शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-३
क्तावाकायेति सूक्तवाकꣳ होता प्रतिपद्यतेऽथैताऽउभावेव प्रस्तरौ सम्प्रगृह्णपतऽउ-
भावनुप्रहरत उभौ तूष्णीमपगृह्योपासाते यदा होता सूक्तवाकमाह ॥ ४२ ॥ अ-
ग्नीदग्नीदन्वनुप्रहरेति । ताऽउभावेवानुप्रहरत उभावात्मानाऽउपस्पृशेते ॥ ४३ ॥
अथाह संवदस्वेति । अगान॒ग्नीद॒ग्नीदगन्नाव॒य॒ श्रौष॒ट् स्वगा॒ दैव्या॒ होतृ॑भ्यः स्व॒स्तिर्मा॑नुषेभ्यः शं योर्ब्रूहीत्यध्वर्यु॑रे॒वैतदा॑ह ताऽउभावेव परिधी॒ननु॑प्रहरत उभौ स्रुचः स-
म्प्र॒गृह्य॑ स्फ्यं सादयतः ॥ ४४ ॥ अथाध्वर्यु॑रेव प्रतिपरेत्य । पत्नीः संयाजयत्युपास्त
ऽएव प्रतिप्रस्थाता पत्नीः संयाज्यो॑दित्यध्वर्युः ॥ ४५ ॥ त्रीणि समिष्टयजूंषि जुहो-
ति । तूष्णीमेव प्रतिप्रस्थाता स्रुचं प्रगृह्णाति तयो वैश्वदेवेन यजमानयोर्वाससी
परिहिते स्यातां तेऽएवात्रापि स्यातामथास्ये वारु॒ण्ये पयस्या॑यै क्षा॒मकर्ष॑मवभृथा-
दायावभृथं यन्ति वरु॒ण्यं वाऽए॒तन्निर्व॑पन्तायि तत्र न साम गीयते न ह्यत्र साम्ना
किं च॒न क्रि॑यते तू॒ष्णीमे॑वे॒त्याभ्य॑वे॒त्योप॑मापयति ॥ ४६ ॥ अव॑भृथ निचुम्पुण । नि-
चेरुरसि निचुम्पुणः । अव॑ दे॒वैर्देव॑कृत॒मेनो॑ऽयासिष॒मव॒ मत्र्यै॑र्मर्त्यकृतं पुरु॒रावाणो॑
देव रिषस्पाहीति कामं हैते यस्मै कामयेत तस्मै दद्यान्न हि दीक्षितावसने भ-
वतः स यथाल्त्विचौ निर्मुच्येतैवꣳ सर्वस्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते ॥ ४७ ॥ अथ केश-
श्मश्रू॒ वप॑ते । समा॒रोप्या॒ग्नीऽउ॑द्वसायै॒व ह्येते॑न॒ यज॑ते न॒ हि तद॑वकल्पते॒ यदु॑त्तर-
वेद्या॑मग्निहो॒त्रं जुहु॑या॒त्तस्मा॑दु॒द्वस्य॑ति गृ॒हान्प॒रा निर्म॑न्थ्या॒ग्नी पौर्णमा॒सेन॑ यजत
ऽउत्स॑न्नय॒ज्ञ-इ॑व वा॒ऽए॒ष यच्चातु॑र्मास्या॒न्यथै॑ष क्लृ॒प्तः प्रति॑ष्ठितो य॒ज्ञो यत्पौर्णमा॒सं
तत्क्लृ॒प्तेनै॒वैतद्य॒ज्ञेना॒न्तः प्रति॑तिष्ठति॒ तस्मा॑दु॒द्वस्य॑ति ॥ ४८ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [५.
