शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
४४२ शतपथ ब्राह्मण
भ्य॒ आस॑ङ्गा॒दिभ्यां॑ चक्रुस्तान्द॑क्षिण॒तोऽसु॑रर॒क्षसान्या॑सेदु॒स्तान्स॒दसॊ ऽनि॑गु॒स्तेषां॑मे-
तान्धि॒ष्ण्यानु॑द्वाप॒यां च॑क्रु॒र्द्धऽए॒तेऽन्तः॑सद॒सं ॥२७॥ सर्वे॑ ह॒ स्म वा॒ऽए॒ते पु॒रा ज्वल॑-
न्ति । य॒थायमा॑हव॒नीयो॑ य॒था गा॑र्हप॒त्यो य॒थाग्नी॑ध्रीयस्तद्यत्त॒ ए॒नानु॑द्वाप॒यंस्तत॑
ऎवैतन्न॒ ज्वल॑न्ति ताना॒ग्नीध्र॑म॒भि स॑ꣳरुरुधुस्ता॒नप्य॑र्धमा॒ग्नीध्र॑स्य नि॒गुस्ततो॒ विश्वे॑ दे॒-
वा॒ अमृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॑द्धि॒ष्ण्यदे॒वम् ॥ २८॥ तान्दे॒वाः प्रति॒समै॑न्धत । यथा॒ प्रत्यव॒-
स्येत्तस्मा॑दिनात्स॒वने॑-सवनऽए॒व प्रति॒समि॑न्धते॒ तस्मा॒द्यः स॑मृ॒द्धः स आ॑ग्नी॒ध्रं कुर्या॒-
द्यो वै ज्ञातो॒ऽनूचा॑नः स स॑मृ॒द्धस्तस्मा॑दग्नी॒धे प्र॑थमाय॒ दक्षि॑णां नयन्त्य॒तो हि वि॑-
श्वे दे॒वा अ॒मृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॒द्यं दी॒क्षिता॑नामब॒ल्यं वि॒न्देदा॑ग्नी॒ध्रमेनं॑ नयतेति ब्रू-
यात्तद॒नार्तं॒ तन्ना॑रिष्यतीति॒ तद्यदतो॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॒मृत॑त्वमपा॒जयँ॒स्तस्मा॑द्धि॒ष्ण्यदे॒वम्
॥२१॥ ब्राह्मणम् ॥५ [६.१]॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३२ ॥ ॥
वि॒ज्ञाता॑नो॒ हैवास्य॑ धिष्ण्या॑: । इ॒मे सम॒ङ्गा ये वै सम॒ङ्गास्ते वि॒ज्ञातान एत॒ऽउ
है॒वास्यै॒तऽआ॒त्मनः॑ ॥ १॥ दिवि॒ वै सोम॑ आसीत् । अथेदू॒ देवा॑स्ते दे॒वा अ॑काम-
यन्ता नः सोमो गच्छेत्तेनागतेन यजेमहीति त॒ऽएते॑ मा॒येऽअ॑सृजन्त सुप॒र्णीं च॑ क॒द्रूं
च वागे॒व सु॑प॒र्णीयं क॒द्रूस्ताभ्याँ॑ सम॒दं चक्रुः॑ ॥२॥ ते ह॒न्ती॒यमाने॑ऽऊचतुः ।
यत॑रा नौ द्वयोः॑ परा॒पश्या॒दात्मा॑नं नौ सा जया॒दिति॒ तथे॑ति सा ह क॒द्रूरु॑वाच
परे॑क्ष॒स्वेति॑ ॥३॥ सा ह सुप॒र्ण्यु॑वाच । अस्य सलिलस्य पा॒रेऽश्वः॑ श्वे॒त स्थाणौ॑
सेव॑ते तम॒हं प॑श्या॒मीति॒ तमे॑व त्वं प॑श्यसीति तꣳ हीत्यथ ह क॒द्रूरु॑वाच तस्य॑
वालो॒ न्य॑ष॒ञ्जि तम॒मुं वातो॑ धूनोति तम॒हं प॑श्या॒मीति॑ ॥४॥ सा यत्सु॑प॒र्ण्यु॑वाच ।
अस्य सलिलस्य पा॒रेऽश्व॒इति॑ वे॒दिर्वै स॑लिलं वे॒दिमे॑व सा तदु॑वाचाश्वः श्वे॒त स्थाणौ॑
सेवत॒ऽइत्य॒ग्निर्वाऽअ॑श्वः श्वे॒तो यूप॑ स्था॒णुरथ॒ यत्क॒द्रूरु॑वाच तस्य॒ वालो॒ न्य॑ष॒ञ्जि
तम॒मुं वातो॑ धूनोति तम॒हं प॑श्या॒मीति॑ रश॒ना हैव सा ॥५॥ सा ह सुप॒र्ण्य॑वा-
च । एही॒दं प॑ताव वे॒दितुं॒ यत॑रा नौ जय॑तीति॒ सा ह क॒द्रूरु॑वाच त्वमे॒व पत॒ त्वं
का० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, कं० २७-२६ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४४३
