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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-२

वि॒ता हिर॑ण्यपाणिः प्रति॑गृह्णात्व॒च्छिद्रेण पा॒णिना॑ सु॒प्रति॑गृहीतान्यस॒न्निति॒ चक्षु॑षे
त्वेति॒ तच्चक्षु॑र्दधात्येता॒नि वै जी॑वतो भवन्त्ये॒वम् हैतज्जीव॑मेव दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भा॑-
वत्य॒मृतम॒मृता॑नां॒ तस्मा॑देवं॒ पिन॑ष्टि॒ विष्व॑क्ति॒ पिष्टा॒न्यभी॑न्धते क॒पाला॑नि ॥ २१ ॥
अथैक॒ आज्यं॒ निर्व॑पति । यद्वाऽ॒आदि॑ष्टं दे॒वता॑यै ह॒विर्गृह्य॑ते॒ याव॑द्दे॒वत्यं॒ तद्भव॑ति
तदित॑रेण॒ यजु॑षा गृह्णाति॒ न वाऽ॒एतत्कस्यै॑ चन दे॒वता॑यै ह॒विर्गृह्ण॒न्नादि॑शति॒ य-
दाज्यं॒ तस्मा॑द॒निरु॑क्तेन॒ यजु॑षा गृह्णाति म॒हीनां॒ पयो॑ऽसीति॒ मध्व॒ इति॑ ह॒ वाऽए॒-
तासा॒मेकै॒ नाम॒ यद्गवां॒ तासां॒ वाऽए॒तत्पयो॑ भवति॒ तस्मा॑दाह म॒हीनां॒ पयो॑ऽसी-
त्ये॒वमु॒ हास्यै॒तत्खलु॒ यजु॑षैव॒ गृही॑तं भवति॒ तस्मा॑द्वेवाह म॒हीनां॒ पयो॑ऽसी॑ति
॥ २२॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ५ [२. १.] ॥
प॒वित्र॑वति॒ संव॑पति । पा॒त्र्यां प॒वित्रे॒ऽअव॑धाय दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्वि॑-
नोर्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याꣳ संवपामीति सोऽसा॑वे॒वैतस्य॒ यजु॑षो बन्धु॑: ॥ १ ॥
अथान्त॑र्वे॒द्युप॑विशति । अथैक उपसर्जनी॒भिरि॑ति ता आ॒नय॑ति ताः प॒वित्रा॑भ्यां प्र-
तिगृह्णा॑ति समाप॒ ओष॑धीभिरिति॒ सꣳ ह्ये॑तदाप॒ ओष॑धिभिरि॒ताभि॑: पि॒ष्टाभि॒: संग॑-
च्छन्ते॒ समोष॑धयो॒ रसेने॑ति॒ सꣳ ह्ये॑तदोष॑धयो॒ रसेने॑ताः पिष्टा॒ अद्भि॒: संग॑च्छन्त॒ आपो॑
ह्ये॑तासाꣳ॒ रस॒: सꣳ रेवती॒र्जग॑तीभिः पृच्यन्ता॒मिति॑ रे॒वत्य॒ आपो॒ जग॑त्य॒ ओष॑धयस्ता
उ॒ ह्ये॑तदु॒भय्य॒: संपृ॑च्यन्ते॒ सं मधु॑मती॒र्मधु॑मतीभिः पृच्यन्ता॒मिति॒ सꣳ र॑सवत्यो॒ रस॑व-
तीभि॒: पृच्य॑न्तामि॒त्येवैतदा॑ह ॥ २॥ अथ॒ संयौ॑ति । ज॒नय॑त्ये॒ वा संयौ॑मीति॒ यथा॑
श्रियै॒ऽन्नाद्या॒येमाः प्र॒जा यज॑मानाय॒ यद्ध्ये॑वं॒ वै तत्संयौ॑त्यधि॒वर्द्धय॑न्नु॒ वै संयौ॑ति॒ यथा॑
वाऽ॒धिक्व॑क्तो॒ऽग्रेऽधि॒ जाये॒तैवँ॑ वै तत्संयौ॑ति ॥ ३॥ अथ॒ द्वेधा क॑रोति । यदि॒ द्वे
ह॒विषी॒ भवत॑: पौ

का० १, अ० २, ब्रा० २, कं० १-४ शतपथब्राह्मण / २७
आयु बढ़ाता है। यह जो कहा कि 'सविता देव, सोने के हाथोंवाला, छिद्र-रहित हाथों से तुझे
स्वीकार करे' यह इसलिये कि उसको भलीभाँति स्वीकार किया जाय। 'आंख के लिए तुझको'