२] ॥ ॥
वरुणप्रघासैर्वै प्रजापतिः । प्रजा वरुणपाशात्प्रामुञ्चत्ताः स्यानमीवा अकि-
ल्विषाः प्रजाः प्राजायतयैतैः साकमेधैरेतैर्वै देवा वृत्रमघ्नन्नेतैरेव व्यजयन्त ये-
यमेषां विजितिस्तां तथोऽएवैष एतैः पाप्मानं द्विषन्तं भ्रातृव्यꣳ हन्ति तयै...
कां० २, अ० ५, ब्रा० २-३, कं० ४२-४८ व १ शतपथब्राह्मण / २६३
| लिए।' अब होता सूक्तवाक् कहता है। इस पर दोनों प्रस्तरों को लेकर (आग में) डाल देते हैं।
दोनों एक तृण लेकर (आग के पास) बैठे रहते हैं। अब होता सूक्तवाक् को कहता है ॥४२॥
आग्नीध्र कहता है, 'अनुप्रहर (डाल)।' दोनों डालते हैं और अपने शरीर का स्पर्श
करते हैं ॥४३॥
अब आग्नीध्र कहता है, '(मुझसे) संवाद कर।' अध्वर्यु कहता है, 'आग्नीध् ! क्या वह
गया ?' 'हाँ वह गया।' 'यहाँ देवताओं को सुनाओ।' 'वे सुनें।' 'दैवी-होता विदा हों। मनुष्य-
होता का कल्याण हो।' अब अध्वर्यु होता से कहता है, 'शान्ति कह।' वे दोनों परिधियों को फेंक
देते हैं, और दोनों स्रुचों को मिलाकर स्फ्य पर रख देते हैं ॥४४॥
अब अध्वर्यु (गार्हपत्य अग्नि के पास) लौटकर 'पत्नी संयाज' करता है। प्रतिप्रस्थाता
ठहरा रहता है। अध्वर्यु पत्नी-संयाज करके उत्तर की ओर चला जाता है ॥४५॥
अब अध्वर्यु तीन समिष्ट-यजुष् की आहुति देता है। प्रतिप्रस्थाता स्रुच लेकर मौन होकर
आहुति देता है। यजमान और पत्नी ने जो वस्त्र वैश्वदेव के समय पहने थे वे अब भी पहनें।
अब वरुण की पयस्या के जले भाग को लेकर अवभृथ अर्थात् स्नान के स्थान में आवें। यह
(स्नान) वरुण के लिए है जिसके पाश से छूट जाय। वहाँ साम नहीं गाया जाता क्योंकि साम से
तो कुछ किया नहीं जाता। अध्वर्यु चुपके से वहाँ जाकर (जले भाग के पात्र को) जल में डुबो
देता है ॥४६॥
अब वह कहता है, "अवभृथ निचुम्पुण निचेरुरसि निचुम्पुणः। अव देवैर्देवकृतमेनोऽया-
सिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि" (यजु० ३।४८) — "हे धीरे चलनेवाले जलाशय,
तू चुपके-चुपके चलता है। देवों की सहायता से इन देव-कृत पापों से छूट जाऊँ और मनुष्यों की
सहायता से मनुष्य-कृत पापों से। हे देव, मुझे राक्षस से बचा।" (स्नान के समय के वस्त्रों को)
मन चाहे किसी (पुरोहित) को दे देवे, क्योंकि ये वस्त्र दीक्षित पुरुष के तो होते ही नहीं। जैसे
साँप केंचुल छोड़ता है, इसी प्रकार यह पापों को छोड़ता है ॥४७॥
