शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-४
२४६ शतपथ ब्राह्मण
अथ॒ यामेता॒ꣳ समि॑धम॒भ्याद॑धाति॒ सैष्ट॑का येन॒ मन्त्रे॑ण जु॒होति॒ तद्यु॒र्येनैतामिष्ट॑-
कामुप॒दधा॑ति यदा वाऽइ॒ष्टकोपधीय॑तेऽथाऽहुति॒र्हूय॑ते॒ तद॒स्योप॑हितास्वे॒वेष्ट॑कास्वे॒-
ता आहु॑तयो हूयन्ते या ए॒ता अ॑ग्निहोत्राहुतयः ॥ १७ ॥ प्र॒जाप॑तिर्वाऽअ॒ग्निः । सं-
व॒त्स॒रो वै प्र॒जाप॑तिः संवत्स॒रे-संवत्सरे ह वाऽअ॒स्या॒ग्नि॒होत्रं॑ चि॒त्येना॒ग्निना॒ सं-
तिष्ठते सवत्स॒रे-संवत्सरे चित्यम॒ग्निमाप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्येत॒द्ध
हा॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ चि॒त्येना॒ग्निना॒ संति॑ष्ठते चि॒त्यम॒ग्निमाप्नो॑ति ॥ १८ ॥ सप्त॒ च वै श॒-
तान्य॒शीतीनामृचः॑ । वि॒ꣳश॒तिश्च॒ स य॒त्सायं॑ प्रा॒तर॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ ते द्वेऽआहु॑ती
ता अ॒स्य सं॑वत्स॒रऽआहु॑तयः संपद्यन्ते ॥ १९ ॥ सप्त॒ चैव श॒तानि॑ वि॒ꣳश॒तिश्च॑ ।
संवत्स॒रे-संवत्सरे ह वा॒ऽअ॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ म॒रुतो॒क्थ्येन॒ संप॑द्यते संवत्स॒रे-संवत्सरे
म॒रुदु॒क्थ्यमाप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्येत॒द्ध हा॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ म॒रुतो॒क्थ्येन॒
संप॑द्यते म॒रुदु॒क्थ्यमाप्नो॑ति ॥ २० ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३. ३.] ॥ ॥
अ॒ग्नौ ह॒ वै देवाः॑ । सर्वा॒न्पशू॒न्निद॑धिरे॒ ये च॒ ग्राम्या ये चार॑ण्या वि॒जये॑ वोप॒-
प्रेष्यन्तः॑ कामचा॒रस्य॑ वा कामा॒याय॑ नो गोपि॒ष्ठो गोपाय॒दिति॑ वा ॥ १ ॥ तानु॒ हा-
ग्निर्निच॑कमे । तैः सं॒गृह्य॒ रात्रिं॑ प्र॒विवेश॒ पुन॒रेम॒ इति॑ दे॒वा इद॑ग्निं तिरोभू॒तं ते
ह विदां॑ चक्रुरि॒ह वै प्रावि॑क्षद्रा॒त्रिं वै प्रावि॑क्ष॒दिति॒ तमे॑तत्प्र॒त्याय॒त्याꣳ रा॒त्रौ सा॒-
यमुपा॑तिष्ठन्त दे॒हि नः॑ पशून्पुन॒र्नः पशून्दे॒हीति॒ तेभ्यो॒ऽग्निः॑ पशून्पुनर॑ददात् ॥ २ ॥
तस्मै॒ कम॒ग्नीऽउ॑पतिष्ठेत । अ॒ग्नी वै दा॒तारौ॑ तावे॒वैतद्या॑चते सा॒यमुपा॑तिष्ठेत सा॒यꣳ
हि दे॒वा उपा॑तिष्ठन्त दत्तो हैवास्मा॒ऽए॒तौ पशू॒न्य ए॒वं वि॒द्वानु॒पति॑ष्ठते ॥ ३ ॥ अ-
थ यस्मान्नोप॑तिष्ठेत । उ॒भये॑ ह॒ वाऽइ॒दमग्रे॑ स॒हाऽऽसु॑र्देवा॒श्च मनु॒ष्याश्च॒ तद्य॒द्ध स्म म-
नु॒ष्याणां॒ न भव॑ति॒ तद्ध स्म॑ दे॒वान्याच॑न्त॒ऽइदं वै नो॒ नास्ती॒दं नो॒ऽस्त्विति॑ ते त॒-
स्याऽए॒व या॒ञ्चायै॑ द्वे॒षेण॑ दे॒वास्ति॑रोभू॒ता नेद्दिन॑सानि॒ नेद्वेष्यो॒ऽसा॒नीति॒ तस्मा-
न्नोप॑तिष्ठेत ॥ ४ ॥ अथ यस्मादु॑पे॒व ति॑ष्ठेत् । य॒ज्ञो वै दे॒वानामाशी॑र्यजमानस्य त-
कां० २, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १७-२० व १-५ शतपथब्राह्मण / २४७
इस पर जो समिधा रखता है वह मानो ईंट है। जिस मन्त्र से आहुति देता है वह यजुः
है जिससे वह ईंट रक्खी जाती है। और जब ईंट रख ली जाती है तब आहुति दी जाती है। इस-
लिए उन रक्खी हुई ईंटों पर वे ही आहुतियाँ दी जाती हैं, जो अग्निहोत्र की आहुतियाँ हैं। (दूसरे
बड़े यज्ञ से उपमा दी है) ॥१७॥
प्रजापति अग्नि है और प्रजापति संवत्सर है। इसलिए वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय पर
अग्निहोत्र होता है और वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय किया जाता है, उस मनुष्य का जो यह समझकर
अग्निहोत्र करता है ॥१८॥
अस्सी ऋचाओं की सात सौ बीस आहुतियां देवें। सायं और प्रातः के अग्निहोत्र की दो
