ ते-
मा॒स्यान्नाय्यं॒ भव॑ति॒ तं वै॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ यज॑ति॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ प्रजय॑ति॒ सर्वं॒ वै सं॑-
वत्सरः॒ सर्वं॒ वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेनो॒ हास्याक्षय्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्यृतू॒ꣳ हैव॒ तद्देवा॑ दे॒वान-
प्येत्य॒न्नाद्यं॒ वै दे॒वाना॑मृ॒तेनो॒ हैवा॒स्यान्नाद्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्ये॒तन्नु॒ तद्यस्मा॑च्चातुर्मा॒-
स्यैर्यज॑ते ॥ १॥ अथ॒ यस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण॒ यजे॑त । या वै दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धे-
रीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॑ तहु॒नमथ॒ यः सं॑वत्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तत्सीरं॑ꣳ
सा या हैव दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धेरीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॒ य उ॑ च सं॑व-
त्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तमे॒वैतदु॒भयं॑ प॒रिगृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण य-
ज॑ते ॥ २॥ तस्या॒वृत् । नोप॑किर॒त्युत्त॑रवे॒दिं न गृह्णा॑ति पृषदा॒ज्यं न म॑न्थ॒त्यग्निं॒
पञ्च॑ प्रया॒जा भव॑न्ति॒ त्रयो॑ऽनुया॒जा एकं॑ꣳ समिष्टयजुः ॥ ३॥ अथैतान्येव॒ पञ्च॑ ह॒-
वीꣳषि॒ भव॑न्ति । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः॑ प्र॒जाप॑तिः प्र॒जा असृ॑जतै॒तैरू॒भय॑तो वरुणापा॒शा-

कां० २, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० १७-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३१६
मिल जाय तो इस मन्त्र से उसमें बांध देता है—"एतत् ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि"
(यजु० ३।६१)—"हे रुद्र! यह तेरा तोशा है। इसे लेकर तू मूजवत के उस पार जा।" तोशा
लेकर ही लोग यात्रा को चलते हैं। इसलिए जहाँ जाना हो वहाँ तोशा लेकर विदा करता है। इस
प्रसंग में उसकी यात्रा मूजवत के उधर है, इसलिए कहता है कि मूजवत के उधर। अब कहता
है—"अवततधन्वा पिनाकावसः" (यजु० ३।६१)—"बिना खिंचे हुए धनुष और वज्र से युक्त ।"
इससे तात्पर्य है 'हिंसा न करते हुए, कल्याण करते हुए जाओ।' अब कहता है— "कृत्तिवासा"
(यजु० ३।६१) "चमड़ा पहने हुए।" इससे वह उसे सुला देता है। सोते हुए कोई किसी को हानि
नहीं पहुँचा सकता। इसलिए कहा 'चमड़ा पहने हुए' ॥१७॥
अब वे दक्षिण की ओर फिरते हैं, बिना पीछे देखते हुए। लौटकर जल का स्पर्श करते
हैं। अब तक रुद्र यज्ञ कर रहे थे। जल शान्ति है। इसलिए शान्तिरुपी जल से अपने को पवित्र
करते हैं ॥१८॥
अब वह केश और दाढ़ी मुंडवाता है, और (उत्तर वेदी की) अग्नि लेता है, क्योंकि
जगह बदलकर ही तो वह (पौर्णमास) यज्ञ कर सकता है। यह ठीक नहीं है कि उत्तर वेदी पर
अग्निहोत्र करे, इसलिए वह जगह बदल लेता है। घर जाकर और अग्नियों का मन्थन करके वह
पौर्णमास यज्ञ करता है। चातुर्मास्य यज्ञ अलग होते हैं, परन्तु पौर्णमास यज्ञ नियत और
प्रतिष्ठित है। इसलिए वह उस नियत यज्ञ को करके अपने को प्रतिष्ठित करता है। इसलिए
जगह बदल देता है ॥१९॥
अध्याय ६-ब्राह्मण ३
जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता। वह संवत्सर को जीत
लेता है, इसलिए वह नाश नहीं होता। वह इसके तीन भाग करके यज्ञ करता है। वह इसके तीन
भाग करके जीतता है। 'संवत्सर' का अर्थ है 'सम्पूर्ण'। 'सम्पूर्ण' नाश नहीं होता। इसलिए
उसका सुकृत भी अक्षय होता है। वह ऋतु हो जाता है और देवों को प्राप्त होता है। देवों में तो
'क्षय' है ही नहीं। इसलिए उसके लिए अक्षय सुकृत होता है। यही प्रयोजन है कि वह चातुर्मास्य
यज्ञ करता है ॥१॥
अब शुनासीर यज्ञ क्यों करना चाहिए ? साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय
पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी वह है 'शुनम्' और प्राप्त हुए 'संवत्सर' का जो रस था वह है
'सीर'। साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी और प्राप्त
हुए संवत्सर का जो 'रस' था, उन दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है, इसलिए 'शुनासीर
यज्ञ' करता है ॥२॥
इसकी यह विधि है - उत्तरवेदी नहीं बनाते। नौनी घी नहीं लेते। अग्नि का मन्थन
नहीं करते। पाँच प्रयाज होते हैं, तीन अनुयाज और एक समिष्ट यजुः ॥३॥
पहले ये साधारण पाँच हवियाँ होती हैं। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की।

