शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-२
२६० शतपथ ब्राह्मण
रो॒ति॒ तं गृ॒हा उप॒सꣳश्रयन्ते न वाऽअयमि॒हावादी॒न्न किं च॒नाकर॒दिति॒ स यदि॒हा-
पि मु॒क्रुद्ध इव स्या॒हू एव तत॒स्तत्कुर्याद्यद्यदि॒ष्यन्वा करिष्यन्वा स्यादे॒ष उ गृ॒हा-
णामुपचा॒रः ॥ १४॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [३. १.] ॥ ॥
प्रजाप॑तिं वै भूता॒न्युपा॑सीदन् । प्र॒जा वै भूता॑नि॒ वि नो धेहि॒ यथा जीवामेति॒
ततो देवा॑ य॒ज्ञोपवी॒तिनो भू॒त्वा द॑क्षि॒णं जा॒न्वाच्यो॑पासीदं॒स्तानब्रवीद्य॒ज्ञो वोऽन्न॑-
ममृ॒तत्त्वं व ऊ॒र्ग्वः सूर्यो वो॒ ज्योति॒रिति॑ ॥ १॥ अथैनं पितरः । प्राचीनावी॒तिनः
स॒व्यं जा॒न्वाच्यो॑पासीदं॒स्तानब्रवीन्मा॒सि-मासि वोऽशनꣳ स्व॒धा वो मनो॒जवी
वश्च॒न्द्र॒मा वो ज्योति॒रिति॑ ॥ २॥ अथैनं मनु॒ष्याः । प्रावृ॑ता उप॒स्थं कृ॒त्वोपा॑सीदं-
स्तानब्रवीत्सा॒यं प्रातर्वोऽशनं प्र॒जा वो मृत्युर्वोऽग्न॑िर्वो॒ ज्योति॒रिति॑ ॥ ३॥ अथैनं
प॒शव उपा॑सीदन् । तेभ्यः स्वैष॑मेव चकार य॑दैव यूयं कदा च लभा॑धै॒ यदि॑ काले
यद्य॑नाका॒लेऽथै॒वाश्नी॒येति॒ तस्मादेते यदि॑व क॒दा च लभ॑न्ते॒ यदि॑ काले॒ यद्य॑नाका-
लेऽथै॒वाश्न॑न्ति ॥ ४॥ अथ हैनꣳ शश्व॑दप्यसु॒रा उप॑सेदु॒रित्याहुः । तेभ्य॒स्तम॑श्च मा॒यां
च प्र॒ददावस्त्ये॒वासु॑रमा॒येतीव परा॑भूता ह्वेव ताः प्र॒जास्ता इ॒माः प्र॒जास्तथै॒वो-
पजी॑वन्ति॒ यथैवाभ्यः प्रजाप॑ति॒र्व्यद॑धात् ॥ ५॥ नैव दे॒वा अ॑तिक्रामन्ति । न पि॒तरो
न प॒शवो मनु॒ष्या ए॒वैके॑ऽतिक्रामन्ति॒ तस्मा॒द्यो मनु॒ष्याणां॑ मेद्य॒त्यशु॑भे मेद्यति वि-
र्द्रू॑हति हि न ह्य॑यनाय चन भ॑वत्यनृ॒तं हि कृ॒त्वा मेद्य॑ति॒ तस्मा॑ड् सा॒यं प्रातरा॒-
श्येव स्यात्स यो हैवं वि॒द्वात्सा॒यं प्रातराशी भ॑वति॒ सर्वꣳ है॒वायु॑रेति॒ यडु ह॒ किं
च वाचा॒ व्याह॑रति॒ तडु है॒व भ॑वत्ये॒तद्धि दे॒वस॒त्यं गो॑पायति॒ तद्वैतत्तेजो॒ नाम
ब्रा॑ह्म॒णं य ए॒तस्य व्र॒तं श॒क्नोति॒ चरि॒तुम् ॥ ६॥ तद्वाऽए॒तत् । मा॒सि-मा॒स्येव
पि॒तृभ्यो॑ ददतो॒ यद्वैवैष न पुर॒स्तान्न प॒श्चाद्ददृशेऽथै॑भ्यो ददात्ये॒ष वै सोमो राजा॑
दे॒वाना॒मन्नं यच्च॒न्द्रमाः स ए॒ताꣳ रात्रिं क्षी॒यते॒ तस्मि॑न्क्षी॒णे द॑दाति॒ तथै॑भ्योऽसम॑दं
करोत्यथ॒ यद्द॑क्षी॒णे दद्या॑त्सम॒दꣳ ह कुर्याद्दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॑श्च॒ तस्मा॒द्यद्वैवैष न पुर-
कां० २, अ० ४, ब्रा० २, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / २६१
कुछ कहता है, न करता है तो उसके घरवाले सन्तुष्ट रहते हैं कि इसने कुछ नहीं कहा या कुछ
नहीं किया। इसलिए यदि गृहपति किसी कारण क्रुद्ध भी हो तो जो कुछ कहना या करना हो, वह