आहुतियाँ होती हैं। इस प्रकार वर्ष-भर में— ॥१९॥
सात सौ बीस आहुतियाँ हुईं। इस प्रकार वर्ष-प्रतिवर्ष यह अग्निहोत्र बड़ी स्तुति द्वारा
किया जाता है। और जो अग्निहोत्र (उसके) रहस्य को समझकर करता है उसको बड़ी स्तुति
की प्राप्ति हो जाती है ॥२०॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
देवों ने अपने सब पशुओं को, चाहे गाँव के, चाहे जंगली, अग्नि को सौंप दिया। या तो
वे विजय के लिए जा रहे थे या स्वतन्त्र विचरना चाहते थे, या यह समझकर कि अग्नि रक्षक है,
इनकी रक्षा करेगा ॥१॥
अग्नि को उन पर लोभ आ गया। वह उनको लेकर रात्रि में प्रविष्ट हो गया। देवों ने
कहा, चलो लौट चलें और जहाँ अग्नि छिपा था वहाँ पहुँच गये। उन्होंने जान लिया कि अग्नि
यहाँ छिपा है, रात में छिपा है। जब सायंकाल को रात्रि वापस आई तो उन्होंने कहा, 'हमारे
पशु लौटा, हमारे पशु लौटा।' अग्नि ने उनके पशु लौटा दिये ॥२॥
इसलिए दोनों अग्नियों का नम्रता से सेवन करे। दोनों अग्नियां दाता हैं। उन्हीं से
माँगता है। शाम को सेवन करे। शाम ही को देवताओं ने सेवन किया था। जो ज्ञानपूर्वक दोनों
अग्नियों का सेवन करता है उसको वे पशु देते हैं ॥३॥
अग्नियों का सेवन करने के विरुद्ध यह युक्ति दी जाती है। पहले देव और मनुष्य दोनों
साथ रहते थे। जो चीज मनुष्यों के पास नहीं होती थी उसको वे देवों से माँगते थे, 'हमारे पास
यह वस्तु नहीं है। इसे हमको दीजिए।' इस माँगने के द्वेष के कारण देव छिप गये। इसलिए देवों
के पास नहीं जाना चाहिए कि कहीं वे हिंसा या द्वेष न करें ॥४॥
सेवन करने के पक्ष में यह युक्ति दी जाती है—यज्ञ देवों का है और आशीर्वाद यजमान
->अ॒यं(underbar on a)ते॒(underbar on te)योनि॑र्ऋ॒त्वियः॑ ।(svarita on ni, underbar on ri, svarita on yah)यतो॑(svarita on to)जा॒तोऽअ-` (underbar on jaa)
Everything looks solid and matched perfectly line by line.
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / २४६
का। यह आहुति (अग्निहोत्र) भी यज्ञ ही है और जो कुछ वह (यजमान) वहाँ रहकर करता है
वह यजमान के लिए आशीर्वाद है। इसलिए अवश्य सेवन करना चाहिए ॥५॥
सेवन के विरुद्ध यह युक्ति है— जो कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय के पास जाकर उसकी प्रशंसा
करता है और कहता है 'यह मुझे दान देगा या मेरा घर बनवा देगा', वह उसको वाणी और कर्म
से खुश करता है; परन्तु जो कहता है 'तू मेरा कौन है ? मुझे क्या देगा ?' तो वह मालिक उससे
अप्रसन्न रहेगा, उससे द्वेष करेगा । इसलिए अग्नियों के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि प्रज्वलित
करने और आहुति देने से वह माँग चुकता है, फिर (माँगने के लिए) अग्नियों के पास नहीं जाना
चाहिए ॥६॥
अब सेवन के पक्षों में यह युक्ति है। जो मांगता है उसको दाता भी मिल जाता है। कोई
मालिक अपने नौकर की आवश्यकताओं को नहीं जानता जब तक नौकर नहीं कहता कि 'मैं
आपके ही ऊपर हूँ। आप मेरा पालन कीजिए।' जब जान जाता है कि यह मेरे ही आश्रित है तो
उसका पालन करता है। इसलिए अग्नियों का सेवन ही करना चाहिए। अग्नियों के सेवन के पक्ष
में ये युक्तियाँ हैं ॥७॥
अग्नि प्रजापति है। इसलिए जब अग्निहोत्र किया जाता है तो वह (अग्नि) जिस पर
शासन करता है या जो उसके अनुकूल होता है उसके वीर्य का वह सिंचन करता है। (अग्नियों
के) सेवन करनेवाला उस अग्नि का इन सब बातों में अनुकरण करता है और सन्तानोत्पत्ति
करता है ॥८॥