राक्षसों ने दक्षिण से आक्रमण किया और सदस् से निकाल दिया, और सदस् के भीतर जो
'धिष्ण्यः' (कुण्ड) थे उनको उलट दिया ॥२७॥
पहले ये सब कुण्ड ऐसे ही जलते थे जैसे यह आहवनीय या गार्हपत्य या आग्नीध्रीय ।
जब से उन्होंने इनको उलट दिया तब से ये नहीं जलते । उन (राक्षसों) ने (देवों को) आग्नी-
ध्रीय अग्नि तक रोक दिया । उनसे आग्नीध्रीय अग्नि का आधा भाग जीत भी लिया। वहीं से
देवों ने अमरपन को प्राप्त किया। इसलिए 'आग्नीध्रीय अग्नि' सब देवों की हो गई ॥२८॥
देवों ने उनको फिर जला लिया, क्योंकि उनका वहाँ रहना था। इसलिए प्रत्येक सोम-
याग में इनको जलाया जाता है। इसलिए जो समृद्ध (पूर्ण योग्य) हो वही आग्नीध्र का काम
करे । समृद्ध वह होता है जो ज्ञानी और वेदपाठी हो। पहले आग्नीध्र के पास दक्षिणा ले जाते
हैं। सब देवों ने यहीं अमरत्व की प्राप्ति की थी। अगर दीक्षित लोगों में किसी प्रकार की निर्बलता
(अबल्य) आ जाय तो अध्वर्यु कहे— 'इसको आग्नीध्र के पास ले जाओ।' चूंकि वह अनार्त या
दुःखरहित है इसलिए उसको भी वहाँ दुःख न होगा। चूंकि यहाँ सब देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ
इसलिए यह 'सब देवों का' है ॥२६॥
अध्याय ६—ब्राह्मण २
धिष्ण्याँ (कुण्ड) यजमान के विजामान होते हैं, क्योंकि ये समङ्क होते हैं। जो समङ्क
हों उनको विजामान कहते हैं । (समङ्क या विजामान वे वस्तुएं होती हैं जिनके अङ्ग एक-दूसरे
के अनुकूल होते हैं, जैसे यदि मनुष्य के सिर है तो धिष्णी का भी सिर है। यदि मनुष्य के आँख है
तो धिष्णी की भी आँख है। अर्थात् एक-एक अङ्ग के स्थान में दूसरा अङ्ग होना)। उसके धड़
के अङ्ग ये हैं—॥१॥
सोम द्यौलोक में था और देव इस लोक में। देवों ने कामना की कि सोम हमारे पास आ
जावे और उस आये हुए सोम के साथ हम यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं-सुपर्णी और कद्रू।
सुपर्णी वाणी थी और कद्रू यह भूमि । उन्होंने उनके बीच में झगड़ा करा दिया ॥२॥
तब वे झगड़ने लगीं, 'जो हममें से सबसे दूर की चीज देख लेगी वही दूसरी पर विजय
पायेगी।' कद्रू ने कहा, 'अच्छा, देख' ॥३॥
सुपर्णी ने कहा—'इस सलिल के उस पार एक श्वेत घोड़ा एक खम्भे के पास खड़ा है।
मैं उसे देख रही हूँ। क्या तू भी उसको देखती है ?' कद्रू ने कहा—'मैं देखती हूँ । उसकी पूंछ
अभी लटक रही थी। मैं देखती हूँ कि वायु इस समय उसको हिला रही है' ॥४॥
अब जब सुपर्णी ने कहा—'उस सलिल के उस पार' तो सलिल का अर्थ था वेदी ।
उससे उसका तात्पर्य वेदी से था। 'खम्भे के पास एक सफेद घोड़ा खड़ा है।' श्वेत घोड़े से तात्पर्य
यज्ञ का है और खम्भे से यज्ञ-यूप का। कद्रू ने जो कहा था कि 'इसकी पूंछ अभी लटक रही थी,
