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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-४, ब्राह्मण-१

६०४ शतपथ ब्राह्मण

ऽआदित्यग्रह॒स्यानु॑वषट्करोत्ये॒तस्मा॒द्वै सा॑वि॒त्रं ग्र॒हं ग्र॑हीष्य॒न्भव॑ति॒ तद॑स्य सावि॒-
त्रे॒णैवा॒नु॑वषट्कृतो भ॑वति ॥ २३॥ य॒द्वेव प्रतिप्रस्था॒ता संस्रा॒वौ सम्प्र॑गृह्णा॒ति ।
पु॒रा वाऽए॒भ्य ए॒तन्मिश्रा॒द्वहम॑हौषुः पु॒रा तृतीयसवना॒त्तृती॑यसवनाय॒ वाऽए॒ष
ग्र॒हो गृ॑ह्यते॒ तदा॑दि॒त्याँस्तूतीयसवनमपियन्ति॒ तथा॒ न ब॒हिर्धा य॒ज्ञाद्भव॑न्ति॒ तस्मा॑-
त्प्रतिप्रस्था॒ता संस्रा॒वौ सम्प्र॑गृह्णा॒ति॑ ॥ २४॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ [३. ५.] ॥ तृती॒यो
ऽध्यायः [२७.] ॥ १॥
मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒ता । तस्मा॑त्सावि॒त्रं गृह्णाति प्रा॒णो ह वा॒ऽअस्य स-
वि॒ता तमे॒वास्मिन्ने॒तत्पु॒रस्ता॒त्प्राणं॑ दधाति॒ यऽपा॒श्शुं गृ॒ह्णाति॒ तमे॒वास्मिन्नेतत्प॒-
श्चात्प्रा॒णं द॑धाति॒ यत्सा॑वि॒त्रं गृह्णा॑ति तावि॒माऽउ॑भयतः॒ प्रा॒णौ हि॒तौ यश्चाय॒मुप॑-
रि॒ष्टाद्यश्चा॒धस्ता॑त् ॥ १॥ ऋ॒तवो॒ वै सं॑वत्स॒रो य॒ज्ञः । तेऽदः॑ प्रातःसव॒ने प्रत्य॑क्षम्-
वकल्पन्ते॒ यदृ॑तुग्र॒हान्गृ॒ह्लात्यथै॑त॒त्परो॒ऽक्षं मा॑ध्यन्दि॒ने सव॑ने॒ऽवक॑ल्प्यन्ते॒ यदृ॑तुपा-
त्राभ्यां॑ म॒रुत्वती॑यान्गृ॒ह्णाति॒ न वा॒ऽअत्र॒ऽर्तुभ्य॒ इति॒ कं चन॒ ग्र॒हं गृ॒ह्णन्ति॒ नर्त्तुपा-
त्राभ्यां॒ कश्चन॒ ग्र॒हो गृ॑ह्यते॒ ॥ २॥ ए॒ष वै स॑वि॒ता य॒ एष तप॑ति । ए॒ष उ॒ऽएव
सर्व्व॒ऽऋत॑वस्तदृतवः संवत्स॒रस्तृती॑यसवने॒ प्रत्य॑क्षम॒वक॑ल्प्यन्ते॒ तस्मा॑त्सावि॒त्रं गृ॒-
ह्णाति॒ ॥ ३॥ तं वा॒ऽउपा॑श्शुपात्रेण गृह्णाति । मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒ता प्रा॒ण
उपा॑श्शुस्तस्मा॑दुपा॑श्शुपात्रेण गृह्णात्यन्तर्यामपात्रेण वा समान् ᳪ ह्ये॒तद्यदु॑पा॑श्श्वन्त-
र्या॒मौ प्रा॒णोदा॒नौ हि ॥४॥ आग्रयणाद्गृह्णाति । मनो॒ ह वा॒ऽअस्य सवि॒तात्मा-
ऽग्रय॑ण॒ आत्म॑न्ये॒वैतन्मनो॑ दधाति प्रा॒णो ह वा॒ऽअस्य सवि॒तात्माग्रय॑ण॒ आत्म॑न्ये-
वैतत्प्रा॒णं द॑धाति ॥ ५॥ अथातो गृह्णात्येव । वा॒मम॒द्य स॑वितर्वा॒ममु॒ श्वो दि॒वे-दि॑-
वे वा॒मम॒स्मभ्य॑ ᳪ सावीः । वा॒मस्य॒ हि क्षय॑स्य देव॒ भूरे॑रया धि॒या वा॑म॒भाजः॑ स्याम
। उपयामगृहीतोऽसि सा॒वि॒त्रोऽसि चनो॒धाश्च॑नो॒धा अ॑सि॒ चनो॒ मयि॑ धेहि । जि॒-
न्व य॒ज्ञं जि॑न्व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑येति ॥ ६॥ तं गृहीत्वा न सादयति । मनो॒ ह वा॑

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कां० ४, अ० ३-४, ब्रा० ५-१, क० २३-२४ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६०५
ग्रह का है। आदित्य ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी आदित्य ग्रह से तो सावित्र ग्रह