वह 'उप'* वाले मन्त्र से प्रार्थना करता है। 'उप' का अर्थ है पृथिवी, और यह दो
प्रकार से— जो कुछ इस संसार में उत्पन्न होता है वह इस पृथिवी पर उत्पन्न होता है ('उप' +
जायते); और जो नष्ट होता है वह यहीं दबाया जाता है ('उप' + उप्यते)। इसलिए यहाँ रात-
दिन आधिक्य होता रहता है (अर्थात् पृथिवी पर जो उत्पन्न हुआ वह भी आधिक्य है और जो
उसमें गाड़ दिया गया वह भी आधिक्य हुआ)। इसलिए वह ('उप' वाले मन्त्र से आरम्भ करके)
आधिक्य से आरम्भ करता है ॥६॥
अब वह कहता है, “उप प्रयन्तोऽअध्वरम्” अर्थात् "मैं अध्वर में (पर) जाऊँ ।” 'अध्वर'
नाम है यज्ञ का। इसलिए "मैं यज्ञ में (पर) जाऊँ" ऐसा अर्थ हुआ। अब कहता है, “मन्त्रं
वोचेमाग्नये ।”— “अग्नि के लिए मन्त्र बोले ।" क्योंकि वह मन्त्र बोलने ही को है। अब कहता है,
"आरेऽअस्मे च शृण्वते ।”—“उसके लिए जो हमको दूर से सुनता है" अर्थात् 'यद्यपि तू हमसे
दूर है तो भी तू इस प्रार्थना को सुन, और हमारा भला चीत' ॥१०॥
अब कहता है, “अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम्। अपाँ२रेताँ२सि जिन्वति”
(यजुर्वेद ३।१२)— “अग्नि द्यौ लोक का सिर, महान्, पृथिवी का पति है। यह जलों में वीर्य को
सींचता है।" इस प्रकार इस मन्त्र के द्वारा वह प्रार्थना करता हुआ उसके पीछे दौड़ता है जैसे
माँगनेवाले दौड़ते हैं और कहता है, 'तू ऐसों की सन्तान है, तू ऐसा कर सकता है, तू ऐसा
है' ॥११॥
अब इन्द्र और अग्निवाला मन्त्र— "उभा वामिन्द्राग्नीऽआहुवध्याऽउभा राधसः सह
मादयध्यै । उभा दाताराविषाँ२ रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्” (यजु० ३।१३)— “इन्द्र
और अग्नि, मैं तुम दोनों को बुलाता हूँ। मैं तुम दोनों को प्रीति की हवि से प्रसन्न करूँगा। तुम
दोनों बल और धन के दाता हो। तुम दोनों को अन्न की प्राप्ति के लिए बुलाता हूँ।" इन्द्र सूर्य का
नाम है। जब वह अस्त हो जाता है तो आहवनीय अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। इसलिए प्रार्थी
उन दोनों मिले हुओं से प्रार्थना करता है कि ये दोनों मिलकर मुझको देंगे। इसीलिए इन्द्र और
अग्निवाला मन्त्र पढ़ता है ॥१२॥
अब पढ़ता है, "अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातोऽअरोचथाः । तं जानन्नग्नऽआरोहाथा
- उप प्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये । आरेऽअस्मे च शृण्वते । (यजु० ३।११)
रोचथाः । तं जानन्नग्न॒ऽआरोहाथा नो वर्धया रयिमिति पुष्टं वै रयिर्भूयो-भूय ए-
व न इदं पुष्टं कुर्वित्येवैतदाह ॥ १३ ॥ अयमि॒ह प्रथ॒मः । धायि धातृभिर्होता य-
जिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्रवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभुं विशे-विश॒ऽइ-
त्यन्वेव धावति तद्यथा याञ्चन्कल्याणं वदेदानुष्यायणो वै त्वमस्यलं वै त्वमेतस्मा
ऽअसीत्येवमेषा यथोऽएवैष तयोऽह्वैनमेतदाह यदाह विभुं विशे-विश॒ऽइति वि-
भूर्ह्येष विशे-विशे ॥ १४ अस्य प्रत्नाम् । अनु द्युत॒ग्ं शुक्रं दुदुह्रेऽअ॒स्रयः । पयः
सहस्रसामृषिमिति परमा वाऽएषा सनीनां यत्सहस्रसनिस्तदेतस्यैवावरुद्धै तस्मा-
दाह पयः सहस्रसामृषिमिति ॥ १५ ॥ तदेतत्समाहार्यं षडृचं । तस्योपवती प्रथ-
मा प्रत्नवत्युत्तमाऽथोचाम तद्यस्मादुपवत्याह ह्व प्रत्नं यावन्तो ह्येव सनाये दे-
वास्तावन्त एव देवास्तस्माददः प्रत्नं तदिमेऽएवांतरेण सर्वे कामास्तेऽअस्माऽइमे
संतानाने सर्वान्कामान्त्संनमतः ॥ १६ ॥ स वै त्रिः प्रथमां जप॑ति । त्रिरुत्तमां त्रि-
