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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-३

२१८ शतपथ ब्राह्मण
स्यग्नी॒ञ्श्चाध॑त्स्वेति॑ स॒ होवा॑च ते॒ मेतदू॑च॒ वाचं॑यम् ए॒वैधि॒ न वाऽआ॒हिता॑ग्निना-
नृ॒तं व॑दि॒तव्यं॒ न वद॒न्त्नाडु नानृ॒तं व॑दे॒ताव॑त्स॒त्यमे॒वोप॑चा॒र् इति॑ ॥२०॥ ब्रा॒ह्म॒णम्
॥६[२.२.]॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या ११४ ॥ ॥
व॒रु॒णो ह्ये॑न्द्रा॒ज्यका॑म॒ आद॑धे । स॒ राज्य॑मगच्छ॒त्समा॒ह्य॑स्य॒ वेद॒ यन्न॒ वरु॑णो
राजेत्ये॒वाहुः॒ सोमो॒ यश॑स्कामः स॒ यशो॑ऽभव॒त्समा॒ह्य॑स्य॒ सोमे॒ लभ॑ते॒ यन्न॒ नोभा-
वेवागच्छ॑तो॒ यश॑ ए॒वैतद्रू॒पमा॑गच्छति॒ यशो॑ ह॒ भव॑ति॒ राज्यं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वा-
नाध॑त्ते ॥१॥ अ॒ग्नौ ह॒ वै दे॒वाः । सर्वा॑णि रू॒पाणि॑ निद॒धिरे॒ यानि॑ च ग्रा॒म्या॑णि
यानि॑ चा॒रण्या॑नि वि॒जयं॑ वो॒पप्रे॑प्सन्तः कामचा॒रस्य॑ वा कामा॒यायं॑ नो गोपि॒ष्ठो
गोपा॒यद्विति॒ वा ॥२॥ ता॒न्यु हा॒ग्निर्निर॑चकमे । तैः सं॒गृभ्या॒ऽन्त॑र्प्रविवेश पुन॒रेम
इति दे॒वा उ॒दमुं॑ तिरो॒भूतं॑ तेषां॒ ह्ये॑तदेवास॒ किमि॒ह कत्र्त॑व्यं॒ केहु॒ प्रज्ञेति॒ वा
॥३॥ तत॑ ए॒तत्त॑ष्टा पुन॒राधे॑यं दद॒र्श । तदाद॑धे तेना॒ग्नेः प्रि॒यं धामोपा॑ऽगच्छ॒त् सो
ऽस्मा॒ऽउ॒भया॑नि रू॒पाणि॒ प्रतिनि॑ःससर्ज॒ यानि॑ च ग्रा॒म्या॑णि॒ यानि॑ चा॒रण्या॑नि॒ त-
स्मादाहुस्त्वष्ट्राणि॒ वै रू॒पाणी॑ति॒ त्वष्टुर्ह्ये॑व सर्वं॒ रूप॒मुप॑ ह॒ त्वेवान्याः॑ प्र॒जा याव॑-
त्तो-यावत्त॒ इव॒ तिष्ठ॑न्ते ॥४॥ तस्मै॒ कं पुन॒राधे॑यमा॒दधी॑त । ए॒षह॑ ह्यै॒वाग्नेः॑ प्रि॒यं
धामोपा॑गच्छति॒ सो॒ऽस्मा॒ऽउ॒भया॑नि रू॒पाणि॒ प्रतिनि॑ःसृजति॒ यानि॑ चं ग्रा॒म्या॑णि या-
नि चा॒रण्या॑नि॒ तस्मि॑न्ने॒तान्यु॒भया॑नि रू॒पाणि॑ दृश्यन्ते॒ पर॑मता॒ वै सा स्पृ॒रूप॒त्यु॑ का-
स्मै तथा॑ पुष्यति॒ लो॒क्य॑मे॒वापि॑ ॥५॥ अ॒ग्नियो॒ऽयं य॒ज्ञः । ज्योति॒र॒ग्निः पा॒प्मनो द॑-
ग्धा सो॒ऽस्य पा॒प्मानं॑ दहति॒ स इ॒ह ज्योति॑रेव॒ श्रिया॒ यश॑सा भवति॒ ज्योति॑र॒मुत्र॑
पु॒ण्यलो॒कमे॑तन्नु॒ तद्य॒स्मादाद॑धीत ॥६॥ स वै व॒र्षास्वा॑दधीत । व॒र्षा वै सर्व॑ऽऋ-
तवो॒ वर्षा॒ हि वै सर्व॑ऽऋतवो॒ऽथादो॑ व॒र्षमकु॑र्मा॒दो व॒र्षमकु॑र्मेति संवत्सरा॒त्संप॑-
श्यन्ति॒ वर्षा॒ ह्वेव॒ सर्वे॑षामृतू॒नाꣳ रू॒पमुत॑ हि॒ तद्व॑र्षासु॒ भव॑ति यदाहुर्ग्री॒ष्मो॒ऽव
वा॒ऽअद्येत्युतो॒ तद्व॑र्षासु॒ भव॑ति यदाहुः॒ शिशिरो॒ऽव वा॒ऽअद्येति॑ व॒र्षाद्धिहृ॒र्षाः॑ ॥७॥

का० २, अ० २, ब्रा० ३, क० १-७ शतपथब्राह्मण / २१६
का आधान कीजिये।' उसने उत्तर दिया, 'ऐसा मत कहो। वाणी का संयम करो। जो आहिताग्नि