अब उसको वायु हिला रहा है। मैं उसे देख रही हूँ' यह केवल रस्सी थी ॥५॥
तब सुपर्णी ने कहा— 'चलो वहाँ तक उड़ चलें और देखें कि हममें से किसकी जीत हुई ।'
४४४ शतपथ ब्राह्मण
वै॒ न ग्राख्यास्यसि॒ यतरा॑ नौ॒ जयतीति॑ ॥ ६॥ सा॒ ह॒ सुपर्णी॒ पपात॒ । तद्ध॒ तथै॒-
वास॒ यथा॒ कद्रूरु॒वाच ता॒मागता॒मभ्युवा॑द॒ त्वमजैषी॒३रह३मिति॒ त्वमिति॒ होवा॒चै-
तदाख्यानं७ सौपर्णिकाद्रव॒मिति॑ ॥ ७॥ ॥ श॒तम् १६०० ॥ ॥ सा॒ ह॒ कद्रूरु॑वाच ।
आत्मानं॒ वै॒ व्यैतिष्ठं॑ दि॒व्यसौ॒ सोम॒स्तं दे॒वेभ्य॒ आहर॒ तेन॑ दे॒वेभ्य॑ आ॒त्मानं॒ नि-
ष्कीणीष्वेति॒ तथेति॒ सा॒ छन्दाꣳसि॑ ससृजे॒ सा॒ गायत्री॑ दि॒वः सोम॑माह॒रत् ॥ ८॥
हिरण्मयो॑र्ह कु॒श्योर॒न्तरव॑हित॒ आस॑ । ते॒ ह॒ स्म॒ नुरपवी॒ निमे॒षं-नि॑मे॒षम॑भि॒सं-
धत्तो दीक्षात्तपसौ॒ हैव॒ तेऽआ॑सतु॒स्तमे॒ते ग॑न्ध॒र्वाः सो॑म॒रक्षा जु॑गुपु॒रिमे॑ धि॒ष्ण्या इ-
मा होत्राः॑ ॥ ९॥ तयो॒रन्य॑तरां कु॒शीमा॑चिखेद । तां दे॒वेभ्यः॒ प्रद॑दौ॒ सा दीक्षा॒ त-
या देवा॒ अदी॑क्षन्त ॥ १०॥ अथ द्वितीयां कुशीमाचिखेद । तां देवेभ्यः प्रददौ तत्त्-
पस्तया देवास्तप उपायन्नुपसदस्तपो॒ ह्युपसदः ॥ ११॥ खदिरेण ह सोममाचखा-
द । तस्मात्खादिरो यदेनेनाखिदत्तस्मात्खादिरो यूषो भवति खादिरु स्फ्योऽहावा-
कस्य॒ हैन॑ गोपायतां॒ जहा॑त् सो॒ऽहावा॑को॒ऽही॑यत ॥ १२॥ त॒मिन्द्रा॒ग्नीऽअ॑नु॒समत॑-
नुताम् । प्रजा॑नां॒ प्रता॑त्यै॒ तस्मा॑दिन्द्रा॒ग्नीऽअ॑हावा॒कः ॥ १३॥ तस्मा॑द्दीक्षि॒ता रा॒जानं॑
गोपायन्ति । नेन्नो॒ऽपह्रा॒निति॒ तस्मा॒त्तत्र॑ सु॒गुप्तं॑ चिकी॒र्षेद्यस्य॑ ह गोप॒नाया॑मप॒-
हरन्ति॒ हीय॑ते ह ॥ १४॥ तस्मा॑द्ब्रह्मचा॒रिण॒ आचा॒र्य्यं गो॑पायन्ति । गृ॒हान्पश्य॑न्नेन्नो
ऽपह्रानिति तस्मात्तत्र सुगुप्तं चिकीर्षेद्यस्य ह गोपनायामपहरन्ति हीयते ह
तैनैतेन सुपर्णी देवेभ्य आत्मानं निष्क्रीणीत तस्मादाहुः पुण्यलोक ईज्ञान इ-
ति ॥ १५॥ अथाठ् ह वै पुरुषो जायमान एव । मृत्योरात्मना जायते स यद्यजते
यथैव तत्सुपर्णी देवेभ्य आत्मानं निष्क्रीणीतैवमेवैष एतन्मृत्योरात्मानं निष्क्री-
णीते ॥ १६॥ तेन देवा अयजन्त । तमेते गन्धर्वाः सोमरक्षा अन्वाजग्मुस्तेऽन्वा-
गत्याब्रुवन्नु नो यज्ञोऽयामन्नत मा नो यज्ञादन्तर्गातास्त्वेव नोऽपि यज्ञे भाग इति
॥ १७॥ ते होचुः । किं नस्ततः स्यादिति यथैवास्यामूत्र गोप्तारोऽभूमैवमेवास्या-
कां० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१८ शतपथब्राह्मण / ४४५
कद्रू ने कहा-'तुम्हीं जाओ और बता देना कि हममें से किसकी विजय हुई' ॥६॥
सुपर्णी वहाँ तक उड़ी और कद्रू ने जो कहा था वही ठीक निकला । जब वह वापस आई
तो कद्रू ने उससे पूछा- 'तुम जीतीं या मैं ?' उसने कहा 'तुम ।' इसको 'सौपर्णी-काद्रव