इससे आंख को धारण कराता है। यही जीवन के चिह्न हैं। इनसे हवि जीवित होता है। अमरों
के लिए अमृत हो जाता है। इसीलिये हवि पीसते हैं। हवि को पीसने और कपालों को गर्म करते
समय—॥२१॥
एक पुरुष (अग्नीध्र) आज्यस्थाली में घी डालता है। जब किसी निर्दिष्ट देवता के लिए
हवि ली जाती है तो उसी देवता की हो जाती है। उसको विशेष यजुष्-मन्त्र पढ़कर लेते हैं। यह
घी किसी विशेष देवता के लिए नहीं है, अतः सामान्य यजुष्-मन्त्र पढ़कर (यजु० १।२०) लिया।
'तू बड़ों का दूध है', बड़ों का अर्थ है गाय; यह गाय का रस है, इसलिये कहा 'बड़ों का दूध';
यह भी इसी यजुष्-मन्त्र से लिया जाता है, इसलिये कहा 'बड़ों का दूध' ॥२२॥
अध्याय २-ब्राह्मण २
जिस पात्री में दो पवित्रे रखे थे उसमें पिसे हवि को डालता है यह मन्त्र पढ़कर (यजु०
१।२१)—"देव सविता की प्रेरणा से अश्विन को दो भुजाओं से, पूषा के दो हाथों से तुझको
उडेला हूँ।" इस यजु० का तात्पर्य तो वही है (जो १।१।२।१७ में कह दिया गया) ॥१॥
अब वेदी के भीतर बैठता है। अब एक (अग्नीध्र) उपसर्जनी जल (आटा सानने का
जल) लेकर आता है और उसको उसके पास लाता है। वह इसको पवित्रों के द्वारा यह मंत्र पढ़-
कर लेता है (यजु० १।२१)-'जल ओषधियों से मिले।" इस प्रकार जल पिसे हुए चावल रूपी
ओषधियों में मिलता है। 'ओषधियां रस के साथ मिलें।' इस प्रकार जल पिसे हुए चावलों के रस
के साथ मिलते हैं। 'रेवती जगती के साथ मिलें।' जल रेवती हैं और ओषधियां जगती हैं। ये
दोनों परस्पर मिलते हैं। 'मधुवाले मधुवालों के साथ मिलें' अर्थात् रसवाले रसवालों के साथ
मिलें ॥२॥
अब सानता है यजु० १।२२ को पढ़कर—"जनने के लिए तुझे मिलाता हूँ।" वह पिसे
आटे को गूंधता है कि जिससे वह यजमान के लिए श्री, खाद्य और सन्तान को देवे। वह इसलिये
भी गूंधता है कि वह अग्नि के ऊपर रखा जा सके और पक सके ॥३॥
अब उसके दो भाग करता है, यदि दो हवि देनी हों तो। पूर्णमासी की इष्टि में दो
हवियाँ दी जाती हैं। अब वह छूकर देखता है कि यह फिर तो नहीं मिल गईं और (यजु० १।२२)
पढ़ता है—"यह अग्नि के लिए और यह अग्नि-सोम के लिए।" पहले ये दोनों हवियां अलग-अलग
ली गई थीं (देखो १।१।२।१७), फिर इनको साथ फटका, साथ पीसा। अब फिर बांटकर अलग-
अलग कर दिया, इसीलिये छूता है। एक (अध्वर्यु) पीठी आग पर रखता है और दूसरा (अग्नीध्र)

२८ शतपथ ब्राह्मण
रोडाशम॒धिश्रय॑त्यसा॒वाज्य॑म् ॥४॥ तद्वाऽए॒तत् । उ॒भय॑ꣳ सह क्रि॑यते तद्य॒देत॒दुभय॑ꣳ
सह क्रि॒यतेऽर्द्धो॑ ह वाऽए॒ष आ॒त्मनो॑ य॒ज्ञस्य यदा॑ज्य॒मर्द्धो यदि॒दं ह॒विर्भ॑वति स
