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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-३

युवाना॒नि प॑तन्ति य॒ज्ञस्यै॒वैतद्दिधा॒मनु॑ ॥ २६॥ ॥ शतम् २३०० ॥ ॥ इ॒यं वै ह वा
ऽउ॒पाꣳशुः॑ । प्रा॒णो व्यु॑पा॒ꣳशुरि॒माꣳ ह्येव प्रा॒णन्न॒भिप्राणि॒त्यसा॒वेवा॒न्तर्या॒म उ॑दा॒नो
ह्य॒न्तर्या॒मोऽमुꣳ ह्येव लो॒कमुद॑नन्न॒भ्युद॑नित्य॒न्तरि॑क्षम॒वोपा॑ꣳशुसवनो व्या॒नो व्यु॑-
पा॑ꣳशुसवनो॒ऽन्तरि॑क्षꣳ ह्येव व्या॒नन्न॒भिव्या॑निति ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ २॥ ॥
वा॒ग्व वा॒ऽअस्यैन्द्रवाय॒वः । ए॒तद्ब्या॑त्म॒मिन्द्रो॒ ह यत्र वृ॒त्राय॒ वज्रं॑ प्रज॒हार॑
सो॒ऽबलीयान्मन्य॑मानो॒ नास्तृषीतीव बिभ्य॑न्निल॒यां च॑क्रे॒ तदे॑वापि दे॒वा अ॒पन्य॑-
लयन्त ॥ १॥ ते ह दे॒वा ऊचुः । न वै ह॒तं वृ॒त्रं वि॑द्म॒ न जी॒वं क॒त्त न एको॑
वे॒त्तु यदि॑ ह॒तो वा वृ॒त्रो जी॑वति॒ वेति॑ ॥ २॥ ते वायुमब्रुवन् । अ॒यं वै वायुर्यो
ऽयं प॑वते॒ वाय्वि॒दं वि॑द्धि॒ यदि॑ ह॒तो वा वृ॒त्रो जी॑वति वा॒ त्वं वै न आशि॑-
ष्ठो॒ऽसि यदि॑ जीवि॒ष्यति॒ त्वमे॒व क्षिप्रं पुन॒रागमिष्यसीति॑ ॥ ३॥ स होवाच । किं
मे ततः स्या॒दिति॑ प्रथमवषट्का॒र ए॒व ते॒ सोम॑स्य॒ राज्ञ इति॒ तथेत्ये॑याय वायु॒रेह॒तं
वृ॒त्रꣳ स होवाच ह॒तो वृ॒त्रो यद्व॑ते कुर्या॒त तत्कुरुतेति॑ ॥ ४॥ ते दे॒वा अ॒भ्यसृ॑-
ज्यन्त । यथा वि॒त्तिं वेत्स्य॑माना ए॒वꣳ स यमेको॑ऽलभत स ए॑कदे॒वत्यो॒ऽभव॒द्यं
द्वौ स द्वि॑देव॒त्यो यं ब॒हवः॒ स ब॑हुदेव॒त्यस्तद्यदेनं॑ पात्रै॒र्व्यगृह्णत॒ तस्माद्ग्रहा ना॑म
॥ ५॥ स एषामापू॑यत् । स एनां॑दु॒क्तः पूतिर॑भि॒ववौ स ना॑ल॒माहुत्या॑ऽऽस्रान्नारलं
भक्षा॑य ॥ ६॥ ते दे॒वा वायुमब्रुवन् । वाय्वि॒मं नो विवाही॒मं नः स्वदयति॒ स
होवाच किं मे ततः स्या॒दिति॒ त्वयै॒वैतानि॒ पात्रा॒ण्याचरी॑र॒न्निति॒ तथेति॒ होवाच
यूयं तु मे सच्या॑पवातेति॑ ॥ ७॥ तस्य देवाः । यावन्मा॒त्रमिव ग॒न्धस्या॑पज॒घ्नुस्तं॑ प-
श्चा॒दधुः॒ स ए॒ष प॒शुषु कुणापगन्धस्तस्मात्कुणपगन्धा॒न्नापि॑गृह्णीत॒ सोम॑स्य॒ ह्येष रा-
ज्ञो गन्धः ॥ ८॥ नोऽस्य॒ निष्ठीवेत् । तस्माद्यद्यप्यासक्त-इव म॒न्येताभिवातं॑ प॒-
रीया॒द्धीवै॑ सोमः पाप्मा वृ॒त्रः स यथा॒ श्रेयस्यायति पापीयान्प्रत्यव॒रोहे॑दे॒वꣳ हा-
स्मात्पा॒प्मः प्रत्यव॑रोहति ॥ १॥ अथे॒तरं वायुर्व्य॑वात् । तद॒स्वदय॒त्ततो॒ऽलमाहुत्या॑

कां० ४, अ० १, ब्रा० २-३, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ५३६
करना चाहते हैं ॥२६॥
यह पृथिवी उपांशु है। उपांशु प्राण है। प्राण के द्वारा ही तो प्राणी पृथिवी पर साँस लेता
है। अन्तर्याम द्यौ है, क्योंकि अन्तर्याम उदान है। उदान से ही प्राणी द्यौ में साँस लेता है। उपांशु-