व्याख्यान कहते हैं ॥७॥ [शतम् १६००]
तब कद्रू ने कहा- 'सचमुच मैंने तुमको जीत लिया । द्यौलोक में सोम है, उसको देवों के
लिए ले आओ। और देवों के ऋण से मुक्त हो ।' यथास्तु । वह छन्दों को लाई । वह गायत्री
द्यौलोक से सोम को ले आई ॥८॥
वह (सोम) दो सोने के प्यालों के बीच में था। आँख मारते में ही वे प्याले तेज किनारो
द्वारा बन्द हो जाते थे। ये थे दीक्षा और तप । उन पर सोमरक्षक गन्धर्व देखभाल रखते थे। यही
धिष्ण्यां हैं, यही होता ॥९॥
उसने इनमें से एक प्याले को खोला और देवों को दे दिया। यह दीक्षा थी। इसी से देवों
ने अपने को दीक्षित किया ॥१०॥
अब उसने दूसरे प्याले को खोला और देवों को दिया। यही 'तप' था। इससे देवों ने
तप किया अर्थात् उपसद, क्योंकि उपसद ही तप है ॥११॥
उसने खदिर की लकड़ी से सोम को लिया (आच्छखाद), इसलिए उनका खदिर नाम
पड़ा । और चूँकि उसी के द्वारा उसने सोम को लिया, इसलिए यूप और स्फ्या खदिर की लकड़ी
के होते हैं। जब वह अच्छावाक के सुपुर्द था तब वह उसे ले गई । इसीलिए 'अच्छावाक' को सोम-
पान का अधिकार नहीं ॥१२॥
इन्द्र और अग्नि ने प्रजाओं की उत्पत्ति के लिए उसको स्थित रक्खा, इसलिए अच्छावाक्
इन्द्र और अग्नि का होता है ॥१३॥
इसीलिए दीक्षित पुरुष ही सोम राजा की रक्षा करते हैं कि गन्धर्व कहीं इसको ले न
जायें। इसलिए उचित है कि उसकी भलीभांति रक्षा की जाय। क्योंकि जिस किसी की सुपुर्दगी
में से वे सोम को ले-जायेंगे, वही (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ॥१४॥
इसीलिए ब्रह्मचारी लोग अपने आचार्य, उसके घर तथा पशुओं की रक्षा करते हैं कि
कहीं वे उसको ले न जायें। इसलिए उस (सोम) की बड़ी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि जिस
किसी की सुपुर्दगी में से वे ले जायेंगे उसी को (सोमपान से) बहिष्कृत कर दिया जायगा ।
इसी के द्वारा सुपर्णी ने देवों के ऋण से छुटकारा पाया, इसलिए कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले पुण्य-
लोक को प्राप्त होते हैं ॥१५॥
पुरुष जब पैदा होता है तभी मृत्यु का ऋणी होता है। और जब वह यज्ञ करता है तो
मृत्यु के ऋण से छूटता है, जैसे सुपर्णी देवताओं के ऋण से छूट गई ॥१६॥
देवों ने (सोम के साथ) यज्ञ किया । सोमरक्षक गन्धर्वों ने उसका अनुसरण किया और
आकर कहने लगे- 'हमको यज्ञ में भाग दो। हमको यज्ञ से बाहर मत करो। यज्ञ में हमारा भी
भाग होना चाहिए' ॥१७॥
उन्होंने कहा-'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'जैसे उस लोक
४४६ शतपथ ब्राह्मण
पी॒थु गो॒प्तारो॑ भविष्याम॒ इति॑ ॥ १८॥ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवन् । सो॒म॒क्रय॑णा व॒ इ-