है उसे झूठ नहीं बोलना चाहिए। अच्छा हो कि वह कुछ न बोले। परन्तु झूठ बोले ही नहीं। इस-
लिये सत्य ही उपचार है' ॥२०॥
पुनराधेयम्
अध्याय २—ब्राह्मण ३
वरुण ने इस (अग्नि) का राज्य की कामना से आधान किया। उसने राज्य को पा लिया।
इसलिए चाहे कोई (अग्न्याधान करनेवाला) जाने या न जाने, लोग उस (अग्न्याधान करने-
वाले) को 'वरुण राजा' कहते हैं। सोम ने यश की कामना से (अग्न्याधान किया), वह यशस्वी
हो गया। इसलिए चाहे कोई सोम का लाभ करे या न करे, दोनों ही यश पाते हैं, क्योंकि लोग
यश को ही देखने आते हैं। जो पुरुष इस रहस्य को समझकर अग्न्याधान करता है वह यशस्वी
होता है और राज्य को प्राप्त होता है ॥१॥
देवों ने सब रूपों को अग्नि के सुपुर्द कर दिया, चाहे वह ग्राम-सम्बन्धी हो या अरण्य-
सम्बन्धी; चाहे विजय करने की इच्छा से, चाहे स्वतन्त्र विचरने के लिए; चाहे यह सोचकर कि
(अग्नि) अच्छा रक्षक है इनकी रक्षा करेगा' ॥२॥
अग्नि को उनका लोभ हो गया। वह उनको इकट्ठा करके ऋतुओं में छिप गया। देवों
ने सोचा कि वहीं चलें। जहाँ अग्नि छिपा हुआ था, वहीं गये। वे निराश हो गये कि 'क्या करना
चाहिए?' 'क्या राय है ?' ॥३॥
तब त्वष्टा ने पुनराधेय अग्नि (फिर रक्खी हुई अग्नि) को देखा। उसने उसका आधान
किया और इस प्रकार अग्नि के प्रिय धाम को पहुँच गया। उस (अग्नि) ने उस (त्वष्टा) के
लिए दोनों रूप अर्थात् ग्राम-सम्बन्धी और अरण्य-सम्बन्धी छोड़ दिये। इसीलिए इन रूपों को
त्वाष्ट्र (त्वष्टा) कहते हैं, क्योंकि त्वष्टा से ही ये सब रूप आते हैं। परन्तु दूसरी प्रजा इस-इस
प्रकार रहती है ॥४॥
इसलिए (मनुष्य को चाहिए) कि त्वष्टा के लिए ही पुनराधेय करे। इसी प्रकार वह
अग्नि के प्रिय धाम का लाभ कर सकता है। और वह (अग्नि) उसके लिए दोनों रूप छोड़ देता
है अर्थात् ग्राम के भी और अरण्य के भी। उसी में ये दोनों रूप दिखाई पड़ते हैं। वह बड़ा हो
जाता है, लोग उससे डाह करते हैं। वह फूलता-फलता है और लोक में उसका यश होता है ॥५॥
यह यज्ञ अग्नि का है। अग्नि ज्योति है। यह पापों को जलाती है। यह उस (यजमान)
के पापों को भी जलाती है। यही ज्योति श्री और यश को देनेवाली होती है। ज्योति दूसरे लोक
में पुण्य का मार्ग बनाती है। इसलिए (फिर) आधान करना चाहिए ॥६॥
वर्षा में पुनराधान करे। वर्षा ही सब ऋतुओं का (प्रतिनिधि) है। वर्षा ही सब ऋतुएँ
हैं। इसीलिए कहते हैं कि अमुक वर्ष में यह काम किया, अमुक वर्ष में यह काम किया। वर्षा सब
ऋतुओं का एक रूप है। जब कहते हैं 'यह ग्रीष्म-सा है' तो यह वर्षा में ही है और जब कहता है
कि 'आज शिशिर-सा है' तो यह भी वर्षा ही है। 'वर्ष से ही 'वर्षा' है ॥७॥