को निकालेंगे। इस प्रकार सावित्र ग्रह के द्वारा इसका भी अनुवषट्कार हो जायगा ॥२३॥
प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को इसलिए भी पकड़ता है कि इस मिश्रण कृत्य के पहले,
तीसरे सवन से पहले (आदित्यों के लिए) ग्रह दिया जा चुका है। यह ग्रह तीसरे सवन के लिए
है। इस प्रकार आदित्य इस सवन में भी भाग ले लेते हैं और यज्ञ से निकाले नहीं जाते। इस-
लिए प्रतिप्रस्थाता उन शेष भागों को लेता है ॥२४॥
सावित्रग्रहः
अध्याय ४—ब्राह्मण १
सविता इस (यज्ञ) का मन है। इसलिए सावित्र ग्रहों को लेता है। सविता इसका प्राण
भी है। जब उपांशु ग्रह को लेता है तो प्राण को आगे रख लेता है, और जब सावित्र ग्रहों को
लेता है तो प्राण को पीछे रख लेता है। इस प्रकार वे दोनों प्राण हितकर हो जाते हैं, वह जो
ऊपर है और वह जो नीचे ॥१॥
यज्ञ ऋतुएँ या संवत्सर है। प्रातःसवन में तो ऋतुएँ प्रत्यक्ष रीति से मनाई जाती हैं
क्योंकि ऋतु-ग्रहों को निकाला जाता है। दोपहर के सवन में परोक्ष रीति से, क्योंकि दोनों ऋतु-
पात्रों में मरुत्वती ग्रहों को निकाला जाता है। यहाँ न तो ऋतुओं के लिए कोई ग्रह निकाला जाता
है और न ऋतु-पात्रों में ही किसी ग्रह को निकालते हैं ॥२॥
यह जो तपता है वही तो सविता है। यही सब ऋतुएँ हैं। इस प्रकार ऋतुएँ या संवत्सर
तीसरे सवन में प्रत्यक्ष रूप से मनाये जाते हैं। इसलिए सावित्र ग्रह को लेता है ॥३॥
उसको उपांशु पात्र में लेता है। इसका मन सविता है और प्राण उपांशुपात्र । इसलिए
उपांशुपात्र से लेता है, या अन्तर्याम पात्र से। क्योंकि ये तो समान ही है। उपांशु और अन्तर्याम
प्राण और उदान हैं ॥४॥
आग्रयण में से लेता है। इसका मन सविता हैं और आत्मा आग्रयण। इस मन को आत्मा
में ही रखता है; इसका प्राण सविता है, और आत्मा आग्रयण। इस प्रकार आत्मा में ही प्राण को
रखता है ॥५॥
इस मन्त्र से लेता है, "वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवे दिवे। वाममस्मभ्यं॒ सावीः।
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम॥ उपयामगृहीतोऽसि सावित्रोऽसि
चनोधाश्चनोधा ऽ असि चनो मयि धेहि। जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय" (यजु० ८।६-७; ऋ०
६।७१।६)—"हे सविता ! आज और कल, प्रतिदिन हमारे लिए उत्तम फल की प्रेरणा कर। हे
देव ! बहुत बड़े सुखवाले निवास को हम इस बुद्धि से पावें।"—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया
है। तू सावित्र ग्रह है। तू आनन्द देनेवाला है। मुझे आनन्द दे। यज्ञ को तृप्त कर। यज्ञपति को
तृप्त कर। भाग्य के लिए" ॥६॥
उसको लेकर भूमि पर नहीं रखता। सविता इस यज्ञ का मन है। यह मन चलायमान

ऽश्व॑स्य सवि॒ता तस्मा॑दिद॒मस॑न्नं॒ मनः॑ प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता तस्मा॑दय॒मस॑न्नः