सवन व्यान है। उपांशु-सवन अन्तरिक्ष है, क्योंकि अन्तरिक्ष में ही प्राणी व्यान-वायु को छोड़ता
है ॥२७॥
ऐन्द्रवायवग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ३
ऐन्द्र-वायव ग्रह उसकी वाणी है और वह उसका आत्मा है। इन्द्र ने जब वृत्र के लिए
वज्र मारा तब उसने समझा कि 'मैं निर्बल हूँ, मैं उसे मार नहीं पाया।' इसलिए वह छिप गया।
अन्य देवता भी वहीं छिप गये ॥१॥
उन देवों ने कहा, 'हम नहीं जानते कि वृत्र मारा गया या नहीं। हममें से एक को देखना
चाहिए कि वह मारा गया या नहीं' ॥२॥
उन्होंने वायु से कहा, इसी वायु से जो बहता है—'हे वायु, पता तो लगा कि वृत्र जीता
है या नहीं ? हम लोगों में तू सबसे अधिक तेज है। यदि वह जीता होगा तो जल्दी से भाग आ
सकता है' ॥३॥
वायु ने कहा, 'इससे मुझे क्या लाभ ?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'सोम राजा का प्रथम
वषट्कार तुझे मिलेगा।' उसने कहा 'अच्छा' और वह गया। वृत्र तो मर चुका था। उसने कहा,
'वृत्र मर चुका है। जो मरे हुए के लिए किया जाता है उसे कीजिए' ॥४॥
देवता वहाँ दौड़े गये जैसे धन की इच्छा में लोग दौड़ते हैं। उसमें से जिसको एक देवता
ने पकड़ा वह एक-देवत्य हुआ, जिसे दो ने पकड़ा वह द्विदेवत्य, जिसको बहुतों ने पकड़ा वह
बहुदेवत्य। चूंकि उसको पात्रों के द्वारा ग्रहण किया इसलिए इनका नाम ग्रह पड़ा ॥५॥
उसमें से उनको दुर्गन्ध आई। वह खट्टा और सड़ा प्रतीत हुआ। वह न आहुति के योग्य
था, न भक्षण के ॥६॥
देवों ने वायु से कहा, 'हे वायो ! इसमें होकर बह। इसको हमारे लिए स्वादिष्ट कर
दे।' उसने कहा, 'मुझे क्या लाभ?' उन्होंने कहा कि, 'इन ग्रहों का नाम तेरे ही नाम पर
पड़ेगा।' उसने कहा, 'अच्छा ! परन्तु मेरे साथ तुम भी फूंको' ॥७॥
देवों ने उसकी जितनी दुर्गन्ध निकाल दी उतनी पशुओं में रख दी। यह वही बदबू है
जो मुर्दा पशुओं में पाई जाती है। इस दुर्गन्ध पर नाक नहीं सिकोड़ना चाहिए, क्योंकि यह सोम
राजा की गन्ध है ॥८॥
उस पर थूकना भी नहीं चाहिए। चाहे उस पर कितना ही असर क्यों न हुआ हो,
उसको वायु की ओर मुड़ जाना चाहिए। सोम का अर्थ है बड़ाई और रोग का अर्थ है बुराई।
जिस प्रकार बड़े के आने पर छोटा दब जाता है, इसी प्रकार सोम के आने पर रोग दब जाता
है ॥६॥
अब वायु ने फिर फूंका। वह स्वादिष्ट हो गया--आहुति के भी योग्य और भक्षण के

५४० शतपथ ब्राह्मण

ऽश्रासा॒न्तं भ॑जाय॒ तस्मा॑दे॒तानि॑ नानादे॒वत्यानि सन्ति वायव्यानी॒त्याच॑क्षते॒ सो
ऽस्यैष प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒मस्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते ॥ १०॥ इन्द्रो