अथै॒तदे॒व प॒रोऽक्षं॑ रू॒पं । यदे॒व पु॒रस्ताद्वा॑ति॒ तद्व॑स॒न्तस्य॑ रू॒पं यत्स्तन॑यति॒ तद्ग्री॒-
ष्मस्य॒ यद्वर्ष॑ति॒ तद्व॑र्षाणां॒ यद्विद्योत॑ते॒ तच्छ॒रदो॒ यदु॑द्गृह्णाति॒ तद्धे॑मन्त॒स्य वर्षाः सर्व॑
ऽऋ॒तव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतु॒भ्य ए॒वैन॑मेतन्निर्मि॑मीते ॥८॥ आ॒दि॒त्यस्त्वे॑व सर्व॑ऽऋ॒तवः॑ ।
यदि॒वोदेत्य॑थ वस॒न्तो यदा॑ संग॒वोऽथ॑ ग्री॒ष्मो यदा॑ मध्य॒न्दिनोऽथ॑ वर्षा य॒दापरा॒ह्णो
ऽथ श॒रद्य॒देवास्त॑मे॒त्यथ॑ हेमन्त॒स्तस्मा॑न्मध्यन्दिन॒ऽएवा॑दधीत॒ तर्हि॑ ह्ये॒षोऽस्य॑
लो॒कस्य॒ नेदि॑ष्ठं भ॑वति॒ तन्नेदि॑ष्ठादे॒वैन॑मेतन्मध्यान्निर्मि॑मीते ॥९॥ छा॒येये॑व वाऽअ॒-
यं पुरु॑षः । पा॒प्मनानु॑षक्तः सो॒ऽस्यात्र॒ कनि॑ष्ठो भवत्यथ॒ य॒दूर्ध्वं॒ नि॒वेप्य॑ते॒ तत्कनि॑ष्ठ-
मे॒वैतत्पा॒प्मान॑मव॒बाध॑ते॒ तस्मा॑न्मध्यन्दिन॒ऽएवा॑दधीत ॥१०॥ तं वै दर्भैरु॒द्धर॑ति ।
दारु॑भि॒र्वे पूर्व॑मु॒द्धर॑ति दारु॑भिः पूर्वं दारु॑भिर॒परं॒ जामि॑ कुर्यात्स॒मदं॑ कुर्यादापो॒ दर्भा
आपो॒ वर्षा॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शद॒द्भ्य ए॒वैन॑मे॒तद॒द्भ्यो निर्मि॑मीते॒ तस्मा॑द्दर्भैरु॒द्धर॑ति ॥११॥
अ॒र्कप॒लाशाभ्यां॑ । व्रीहि॒मयम॒पूपं॑ कृ॒त्वा यत्र॒ गार्ह॑पत्यमा॒धास्य॒न्भव॑ति॒ तन्निद॑धाति
तद्गार्ह॑पत्यमा॒दधा॑ति ॥१२॥ अ॒र्कप॒लाशाभ्यां॑ । यव॒मयम॒पूपं॑ कृ॒त्वा यत्रा॒हव॑नीयमा॒-
धास्य॒न्भव॑ति॒ तन्निद॑धाति॒ तदा॒हव॑नीयमा॒दधा॑ति पूर्वार्ध्यामे॒वैना॑वेतद॒ग्निभ्या॒मन्त॑र्द्धम्
इति॒ वद॑न्तस्त॒दु तथा॑ न कुर्याद्रा॒त्रिभि॑र्ह्येवान्त॒र्हितौ॑ भवतः ॥१३॥ आ॒ग्ने॒यमे॒व प॒-
ञ्चक॒पालं॑ पुरो॒डाशं॒ निर्व॑पति । तस्य॒ पञ्च॑पदाः प॒ङ्क्त्यो याज्यानुवाक्या॑ भवन्ति प॒ञ्च
वाऽऋ॒तव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतु॒भ्य ए॒वैन॑मेतन्निर्मि॑मीते ॥१४॥ सर्व॑ आग्ने॒यो भ॑वति ।
ए॒तद्वै विष्णोः प्रि॒यं धामो॒पाग॑च्छ॒त्तस्मा॑त्सर्व आग्ने॒यो भ॑वति ॥१५॥ तेनो॑पा॒ꣳशु
चर॑न्ति । यद्वै ज्ञा॒तये॑ वा स॒ख्ये वा निष्केव॒ल्यं चि॑िकी॒र्षति तिर॒ इवैते॑न बीभत्स॑ते-
यद्दे॒वेभ्यो॒ऽन्यो य॒ज्ञोऽथै॑ष निष्केव॒ल्य आ॑ग्ने॒यो यद्वै तिर॒ इव॒ तदु॑पा॒ꣳशु॒ तस्मा॑दुपा॒ꣳशु
चर॑न्ति ॥१६॥ उच्चैरु॑त्त॒ममनू॑या॒जं य॑जति । कृ॒तक॑र्मेव॒ हि स तर्हि॑ भ॑वति॒ सर्वै॑-
र्हि कृ॒तमनु॑बुध्यते ॥१७॥ स आ॒श्राव्या॑ह । स॒मिधो॑ य॒जेति॒ तदा॑ग्ने॒यꣳ रू॒पं प॒रोऽक्षं॑
त्वम॒ग्नियजेति॑ ह्ये॒व ब्रूया॒त्तद्देव प्रत्य॒क्षमा॑ग्ने॒यꣳ रू॒पम् ॥१८॥ स य॑जति । अ॒न्नाद्या॒य-

कां० २, अ० २, ब्रा० ३, क० ७-१६ शतपथब्राह्मण / २२१