दूसरे दिन कहे या करे। यह घर में आने की विधि है ॥१४॥
पिण्डपितृयज्ञः
अध्याय ४—ब्राह्मण २
प्राणि-लोक एक बार प्रजापति के पास गये। ये साधारण प्राणी थे। उन्होंने कहा,
'हमको वह विधि बताओ जिससे जीवन व्यतीत करें।' इस पर यज्ञोपवीत पहने हुए देव दाहिनी
जानु को नमाकर, उसके पास आकर बैठे। उसने उनसे कहा, 'यज्ञ तुम्हारा अन्न है, अमृतत्व
तुम्हारा बल है और सूर्य तुम्हारी ज्योति' ॥१॥
अब पितर दाहिने कंधे पर यज्ञोपवीत पहने बाईं जानु नमाकर उसके पास बैठे। उसने
उनसे कहा, 'तुम्हारा मासिक भोजन होगा। तुम्हारे मन की तेजी (मनोजवा) तुम्हारी स्वधा
और चन्द्रमा तुम्हारी ज्योति' ॥२॥
अब मनुष्य उसके पास आये कपड़े पहने (प्रावृत) और शरीर को झुकाये हुए। उनका
उसने कहा, 'सायं और प्रातः तुम्हारा भोजन होगा। मृत्यु तुम्हारी प्रजा और अग्नि तुम्हारी
ज्योति' ॥३॥
अब उसके पास पशु आए। उनको उसने अपनी इच्छावाला (स्वेच्छाचारी) कर दिया।
जब कभी तुम कोई चीज पाओ, चाहे समय पर, चाहे कुसमय, तुम खा जाओ। इसलिए जब वे
कोई चीज पाते हैं चाहे समय पर, चाहे कुसमय, वे खा जाते हैं ॥४॥
तत्पश्चात् कहते हैं कि असुर भी (प्रजापति के पास) पहुँचे। उनको उसने अन्धकार
और माया दी। इसीलिए आसुरी माया होती है। वे तो नष्ट हो गये, परन्तु आजकल भी वैसी
प्रजा है जो उसी प्रकार बरतती है, जैसे प्रजापति ने उनके लिए निर्धारित किया था ॥५॥
देव, पितर या पशु इन नियमों का उल्लंघन नहीं करते। कुछ मनुष्य ही उल्लंघन करते
हैं। इसलिए मनुष्यों में जो मोटा हो जाता है वह अशुभ कार्यों के कारण मोटा हो जाता है, और
चूंकि वह अनृत के कारण मोटा होता है इसलिए वह चल नहीं सकता और उसके पैर लड़खड़ाते
हैं। इसलिए सायं और प्रातःकाल को ही खाना चाहिए। जो इस रहस्य को जानकर सायं और
प्रातः ही खाता है वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है। और जो कुछ वह बोलता है वही होता है,
क्योंकि देव सत्य की रक्षा करता है। जो आदमी प्रजापति के व्रत को पाल सकता है, उसमें ब्रह्म-
तेज आ जाता है ॥६॥
यह तेज उसी को होता है जो मास में एक बार पितरों को भोजन देता है। जब पूर्व या
पश्चिम में चाँद न दीखे तब उनको भोजन देता है। क्योंकि चन्द्रमा सोम राजा है जो देवों का
भोजन है। (अमावस्या की) रात को वह क्षीण होता है, तब (देवताओं का भोजन भी क्षीण
होता है इसलिए उस समय पितरों को) भोजन देता है। इस प्रकार वह (देवों और पितरों में)
समन्वय कराता है। परन्तु यदि उस समय देगा जब (चाँद) क्षीण नहीं है तो देवों और पितरों
२६२ शतपथ ब्राह्मण
