शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-१, ब्राह्मण-४
५४२ शतपथ ब्राह्मण
श॒क्ति हि । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि वाय॒वऽइ॑न्द्रवा॒युभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां
त्वेति॑ सादयति स॒ यदा॒ह स॒जोषो॑भ्यां त्वेति॒ यो वै वायुः स इन्द्रो॒ य इन्द्रः॑ स वा-
युस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां॒ त्वेति॑ ॥ ११॥ ब्राह्मणम् ॥ ३॥॥
क्रतू॒दक्षौ॑ ह॒ वाऽअ॑स्य मित्रावरुणौ । ए॒तन्म॒ध्या॒त्म स॒ यदे॒व मन॑सा कामय-
तऽइ॒दं मे॑ स्यादि॒दं कु॑र्वी॒येति॑ स॒ एव क्रतु॒रथ॒ यदस्मै॒ तत्समृ॒ध्यते॑ स द॒क्षो मित्र॑
ए॒व क्रतु॑र्वरु॒णो दक्षो॒ ब्रह्मैव॑ मित्रः॑ क्ष॒त्रं व॑रु॒णोऽभिग॒न्तेव॒ ब्रह्म॑ क॒र्ता क्ष॒त्रियः॑
॥ १॥ ते॒ हैतेऽग्रे॒ नानेवासतुः । ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ ततः॑ शशा॒कैव॒ ब्रह्म॑ मित्र
ऋ॒ते क्ष॒त्राद्वरु॑णा॒त्स्थातुम् ॥ २॥ न क्ष॒त्रं वरु॑णः । ऋ॒ते ब्रह्म॑णो मित्रा॒द्यद् किं च॒
वरु॑णः कर्म॑ चक्रे॒ऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समानृधे॑ ॥ ३॥ स क्ष॒त्रं
वरु॑णः । ब्रह्म॑ मि॒त्रमुप॑मन्त्रयां च॒क्रऽउप॒ माव॑र्तस्व॒ सꣳसृ॒जाव॑है पु॒रस्ता॑ करवै
त्वत्प्रसूतः॒ कर्म॑ करवा॒णीति॒ तथेति॒ तौ सम॑सृजेतां॒ तत ए॒ष मैत्रावरुणो ग्र॒होऽभ॑-
वत् ॥ ४॥ सोऽए॒व पु॑रो॒धा । तस्मा॒न्न ब्रा॑ह्म॒णः॒ सर्व॑स्येव क्ष॒त्रिय॑स्य पुरो॒धां का-
मयेत स॒ꣳ ह्ये॑तौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ नोऽए॒व क्ष॒त्रियः॑ सर्व॑मिव ब्राह्म॒णं
पुरो॒दधी॑त स॒ꣳ ह्ये॑वैतौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ स यत्ततो वरु॑णः कर्म॑ चक्रे
प्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण स॒ꣳ हैवास्मै॒ तदानृधे ॥ ५॥ तत्तदे॒वानु॑क्लृ॒प्तमेव॑ । य॒द्ब्राह्म॒णो
ऽरा॒जन्यः॑ स्या॒द्यद्यु॒ राजा॑नं ल॒भेत॒ समृ॑द्धं॒ तदे॒तद्ध॒ त्वेवानव॑क्लृप्तं॒ यत्क्षत्रियो॒ऽब्राह्म-
णो भव॑ति॒ यद्ध॒ किं च॒ कर्म॑ कुरु॒तेऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समृ॑-
ध्यते॒ तस्मा॒द् क्ष॒त्रिये॑ण कर्म॑ करिष्यमा॒णेनोप॑स॒र्त्य एव॑ ब्राह्म॒णः स॒ꣳ ह्यै॒वास्मै॑
तद्ब्रह्म॑प्रसूतं॒ कर्म॒ऽर्धते ॥ ६॥ अ॒थातो गृ॒ह्णात्येव॑ । अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः
सोम॑ ऋतावृधा । ममेदि॒ह श्रुतꣳ॒ हव॒म् । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि मित्रावरु॑णाभ्यां
त्वेति॑ ॥ ७॥ तं पय॑सा श्रीणाति । तद्यत्पय॑सा श्रीणा॒ति वृ॒त्रो वै सोम॑ आसी॒त्तं
यत्र॑ दे॒वा अ॒घ्नꣳस्तं॑ मि॒त्रम॑ब्रुवंस्त्वमपि जही॒तीति॑ स॒ न च॑कमे सर्व॑स्य वा॒ऽअ॒हं मि-
कां० ४, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५४३
भिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि । उपयामगृहीतोऽसि वायव ऽ इन्द्र वायुभ्यां'' (यजु० ७।८,
ऋ० १।२।४)—"हे इन्द्र-वायु, यह सोम है। आप दोनों इसके पान के लिए आइये। बूंदें आपको