(वर्षा का) एक परोक्ष रूप है। जब यह पूर्व से बहता है तो वसन्त का रूप है, जो
गरजता है वह ग्रीष्म का, जो बरसता है वह वर्षा का, जो बिजली चमकती है वह शरद् का,
जब बरसकर बन्द हो जाता हैं वह हेमन्त का। वर्षा सब ऋतुएँ हैं। वह (अग्नि) ऋतुओं में
प्रविष्ट हो गया। इसलिए ऋतुओं में से ही इसका निर्माण करते हैं ॥८॥
लेकिन आदित्य भी सब ऋतुएँ हैं। जब उदय होता है तो वसन्त, जब संगव होता है
(अर्थात् जब गौएँ दुहने के लिए इकट्ठी की जाती हैं) तब ग्रीष्म, जब दोपहर होता है तो वर्षा,
तीसरा पहर शरद्, जब अस्त होता है तब हेमन्त । इसलिए दोपहर के समय ही (पुनराधान)
करे, क्योंकि उस समय सूर्य इस लोक के निकटतम होता है और इसलिए वह मध्य से ही (अग्नि
का) निर्माण करता है ॥६॥
यह पुरुष छाया के समान पाप से लिप्त है। (दोपहर के समय) यह छाया सबसे छोटी
होती है, पैर के नीचे ही सिकुड़ जाती है। इस प्रकार वह पाप को सबसे छोटा कर देता है।
इसलिए दोपहर के समय ही पुनराधान करे ॥१०॥
वह (गार्हपत्य में से) दर्भों के द्वारा निकालता है। पहले वह दारु (लकड़ी) से निकालता
है। पहले भी दारु से निकाले और फिर भी दारु से, तो दुहराने का दोषी हो और विघ्न पड़े।
जल ही दर्भ है और जल ही वर्षा है। (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हो गया। इसलिए वह उसे
जलों में से जलों के द्वारा ही निकालता है। इसलिए दर्भों के द्वारा निकालता है ॥११॥
भात पकाकर वह दो आक के पत्तों पर रखता है; और उसको उस जगह रखता है
जहाँ गार्हपत्य अग्नि रखनी है। फिर गार्हपत्य अग्नि की स्थापना कर देता है ॥१२॥
जौ के अपूप (पूये) पकाकर दो आक के पत्तों पर रखकर उस जगह रखता है जहाँ
आहवनीय स्थापित करनी होती है और आहवनीय को स्थापित कर देता है। कुछ लोग कहते हैं
कि हम इस प्रकार पहली दो अग्नियों से इनको ढक देते हैं। परन्तु ऐसा न करे क्योंकि ये रातों
के द्वारा ढकी जाती हैं ॥१३॥
अब पांच कपालों पर पुरोडाश को अग्नि के लिए तैयार करता है। इसके याज्य और
अनुवाक्य पंक्ति छन्द के पाँच-पाँच पदवाले होते हैं। पाँच ही ऋतुएँ हैं। अग्नि ऋतुओं में घुसा
था, इसलिए ऋतुओं से ही इसको निकालता है ॥१४॥
यह सब (यज्ञ) अग्नि का होता है। क्योंकि इसी से त्वष्टा अग्नि के प्रियधाम में घुसा,
इसलिए यह सब अग्नि का ही होता है ॥१५॥
इसे चुपके-चुपके करते हैं। किसी सम्बन्धी या सखा के लिए जब कोई कुछ बनाना
चाहता है तो छिपाकर रखता है। अन्य यज्ञ विश्वेदेवों का होता है और यह यज्ञ केवल अग्नि
का ही है। जो छिपाकर किया जाता है वह चुपके से किया जाता है। इसलिए वे इसका चुपके-
चुपके करते हैं ॥१६॥
अन्तिम अनुयाज को जोर से बोलते हैं, क्योंकि तब कार्य समाप्त हो जाता है। जब कार्य