स्तान् पश्चाद्ददृशेऽथैभ्यो॑ ददाति ॥ ७॥ स वाऽअ॒पराह्ने॑ ददाति । पूर्वा॒ह्णो वै दे॒वा-
नां म॒ध्यन्दि॑नो मनु॒ष्याणा॑मपराह्लः॑ पितॄणां तस्मादपराह्ने॒ ददा॑ति ॥ ८॥ स ज॒घने॑न
गार्हपत्यं । प्राचीनावीती भूत्वा॑ दक्षि॒णासी॑न शृ॒तं गृ॒ह्णाति स तत शृ॒तोपोत्था-
योत्तरेणान्वाहार्यपचनं दक्षिणा तिष्ठन्नवहन्ति सकृत्फलीकरोति सकृ॒द्ध्येव प॒-
राञ्चः पितर॒स्तस्मात्सकृत्फलीकरोति ॥ ९॥ तꣳ श्र॑पयति । तस्मिन्नधिश्रितऽआ॒ज्यं
प्रत्यानयत्यग्नौ वै दे॒वेभ्यो जुह्वत्युद्धरन्ति मनुष्येभ्यो॒ऽथैव पितॄणां तस्मादधिश्रित
ऽआ॒ज्यं प्रत्यानय॑ति ॥ १०॥ स उदास्याग्नौ द्वेऽआहुती जुहोति देवेभ्यः । देवान्वा
ऽएष उपावर्तते य आहिताग्निर्भवति यो दर्शपूर्णमासाभ्यां यज॒तेऽथैतत्पितृयज्ञेने-
वाचारीत्तद् देवेभ्यो निहुते स देवैः प्रसूतोऽथैतत्पितृभ्यो ददाति तस्माद्द्वावस्या-
ग्रौ द्वेऽआहुती जुहोति देवेभ्यः ॥ ११॥ स वाऽअ॒ग्नये च सोमाय च जुहोति ।
स यद॒ग्नये॑ जु॒होति॒ सर्वत्र॒ ह्येवाग्नि॒रन्वा॑भक्तोऽथ यत्सोमा॑य जु॒होति पितृदे॒वत्यो
वै सोम॒स्तस्माद॒ग्नये च सोमा॑य च जु॒होति ॥ १२॥ स जुहोति । अग्नये कव्यवा-
हनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहेत्यग्नौ मेक्षणमभ्यादधाति तत्स्विष्टकृद्भाजन-
मथ दक्षिणेनान्वाहार्यपचनꣳ सकृदुल्लिखति तद्बर्हिर्भाजनꣳ सकृ॒द्ध्येव पराञ्चः
पितर॒स्तस्मात्सकृदुल्लिख॑ति ॥ १३॥ अथ पुरस्तादुल्मुकं निद॒धाति । स यदनिधा-
योल्मुकमथैतत्पितृभ्यो दद्यादसुररक्षांसानि हैषामेतद्विमथ्नीरंस्तथो हैतत्पितॄणाम-
सुररक्षांसानि न विमथ्नते तस्मात्पुरस्तादुल्मुकं निद॒धाति ॥ १४॥ स निद॒धाति ।
ये रूपा॑णि प्रतिमुञ्चमा॑ना अ॒सुराः सन्तः स्व॒धया चर॑न्ति । परापुरो निपु॒रो ये भर॒-
न्त्यग्निष्टांल्लो॒कात्प्र॑णुदात्यस्मादित्याग्निर्हि रक्षसामपहन्ता तस्मादेवं निदधाति ॥ १५॥
अथोदपात्रमादायावनेजयति । असाववनेनिङ्क्ष्वेत्येव यजमानस्य पितरमसाववने-
निङ्क्ष्वेति पितामहमसाववनेनिङ्क्ष्वेति प्रपितामहं तद्यथाशिष्यतेऽभिषिञ्चेदेवं तत्
॥ १६॥ अथ सकृदाच्छिन्नान्युपमूलं दिनानि भवन्ति । अग्र॒मिव॒ वै दे॒वानां म॒ध्यमिव
का० २, अ० ४, ब्रा० २, कं० ७-१७ शतपथब्राह्मण / २६३
में झगड़ा हो जायगा। इसलिए तभी भोजन दे जब (चन्द्र) न पूर्व में दीखे न पश्चिम में ॥७॥
वह दोपहर के बाद देता है। देवों का पहला पहर (पूर्वाह्न) है, दोपहर (मध्यन्दिन)
मनुष्यों का और तीसरा पहर (अपराह्न) है पितरों का। इसलिए तीसरे पहर देता है ॥८॥
वह गार्हपत्य के पीछे बैठकर जनेऊ दक्षिण कन्धे पर रखे हुए दक्षिण की ओर मुंह करके
(गाड़ी में से हवि) लेता है। फिर वहाँ से उठकर अन्वाहार्य-पचन के उत्तर की ओर खड़ा होकर