चाहती हैं। तू उपयाम के साथ लिया गया है। इन्द्र और वायु के लिए तू है।" अब वह यह
कहकर रखता है कि 'यह तेरी योनि है। तुझको ही मिले हुओं के साथ लेता हूँ।' जो वायु है वह
इन्द्र है; जो इन्द्र है सो वायु है, इसलिए कहा, 'यह तेरी योनि है।' दोनों मिले हुओं के साथ
तुझको लेता हूँ' ॥१६॥
मैत्रावरुणग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ४
मित्र और वरुण इसके ऋतु और दक्ष हैं। यह इनका अध्यात्म है, अर्थात् ऋतु और दक्ष
आत्मिक वृत्तियाँ हैं। जब वह मन में सोचता है कि 'मेरा ऐसा हो जाय, मैं यह करूँ' यही ऋतु
अर्थात् मित्र है। और जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है तो यह दक्ष हुआ। मित्र ऋतु है और
वरुण दक्ष। ब्रह्म मित्र हैं, क्षात्र वरुण । ब्राह्मण सोचता है और क्षत्रिय करता है ।।१।।
आरम्भ में ये ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग-अलग थे। तब मित्र अर्थात् ब्राह्मण वरुण
अर्थात् क्षत्रिय बिना रह सकता था ॥२॥
लेकिन वरुण या क्षत्रिय मित्र अर्थात् ब्राह्मण के बिना नहीं रह सकता था। वरुण जो
कुछ कर्म मित्र या ब्राह्मण की प्रेरणा के बिना करता उसी में असफलता हो जाती ।।३।।
वह क्षत्रिय वरुण ब्राह्मण मित्र के पास आया और कहा, 'तू मेरी ओर आ कि हम दोनों
मिल जायें। तुझी को आगे रक्खूँ। तेरी प्रेरणा से काम करूं।' उसने कहा, 'अच्छा।' वे दोनों
मिल गये। इसीलिए यह मित्र और वरुण का ग्रह हुआ ॥४॥
यही पुरोहित है। इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि (बिना पता लगाये) हर किसी
क्षत्रिय का पुरोहित न बने जिससे पुण्य और पाप मिल न जावें, और क्षत्रिय को चाहिए कि
(बिना पता लगाये) हर ब्राह्मण को अपना पुरोहित न बना ले कि पाप और पुण्य मिल न जायँ।
वरुण ने मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा से जो कर्म किये उनमें उसकी सफलता हुई ॥५॥
यदि ब्राह्मण राजा के बिना रहे तो कोई दोष नहीं है। यदि राजा हो तो इसमें दोनों का
भला है। परन्तु क्षत्रिय को बिना ब्राह्मण के नहीं रहना चाहिए। क्षत्रिय जो कुछ कर्म बिना
मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा के करता है उसमें उसकी सफलता नहीं होती। इसलिए क्षत्रिय जो कुछ
करना चाहे उसमें वह ब्राह्मण के पास जाय, क्योंकि जो कुछ वह ब्राह्मण की प्रेरणा से करेगा
उसमें उसे सफलता होगी ॥६॥
अब वह इसको इस मन्त्र से लेता है— "अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा ।
ममेदिह श्रुतं ु हवम् । उपयामगृहीतोऽसि मित्रावरुणाभ्यां त्वा" (यजु० ७।६, ऋ० २।४१।४) -
"हे पवित्र मित्र और वरुण, यह सोम तुम दोनों के लिए निचोड़ा गया। मेरे निमन्त्रण को
सुनो। तुमको उठाया गया है मित्र वरुण के लिए" ॥७॥
उसमें दूध मिलाता है। दूध इसलिए मिलाता है। सोम ही वृत्र था। जब देवों ने उसे
मारा तो उन्होंने मित्र से कहा, 'तू भी मार।' उसने न माना- 'मैं सबका मित्र हूँ। मित्र होकर