हो चुकता है तो उसे सभी जान जाते हैं ॥१७॥
वह पुकार (और आग्नीध्र द्वारा उत्तर दिये जाने के पश्चात् होतृ से) कहता है,*
'समिधाओं का यज्ञ करो।' वह अग्नि का परोक्ष-रूप है। परन्तु उसको यह भी कहना चाहिए कि
'अग्नियों का यज्ञ करो', क्योंकि वह अग्नि का प्रत्यक्ष रूप है ॥१८॥
अब वह पढ़ता है—(अ) “अग्नऽआज्यस्य व्यन्तु वौषट्”—'हे अग्नि ! (ये समिधायें)

  • अध्वर्यु कहता है, 'ओं श्रावय'; इस पर आग्नीध्र कहता है, 'अस्तु, श्रोषट्' ।

स्य॒ व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु
वौ३षडिति ॥१९॥ अथ॒ स्वाहा॒ग्निमित्या॑ह । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ स्वाहा॒ग्निं पव॑मा-
न॒मिति॒ यदि॑ पवमानाय॒ ध्रिये॑र॒न्स्वाहा॒ग्निमिन्दु॑मन्त॒मिति॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑र-
न्स्वाहा॒ग्निग्ँ स्वाहा॒ग्नीनाज्य॑पाञ्जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२०॥ अ-
थाहा॒ग्नयेऽनु॑ब्रूहीति॑ । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ सोऽन्वा॑हा॒ग्निꣳ स्तोमे॑न बोधय॒ समि॑धा-
नो॒ऽअमर्त्यम् । कृ॒ण्वद्दे॒वेषु॑ नो॒ दध॒दिति॒ स्वपि॑तीव॒ खलु॒ वाऽए॒तद्यदु॑द्वासि॒तो
भ॑वति सम्प्र॒बोध॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सम॒दी॑धयति जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति
॥२१॥ अथ॒ यद्य॑ग्नये॒ पव॑मानाय॒ ध्रिये॑रन् । अग्न॑ये॒ पव॑मानायानु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो
ऽन्वा॑हाग्ने॒ऽआयु॑ꣳषि पवस॒ऽआसु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः । आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुना॒मिति॑ त-
थाहाग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वै पव॑मानस्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्यन्त्यि जुषाणो॒ऽअग्निः॑
पव॑मान॒ आज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२२॥ अथ॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑रन् । अग्नय॑
ऽइन्दु॑मते॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो॒ऽन्वाहे॒ह्वो॒ न्नु प्र॒वाणि॑ ते॒ऽग्ना॒ऽइत्थे॒तरा॒ गिरः॑ । अ॒भि-
वर्ध॑स्व॒ऽइन्दु॑भिरिति॒ तथा॑ ह्याग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वाऽइन्दु॑स्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्य-
न्ति जुषाणो॒ऽअग्नि॒रिन्दु॑मानाज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑त्येवमु॒ सर्व॑माग्ने॒यं करो॑ति ॥२३॥