दक्षिण की ओर मुंह करके (चावलों को) फटकता है। एक बार ही फटकता है; क्योंकि एक ही
बार पितर गुजर गये इसलिए एक बार ही फटकता है ॥६॥
फिर पकाता है। इसके पकते हुए में घी छोड़ता है। देवों के लिए हवि अग्नि में छोड़ी
जाती है, मनुष्यों के लिए (भोजन) अग्नि से निकालकर लिया जाता है और पितरों के लिए
इस प्रकार करते हैं।—जब यह आग पर पक रहा हो, उसमें घी छोड़ते हैं ॥१०॥
वहाँ से उठाकर अग्नि में देवों के लिए दो आहुतियाँ देता है। जो अग्नि स्थापित करता
है (अग्निहोत्र के लिए) या जो दर्शपूर्णमास करता है, वह देवों की सेवा में उपस्थित होता है।
परन्तु यहाँ उसे पितृयज्ञ करना है। इसलिए देवों को प्रसन्न करता है कि उनको प्रसन्न करने के
पश्चात् पितरों को देवे। इसलिए वहाँ से (हवि को) उठाकर अग्नि में देवों के लिए दो आहुतियाँ
देता है ॥११॥
वह अग्नि और सोम के लिए आहुतियाँ देता है। अग्नि को आहुति इसलिए देता है कि
अग्नि का भाग तो सभी जगह दिया जाता है। सोम के लिए यों देता है कि सोम पितरों का देवता
है। इसलिए अग्नि और सोम के लिए देता है ॥१२॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहा"
(यजु० २।२६)—"बुद्धिमान् कवियों के लिए, ले जानेवाले अग्नि के लिए। पितृयुक्त सोम के
लिए।" स्विष्टकृत् के बदले आग पर मेक्षण (चमचा pot-ladle) रखता है। अब दक्षिणाग्नि
के दक्षिण को एक रेखा खींचता है, वेदि के पहले। पितर लोग एक ही बार गुजर गये, इसलिए
एक ही बार रेखा खींचता है ॥१३॥
अब दूसरे छोर पर जलती हुई लकड़ी (उल्मुक) रखता है। क्योंकि यदि बिना इस
लकड़ी के रखे पितरों को भोजन दिया गया तो असुर और राक्षस उसको बिगाड़ ही जायेंगे,
जबकि इस प्रकार असुर और राक्षस उसको नहीं बिगाड़ते, इसलिए वह जलती हुई लकड़ी को
रखता है ॥१४॥
वह मन्त्र पढ़कर रखता है, "ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽअसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति।
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टांल्लोकात् प्रणुदात्यस्मात्" (यजु० २।३०)—"जो असुर रूपों
को बदलते हुए स्वतन्त्रता से विचरते हैं, छोटे शरीरवाले या बड़े शरीरवाले, अग्नि उनको इस
लोक से निकाल दे।" अग्नि राक्षसों का भगानेवाला है, इसलिए वह इस लकड़ी को रखता
है ॥१५॥
अब जल का पात्र लाकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'आप हाथ
धोइये', यजमान के बाबा का नाम लेकर, 'आप हाथ धोइये', यजमान के परदादा का नाम
लेकर, 'आप हाथ धोइये।' जैसे मेहमान को जल देते हैं ऐसे यहाँ भी ॥१६॥
कुश एक चोट में ही मूल से काटे जाते हैं। उनका अगला भाग देवों का होता है, बीच