ष्कृत्यायणा हि देवास्त्रिवृद्धयनास्तस्मात्त्रिः प्रथमां जप॑ति त्रिरुत्तमाम् ॥ १७ ॥ यद्ध
वाऽअ॒त्राग्निहो॒त्रं जुह्वत् । वाचेन वा कर्मणा वा मिथ्या करोत्यात्मनस्तदवद्य-
त्यायुषो वा वर्चसो वा प्रजा॑यै वा ॥ १८ ॥ तडु खलु तनूपा अग्नेऽसि । तन्वं मे
पाह्यायुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वा
ऊनं तन्मऽआपृणेति ॥ १९ ॥ यद्ध वाऽअ॒त्राग्निहो॒त्रं जुह्वत् । वाचेन वा कर्मणा
वा मिथ्या करोत्यात्मनस्तदवद्यत्यायुषो वा वर्चसो वा प्रजा॑यै वा तन्मे पुनरा-
प्यायेत्येवैतदाह भूयो हास्यैतत्पुनराप्यायते ॥ २० ॥ इन्धानास्त्वा । शत॒ग्ं हिमा
द्युमन्त॑ समिधीमहीति शतं वर्षाणि जीवास्मेत्येवैतदाह तावन्ता महाग्ं स-
मिधीमहीति यदाह द्युमन्त॒ समिधीमहीति वयस्वन्तो वयस्कृत॒ग्ं सहस्वन्तः स-
हस्कृतमिति वयस्वन्तो वयं भूयास्म वयस्कृतं भूया इत्येवैतदाह सहस्वन्तो वयं
भूयास्म सहस्कृतं भूया इत्येवैतदाहाग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाभ्यमिति त्वया
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० १३-२१ शतपथब्राह्मण / २५१
नो वर्धया रयिम्” (यजु० ३।१४) - "यह तेरी ऋतु के अनुकूल योनि है जहां से उत्पन्न होकर
तू चमकता है। हे अग्नि ! इस बात को जानकर उठ और हमारा धन बढ़ा।" 'रयि' का अर्थ है
पुष्टि। इस मन्त्र का अर्थ यह है कि 'तू हमारी बढ़ोतरी कर' ॥१३॥
अब कहता है, “अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो
भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे" (यजु० ३।१५) - "विधाताओं द्वारा प्रथम यह यहाँ
बनाया गया, सर्वश्रेष्ठ होता और यज्ञ में पूजा के योग्य, जिसको अप्नवान और भृगु ने प्रज्वलित
किया, वनों में विचित्रता से चमकते हुए और घर-घर में फैलते हुए' ॥१४॥
अब कहता है, "अस्य प्रत्नामन्नु द्युतं शुक्रं दुदुह्रे अह्रयः । पयः सहस्रसामृषिम्" (यजुर्वेद
३।१६) - " ( अह्रयः ) न शरमानेवाले लोगों ने (अस्य) इस अग्नि के ( प्रत्नाम् ) सन्तान ( द्युतं )
प्रकाशयुक्त (शुक्रं) शुद्ध (पयः) दूध को (सहस्रसाम् + ऋषिम्) हजारों देनेवाले ऋषि से
(दुदुह्रे ) दुहा।" 'सहस्रसा' का अर्थ है परम दान देनेवाला। इसी की प्राप्ति के लिए वह कहता
है 'सहस्रसाम् ऋषिम्' ॥१५॥
ये छः ऋचाओं के मन्त्र हैं। पहले में 'उप' शब्द है और पिछले में 'प्रत्न' (अर्थात्
यजुर्वेद के तीसरे अध्याय, ११ से १६ मन्त्र तक)। हमने इनका उच्चारण इसलिए किया 'उप'
वाली यह अर्थात् पृथिवी है और प्रत्न (सन्तान) वह अर्थात् द्यौ है। क्योंकि जितने देव पहले थे
उतने अब भी हैं, इसलिए 'प्रत्न' का अर्थ द्यौलोक है। अब इन्हीं दोनों के बीच में सब कामनाएँ
हैं और ये दोनों यजमान के हित के लिए और उसकी कामनाओं की पूर्ति के लिए संयुक्त
हैं ॥१६॥
पहला मन्त्र तीन बार जपता है और अन्तिम तीन बार। क्योंकि यज्ञ तीन आरम्भ और
तीन अन्तवाले होते हैं, इसलिए तीन बार प्रथम मन्त्र जपता है और तीन बार अन्तिम ॥१७॥
अग्निहोत्र करने में जो कुछ भूल वाणी या कर्म से करता है उससे वह आत्मा आयु, वर्चस्
और प्रजा को हानि पहुँचाता है ॥१८॥
इसलिए कहता है, “तनूपाऽअग्नेऽसि तन्वं मे पाह्यायुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदाऽअग्नेऽसि
वर्चो मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्मऽआपृण” (यजु० ३।१७) - “हे अग्नि ! तू शरीरों का
रक्षक है, मेरे शरीर की रक्षा कर। हे अग्नि ! तू आयु को देनेवाला है, मुझे आयु दे। हे अग्नि !