यन्नासा॒वर्द्धो य उ चा॒यमर्द्धस्ता उ॑भावनिं ग॒मया॒वेति॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तदुभय॑ꣳ सह क्रि-
यतऽए॒वमु॒ हैष आ॒त्मा य॒ज्ञस्य सं॒धीय॑ते ॥५॥ सोऽसा॒वाज्यम॒धिश्रय॑ति । इ॒षे त्वेति॑
वृ॒ष्ट्यै तदा॑ह॒ यदा॒हेषे त्वेति॒ तत्पु॑नरु॒द्वासय॒त्यूर्जे त्वेति॒ यो वृ॒ष्टादूर्द्र॑सो जाय॑ते॒ तस्मै॑
तदा॑ह ॥६॥ अथ पुरोडाशम॒धिवृ॑णक्ति । घ॒र्मोऽसीति॑ य॒ज्ञमे॒वैतत्क॑रोति य॒था घ॒र्मं
प्र॒वृ॑ञ्ज्यादे॒वं प्र॒वृ॑णक्ति॒ विश्वा॑यु॒रिति॒ तदायु॑र्दधाति ॥७॥ तं प्र॑थयति । उ॒रुप्रथा॑ उ॒रु
प्र॒थस्वेति॑ प्रथयत्ये॒वैन॑मेत॒दुरु॑ ते य॒ज्ञप॑तिः प्रथता॒मिति॑ य॒जमा॑नो॒ वै य॒ज्ञप॑तिस्तद्य॒-
जमा॑नायै॒वैतदाशिष॒माशा॑स्ते ॥८॥ तं न स॒त्रा पृथुं कु॑र्यात् । मानु॒ष॑ꣳ ह कुर्याद्य॒-
त्यू॒र्ध्वं कु॒र्याद्गृ॒द्धं वै तद्य॒ज्ञस्य यन्मानु॑षं नेद्गृ॒द्धं य॒ज्ञे कर॑वाणीति॒ तस्मान्न स॒त्रा पृथुं
कु॑र्यात् ॥९॥ अश्वशफमा॒त्रं कु॑र्यादित्य् हेकऽआहुः । कस्त॒द्वेद॒ यावा॑नश्वश॒फो या-
वत्त॑मेव॒ स्वयं मन॑सा न स॒त्रा पृथुं मन्ये॒तैवं कु॑र्यात् ॥१०॥ तम॒द्भिर॒भिमृ॑शति ।
सकृ॑द्वा॒ त्रिर्वा॒ तद्य॒देवास्यात्राव॑घ्नन्तो वा पि॒षन्तो॑ वा हि॒ण्वन्ति॑ वा॒ वि वा वृ-
ह॒न्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः संद॑धाति॒ तस्मा॑द॒द्भिर॒भिमृ॑शति
॥११॥ सोऽभिमृ॑शति । अ॒ग्निष्टे॒ त्वचं॒ मा हि॑ꣳसी॒दित्य॒ग्निना वाऽएन॑मे॒तद॒भित॒प्स्य-
न्भव॒त्येष ते॒ त्वचं॒ मा हि॑ꣳसी॒दित्ये॒वैतदा॑ह ॥१२॥ तं पर्य॒ग्निं क॑रोति । अ॒छिद्र॑मे॒वै-
नमे॒तद॒ग्निना परि॑गृह्णाति॒ नैदं नाष्ट्रा र॑क्षा॑ꣳसि प्रमृशा॒नित्य॒ग्निर्हि रक्षा॑सामप॒हन्ता
तस्मा॒त्पर्य॒ग्निं क॑रोति ॥१३॥ तꣳ श्रपयति । दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता श्र॑पय॒त्विति॒ न वा-
ऽए॒तस्य मनु॑ष्यः श्रपयि॒ता दे॒वो ह्येष तदे॑नं दे॒व एव सवि॒ता श्र॑पयति॒ वर्षि॑ष्ठे
ऽधि नाक॒ऽइति॑ दे॒वत्रो॑ ए॒तदा॑ह॒ यदा॑ह॒ वर्षि॑ष्ठे॒ऽधि नाक॒ऽइति॑ तम॒भिमृ॑शति
शृतं वे॒दानीति॒ तस्मा॑द्वाऽअ॒भिमृ॑शति ॥१४॥ सोऽभिमृ॑शति । मा भेर्मा संवि॑क्था
इति॒ मा त्वं भेषीर्मा सं॑विक्था य॒त्त्वाहम॑मानुषꣳ सन्तं मानुषोऽभिमृशामीत्येवैत

कां० १, अ० २, ब्रा० २, कं० ४-१५ शतपथब्राह्मण / २६
घी को ॥४॥
ये दोनों काम साथ-साथ किये जाते हैं। ये दोनों काम साथ क्यों किये जाते हैं ? इसलिए
कि यज्ञ के आत्मा का आधा भाग घी है और आधा हवि । वे दोनों सींचते हैं कि आधा भाग यह
हुआ और आधा भाग यह हुआ । इन दोनों को साथ-साथ अग्नि में ले जावे । इसलिये इन दोनों
