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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-२

इ॒ध्मम॒भ्याद॑धाति । उप॒यमनी॒रुप॑कल्पयन्त्या॒ज्यम॒धिश्रयति स्रुवं च॒ स्रुचं॑ च संमा॒-
र्ष्ट्योत्यू॒र्ध्व्याभ्यं॑ पञ्चगृहीतं गृ॑ह्णीते यदा प्रदी॑प्त इध्मो भव॑ति ॥ १॥ अथो॒द्यच्छ॑ती-
ध्मम् । उप॒यम॒न्युप॑यमन॒ीरथाह्वाग्नये॒ प्रह्रिय॑माणाय॒ानुब्रू॒ह्येक॑स्फ्यया॒नूदे॑हीत्यनूदे॑ति
प्रतिप्रस्थातैक॑स्फ्ययतस्मान्मध्यमाद्गोर्य एष वेदे॑र॒र्धनार्थे भव॑ति तद्यद्देवा॒त्रातः॑पा-
तेन गार्हपत्यस्य॒ वेदेर्व्यव॑च्छिन्नं॒ भव॑ति तद्द्वैवैतद॒नुसंत॑नोति ॥ २॥ तद्वैके॑ । श्रोत्त-
रवेदे॒रनूद्याय॑न्ति तदु॒ तथा न कुर्या॒द्धैवैतस्मान्मध्यमाद्गोरनू॑द्याया॒त्प्रायस्या॒गच्छ॑त्यु-
त्त॒रवेदिम् ॥ ३॥ ॥ शतम् १८०० ॥ ॥ प्रोक्षणी॑र॒ध्वर्युराद॑त्ते । स पु॒रस्ता॑देवाग्रे प्रो-
क्षत्युदङ् तिष्ठ॑न्निन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुरस्तात्पात्वितीन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुर॒स्ता-
द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ४॥ अथ पश्चात्प्रोक्ष॑ति । प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः प॒श्चात्पात्विति
प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः पश्चा॑द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ५॥ अथ दक्षिण॒तः प्रोक्ष॑ति । मनो॑-
जवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तः पात्विति मनोजवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तो गोपायत्वित्ये-
वैतदाह ॥ ६॥ अथोत्तर॒तः प्रोक्ष॑ति । विश्व॑कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तः पात्विति विश्व॑-
कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तो गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ७॥ अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्य॑-
न्ते । तद्येऽएते पूर्व्वे सक्ती तयो॑र्या द॑क्षिणा ता मन्तेन बहिर्वेदि निनयतीदम॒हं
ततं॒ वार्बल्बि॑थीं य॒ज्ञात्रिःसृ॑जामीति सा यद्वैवाहुः सिञ्ची भूवाशान्तेवा॒चरत्ता॒मेवा-
स्या एतच्छं॑ ब॒हिर्धा य॒ज्ञात्रिःसृ॑जति य॒द्वि नाभिचरे॒द्यद्यु॑ऽअभिचरे॒दादिशे॑दिदम॒हं
ततं॒ वारमुम॑भि निःसृ॑जामीति तमेतया॑ शु॒चा विध्यति स शौचंन्नेवामं लोकमेति
॥ ८॥ स य॒द्धार्य॑माणेऽग्नौ । उत्तरवेदिं॒ व्याघा॑रयति य॒द्वैवैनामदो देवा अब्रुवन्पूर्वा
त्वयि॒राहु॑तिः प्राप्स्यतीति तद्द्वैवैनामितत्पूर्वाम॒ग्नेराहु॑तिः प्राप्नोति यद्देषा देवा॒नब्र-
वोद्यां मया कां चाशिषमाशासिष्यध्वे सा वः सर्वा सम॑र्धिष्यत॒ऽइति तस्मि॒न्यत्रा
ऽर्त्विजो यज॑मानायाशिष॒माशा॑सते सास्मै सर्वा समृ॑ध्यते ॥ ९॥ तद्द्वाऽए॒तदेकं कुर्व-
न्द्वयं॑ करोति । यदु॑त्तरवेदिं व्याघा॒रयत्यथ यैषां म॒ध्ये नाभि॑केव भव॑ति तस्यै ये

कां० ३, अ० ५, ब्रा० २, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ४२३
अध्याय ५-ब्राह्मण २
वे (आहवनीय अग्नि पर) समिधाएँ रखते हैं। और उपयमनी (नीचे की तह जो बालू
डालकर बनाई जाती है) बनाते हैं। (अध्वर्यु) [गार्हपत्य अग्नि पर] घी रखता है। स्रुवा और
स्रुक् दोनों को माँजता है, और घी को छानकर उसमें से पाँच चम्मच (स्रुक् में) लेता है। जब