तू वर्चस् को देनेवाला है, मुझे वर्चस् दे । हे अग्नि ! जो मेरे शरीर में कमी है उसको मेरे लिए
पूरा कर” ॥१९॥
और अग्निहोत्र करने में वह वाणी या कर्म से जो भूल करता है उससे वह आत्मा आयु,
वर्चस् और प्रजा को हानि पहुँचाता है। जब वह इस मन्त्र को पढ़ता है 'मेरी कमी को पूरा कर'
तो वह कमी पूरी हो जाती है ॥२०॥
अब कहता है, “इन्धानास्त्वा शतꣳ हिमा द्युमन्तं समिधीमहि” (यजु० ३।१८)—
"प्रज्वलित हम सौ वर्षों तक तुझ जलते हुए के ऊपर समिधा रखते हैं।" इससे तात्पर्य है कि हम
सौ वर्ष जीते रहें, और 'जलते हुए तुझ पर समिधा रक्खें' का अर्थ है कि 'हे महान् ! हम तुझको
प्रज्वलित करते हैं।' अब कहता है- “वयस्वन्तो वयस्कृतꣳ सहस्वन्तः सहस्कृतम्” (यजु० ३।१८)
-“अन्नवाले हम तुझ अन्न देनेवाले को, बलवान् हम बल देनेवाले तुझको।" इसका अर्थ है कि
'हम अन्नवाले हों, तू अन्न देनेवाला हो। हम बलवाले हों, तू बल देनेवाला हो।' अब कहा- “अग्ने
सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाम्यम् ।” (यजु० ३।१८) – “हे अग्नि ! क्षतिरहित हम तुझ क्षतिरहित
२५२ शतपथ ब्राह्मण
वय॒ꣳ सपत्नान्पापीयसः क्रियास्मेत्ये॒वैतदाह ॥ २१॥ चित्रावसो स्वस्ति ते पार॒म-
शीयेति । त्रि॒रेतज्जपति रात्रिर्वै चित्रावसुः सा हीय॒ꣳ संगृह्येव चित्राणि वसति
तस्मान्नारकाश्चिन्न॑ ददृशे ॥ २२॥ ए॒तेन ह स्म वाऽऋषयः । रात्रेः स्व॒स्ति पार॒ꣳ स-
मश्नुवत॒ऽएतेनो॑ ह स्मैनान्॒रात्रीर्नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न विन्दन्त्येतेनोऽए॒वैष एतद्रात्रेः
स्व॒स्ति पार॒ꣳ समश्नुत॒ऽएतेनोऽएनꣳ रात्रीर्नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न विन्दन्त्येतावन्नु ति-
ष्ठञ्जपति ॥ २३॥ अथासीनः । सं त्वमग्ने॒ सूर्य्यस्य॒ वर्च॑सा गथा॒ इति तद्यदस्तं यन्ना-
दित्य आहवनीयं प्रविशति तेनैतदाह समृषीणाꣳ स्तुतेनेति तद्यदुपतिष्ठते तेनै-
तदाह॒ सं प्रियेण॒ धाम्नेत्याहुतयो वाऽअस्य प्रियं धामाहुतिभिरेव तदाह सम॒ह-
मायु॑षा सं वर्च॑सा सं प्र॒जया॒ सꣳ रायस्पोषे॑ण गमिषीयेति यथा त्वमेतैः समगथा
ए॒वमहम॒युषा वर्च॑सा प्र॒जया रायस्पोषे॑णेति यद्ब्रूतेति तदे॒वमहमेतैः संगहाऽइत्ये-
वैतदाह ॥ २४॥ अथ गामभ्यैति । अन्य॒ स्थान्यो वो भक्षीय मह॒ स्थ महो वो
भक्षीयेति यानि वो वीर्य्याणि यानि वो महाꣳसि तानि वो भक्षीयेत्येवैतदा-
ह॒ोर्ज॒ स्थोर्जं॑ वो भक्षीयेति रस॒ स्थ रसं वो भक्षीयेत्येवैतदाह रायस्पोष॒ स्थ रा-
यस्पोषं वो भक्षीयेति भूमा॒ स्थ भूमानं वो भक्षीयेत्येवैतदाह ॥ २५॥ ॥ शतम्
११०० ॥ ॥ रेवती रमध्वमिति रेवन्तो हि पश॒वस्तस्मादाह रेवती रमध्वमित्य-
स्मि॒न्योनाव॒स्मिन्गोष्ठेऽस्मिँल्लोकेऽस्मिन्क्षये । इ॒हैव स्त॒ मापगातेत्यात्मन ए॒वैत-
दाह म॑देव मापगातेति ॥ २६॥ अथ गामभिमृशति । सꣳहितासि विश्व॑रू॒पीति
विश्व॑रूपा इव हि पश॒वस्तस्मादाह विश्व॑रूपीत्यूर्जा माविश गौपत्येनेत्यूर्जेति य-
दाह॒ रसे॒नेति तदाह गौपत्येनेति यदाह भूम्नेति तदाह ॥ २७॥ अथ गार्हपत्यम-
भ्यैति । स गार्हपत्यमुपतिष्ठतऽउप॑ त्वाग्ने दि॒वे-दिवे दोषावस्तर्धिया व॒यम् । नमो
भर॑न्त एमसीति नम ए॒वास्माऽएतत्करोति यथेनं न हिꣳस्यात् ॥ २८॥ राज॑न्तम-
ध्वराणां॑ । गो॒पामृतस्य॒ दीदि॑विम् । वर्ध॑मानꣳ स्वे दम॒ऽइति स्वं वै तद्गृहं यन्मम
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / २५३
और शत्रुओं का दमन करनेवाले को।” इसका तात्पर्य यह है कि 'तेरी सहायता से शत्रुओं को
सर्वथा दुःखी करें' ॥२१॥
तीन बार इस मन्त्रांश को जपे- “चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय” (यजु० ३।१८)—