कामों को साथ-साथ करते हैं जिससे यज्ञों का आत्मा पूरा-पूरा जुड़ जाय ॥५॥
अग्नीध्र घी को आग पर यह मन्त्रांश पढ़कर पकाता है (यजु० १।२२) —"रस के लिए
तुझको।" रस से तात्पर्य है वृष्टि का । फिर उसको आग पर से हटा लेता है और कहता है—
“ऊर्ज के लिए तुझको” (यजु० १।३०) । वर्षा से यह ऊर्ज (वृक्षों में) उत्पन्न होता है, उसी से
तात्पर्य है ॥६॥
अब (अध्वर्यु) पुरोडाश को पकाता है यह पढ़कर—"तू घर्म है" (यजु० १।२२) । इस
प्रकार उसको 'यज्ञ' बना देता है, यानी उसको कड़ाही में पकाया। अब कहता है—"विश्वायुः।"
इससे वह यजमान के लिए जीवन की वृद्धि करता है ॥७॥
अब वह उसको (कपालों) में फैलाता है (यजु० १।२२) को पढ़कर—"तू फैला हुआ है।
फैल जा । तेरा यज्ञपति भी ऐसा ही फैले ।” यज्ञपति यजमान है। यह यजमान के लिए आशीर्वाद
है ॥८॥
उसको बहुत नहीं फैलाना चाहिए। बहुत फैलाने से वह मानुषी हो जाती है (दैवी नहीं
रहती) । मानुषी हवि अशुभ होती है। वह चाहता है कि कोई ऐसा काम न हो कि अशुभ हो
जाय, इसलिये बहुत नहीं फैलाता ॥६॥
कुछ का कहना है कि घोड़े की टाप के बराबर होना चाहिए। परन्तु कौन जाने कि घोड़े
की टाप कितनी चौड़ी होती है ? अतः इतना चौड़ा करना चाहिए कि बुद्धि कहे कि बहुत चौड़ी
नहीं है ॥१०॥
अब जल से स्पर्श कराता है। एक बार या तीन बार ? क्योंकि फटकने या पीसने में जो
कुछ उसको क्षति हो गई हो, जल से दूर हो जाती हैं। जल शान्ति है। जल से उसका शमन कर
देता है। इसीलिए जल स्पर्श कराता है ॥११॥
वह जल का स्पर्श इस मन्त्रांश (यजु० १।२२) से कराता है—"अग्नि तेरी त्वचा को हानि
न पहुँचावे ।” अग्नि पर उसे तपाना है। इसीलिये कहता है कि 'अग्नि तेरी त्वचा को हानि न
पहुँचावे' ॥१२॥
अब उसके चारों ओर अग्नि की परिक्रमा कराता है। मानो उसके चारों ओर एक छिद्र-
रहित परिखा बनाता है जिससे राक्षस उसको ग्रहण न कर सकें। क्योंकि अग्नि राक्षसों का दूर
करनेवाला है, इसीलिये अग्नि को परिखा बनाता है ॥१३॥
अब उसे पकाता है, यजु० १।२२ के इस मन्त्रांश को पढ़कर—'देव सविता तुझे पकावें।'
इसका पकानेवाला मनुष्य नहीं हैं, देव हैं। इसलिये 'देव सविता पकावें' ऐसा कहता है। अब
कहता है “स्वर्ग में”, अर्थात् 'देवों के स्थान में'। अब यह कहकर छूता है—"देखूं पका कि नहीं।"
इसीलिये छूता है ॥१४॥
वह इस मन्त्रांश को पढ़कर छूता है—"मत डर ! मत संकोच कर !" यह कहने का
तात्पर्य यह है कि 'डर मत, संकोच न कर, मैं मनुष्य हूँ और तू अमानुष अर्थात् देव है । मैं तुझे