अब यजमान के बाल और दाढ़ी बनाते हैं। अब दोनों अग्नियों को लेते हैं, क्योंकि जगह
बदलकर ही दूसरा यज्ञ होता है। उत्तर वेदी पर अग्निहोत्र करना ठीक नहीं। अब घर जाकर
अग्नि मथकर वह पूर्णमासी का यज्ञ करता है। यह चातुर्मास्य यज्ञ अलग है, पूर्णमासी का निश्चित
यज्ञ है। इसलिए वह निश्चित यज्ञ द्वारा अपने को स्थापित कर लेता है। इसीलिए वह जगह
बदलता है ॥४८॥ (वर्षाकाल का वरुण-प्रघास पर्व समाप्त)
अध्याय ५—ब्राह्मण ३
वरुण-प्रघास के द्वारा प्रजापति ने प्रजा को वरुण के जाल से छुड़ाया, और प्रजा रोग-
रहित और दोषरहित उत्पन्न हुई। और इन 'साकमेध' आहुतियों के द्वारा देवों ने वृत्र को मारा
और उस विजय को प्राप्त किया जिसको वे इस समय भोग रहे हैं। उसी प्रकार यह (यजमान)
भी अपने पापी शत्रुओं और अहितैषियों को मारता है और उन पर विजयी होता है। इसीलिए
२९४ शतपथ ब्राह्मण
वि॒वप॑त॒ तस्मा॑द्वा॒ऽएष॒ ऋ॒तुश्च॑तु॒र्थे मासि॑ यजते॒ स वै॑ ऋतू॒मनूची॑ना॒न्हं य॑जते ॥ १ ॥
स पू॑र्वे॒द्युः । अ॒ग्नयेऽनी॑कवते॒ऽष्टाक॑पालं पुरोडाशं निर्व॑पत्य॒ग्नि॒र्ह वै देवा॒ अ-
नी॑कं कृ॒त्वा॑ऽग्रे॒प्रैयु॒र्वृत्र॒ꣳ ह॑नि॒ष्यन्तः॒ स तेजो॑ऽग्नि॒र्नाव्य॑थत॒ तथो॑ऽए॒वैष ए॒तत्पाप्मा॑नं
द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यंꣳ ह॑नि॒ष्यन्न॒ग्निमे॒वानी॑कं कु॒रुते॒ऽप्रैति॒ स तेजो॑ऽग्नि॒र्न व्य॑थते॒ तस्मा॑द-
ग्नयेऽनी॑कवते ॥ २ ॥ अथ म॒रुद्ध्यः सां॑तप॒नेभ्यः॑ । मध्यन्दिने च॒रुं निर्व॑पति म॒रुतो
ह॒ वै सां॑तप॒ना मध्य॑न्दिने वृ॒त्रꣳ संते॑पुः॒ स संत॑प्तो॒ऽन्तरे॑व प्रा॒णान्य॑रिरीर्णः शि॒श्ये
तथो॑ऽए॒वैत॑स्य पा॒प्मानं॑ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं म॒रुतः सां॑तप॒नाः सं॑तपन्ति॒ तस्मान्म॒रुद्ध्यः॑
सां॑तप॒नेभ्यः॑ ॥ ३ ॥ अथ म॒रुद्ध्यो गृ॒हमे॑धिभ्यः । शाख॑या व॒त्सानपा॑कृ॒त्य प॒वित्र॑वति
सं॒दोह्य॒ तं च॒रुꣳ श्र॑पयति चरुरु॒ ह्येव स यत्र॒ क्व च तण्डु॑लाना॒वप॑न्ति तन्मेधो॑
दे॒वा द॑धिरे प्रात॒र्वृत्र॒ꣳ ह॑नि॒ष्यन्त॒स्तथो॑ऽए॒वैष ए॒तत्पाप्मा॑नं द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यꣳ ह-
निष्य॒न्मेधो॑ धत्ते तन्म॒त्त्स्यौद॑नो भवति मेधो॒ वै पयो॑ मेधस्तण्डु॑लास्त॒दुभयं॑ मेध-
मा॒त्मन्ध॑त्ते॒ तस्मा॑न्मा॒त्स्यौद॑नो भवति ॥ ४ ॥ तस्या॒वृत् । सैव स्ती॒र्णा वेदि॑र्भवति