अथा॑हा॒ग्नये॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ह॒विषः॑ । अ॒ग्निं य॑जा॒ग्नये॑ स्विष्ट॒कृते॒ऽनु॑ब्रूह्य॒ग्निग्ँ स्विष्ट॒कृतं॑
यजे॒त्यथ॒ यद्दे॒वान्यजे॒त्यग्नी॒न्यजे॒त्येवैतदा॑ह ॥२४॥ स॒ यज॑ति । अ॒ग्नेर्वसु॑वने वसु॒धे-
यस्य॑ वेतु॒ वौ३षड॒ग्नाऽउ॑ वसु॒वने॑ वसु॒धेयस्य॑ वेतु॒ वौ३षद्देवो॒ऽअग्निः॑ स्विष्ट॒कृदिति॑
स्वय॒माग्ने॒यस्तृतीय॑ ए॒वम्वा॑ग्ने॒याननुया॒जान्क॑रोति ॥२५॥ ता वा॒ऽए॒ताः । षड्भि-
र्निर्य॑तति च॒तस्रः॑ प्रया॒जेषु॒ द्वेऽनु॑नया॒जेषु॒ षडा॒ऽऋतव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मे-
तन्निर्मि॑मीते ॥२६॥ द्वाद॑श वा॒ त्रयो॑दश वा॒न्तरा॑णि भवन्ति । द्वाद॑श वा॒ वै त्र-
यो॑दश वा संवत्सर॒स्य मासाः॑ संवत्सर॒मृतून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मेतत्त्संवत्सरा॒न्नि-
र्मि॑मीते न द्वे च॒न स॒ङ्काशा॑मितायै ज्ञानि॒ क कुर्याद्यद्वे॒ भित्सन्त्स्याता॑ व्यन्तु॒ वे-

कां० २, अ० २, ब्रा० ३, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / २२३
घी को ग्रहण करे। वौषट् ।" (आ) "अग्निमाज्यस्य वेतु वौषट् ।" "(तनूनपात्) आज्य की अग्नि
को स्वीकार करे। वौषक्।" (इ) "अग्निनाज्यस्य व्यन्तु वौषक् ।"— "वे (इडा) अग्नि के द्वारा
आज्य को स्वीकार करें, वौषक् ।" (ई) "अग्निराज्यस्य वेतु वौषक्"-'अग्नि आज्य को स्वीकार
करे, वौषक्" ।।१६।।
अब कहता है— 'स्वाहाग्निम्'—आग्नेय आज्य भाग के लिए। यदि पवमान के लिए
आधान करे तो कहे 'स्वाहाग्निं पवमानम्', यदि इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करें तो कहे,
'स्वाहाग्निमिन्दुमन्तम्' । 'स्वाहाग्निम्', 'स्वाहाग्नीनाज्यपान् जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु ।' यह
(होता) पढ़ता है ॥२०॥
आग्नेय आज्य भाग के सम्बन्ध में (अध्वर्यु) कहता है, "अग्नयेऽनुब्रूहि"— "अग्नि के लिए
पढ़ो।" तब (होता) पढ़ता है- "अग्निं स्तोमेन बोधय, समिधानोऽमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ।"-
"स्तुति द्वारा अग्नि को जगाओ जो अमरत्व को प्रज्वलित करता है, जिससे यह अग्नि हमारे
हवियों को देवताओं तक ले जावे।" जब अग्नि अपने स्थान से निकाला जाता है तो सोता-सा है।
अब (ऋत्विज्) उसको जगाता है। अब वह पढ़ता है- "जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु" अर्थात् "अग्नि
कृपा करके आज्य को ग्रहण करे" ।।२१।।
यदि अग्नि-पवमान के लिए आधान करना हो तो कहे "अग्नये पवमानाय अनुब्रूहि"
अर्थात् "पवमान अग्नि की स्तुति करो।" तब होता पढ़े— "अग्नऽआयु॑ षि पवसऽआसुवोर्ज॒मिषं
च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम्" (ऋग्वेद ६।६६।१६)—"हे अग्नि ! तू आयु को (उम्रों को)
