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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

अध्याय-६, ब्राह्मण-५

Page 680Permalink

६६२ शतपथ ब्राह्मण
ये संवत्सर॒मास॑ते॒ तस्मा॑द्विश्वकर्म॑णे वाच॒स्पतिं॑ वि॒श्वक॑र्माणमूत॒ये म॑नो॒जुवं वाजे॑
ऽअ॒द्या हु॑वेम । स नो॒ विश्वा॑नि॒ हव॑नानि जोषद्विश्वशम्भूरव॑से सा॒धुकर्मा॑ । उप॒-
या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽइति
॥ ५ ॥ यद्यु॑ऽऐ॒न्द्रीं वै॑श्वकर्म॒णीं वि॒द्यात् । तथै॒व गृह्णी॑याद्विश्वकर्मन्ह॒विषा॑ वर्धनेन
त्रा॒तार॒मिन्द्र॑मकृणोरव॒ध्यम् । तस्मै॒ विशः॒ सम॑नमन्त पू॒र्वी॒र॒यमु॒ग्रो वि॒हव्यो॑ यथा॒-
सत् । उप॒यामगृ॑हीतोऽसीन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्व-
कर्म॑णऽइति ॥ ६॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [६. ४.] ॥ ॥
ए॒ष वै ग्रहः॑ । य ए॒ष तप॑ति येने॒माः सर्वाः प्रजा गृ॑हीतास्तस्मादादा॒ङ्र्य॒ह्यान्गृ-
ह्लीम॒ इति॒ चर॑न्ति ग्रहगृहीताः स्म इति ॥ १॥ वागे॒व ग्रहः॑ । वाचा॒ हीदꣳ॒ सर्वं॑
गृ॒हीतं किमु॒ तद्य॑द्वाग्ग्रहः॑ ॥ २॥ नामै॒व ग्रहः॑ । नाम्ना॒ हीदꣳ॒ सर्वं॑ गृ॒हीतं किमु॒
तद्य॒न्नाम॒ ग्रहो॑ बहूनां वै नाना॑नि वि॒द्यान्न नस्तेन॒ ते न॒ गृही॑ता भवन्ति ॥ ३॥
अन्न॑मे॒व ग्रहः॑ । अन्ने॒न हीदꣳ॒ सर्वं॑ गृ॒हीतं॒ तस्मा॒द्याव॑न्तो नोऽशनमश्न॑न्ति॒ ते नः॒
सर्वे॑ गृहीता भवन्त्येषेव स्थितिः॑ ॥ ४॥ स य ए॒ष सोम॑ग्रहः । अन्नं॒ वाऽए॒ष स
यस्यै दे॒वता॑याऽए॒तं ग्रहं॑ गृह्णा॒ति॒ सास्मै दे॒वतै॒तेन॒ ग्रहे॑ण गृहीता तं कामꣳ॒ स-
मर्धयति यत्काम्या गृह्णा॒ति॒ स उ॒द्यतं वा॒दित्य॒मुप॑तिष्ठते॒ऽस्तं॒ यन्तं॑ वा गृहोऽस्य-
मुमनया॒र्त्या गृ॑ह्णाणासाव॒दो मा प्रापदिति॒ यं द्वि॒ष्याद॒सावस्मै कामो मा सम॑र्द्धीति
वा॒ न॒ हैवास्मै॑ स कामः॒ समृ॑ध्यते यस्मा॒ऽएव॒मुप॑तिष्ठते ॥ ५॥ ब्राह्मणम् ॥ ७
[६. ५.] ॥ ॥
देवा॒ ह वै यज्ञं त॑न्वानाः । तेऽसुररक्ष॒सेभ्य आस॒ङ्गाद्वि॑भयां चक्रुस्ते॒ होचुः
को नो॒ दक्षि॑णत॒ आसि॑ष्यते॒ऽथाभ॑येऽनाष्ट्र॒ऽउत्तर॑तो यज्ञमु॑पचरिष्याम॒ इति॑ ॥ १॥
ते होचुः । य ए॒व नो वी॒र्य॑वत्तमः स दक्षि॑णत॒ आस्ता॒मथाभ॑येऽना॒ष्ट्रऽउत्तर॑तो
यज्ञमु॑पचरिष्याम॒ इति॑ ॥ २॥ ते॒ होचुः । इन्द्रो॒ वै नो वीर्य॑वत्तम॒ इन्द्रो॒ दक्षि॑णत