या म॒रुद्ध्यः सां॑तप॒नेभ्य॒स्तस्या॑मेव॒ स्ती॒र्णायां॑ वे॒दौ प॑रि॒धीꣳश्च श॒कलां॑श्चो॒पनि॑दधति
तथा॒ संदो॑ह्य च॒रुꣳ श्र॑पयति श्रपयि॒त्वाभि॑घार्योद्वासयति ॥ ५ ॥ अथ द्वे पि॒शीले॑ वा
पा॒त्र्यौ॑ वा॒ निर्णेनि॑नक्ति । तयो॒रेने॑ द्वेधो॒द्धर॑ति तयो॒र्मध्ये॑ सर्पिरासिचने कृ॒त्वा स-
र्पिरासि॑ञ्चति स्रुवं॑ च स्रुचं॑ च॒ संमा॑ष्ट्ये॒ता॒ऽओद॑ना॒वादा॒योदै॑ति स्रुवं॑ च स्रुचं॑ चा-
दा॒योदै॑ति॒ स इ॒मामेव स्ती॒र्णां वेदि॑म॒भिमृ॑श्य प॒रिधी॒न्परि॑धाय॒ यावतः॑ श॒कलान्का-
मय॑ते॒ तावतो॑ऽभ्या॒दधा॒त्ये॑ता॒ऽओद॑नावा॒सादय॑ति स्रुवं॑ च स्रुचं॑ चासा॒दय॒त्युप॑वि-
शति॒ होता॑ होतृ॒षद॑ने स्रुवं॑ च स्रुचं॑ चाद॒दान आ॒ह ॥ ६ ॥ अ॒ग्नये॒ऽनुब्रू॒हीति॑ ।
आ॒ग्नेय॒माज्य॑भागꣳ स द॑क्षिणा॒स्यौद॑नस्य स॒र्पिरा॑सेच॒नाच्च॒तुरा॒ज्यस्या॑वदा॒याति॑क्रामत्य-
ति॑क्रम्या॒श्राव्या॑हा॒ग्निं यजे॑ति वषट्कृ॒ते जु॑होति ॥ ७ ॥ अथा॒ह सोमा॑या॒नुब्रू॒हीति॑ ।
सौम्य॒माज्य॑भागꣳ स उ॑त्तर॒स्यौद॑नस्य स॒र्पिरा॑सेच॒नाच्च॒तुरा॒ज्यस्या॑वदा॒याति॑क्रामत्यति-
कां० २, अ० ५, ब्रा० ३, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २६५
(वरुणप्रघास के) चौथे मास में यह (साकमेध) यज्ञ करता है। वह इस यज्ञ को दो लगातार
दिनों में करता है ॥१॥
पहले दिन 'अनीकवत्' अग्नि के लिए आठ कपालों का पुरोडाश देता है, क्योंकि अग्नि
को 'अनीक' (नुकीला) करके ही वे देव वृत्र को मारने दौड़े थे। और उस तेज को अग्नि ने
छोड़ा नहीं। उसी प्रकार (यजमान भी) पापी अहितकारी शत्रु को मारने के लिए अग्नि को
'अनीक' (नुकीला) करके दौड़ता है। उस तेज को अग्नि नहीं छोड़ता, इसलिए 'अग्नि अनीकवत्
के लिए' ॥२॥
दोपहर को 'सांतपन मरुतों' के लिए 'चरु' देता है। क्योंकि दोपहर को गर्म (सन्तप्त)
हवाओं ने वृत्र को झुलसा दिया। इस प्रकार झुलसकर वह हाँफता हुआ और जख्मी पड़ा था।
इसी प्रकार 'सांतपन मरुत्' (गर्म हवाएँ) उस यजमान के पापी, अहितकारी, शत्रु को झुलसा
देते हैं, इसलिए 'सांतपन मरुतों के लिए' ॥३॥
इसके पश्चात् (सायंकाल को) 'गृहमेधी मरुतों' के लिए (चरु)। (पलाश की) शाखा
से बछड़ों को दूर करके वह पवित्रोंवाले बर्तन में (गायों को) दुहकर चरु को पकाता है।
जिसमें तण्डुल या चावल पकाते हैं वह 'चरु' कहलाता है। जिस अगले दिन देव वृत्र को मारने