“हे चित्रावसो, हम भलीभांति तेरे पार को पा जायें।” 'चित्रावसु' रात है, क्योंकि यह चित्रों को
इकट्ठा करके रहती है। इसीलिए (रात में) दूर से चित्र स्पष्ट नहीं दीखता ॥२२॥
इसी मन्त्र से ऋषि लोग रात के पार को भलीभांति पा गये और इसी के कारण
दुरात्मा राक्षसों ने उनको न पाया। इसी प्रकार इसी मन्त्र के द्वारा वह रात के पार को भली-
भाँति पा जाता है और इसी के कारण दुरात्मा राक्षस उसको नहीं पा सकते। इस मन्त्र को वह
खड़े होकर जपता है ॥२३॥
अब बैठे-बैठे यह जपता है - “सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः” (यजु० ३।१६) - “हे
अग्नि, तू सूर्य के वर्चस् (प्रकाश) को प्राप्त हो गया।” यह वह कहता है क्योंकि डूबता हुआ सूर्य
आहवनीय में घुस जाता है, इसीलिये कहा। अब कहा- “समृषीणाꣳ स्तुतेन।” (यजु० ३।१६)
“ऋषियों की स्तुति से।” चूँकि वह खड़े होकर स्वयं प्रार्थना करता है इसलिए ऐसा कहता है-
“सं प्रियेण धाम्ना” (यजु० ३।१६) - “प्रिय घर के द्वारा।” आहुतियाँ इसका प्रियधाम हैं।
इसलिए 'धाम के द्वारा' का अर्थ है आहुतियों के द्वारा। अब कहा- “समहमायुषा सं वर्चसा सं
प्रजया सं॒ रायस्पोषेण गमिषीय” (यजु० ३।१६) - “मैं आयु, वर्चस्, सन्तान और धन की प्राप्ति
करूँ।” इसका तात्पर्य यह है कि 'जैसे तूने ये चीजें प्राप्त कीं, वैसे मैं भी आयु, वर्चस्, सन्तान
और धन अर्थात् समृद्धि को प्राप्त हो जाऊँ' ॥२४॥
अब इस मन्त्र को पढ़कर गाय के पास जाता है- “अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो
वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम अन्ध (अन्न) हो, मैं तुम्हारा अन्न खाऊँ; तुम धन हो, मैं
तुम्हारा धन खाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि तुम्हारे जो पराक्रम हों और जो धन हों उनका मैं
उपभोग करूँ। अब कहा- “ऊर्ज स्थोर्जं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम ऊर्ज हो, मैं तुम्हारे
ऊर्जं को भोगूं।” अर्थात् 'तुम रस हो। मैं तुम्हारे रस को भोगूं।' अब कहा- “रायस्पोष स्थ
रायस्पोषं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम धन हो, तुम्हारे धन को मैं भोगूँ।” अर्थात् तुम
समृद्धि हो, मैं तुम्हारी समृद्धि का भोग करूँ ॥२५॥
अब कहा “रेवती रमध्वम्” (यजु० ३।२१) - “हे धनवालो! रमण करो।” रेवन्त
अर्थात् धनवाले पशु हैं। इसलिए कहा, 'रेवती रमध्वम्।' अब कहा- “अस्मिन् योनावस्मिन्
गोष्ठेऽस्मिंल्लोकेऽस्मिन्क्षये। इहैव स्त मापेगात।” - “इस स्थान में, इस बाड़े में, इस लोक में, इस
घर में, यहाँ ही रहो, यहाँ से न जाओ।” यहाँ अपने लिए कहा है अर्थात् 'मुझको छोड़कर न
जाओ' ॥२६॥
अब इस मन्त्र से गाय को छूता है- “सं॒हितासि विश्वरूपी” (यजु० ३।२२) - “तू
इकट्ठा करनेवाली और नाना रूपवाली है।” पशु भिन्न-भिन्न रूपवाले होते हैं इसलिए (गाय को)
'विश्वरूपी' कहा। अब कहा- “ऊर्जा माविश गोपत्येन” (यजु० ३।२२) - “(गोपत्येन ऊर्जा)
गौओं से युक्त ऊर्ज के द्वारा (मा) मुझमें (विश) प्रविष्ट हो।” यहाँ 'ऊर्ज' कहने से 'रस' का
तात्पर्य है और 'गोपत्य' कहने से तात्पर्य है 'संवृद्धि' का ॥२७॥
अब गार्हपत्य में जाता है और उसकी अर्चना करता है इस मन्त्र से— “उप त्वाग्ने दिवे-
दिवे दोषावस्तर्धिया वयम्। नमो भरन्त॒एमसि” (यजु० ३।२२) - “हे अग्नि ! दिन-प्रतिदिन
नमस्कार करते हुए हम रात को प्रकाशित करनेवाले तुझको बुद्धि से प्राप्त होते हैं। वह इसलिए
इसकी अर्चना करता है कि कहीं वह उसको हानि न पहुँचा दे ॥२८॥