प्रा॒णः संच॑रत्यथाह दे॒वाय॑ सवि॒त्रेऽनु॑ब्रूही॒त्याश्रा॑व्याह दे॒वाय॑ सवि॒त्रे प्रेष्येति॑ व-
षट्कृ॑ते जुहोति॒ नानु॑वषट्करोति॒ मनो॑ ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता नेन्मनो॒ऽग्नौ प्रवृ॑ण-
जानी॒ति प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता नेत्प्रा॒णम॒ग्नौ प्रवृ॑णजानी॒ति ॥७॥ अथा॑भ-
क्षितेन पात्रे॑ण । वै॒श्व॒दे॒वं ग्र॒हं गृ॑ह्णाति॒ तद्यद॑भक्षितेन॒ पात्रे॑ण वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒-
ह्णाति॒ न वै सा॑वित्र॒स्यानु॑वषट्करोत्ये॒तस्मा॑द्धि वैश्वदे॒वं ग्र॒हं ग्र॑ही॒ष्यन्भ॑वति॒ तद॑स्य
वै॒श्व॒दे॒वेनै॒वानु॑वषट्कृतो भ॑वति ॥८॥ यद्वे॑व वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णाति॑ । मनो॑ ह॒
वाऽश्व॑स्य सवि॒ता सर्व॒मिदं॒ विश्वे॑ दे॒वा इ॒दमे॒वैतत्सर्वं॒ मन॑सः कृतानु॒कर॒मनु॑वर्त्म
क॑रोति॒ तद॑दि॒ꣳ सर्वं॒ मन॑सः कृतानु॒कर॒मनु॑वर्त्म ॥९॥ यद्वे॑व वैश्वदे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णा-
ति॑ । प्रा॒णो ह॒ वाऽश्व॑स्य सवि॒ता सर्व॒मिदं॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॒स्मिन्ने॒वैतत्सर्व॑स्मिन्प्रा-
णोदा॒नौ द॑धाति तावि॒माव॒स्मिन्सर्व॑स्मिन्प्राणोदा॒नौ हि तौ ॥१०॥ यद्वे॑व वैश्व-
दे॒वं ग्र॒हं गृ॒ह्णाति॑ । वै॒श्व॒दे॒वं वै तृ॑तीयसवनं॒ तद्यच्यत॒ऽएव॒ सा॑मतो॒ यस्मा॑द्वैश्वदे॒वं
तृ॒तीय॑सवनमुच्यत॒ऽऋक्तो॑ऽथै॒तदे॒व य॑जु॒ष्टः पु॑रश्चरणतो॒ यदे॒तं म॒हावै॑श्वदे॒वं गृ॒ह्णाति॑
॥११॥ तं वै पू॒तभृ॑तो गृह्णाति । वै॒श्व॒दे॒वो वै पू॒तभृदतो॒ हि दे॒वेभ्य॒ उन्न॑यन्त्यतो॒
मनु॒ष्येभ्योऽतः॑ पि॒तृभ्य॒स्तस्मा॑द्वैश्वदे॒वः पू॒तभृत् ॥१२॥ तं वा॒ऽअपू॑रोरु॒कं गृ॑ह्णाति
। विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॑ति॒ सर्वं॒ वै विश्वे॑ दे॒वा यदृचो॒ यद्य॒जूꣳषि॒ यत्सामा॑-
नि॒ स यद्दे॒वं विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॑ति॒ तेनो॑ हास्यै॒ष पु॑रो॒रुग्वान्भ॑वति॒ तस्मा॑-
दपू॑रोरु॒कं गृ॑ह्णाति ॥१३॥ अथातो गृह्णात्येव । उप॒यामगृ॑हीतोऽसि सु॒शर्मा॑सि सु-
प्र॑ति॒ष्ठान॒ इति॑ प्रा॒णो वै सु॒शर्मा॑ सुप्रति॒ष्ठानो॑ बृह॒दुक्षा॑य॒ नम॒ इति॑ प्र॒जाप॑तिर्वै
बृ॒हदु॒क्षः प्र॒जाप॑तये॒ नम॒ इत्ये॒वैत॑दाह॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ ए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्य-
स्त्वा दे॒वेभ्य॒ इति॑ सादयति॒ विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॒ गृह्णा॒त्यथैत्य॒ प्राङुप॑विशति
॥१४॥ स यत्रेताꣳ होता शꣳसति । एक॑या च दश॑भिश्च स्वभूते द्वाभ्या॑मि॒ष्टये

कां० ४, अ० ४, ब्रा० १, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ६०७