जा रहे थे उसकी शाम को देवों ने यही भोजन किया था (मेधो दधिरे)। यहाँ 'मेध' का अर्थ
भोजन है ('Nourishment' according to Eggeling)। इसी प्रकार यह यजमान भी पापी
अहितकारी शत्रु को मारने के लिए इसी मेध या भोजन को करता है। यह दूध और चावल दोनों
का क्यों बनाते हैं ? दूध 'मेध' या शक्तिवाला भोजन है और चावल भी शक्तिवाला भोजन है।
इस प्रकार वह अपने में दोनों शक्तियों (मेध) को धारण करता है। इसलिए दूध और चावल
का चरु बनाते हैं ॥४॥
यह इस प्रकार से—जो कुशों से आच्छादित वेदी 'सांतपन मरुतों' के लिए थी, वही अब
भी काम में आती है। इसी कुशों से आच्छादित (स्तीर्णा) वेदी में 'परिधि' और 'शकल' अर्थात्
बड़ी समिधाओं और छोटे टुकड़ों को रखता है और उसी प्रकार दुहकर चरु पकाता है, और
पकाकर और चुपड़कर (घी डालकर) आग से हटा लेता है ॥५॥
तब दो बर्तनों या थालियों को माँजता है। और उनमें उस (चरु) के दो बराबर भाग
करके रख देता है। उनके बीच में गड्ढा करके उनमें घी छोड़ता है। अब स्रुवा और स्रुक् दोनों
को पोंछता है, और भात के दोनों पात्रों को लेकर (वेदी तक) आता है। फिर वह स्रुवा और
स्रुक् को लेकर (वेदी तक) आता है, और कुशों से आच्छादित वेदी को छूकर समिधाएं रखकर
जितने टुकड़ों को चाहता है रख देता है। तब वह दोनों भात की थालियों को और स्रुवा और
स्रुक् को यथोचित स्थान पर रख देता है। होता होता के आसन पर बैठ जाता है। स्रुवा और
स्रुक् को लेकर अध्वर्यु कहता है—॥६॥
'अग्नि के लिए कह।' अग्नि के आज्य भाग की ओर संकेत करके। दाहिने भात की
प्याली के गड्ढे के घी में से चार भाग लेकर दक्षिण की ओर जाता है, और जाकर आग्नीध्र के
लिए 'श्रौषट्' कहता है। फिर (होता से) कहता है, 'अग्निं यज।' और वषट्कार कहने के अनन्तर
आहुति देता है ॥७॥
अब सोम के आज्य भाग की ओर संकेत करके कहता है, 'सोम के लिए कह।' और बायें
भात की थाली के गड्ढे के घी में से चार भाग लेकर आता है और आकर 'श्रौषट्' कहकर वह
२६६ शतपथ ब्राह्मण
क्रम्या॒श्राव्या॑ह॒ सोमं॑ यजे॒ति वष॑ट्कृते जुहोति ॥ ८॥ अथा॑ह म॒रुद्भ्यो॑ गृह॒मेधि॑भ्यो
ऽनु॒ब्रूहीति॑ । स द॑क्षिणस्यौद॒नस्य॑ सर्पिरासेचनान्तत आ॒ज्यमु॒पस्तृणी॑ते तस्य॒ द्वि-
रव॑द्यत्यथो॑परि॒ष्टादाज्य॒स्या॒भिघा॑रयत्य॑तिक्रामत्य॑तिक्रम्या॒श्राव्या॑ह म॒रुतो॑ गृहमेधि-