अब कहता है, “राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्। वर्धमानं॒ स्वे दमे” (यजु०
२५४ शतपथ ब्राह्मण
तन्नो॑ भूयो॒-भूय॑ ए॒व कु॒र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥ २९॥ स॒ नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवे॑ । अग्ने॑ सू॒पाय॒-
नो भ॑व । स॒च॑स्वा नः स्व॒स्तय॒ऽइति॒ यथा॑ पि॒ता पु॒त्राय॑ सूपच॒रो नैवे॑नं॒ केन॑ च॒न
हि॒नस्त्ये॒वं नः॑ सूपच॒रो रधि॒ मैव॑ वा॒ केन॑ च॒न हि॑सिषिष्टे॒त्येवैतदा॑ह ॥ ३०॥ अथ॑
द्विपदा॑: । अग्ने॒ त्वं नो॒ऽअन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑ । वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒
अच्छा॒ नक्षि॑ सु॒मत्त॑मं र॒यिं दाः॑ ॥ तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ स-
खिभ्यः॑ । स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ऽअघाय॒तः सम॑स्मा॒दिति॑ ॥ ३१॥ यद्वा
ऽआ॑हव॒नीय॒मुप॑तिष्ठते । प॒शूंस्तद्या॑चते॒ तस्मा॑त्तुमुच्चावचैश्छन्दो॑भिरु॒पति॑ष्ठत॒ऽउच्चा॑-
वचा इव॒ हि पशवो॒ऽथ यद्गार्ह॑पत्यं पु॒रुषां॑स्त॒द्या॑चते॒ तद्गाय॑त्रं प्रथ॒मं तृचं॑ गाय॒त्रं
वा॒ऽअग्ने॒श्छन्दः॑ स्वेनै॒वैन॑मेत॒च्छन्द॑सोप॒परै॑ति ॥ ३२॥ अथ द्विपदा॑: । पु॒रुष॒छन्द॑सं॒ वै
द्विपदा॑ द्विपाद्वा॒ऽअयं पु॑रुषः पु॒रुष॑मे॒वैतद्या॑चते पु॒रुषान्हि॑ या॑चते॒ तस्मा॑द्द्विपदाः॑
प॒शुमा॒न्त्सु वै पु॑रुष॒वान्भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानुप॑ति॒ष्ठते॑ ॥ ३३॥ अथ गा॒मभ्यै॑ति । इ॒-
डऽए॒ह्यदि॑त॒ऽएही॑तो॒डा हि गौरदि॑ति॒र्हि गौस्ताम॑भि॒मृश॑ति का॒म्या ए॒तेति॑ मनु॒-
ष्याणां॒ ह्येतासु॒ कामाः॒ प्रवि॑ष्टा॒स्तस्मा॑दाह का॒म्या ए॒तेति॒ मयि॑ वः कामध॒रणं॑
भूया॒दित्य॒हं वः॑ प्रि॒या भू॑यासमित्ये॒वैतदा॑ह ॥ ३४॥ अथा॒न्तरे॑णाहव॒नीयं॑ च गार्ह॑-
पत्यं च । प्राङ् तिष्ठ॑न्न॒ग्निमीक्ष॑माणो जपति सोमा॒न ँ॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्म॒णस्प॑-
ते । कक्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॑ ॥ यो रे॒वान्योऽअ॑मीव॒हा वसु॑वित्पुष्टि॒वर्धनः॑ । स नः॑
सिषक्तु॒ यस्तुरः॑ ॥ मा नः॒ श ँ॒सोऽअरु॑षो॒ धूर्तिः॒ प्रणङ् मर्त्य॑स्य । र॒क्षा णो॑ ब्रह्मण-
स्प॒तऽइति॑ ॥ ३५॥ यद्वा॒ऽआह॑वनी॒यमुप॑तिष्ठते । दिवं॒ तदुप॑तिष्ठ॒तेऽथ॒ यद्गार्ह॑पत्यं
पृथि॒वीं तदु॒थैतदु॑त्त॒र्द्धिन्ने॒षा हि दिग्बृहस्प॑ते॒रैता ँ॒ ह्ये॒तद्दिश॒मुप॑तिष्ठते॒ तस्मा॑द्गा-
र्ह॑पत्यं॑ जप॑ति ॥ ३६॥ म॒हि त्री॒णामवॊ॑ऽस्तु । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः । दु॒राधर्षं॒ व-
रुणस्य॑ ॥ न हि ते॒षाममा॑ च॒न नाध॑सु॒ वार॑णेषु । ईशे॑ रि॒पुरघ॒श ँ॒सः॑ ॥ ते हि
पु॒त्रासो॒ऽअदि॑तेः॒ प्र जी॒वसे॒ मर्त्या॑य । ज्योति॒र्यच्छ॒न्त्यज॑स्र॒मिति॑ तत्रा॑स्ति नाध॑सु॒ वा-
कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / २५५
३।२३) — "यज्ञों के प्रकाशित करनेवाले, ऋत के चमकानेवाले रक्षक, अपने घर में बढ़नेवाले
तुझको।" इसका तात्पर्य है कि यह मेरा घर तेरा ही घर है। इसको हमारे लिए समृद्धि-शील
कर ॥२६॥
अब कहा, "स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये" (यजु० ३।२४)
"हे अग्नि, तू हमारे लिए उसी प्रकार सुलभ हो जैसे पिता पुत्र को । और हमारी स्वस्ति कर।"
इसका तात्पर्य है कि जैसे पिता पुत्र के लिए सुलभ होता है और किसी प्रकार उसको हानि नहीं
पहुँचाता, इसी प्रकार तू भी हमारे लिए सुलभ हो, किसी प्रकार हानि न पहुँचा ॥३०॥
अब वह दो पदवाले मन्त्र को पढ़ता है, 'अग्ने त्वं नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भवा
