शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-३
६१४ शतपथ ब्राह्मण
सं॒ख्याप॑यति प्र॒जाप॑तिर्वृ॒षासि॑ रेतो॒धा रेतो॒ मयि॑ धे॒हीति॑ प्र॒जाप॑तिर्वी॒ऽउदा॑ता यो-
षा पत्नी॑ मि॒थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ १८ ॥ ब्राह्म॑णम् ॥ ४ [४. २.] ॥ ॥
प॒शवो॒ वै दे॒वानां॒ छन्॒दाꣳसि॑ । तद्यथे॒दं पश॑वो यु॒क्ता म॑नु॒ष्ये॑भ्यो व॒हन्त्ये॑वं
छन्दाꣳसि यु॒क्तानि॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑न्ति॒ तय॑त्र छन्॒दाꣳसि॑ दे॒वात्स॑मत॒र्पयं॒न्नथ॒ छू-
न्दाꣳसि॑ दे॒वाः सम॑तर्पय॒ꣳस्तत्प्राग्भूय॑श्छन्दाꣳसि यु॒क्तानि॑ दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञम॑वा-
क्षुर्यदे॑नान्त्सम॒तीतृ॑पन् ॥ १ ॥ अथ॑ हा॑रियोज॒नं गृ॑ह्णाति । छन्॒दाꣳसि॒ वै हा॑रियोज॒-
नश्छन्॒दाꣳस्ये॒वैतत्सं॑तर्पयति॒ तस्मा॑द्धारियोज॒नं गृ॑ह्णाति ॥ २॥ तं वा॒ऽअति॑रिक्तं गृ॒-
ह्णाति॑ । यदा॒ हि श॒म्यो॑र॒ङ्ग्यि॑नं गृ॒ह्णाती॒दं वै दे॒वा अथ॑ छन्॒दाꣳस्य॑ति॒रिक्ता॒न्यथ॑
म॒नु॒ष्या॒ अथ॑ प॒शवो॒ऽति॑रिक्ता॒स्तस्मा॑दति॒रिक्तं॑ गृ॒ह्णाति॑ ॥ ३॥ द्रो॑णकल॒शे गृ॑ह्णाति ।
वृ॒त्रो वै सोम॑ आसी॒त्तं यत्र॑ दे॒वा अग्र॑ꣳस्तस्य मू॒र्धाद॑वर्त॒ स द्रो॑णकल॒शोऽभ॑व॒त्त-
स्मि॒न्यावा॑न्वा॒ यावा॑न्वा॒ रसः॑ सम॒स्रव॒दति॑रिक्तो॒ वै स आ॑सीदति॒रिक्तो॒ ह्येष ग्र॒ह-
स्तदति॑रिक्त॒ऽए॒वैतदति॑रिक्तं दधाति॒ तस्मा॑द्द्रोणकल॒शे गृ॑ह्णाति ॥ ४॥ तं वा॒ऽअप्यु-
रो॑रु॒कं गृ॑ह्णाति । छन्॒दोभ्यो॒ ह्येनं॑ गृ॒ह्णाति॒ स यद्धैवेनं॑ छन्॒दोभ्यो॒ गृ॒ह्णाति॒ तेनो॑
हास्यैष पु॑रोरु॒ग्भान्भव॑ति॒ तस्मा॑दपुरोरु॒कं गृ॑ह्णाति ॥ ५॥ अ॒थातो॑ गृ॒ह्णात्ये॒व । उप॑-
या॒म॒गृ॒ही॒तो॒ऽसि॒ हरि॑रसि हारियोज॒नो हरि॑भ्यां॒ त्वेत्यृ॑क्सामे॒ वै हरी॒ऽऋक्सामॉ-
भ्याꣳ ह्ये॑नं गृ॒ह्णाति॑ ॥ ६॥ अथ॒ धाना॒ आव॑पति । हर्यो॒र्धाना॑ स्थ सꣳसोमा इन्द्रा-
येति॒ तद्य॑दे॒वात्र॑ मि॒तं च॒ छन्॒दोऽमि॑तं च॒ तद्द्वै॒वैतत्सर्वं॑ भक्षयति ॥ ७॥ तस्यो॑न्ने॒ता-
श्राव॑यति । अति॑रिक्तो वा॒ऽउन्ने॑ता॒ न ह्ये॑षो॒ऽन्यस्या॒श्राव॑य॒त्यति॑रिक्त ए॒ष ग्र॒हस्त-
दति॑रिक्त॒ऽए॒वैतदति॑रिक्तं दधाति॒ तस्मा॑दुन्ने॒ताश्राव॑यति ॥ ८॥ मू॒र्धन्न॑भिनि॒धाया॒श्रा-
व॑यति । मू॒र्धा ह्य॑स्यै॒षोऽथाह॑ धानासो॒मेभ्यो॑ऽनुब्रू॒हीत्या॒श्राव्या॑ह धानासो॒मान्प्र-
स्थि॑ता॒न्प्रेष्येति॑ वषट्कृ॒ते जु॑होत्यनुवषट्कृ॒तेऽथ॑ धा॒ना वि॑लिप्सन्ते भ॒क्षाय॑ ॥ ९॥
तद्धै॑के । होत्रे॑ द्रोणकल॒शं प्र॑तिप॒राहुरि॑ति वषट्क॒र्तुर्भ॒क्ष इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न
कां० ४, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १८ व १-१० शतपथब्राह्मण / ६१५
मिला देता है इस मन्त्र को पढ़कर “प्र॒जाप॑तिवृँ'षासि रेतो॒धा रेतो॒ मयि॑ धेहि” (यजु० ८।१०)–