नो यजेति॒ वष॑ट्कृते जुहोति ॥ ९॥ अथाहा॒ग्नये॑ स्विष्ट॒कृते॒ऽनुब्रूहीति॑ । स उत्तर-
स्यौद॒नस्य॑ सर्पिरासेचनान्तत आ॒ज्यमु॒पस्तृणी॑ते तस्य॒ द्विरवद्यत्यथो॑परि॒ष्टादाज्य॒स्या-
भिघा॑रयत्य॑तिक्रामत्य॑तिक्रम्या॒श्राव्या॑हा॒ग्निं स्विष्ट॒कृतं॑ यजेति॒ वष॑ट्कृते जुहोत्य-
वेडमिवावद्य॑ति न प्राशित्रमुप॒हृत्य॑ मार्जयन्त एतदेकमयनम् ॥ १०॥ अथैत॑द् द्विती॑-
यम् । सैव स्ती॒र्णा वेदि॑र्भवति॒ या म॒रुद्भाः सांतपनेभ्यस्तस्या॑मेव स्ती॒र्णायां॒ वेदीं
परि॒धींश्च॒ शकलां॑श्चोप॒निद॑धाति॒ तथा॒ संदो॑ह्य च॒रुं श्रप॑यति॒ नैदेव प्रति॑विश॒मान्य-
मधि॑श्रयति श्रपयित्वा॒भिघार्योद्वास्यानक्ति॑ स्थाल्या॒माज्य॒मुद्वा॑सयति॒ स्रुवं॑ च॒ स्रुचं॑ च
संमा॑र्ष्ट्यथैत॒ꣵ सो॑खमेव चरुमा॒दायो॑देति स्थाल्या॒माज्य॑मा॒दायो॑देति स्रुवं॑ च॒ स्रुचं॑
चादायो॑देति स इ॒मामेव स्ती॒र्णां वेदि॑म॒भिमृ॑श्य परि॒धीन्परि॑धाय याव॑तः शकला-
न्कामय॑ते तावतो॒ऽभ्याद॑धात्यथैत॒ꣵ सो॑खमेव च॒रुमासा॑दयति स्थाल्या॒माज्य॒मासा॑द-
यति स्रुवं॑ च॒ स्रुचं॑ चासा॑दयत्युप॒विश॑ति होता होतृ॒षद॑ने स्रुवं॑ च॒ स्रुचं॑ चा॒दाया॑-
न्वाह ॥ ११॥ अ॒ग्नयेऽनु॑ब्रूहीति॑ । आग्ने॒यमा॒ज्यभा॑गं स स्था॒ल्यां चतुर॒वत्त॑म॒वदा॒या-
तिक्रामत्य॑तिक्रम्या॒श्राव्या॑हा॒ग्निं यजेति॒ वष॑ट्कृते जुहोति ॥ १२॥ अथा॑ह॒ सोमा॑-
यानु॒ब्रूहीति॑ । सौम्य॒माज्य॑भागꣳ स स्था॒ल्या एव चतुर॒वत्त॒मव॑दा॒याति॑क्रामत्य॑ति
क्रम्या॒श्राव्या॑ह॒ सोमं॑ यजे॒ति वष॑ट्कृते जुहोति ॥ १३॥ अथा॑ह म॒रुद्भ्यो॑ गृह॒मेधि॑-
भ्यो॒ऽनुब्रूहीति॑ । स उपस्तृणीत॒ऽआज्य॒मथास्य च॒रोर्द्विरव॑द्यत्यथो॑परि॒ष्टादाज्य॒स्या-
भिघा॑रयति प्रत्यनक्त्यवदा॒नेऽति॑क्रामत्य॑तिक्रम्या॒श्राव्या॑ह म॒रुतो॑ गृहमेधिनो य-
जेति॒ वष॑ट्कृते जुहोति ॥ १४॥ अथाहा॒ग्नये॑ स्विष्ट॒कृते॒ऽनुब्रूहीति॑ । स उप॒स्तृ-
णीत॒ऽआज्य॒मथास्य च॒रोः सकृदव॑द्यत्यथो॑परि॒ष्टाद्विराज्या॑स्या॒भिघा॑रयति॒ न प्रत्यन-
कां० २, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / २६७
कहता है, 'सोमं यज।' इसके अनन्तर 'वषट्कार' कहके आहुति देता है ॥८॥
अब कहता है, 'गृहमेधी मरुतों के लिए कह।' दाहिने भात की प्याली के गड्ढे में घी
फैलाता है। उसमें से दो भाग लेकर उन पर घी छोड़ता है और चला आता है। वहाँ आकर