ह॒ वाऽई॒क्षां च॑क्रे । वायु॒र्वै नो॒ऽस्य य॒ज्ञस्य॒ भूयि॑ष्ठभाग॒स्य प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒म-
स्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते हन्ता॒स्मिन्नप॑वमि॒भाऽइति॑ ॥ ११॥ स हो-
वाच । वाय॒वा मा॒स्मिन्य॒ज्ञे भ॑जेति किं ततः स्या॒दिति॒ निरु॑क्तमेव वाग्व॑दे॒दिति॒
निरु॑क्तं चेद्वाग्व॑दे॒द्वा वा भ॑जामीति॒ तत एष ऐन्द्रवाय॒वो ग्रहो॑ऽभवद्वाय॒व्यो हैव
ततः पुरा ॥ १२॥ स इन्द्रो॑ऽब्रवीत् । अ॒र्धं मेऽस्य॒ ग्रह॒स्येति तुरी॑यमेव त॒ऽइति॑
वायु॒रर्ध॒मेव म॒ऽइतीन्द्र॑स्तुरी॒यमेव त॒ऽइति॑ वायुः ॥ १३॥ तौ प्र॒जाप॑तिं प्रति॒प्रश्न-
मेयतुः । स प्रजाप॑तिर्गृहं द्वेधा च॑कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरित्य॑थ पुन॒रर्धं द्वेधा॑ च-
कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरिती॒दं तवेतीन्द्रं॑ तुरी॒यमे॒व भाज॑यां चकार॒ यद्वै चतुर्थं
तन्तुरी॒यं तत॑ एष ऐन्द्रतुरी॒यो ग्रहो॑ऽभवत् ॥ १४॥ तस्य॒ वाऽए॒तस्य॒ ग्रह॑स्य । द्वे
पुरो॒रुचौ॑ वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा द्वेऽऽनुवा॒क्ये वाय॒व्येव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा
द्वौ प्रैषौ वाय॒व्य एव पूर्व ऐन्द्रवायव उत्तरो द्वे या॒ज्ये वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्यु-
त्त॒रैव॒मेनं॑ तुरीयं-तुरीयेणैव भाज॑यां चकार ॥ १५॥ स॒ होवाच । तुरीयं-तुरीयं चे-
न्माम॑बीभजुस्तुरी॒यमेव तर्हि वाङ्निरु॑क्तं वदिष्यतीति॒ तदे॒तन्तुरी॒यं वा॒चो निरु॑क्तं
यन्मनु॑ष्या व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यत्प॒शवो॑ व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनि-
रु॑क्तं यद्वया॑सि व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यदि॒दं क्षु॒द्रं स॑रीसृ॒पं व॑दति ॥ १६॥
तस्मा॑दे॒तदृषि॑णाभ्य॒नूक्तम् । च॒त्वारि॒ वाक्परि॑मिता प॒दानि॒ तानि॑ विदु॒र्ब्राह्मणा ये
म॑नी॒षिणः॑ । गुहा॒ त्रीणि॒ निहि॑ता॒ नेङ्ग॑यन्ति तुरी॒यं वा॒चो म॑नु॒ष्या व॑दन्तीति ॥ १७॥
अथातो गृह्णात्येव । आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववा-
र । उपो तेऽन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वेति ॥ १८॥ अ-
थापगृह्य पुनरानयति । इन्द्रवायूऽइमे सुता उप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामु-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ३, कं० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५४१
भी योग्य। इसलिए यह ग्रह भिन्न-भिन्न देवताओं के होते हुए भी वायु के ही कहे जाते हैं।
सोम राजा का पहला वषट्कार भी वायु का है और ये ग्रह भी वायु के ही कहे जाते हैं ॥१०॥