होता है। सविता इसका प्राण है। प्राण चलायमान होता है। अब वह मैत्रावरुण से कहता है
'सविता देव के लिए अनुवाक कहो।' श्रौषट् कहकर कहता है कि 'देव सविता के लिए आहुति
दे।' वषट्कार आहुति देता है। अनुवषट्कार नहीं करता। सविता इसका मन है। ऐसा न हो
कि मन अग्नि के अर्पण हो जाय। सविता इसका प्राण है। ऐसा न हो कि प्राण अग्नि के अर्पण
हो जाय ॥७॥
अब बिना जूठा किये (अभक्षित) पात्र से वैश्वदेव ग्रह को लेता है। वैश्वदेव ग्रह को
अभक्षित पात्र से इसलिए निकालता है कि सावित्र ग्रह का अनुवषट्कार तो होता नहीं। इसी से
वैश्वदेव ग्रह निकालता है। इस प्रकार वैश्वदेव ग्रह के द्वारा ही उसका भी अनुवषट्कार हो
जाता है ॥८॥
वैश्वदेव ग्रह इसलिए भी निकाला जाता है—सविता इस (यज्ञ) का मन है, विश्वेदेव
ये सब-कुछ हैं, इस प्रकार वह इस सबको मन के आधीन कर देता है। इसीलिए यह सब-कुछ
मन के आधीन होता है ॥६॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि सविता इस यज्ञ का प्राण है। विश्वेदेव ये सब-
कुछ हैं। इस सब में इस प्रकार प्राण और उदान को धारण कराता है। इसलिए इस सब में प्राण
और उदान स्थित हैं ॥१०॥
वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि तीसरा सवन विश्वेदेवों का है। यह साम के
हिसाब से भी 'वैश्वदेव' है, ऋक् के हिसाब से भी और यजुः के पुरश्चरण के हिसाब से भी, जब
कि महावैश्वदेव ग्रह निकाला जाता है ॥११॥
इस ग्रह को पूतभृत में से निकालते हैं। पूतभृत वैश्वदेवों का है, क्योंकि इसी से देवों के
लिए भी निकालते हैं, इसी से मनुष्यों के लिए भी और इसी से पितरों के लिए भी। इसलिए
वैश्वदेव ग्रह को पूतभृत से निकालते हैं ॥१२॥
इसको बिना पुरोरुच् के निकालता है। इसको विश्वदेवों के लिए निकालता है। विश्व-
देवा का अर्थ है 'सब'। अर्थात् जो कुछ ऋक् है, जो यजुः है, जो साम है। चूंकि वह इसको सब
देवों के लिए निकालता है इसलिए वह इसके लिए पुरोरुच्-सम्पन्न हो जाता है। इसलिए उसको
बिना पुरोरुच् के निकालता है ॥१३॥
उसको इस प्रकार निकालता है, "उपयामगृहीतोऽसि सुशर्मासि सुप्रतिष्ठानः" (यजु०
८।८)—"तू आश्रय के लिए लिया गया है। तू सुरक्षित और सुप्रतिष्ठित है।" प्राण ही सुशर्मा
और सुप्रतिष्ठान है। "बृहदुक्षाय नमः" (यजु० ८।८)—'बृहदुक्ष' का अर्थ है प्रजापति, तात्पर्य
यह है कि "प्रजापति के लिए नमः।" "विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः"
(यजु० ८।८)—"सब देवों के लिए तुझे। यह तेरा स्थान है, सब देवों के लिए तुझे।" यह कह-
कर उसे रख देता है क्योंकि इसको यह विश्वेदेवों के लिए लेता है। अब वह (सदस् में) जाता है
और (होता के सामने) पूर्वाभिमुख बैठता है ॥१४॥
"एकया च दशभिश्च स्वभूते द्वाभ्यामिष्टये विꣳशती च। तिसृभिश्च वहसे त्रिꣳशता