“तू प्रजापति नर है, वीर्य को रखनेवाला। मुझे वीर्य दे।” प्रजापति उद्गाता है और पत्नी स्त्री
है। इस प्रकार जोड़े से उत्पत्ति होती है ॥१८॥
हारियोजनग्रहः
अध्याय ४—ब्राह्मण ३
छन्द देवों के पशु (वाहक या बैल) हैं। जैसे बैल जुतकर मनुष्यों का सामान ले जाते हैं,
ऐसे ही छन्द जुतकर देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। जब-जब छन्दों ने देवों की तृप्ति की, तब-
तब देवों ने छन्दों की तृप्ति की। जुते हुए छन्द देवों के लिए यज्ञ को ले गये, उससे पहले उन्होंने
उनको तृप्त किया ॥१॥
अब हारियोजन ग्रह को लेता है। हारियोजन छन्द है। इस प्रकार वह छन्दों को तृप्त
करता है, इसीलिए हारियोजन ग्रह लिया जाता है ॥२॥
इसको अतिरिक्त-ग्रह (दूसरों ग्रहों से अतिरिक्त) की भाँति लेता है। इसे उस समय
लेता है जब होता 'शम्य' कहता है। देव हैं और अतिरिक्त छन्द भी है। मनुष्य हैं और अति-
रिक्त पशु भी हैं। इसलिए अतिरिक्त ग्रह को लेता है ॥३॥
इसको द्रोणकलश में लेता है। सोम वृत्र था। उसको जब देवों ने मारा, उसका सिर
फट गया और वह द्रोणकलश हो गया। उसमें जितना-जितना रस बहा वह अतिरिक्त था, इसी
प्रकार यह ग्रह भी अतिरिक्त है। इस प्रकार अतिरिक्त में अतिरिक्त को रखता है, इसलिए द्रोण-
कलश में लेता है ॥४॥
इसको बिना पुरोरुक् के लेता है क्योंकि वह इसको छन्दों के लिए लेता है। चूँकि इसको
वह छन्दों के लिए लेता है इसलिए वह पुरोरुक् का काम देता है, अर्थात् पुरोरुक् के रस को लेता
है ॥५॥
इसको इसमें से (आग्रायण ग्रह में से) इस मन्त्र से लेता है, “उप॒यामगृ॑हीतोऽसि॒ हर॑रसि
हा॑रियोज॒नो ह॒रिभ्यांᳵ त्वा” (यजु० ७।११)—“तुझे आश्रय के लिए लिया गया है, तू हरि है।
हरि से युक्त है। दोनों हरियों के लिए तुझको।” दो हरियों से तात्पर्य है ऋक् और सोम का,
अर्थात् ऋक् और साम द्वारा इसको लेता है ॥६॥
अब धान बोता है—“हर्योर्धाना स्थ सहसोमा ऽ इन्द्राय” (यजु० ७।११)—“तुम हरियों
के धान हो। इन्द्र के लिए सोम के साथ।” मित (नपे हुए) या अमित (न नपे हुए) जितने छन्द
हैं वे सब (सोम को) पीते हैं ॥७॥
इस आहुति के लिए उन्नेता श्रौषट् बोलता है। उन्नेता अतिरिक्त है। इस प्रकार
किसी अन्य आहुति के लिए श्रौषट् नहीं कहता। यह आहुति भी अतिरिक्त है। इस प्रकार अति-
रिक्त में अतिरिक्त को रखता है। इसलिए उन्नेता श्रौषट् बोलता है ॥८॥
(द्रोण कलश को) सिर पर रखकर श्रौषट् बोलता है। क्योंकि यह (सोम का) सिर
है। पहले वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'सोमों के लिए धान के साथ अनुवाक पढ़ो।' श्रौषट्
कहकर बोलता है कि लाये हुए धान-सोमों की आहुति दे। वषट्कार करके आहुति देता है
और अनुवषट्कार करके आहुति देता है। अब सोमपान के लिए धानों को बाँट देते हैं ॥६॥
कुछ लोग द्रोण कलश को होता के पास ले जाते हैं क्योंकि यह सोमपान वषट्कार करने-