इन्द्र ने सोचा—हमारे इस यज्ञ का सबसे बड़ा भाग तो वायु का हो गया, क्योंकि सोम
राजा का पहला वषट्कार उसका है। इसके अतिरिक्त ये ग्रह भी उसी के नाम से पुकारे जाते
हैं। इनमें से मैं भी भाग लूंगा ॥११॥
उसने कहा, 'वायु ! इस ग्रह में मुझे भी भाग दे ।' 'मुझे क्या लाभ ?' 'वाणी व्यक्त हो
जायगी।' 'यदि वाणी व्यक्त हो जायगी तो मैं तुझे भाग दे दूंगा।' इसलिए इस ग्रह का नाम
ऐन्द्रवायव पड़ा। पहले केवल इन्द्र का ही था ॥१२॥
इन्द्र ने कहा, 'इस ग्रह का आधा मेरा ।' वायु ने कहा, 'इस ग्रह का चौथाई तेरा।' इन्द्र
ने कहा, 'आधा मेरा।' वायु ने कहा, 'चौथाई तेरा' ॥१३॥
वे दोनों फैसले के लिए प्रजापति के पास गये। उस प्रजापति ने ग्रह के दो भाग कर
दिये। उसने कहा, 'यह वायु का।' फिर आधे के दो भाग किये, और कहा, 'यह वायु का और
यह तेरा।' तब उसने अपने भाग का चौथाई इन्द्र को दिया। चतुर्थ और तुरीय का एक अर्थ है।
इसलिए इसका नाम ऐन्द्र-तुरीय ग्रह हो गया ॥१४॥
इस ग्रह के दो पुरोरुच मन्त्र होते हैं—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी;
दो प्रैष—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु सम्बन्धी; दो याज्य—पहला वायु-सम्बन्धी,
दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी। इस प्रकार वह सदा इन्द्र के लिए चौथाई भाग रखता है ॥१५॥
उसने कहा कि अगर मुझे चौथाई भाग दिया है तो वाणी भी चौथाई भाग ही स्पष्ट
बोलेगी। इससे केवल यही चौथाई वाणी समझ में आती है जो मनुष्य बोलता है, और जिस
चौथाई को पशु बोलते हैं वह समझ में नहीं आती। वह चौथी वाणी समझ में नहीं आती जिसे
पक्षी बोलते हैं और वह चौथाई वाणी भी समझ में नहीं आती जिसको क्षुद्र कीड़े बोलते हैं ॥१६
इसीलिए ऋषि ने कहा, “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनी-
षिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति” (ऋ० १।१६४।४५)—
“वाणी से परिमित चार पद होते हैं। बुद्धिमान्, ब्राह्मण उनको जानते हैं। तीन गुहा में रक्खे
हुए स्पष्ट नहीं होते हैं। चौथाई वाणी को मनुष्य बोलते हैं” ॥१७॥
अब उस (सोम) में से ग्रह को मारता है, इस मन्त्र से—“आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप
नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार। उपो ते ऽअन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा”
(यजु० ७।७, ऋ० ७।६२।१)—“हे शुद्ध व्यान करनेवाले वायु, आ। तेरे हजारों अश्व हैं। तू सब
वरों का दाता है। हे देव, जिसका तू पहला घूंट पीता है वह आनन्द-युक्त रस तुझको अर्पण किया
गया” ॥१८॥
इस ग्रह को लेकर फिर भरता है, इस मन्त्र से—“इन्द्र वायू ऽ इमे सुता ऽ उप प्रयो-