३२० शतपथ ब्राह्मण
त्त्र॒ताः प्रामु॒खदन्तैरे॒वै देवा॒ वृत्रम॒घ्नन्ने॒तैरै॒व व्य॒जयन् येये॑मे॒षां वि॒त्रित्ति॒स्तां तयोऽहृ॒-
वेष॒ तेषां चैव दे॒वाना॒ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धैरी॑जानानां॒ विजि॑ग्यानानां॒ य उ॑ च सं॒-
वत्सर॑स्य प्र॒जितस्य॒ रस॒ आसी॒त्तमे॒वैतदु॒भयं॒ परि॒गृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॒द्वा ए॒तानि॑
पञ्च॒ ह॒वीꣳ॑षि भवन्ति ॥४॥ अथ शुनासी॒रीयो॑ द्वादशकपालः पुरो॒डाशो॑ भवति ।
स बन्धु॑: शुनासी॒र्य॑स्य॒ यं पूर्व॑मवोचाम ॥५॥ अथ वाय॒व्यं॑ पयो॑ भवति । पयो॒ ह
वै प्र॒जा जाता॒ अभि॒संज्ञा॑नते विजिग्या॒नं मा॒ प्रजा॑: श्रिये॒ यश॑सेऽन्ना॒द्याया॒भिसंज्ञा॑-
न

का० २, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३२१
इन्हीं के द्वारा दोनों ओर से वरुण के पाश से प्रजा को छुड़ाया। इन्हीं से देवों ने वृत्र को मारा।
इन्हीं से उनको यह विजय मिली जो उनको प्राप्त है। इन्हीं के द्वारा साकमेध यज्ञ करनेवाले
और (वृत्र को) जीतनेवाले देवों की जो श्री थी और जो प्राप्त हुए संवत्सर का रस था, उन
दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है। इसीलिए इन पाँच हवियों से यज्ञ करता है ॥४॥
अब शुनासीर्य पुरोडाश बारह कपालों का होता है। शुनासीर्य यज्ञ के विषय में पहले कह
ही दिया गया ॥५॥
वायु के लिए दूध की आहुति होती है। प्रजा उत्पन्न होते ही दूध पीती है। वह सोचता
है कि मुझ जीते हुए को प्रजा प्राप्त होवे। श्री, यश, अन्न, मेरा हो। इसलिए दूध की आहुति
होती है ॥६॥
वायु के लिए क्यों आहुति होती है ? यह जो चलता है यह वायु ही तो है। इसी के द्वारा
तो वर्षा होती है। वर्षा से औषध होती हैं। औषध खाकर और जल पीकर ही तो जल में से दूध
होता है। इसलिए (वायु से) ही दूध होता है, इसलिए वायु के लिए आहुति देता है ॥७॥
अब एक कपाल का पुरोडाश सूर्य के लिए। यह सूर्य ही तो है जो तपता है। यही तो
सबकी रक्षा करता है; कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यही सबको धारण करता है;
कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यह सोचता है कि 'मैं विजयी हो गया। अब वह प्रसन्न
होकर 'साधु' द्वारा मेरी रक्षा करे। साधु द्वारा धारण करे।' इसलिए सूर्य का एक कपाल का
पुरोडाश होता है ॥८॥
इसकी दक्षिणा है सफेद घोड़ा। इसलिए उस तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है। यदि
सफेद घोड़ा न मिले तो सफेद गौ ही होवे। इस प्रकार वह तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है ॥६॥
जब यह साकमेध यज्ञ करे तभी शुनासीर यज्ञ करे। वर्ष में तीन बार करने से सम्पूर्णता
मिल जाती है। इसलिए कभी कर ले ॥१०॥
कुछ लोग रात्रि को लेना चाहते हैं। यदि वह रात्रि को लेना चाहे तो जब सामने
आकाश में फाल्गुनी पूर्णमासी दिखाई पड़े उस समय शुनासीर यज्ञ को करे ॥११॥
अब वह दीक्षा लेवे कि कहीं फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के न रह जाय, क्योंकि यदि
फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के गुजर जायगी तो उसको फिर प्रयोग करना पड़ेगा। इसलिए
फाल्गुनी पूर्णमासी बिना सोम यज्ञ के नहीं गुजरनी चाहिए। यह उसके लिए जो (चातुर्मास्य
आहुतियों को) छोड़ बैठता है ॥१२॥
जो (चातुर्मास्य यज्ञ) फिर करना चाहता है, उसे फाल्गुनी पूर्णमासी के पहले दिन
शुनासीर यज्ञ करना चाहिए, दूसरे दिन वैश्वदेव यज्ञ, फिर पौर्णमास यज्ञ। यह उसके लिए है