वरूथ्यः । वसुर्गनिर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिं दाः' (यजु० ३।२५) — "तं त्वा शोचिष्ठ
दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णोऽअघायतः समस्मात्"
(यजु० ३।२६) — "हे अग्नि ! तू मेरे निकट रह । रक्षक, कल्याणकारी और घर का हितकर हो ।
हे अग्नि, तुम वसु (धन) हो, वसुश्रवा अर्थात् धन देने के लिए प्रसिद्ध हो । हमको अच्छा-अच्छा
चमकदार धन दो" (यजु० ३।२५) — "अपने मित्रों को सुख के लिए हम तुझ प्रकाशस्वरूप और
चमकानेवाले के पास आते हैं। हमारे साथ रह, हमारी बात सुन और हमको पापी शत्रु से बचा"
(यजु० ३।२६) ॥३१॥
जब आहवनीय की अर्चना करता है तो पशुओं की याचना करता है, इसलिए ऊँचे-नीचे
मन्त्रों को जपता है, क्योंकि पशु भिन्न आकार के होते हैं। जब गार्हपत्य की अर्चना करता है तो
पुरुषों की याचना करता है। इसलिए पहली तीन ऋचाएँ गायत्री छन्द में हैं। गायत्री अग्नि.का
छन्द है। इसलिए उसी के छन्द से स्तुति करता है ॥३२॥
अब वह (ऊपर के) दो पदवाले मन्त्र जपता है। दो पदवाले मन्त्र पुरुष छन्द हैं, क्योंकि
पुरुष भी दो पैरवाला है, इसलिए पुरुषों की याचना करता है। पुरुषों की याचना करता है
इसलिए दो पदोंवाले मन्त्र को जपता है। जो इस रहस्य को समझकर (दोनों अग्नियों की) सेवा
करता है उसको पशु और पुरुष दोनों प्राप्त होते हैं ॥३३॥
अब वह इस मन्त्र को जपकर गाय के पास जाता है, "इड एह्यदित ऽएहि" (यजुर्वेद
३।२७) — "हे इडा, आ । हे अदिति, आ ।" इडा गौ है। अदिति गौ है। "काम्याऽ एत" अर्थात्
"कामना के योग्य तुम आओ" यह कहकर छूता है। इनमें मनुष्यों की कामनाएँ हैं, इसलिए इनको
'काम्या एत' कहा (यजु० ३।२७) । अब कहा—"मयि वः कामधरणं भूयात्" (यजु० ३।२७)
—"आपकी मेरे में इच्छा-पूर्ति हो" अर्थात् मैं आपका प्रिय होऊँ, यह तात्पर्य है ॥३४॥
अब आहवनीय और गार्हपत्य के बीच में खड़ा होकर पूर्व को देखकर (इन तीन मन्त्र)
को जपता है—'सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं यऽ औशिजः ॥ यो रेवान् योऽ
अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ मा नः शँ सोऽअरुषो धूर्तिः प्रणङ्
मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते" (यजु० ३।२८, २६, ३०) — "हे वाणी के पति, सोम को अर्पण
करनेवाले कक्षीवान औशिज को सुरीला कर", "धनवाला, दुःखनाशक, समृद्धिशील और पुष्टि
देनेवाला तथा तीव्र, हमारे पास आवे", "हे वाणी के पति ! हमारी रक्षा कर । बुरों का शाप
हम तक न आवे और न किसी मनुष्य की धूर्तता" ॥३५॥
जब वह आहवनीय में जाता है तो मानो द्यौलोक में जाता है और जब गार्हपत्य में
जाता है तो मानो पृथिवीलोक में, इससे वह अन्तरिक्ष में जाता है। यह बृहस्पति की दिशा है।
इस दिशा को प्राप्त होना चाहता है, इसलिए बृहस्पतिवाला मन्त्र जपता है ॥३६॥
अब जपता है, "महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्षं वरुणस्य" (यजु०
३।३१) । "नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु । ईशे रिपुरघशँ सः' (यजु० ३।३२) । "ते हि
पुत्रासोऽ अदितेः प्र जीवसे मत्र्याय । ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्" (यजु० ३।३३) — "बड़ी द्यौलोक
सम्बन्धी, न पराजित होनेवाली मित्र, अर्यमा और वरुण तीनों की रक्षा (हमारे लिए) हो,"
"(इन देवों से रक्षित) लोगों पर भयानक मागों अथवा घरों में पापी शत्रु स्वत्व नहीं प्राप्त कर
सकते", "(ये देव) निरन्तर मनुष्य के लिए अदिति के पुत्रों के जीवन के लिए ज्योति देते हैं।"