श्रौषट् कहकर कहता है, 'मरुतो गृहमेधिनो यज।' और वषट्कार कहकर आहुति देता है ॥६॥
अब कहता है, 'स्विष्टकृत् अग्नि के लिए कह।' बायें भात के गड्ढे के घी को फैलाता
है और दो भाग लेकर उन पर घी छोड़ता है और चला आता है। आकर 'श्रौषट्' कहकर कहता
है—'अग्ने स्विष्टकृतं यज।' और 'वषट्' कहकर आहुति देता है। अब इडा को काटता है परन्तु
अगला भाग नहीं। इडा कहकर वे अपने को पवित्र कर लेते हैं। यह एक प्रकार है (साकमेध
का) ॥१०॥
अब यह दूसरा। वेदी वही स्तीर्ण रहती है जो 'सांतपन मरुतों' के लिए थी। इसी
आच्छादित वेदी में परिधि और शकलों को रखता है। और (गौओं को उसी तरह) दुहकर चरु
पकाता है। घृत वहीं (?) रखता है। चरु पकाकर घी डालता है, और आग से हटा लेता है।
थाली में घी को निकालता है, स्रुवा और स्रुक् को पोंछता है। चरु को बर्तन में लेकर (वेदी
तक) आता है। फिर थाली में घी लेकर आता है और फिर स्रुवा और स्रुक् को लेकर आता है।
अब वह कुशों से ढकी हुई वेदी को छूता है। और परिधियों को (आहवनीय अग्नि पर) रखता
है और जितने लकड़ी के टुकड़ों को चाहता है रख देता है। अब वह चरुके बर्तन को रख देता है,
घी की थाली को रख देता है, स्रुवा और स्रुक् को रख देता है। होता होता के आसन पर बैठ
जाता है। स्रुवा और स्रुक् को लेकर (अध्वर्यु) कहता है—॥११॥
'अग्नि के लिए कह।' यह अग्नि के आज्य भाग के विषय में। अब थाली में से घी के
चार भाग लेकर (अग्नि के दक्षिण को) जाता है। जाकर और (आग्नीध्र को) श्रौषट् कहकर
(होता से) कहता है, 'अग्निं यज' और वषट्कार कहकर आहुति डालता है ॥१२॥
अब वह कहता है, 'सोम के लिए कह।' यह सोम को आज्यभाग के सम्बन्ध में कहा।
अब प्याली में से चार भाग लेकर जाता है। जाकर श्रौषट् कहकर कहता है 'सोमं यज' और
वषट्कार के पश्चात् आहुति देता है ॥१३॥
अब कहता है, 'गृहमेधी मरुतों के लिए कह'। अब वह (जुहू में) घी को फैलाता है।
चरु में से दो भाग काटता है। उस पर घी डालता है। फिर दो भागों को चुपड़ता है और (वेदी
तक) जाता है। जाकर और श्रौषट् कहकर कहता है, 'मरुतो गृहमेधिनो यज' और वषट्कार
कहकर आहुति देता है ॥१४॥
अब कहता है, 'अग्निस्विष्टकृत के लिए कह।' अब वह घी को फैलाता है, चरु में से एक
टुकड़ा लेता है और दो बार घी छोड़ता है, और दोनों टुकड़ों को बिना चुपड़े हुए जाता है।