अग्नि प्रज्वलित हो जाती है तो—॥१॥
जलती समिधा को उठाकर उपयमनी पर रखते हैं। अब वह (होता से) कहता है, 'अग्नि
को लिये जाते हैं, इसके लिए स्तुति कर।' और (प्रतिप्रस्थाता से) कहता है कि 'एक स्फ्या को
लेकर उसके पीछे-पीछे आ।' प्रतिप्रस्थाता एक स्फ्या को लेकर उसके पीछे-पीछे चलता है, वेदी
के निचले भाग की बीच की कील तक। उस बीच की कील ने गार्हपत्य का जितना भाग वेदी से
अलग कर दिया उसको जोड़ देता है ॥२॥
कुछ लोग उत्तर वेदी तक पीछे-पीछे जाने के पक्ष में हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए,
केवल मध्य की कील तक जाना चाहिए। वे आते हैं और उत्तर वेदी तक पहुँच जाते हैं॥३॥
[शतम् १८००]
अध्वर्यु प्रोक्षणी ले लेता है। वह आगे उत्तर की वेदी को सींचता है, दक्षिण की ओर
उत्तराभिमुख खड़ा होकर और यह मन्त्र बोलकर—"इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात् पातु” (यजु०
५।११)—"इन्द्र का शोर वसुओं के साथ तेरी रक्षा करे।" यही उसका तात्पर्य है ॥४॥
अब वह पीछे की ओर जल सींचता है इस मन्त्र को पढ़कर—"प्रचेतास्त्वा रुद्रैः
पश्चात्पातु" (यजु० ५।११)—"बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे की ओर तेरी रक्षा करें।"
इसका तात्पर्य यह है कि बुद्धिमान् लोग रुद्रों के साथ पीछे से तेरी रक्षा करें ॥५॥
अब दक्षिण की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"मनोजवास्त्वा पितृ-
भिर्दक्षिणतः पातु" (यजु० ५।११)—"तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा
करें।" इसका तात्पर्य यह है कि तीव्र मनवाले पितरों के साथ दक्षिण की ओर तेरी रक्षा करें ॥६॥
अब उत्तर की ओर जल-सिंचन करता है इस मन्त्र को पढ़कर—"विश्वकर्मा त्वादित्यै-
रुत्तरतः पातु" (यजु० ५।११)—"विश्वकर्मा आदित्यों के साथ उत्तर की ओर तेरी रक्षा करें।"
इसका तात्पर्य है कि विश्वकर्मा उत्तर की ओर आदित्यों के साथ तेरी रक्षा करें ॥७॥
प्रोक्षणी पात्र में जो पानी बच रहता है उसको वह वेदी के बाहर जहाँ उत्तर वेदी के दो
पूर्व कोने हैं उनमें से दक्षिणी कोने के पास फेंक देता है यह मन्त्र पढ़कर—"इदमहं तप्तं वार्बहिर्धा
यज्ञान्निःसृजामि" (यजु० ५।११)—"इस गर्म जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।" चूंकि
वह वाणी सिंहिनी बनकर अशान्त फिरती रही, उसके उस शोक को इस प्रकार यज्ञ से निकालता
है। यदि किसी के विरुद्ध शाप न देना चाहे तो इतना ही कहे, परन्तु यदि शाप देना चाहे तो इतना
कहे कि 'अमुक पुरुष के विरुद्ध इस जल को मैं यज्ञ के बाहर निकालता हूँ।' इस प्रकार वह उस
पुरुष को उस शोक से बाँधता है और वह शोक से पीड़ित उस लोक को जाता है ॥८॥
वह अग्नि को लेते हुए उत्तर वेदी पर घी क्यों छोड़ता है? इसलिए कि देवों ने पहले ही
वाणी से कह दिया था कि अग्नि से पूर्व तुझको आहुति मिलेगी। इसलिए आहुति अग्नि से पूर्व ही
उस तक पहुँच जाती है। और वाणी ने देवों से जो यह कहा था कि जो कुछ मेरा आशीर्वाद होगा
वह सब तुमको प्राप्त होगा, इसीलिए ऋत्विज यजमान के लिए वह सब आशीर्वाद प्राप्त कराते
हैं, और उसके लिए इस सब की पूर्ति होती है ॥९॥
यह जो उत्तर वेदी पर घी छोड़ता है वह एक बार छोड़ता हुआ मानो दो बार छोड़ता