ति॒ ताने॑भ्य ए॒तत्सोमक्रय॒णान॒नुदि॑शत्यथैनान॒ब्रुवंस्तृ॒तीयसवने वो घृ॒त्याहु॑तिः प्रा-
प्त्स्यति॒ न सौम्याप॑हतो॒ हि यु॒ष्मत्सोम॑पीथ॒स्तेन॒ सोमाहु॑तिं॒ नार्ह॒थेति॒ सैनाने॑षा
तृ॒तीयसवन॒ऽएव घृ॒त्याहु॑तिः प्राप्नोति॒ न सौम्या य॒द्धालाकैर्र्धिष्ण्यानव्याघा॒रय॑ति
॥ १९॥ अ॒थ यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्गो॒ऽविष्यतीति॒ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति॒ तदे॒नानव॑तय॒-
यद॒दः सोमं॒ बिभ्र॑त उप॒र्युप॑रि चरि॒ष्यन्ति॒ तद्गो॒ऽविष्यती॑ति॒ स य॒देना॒न्त्सोमं॒ बिभ्र॑त
उप॒र्युप॑रि चर॑न्ति॒ तदे॒नानव॑ति तस्माद॒ध्व॒र्युः सम॑या धिष्ण्या॑ना॒तीया॒दध्व॒र्युर्हि॒ सोमं॒
बिभ॑र्ति॒ तन्मैते॒ व्या॑त्सि॒न प्रत्या॑सते॒ स ह्ये॑षां॒ व्यात्त॒माप॑द्येत तम॒ग्निर॒भिद॑हेद्यो वा-
ऽयं दे॒वः प॒शूनामी॒ष्टे स वा॒ ह्येनम॒भिमन्येत॒ तस्माद्य॒द्यध्व॑र्युः शाला॒या॒मर्धः स्यादु-
त्तरे॑णैवाग्नीध्री॒य॒ꣳ संच॑रेत् ॥ २०॥ ते वाऽए॒ते । सोम॑स्यैव गु॒प्त्यै न्यु॒प्ताऽआ॑हव-
नीयः पु॒रस्तान्मार्जालीयो दक्षि॑णत आग्नीध्री॒य उत्त॑रतो॒ऽथ ये सद॑सि॒ ते प॒श्चात्
॥ २१॥ तेषां वाऽअर्धानुपकिर॑न्ति । अर्धान॒नुदि॑शन्त्ये॒तऽउ॒ ह्ये॑वैतद्दधि॒रेऽर्धान् उप॑-
किरन्त्वर्धान॒नुदि॑शन्तु॒ तया॒ यस्मा॑ल्लो॒कादाग॑ताः स्मो दि॒वस्तथा॒ तं लो॒कं प्रति॒प्र
ज्ञास्याम॒स्तथा॒ न क्षिक्षा॑ ऋष्याम॒ इति॑ ॥ २२॥ स या॒नुप॑किरन्ति । तेना॒स्मिंल्लोके
प्रत्यञ्चो॑ भवन्त्यथ यान॒नुदि॑शन्ति॒ तेना॒मुष्मिँल्लो॒के प्रत्यञ्चो॑ भवन्ति ॥ २३॥ ते॑ वै द्वि-
नामानो भवन्ति । ए॒तऽउ॒ ह्ये॑वैतद्द॑धिरे न वाऽए॒भिर्नामा॑भि॒रात्स॒ येषां नः सो-
म॒मपाहु॒र्हन्त॑ द्वितीया॑नि॒ नामा॑नि कर॒वामहा॒ऽइति॒ ते द्वितीया॑नि॒ नामा॒न्यकु॑-
र्वत तैर॒राध्नुव॒न्यानप॑हृतसोमपीथा॒त्सन्तो॒ऽथ य॒ज्ञऽआ॒भवं॒स्तस्माद्विना॑मानस्तस्मा॒द्वा-
क्ष्ण्यो॒ऽनूच्य॑माने द्विती॑यं ना॑म कुर्वन्ति॒ राध्नो॑ति ह्यैव॒ य ए॒वं वि॒द्वान्द्विती॑यं॒ नाम॑
कुरु॒ते ॥ २४॥ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्दे॒वेषु॑ जुहोति॒ तस्माद्देवाः स॒न्त्यथ॒ यत्स॒दसि॑
भ॒क्षय॑न्ति॒ तन्मनु॑ष्येषु जुहोति॒ तस्मान्मनु॑ष्याः सन्त्यथ॒ यद्धविर्धानयोर्ना॒राश॒ꣳसाः
सीद॑न्ति॒ तत्पि॒तृषु॑ जुहोति॒ तस्मात्पि॒तरः॑ सन्ति ॥ २५॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽनन्वाभ-
का० ३, अ० ६, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ४४७
में हम उसके रक्षक रहे उसी प्रकार इस भूमि पर भी रक्षक रहेंगे' ॥१८॥
देवों ने कहा—'अच्छा।' जब वह कहता है—'यह है सोम की मजदूरी।' तो इससे सोम