फूँकती है। हमारे लिए अन्न और रस उत्पन्न करो। विपत्तियों को हमसे दूर करो।" इस प्रकार
यह अग्नि-युक्त हो जाता है। सोम पवमान है। परन्तु इसको वह सोम के आज्य भाग से निकालते
हैं। अब वह पढ़ता है— "जुषाणोऽग्निः पवमान आज्यस्य वेतु ।"— "अग्नि पवमान प्रसन्न होकर
आज्य को स्वीकार करे" ।।२२।।
यदि वह इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करे तो कहता है— "अग्नयेऽइन्दुमतेऽनुब्रूहि ।"
"इन्दुमान् अग्नि के लिए प्रार्थना करो।" तब होता पढ़े- "एह्यषु ब्रवाणि तेऽग्ने इत्येतरा गिरः।
एभिर्वर्धास इन्दुभिः" (ऋग्वेद ६।१६।१६)-'हे अग्नि, आ। मैं और प्रार्थनायें तेरे लिए कहूँगा।
इन इन्दुओँ (बूँदों) से बढ़।" इस प्रकार वह अग्नि का सम्बन्धी हो जाता है। सोम ही इन्दु है।
सोम आज्य भाग से लाते हैं। इसलिए पढ़ता है-"जुषाणोऽग्निरिन्दुमानाज्यस्य वेतु।"-"अग्नि
इन्दुमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह इन सब को अग्नि-युक्त कर देता
है ।।२३।।
अब वह हवियों के विषय में कहता है— 'अग्नयेऽनुब्रूहि।' अर्थात् अग्नि की प्रार्थना
करो। 'अग्निं यज' अर्थात् अग्नि को पूजो। 'अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि।' अर्थात् स्विष्टकृत् की
प्रार्थना करो। 'अग्निं स्विष्टकृतं यज।' अर्थात् अग्नि स्विष्टकृत् को पूजो। फिर कहे 'देवान्
यज ।'—देवों को पूजो। 'अग्नीन् यज ।'—अग्नियों को पूजो ॥२४॥
अब वह प्रार्थना करता है-"अग्नेर्वसुवने वसुधेयस्य वेतु, वौषक् ।"— "(बर्हि) अग्नि की
वृद्धि के लिए वसुधा को ग्रहण करे, वौषक् ।"—"अग्नाऽऽड वसुवने वसुधेयस्य वेतु वौषक् ।"
" (नराशंस) अग्नि में वृद्धि के लिए वसुधा को स्वीकार करे, वौषक् ।" "देवोऽअग्निः स्विष्टकृत् ।"
अर्थात् देव स्विष्टकृत् अग्नि।" यह तीसरी प्रार्थना स्वयं अग्नि की ही है। इस प्रकार सब अनु-
याजों को अग्नि का कर देता है ॥२५॥
ये छः विभक्तियाँ हैं— चार प्रयाज में और दो अनुयाजों में। छः ऋतुएँ हैं। (अग्नि)
ऋतुओं में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं से ही उनका निर्माण करता है ॥२६॥
(इन छः विभक्तियों में) बारह या तेरह अक्षर होते हैं। वर्ष में बारह या तेरह महीने
होते हैं। अग्नि ऋतुओं अर्थात् वर्ष में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं में अर्थात् संवत्सर से
उसका निर्माण करता है। दुहराने के दोष से बचने के लिए दो एक-से नहीं होते। यदि दो एक-से
हों तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए प्रयाजों में कहते हैं 'व्यन्तु' या 'वेतु', और अनुयाजों में