के मोल से तात्पर्य है। फिर उन्होंने कहा—'तीसरे सवन में जो घी की आहुति दी जायगी वह
तुम्हारी होगी। सोम का पान तुमसे छीन लिया गया है। इसलिए तुम सोम की आहुति के
अधिकारी नहीं रहे। इसलिए सायंकाल के तीसरे सवन में कुण्ड में लकड़ियों पर जो घी की
आहुति दी जाती है वही इनकी होती है, सोम की आहुति नहीं ॥१९॥
'और जो आहुति घी में दी जायगी वह तुमको तृप्त कर देगी।' इसलिए जो घी में
आहुति दी जाती है वह उनको तृप्त कर देती है। 'और वह जो सोम को चमचों के लिए ऊपर-
ऊपर फिरायेंगे उनसे इसकी तृप्ति होगी।' इसलिए यह जो सोम को चमचे में भरकर ऊपर-ऊपर
फिराते हैं उनसे इसकी तृप्ति होती है। इसलिए अध्वर्यु को चाहिए कि कुण्डों के बीच से न गुजरे
क्योंकि वह सोम के लिए होता है और वे (कुण्ड) सोम के लिए मुँह खोले बैठे होते हैं, और
वह उनके मुँह में घुस जायेगा। इसलिये या तो उसको अग्नि जला देगा या जो देव पशुओं का
अधिष्ठाता है (पशुपति, रुद्र) वह उसको पकड़ लेगा। इसलिये जब कभी अध्वर्यु का शाला में
कुछ काम हो तो वह आग्नीध्रीय अग्नि के उत्तर की ओर होकर जावे ॥२०॥
ये कुण्ड सोम की रक्षा के लिए बनाये जाते हैं—आगे आहवनीय, दाईं ओर मार्जालीय,
बाईं ओर आग्नीध्रीय और पीछे की ओर सदस् ॥२१॥
इनमें से आधे को मिट्टी डालकर ऊँचा करते हैं और आधे की ओर केवल संकेत करते
हैं। उन्हीं का यह आग्रह था कि हममें से आधों को ऊँचा करो, आधों की ओर संकेत करो।
(यहाँ 'अनुदिशन्तु' का अर्थ समझ में नहीं आया) इस प्रकार हम उस द्युलोक को जान लेंगे
जहाँ से हम आये हैं, और हम बहक न सकेंगे ॥२२॥
जो ऊँचे किये गये वे इस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं, और जिनकी ओर संकेत करते हैं वे
उस लोक में प्रत्यक्ष होते हैं ॥२३॥
उनके दो नाम होते हैं। वस्तुतः यह उन्हीं का आग्रह था कि 'हम इन नामों से फलीभूत
नहीं हुए क्योंकि हमसे सोम ले लिया गया। अब हम दूसरे नाम रख लें।' उन्होंने दूसरा नाम
रख लिया। इससे वे सफल हो गये, क्योंकि जो सोम से वंचित हो चुके थे उनको यज्ञ में भाग
मिल गया। इसलिये दो नाम होते हैं। इसलिए यदि कोई ब्राह्मण सफल न होता हो तो दूसरा
नाम रख ले। जो इस रहस्य को समझकर दूसरा नाम रख लेता है वह फलीभूत हो जाता
है ॥२४॥
वह अग्नि में जो आहुतियां देता है वह देवों के प्रति देता है। इसी से देव स्थित रहते
हैं। और जो सदस् में खाते हैं वे मनुष्यों के प्रति देते हैं। उससे मनुष्यों की स्थिति है। हविर्धानों
में जो नाराशंस बैठते हैं वे पितरों के प्रति होते हैं। उनसे पितरों की स्थिति है ॥२५॥
अब जो ऐसी प्रजा बच रही जिसका यज्ञ में कोई भाग ही नहीं है, वह तो कहीं की नहीं