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का० ४, अ० ६, ब्रा० ४-५-६, कं० ५-६ व १-५ एवं १-३ शतपथब्राह्मण / ६६३
है, वे सबको जीत लेते हैं, इसलिए विश्वकर्मा के लिए इस मन्त्र से—"वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये
मनोजुवं वाजे ऽ अद्या हुवेम । स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा । उप-
यामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे' (यजु० ८।४५) —
"आज हम इस युद्ध में वाचस्पति विश्वकर्मा को बुलाते हैं जो हमारे मनों का प्रेरक है। वह सब
प्रकार से हित करनेवाला और शुभ कर्मवाला हमारे सब हवनों को रक्षा के लिए स्वीकार करे।
हे ग्रह, तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझको विश्वकर्मा इन्द्र के लिए। यह तेरी योनि है, तुझ
के इन्द्र विश्वकर्मा के लिए ॥५॥
यदि वह इन्द्र और विश्वकर्मा वाली ऋचा को जानता हो तो इस प्रकार निकाले, "विश्व-
कर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम् । तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुग्रो विहव्यो
यथासत् । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे" (यजु०
८।४६) —"हे विश्वकर्मन् ! तूने उन्नति करनेवाली हवि के द्वारा इन्द्र को त्राता (बचानेवाला)
और अवध्य (न मारे जानेवाला) बना दिया। उसके लिए पूर्व लोगों ने नमस्कार किया क्योंकि
वह उग्र और पूजनीय है। हे ग्रह ! तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र विश्वकर्मा के
लिए। यह तेरी योनि है। तुझको विश्वकर्मा इन्द्र के लिए" ॥६॥
ग्रहस्तुतिः
अध्याय ६—ब्राह्मण ५
यह जो तपता है और जिसने सब प्रजाओं को थाम रक्खा है वह ग्रह है। इसलिए वे
कहते हैं कि हम ग्रहों को ग्रहण करते हैं, या ग्रहों से थामे हुए हम चलते हैं। (यहाँ ग्रह के दो
अर्थ दिये हैं—(१) जिसको ग्रहण किया जाय, (२) जिससे थामे हुए हम चलें) ॥१॥
वाणी एक ग्रह है। वाणी से यह सब थामा हुआ है। क्या आश्चर्य यदि वाणी ग्रह है ॥२॥
नाम ग्रह है। नाम से ही यह सब थामा हुआ है। क्या आश्चर्य है यदि नाम ग्रह हो !
हम बहुतों के नामों को जानते हैं, क्या वे इस प्रकार हमसे बाँधे नहीं गये ? ॥३॥
अन्न भी ग्रह है। अन्न से ये सब थामे हुए हैं। इसलिए जितने हमारा अन्न खाते हैं वे
हमसे थामे जाते हैं। यह स्थिति है ॥४॥
यह जो सोम ग्रह है वह अन्न है। जिस देवता के लिए यह ग्रह निकाला जाता है वह
देवता इस ग्रह से बद्ध होकर उसकी कामना पूरी कर देता है जिसके लिए इस ग्रह को निकालते
हैं। वे उदय होते हुए या अस्त होते हुए सूर्य की उपासना करें, यह सोचकर—'तू पकड़नेवाला
(ग्रह) है। अमुक पुरुष को अमुक रोग के द्वारा पकड़। अमुक पुरुष को अमुक वस्तु न मिले।'
यह उसका नाम लेकर जिससे वह द्वेष करता है, या 'अमुक पुरुष की वृद्धि न हो, वह अपनी
इच्छा को पूरा न करे।' वस्तुतः यदि वह सूर्य की उपासना किसी के अहित के लिए करता है तो
उस पुरुष की समृद्धि नहीं होती और न उसकी कामना पूरी होती है ॥५॥
सौमिकं ब्रह्मत्वम्
अध्याय ६—ब्राह्मण ६
यज्ञ रचाते हुए देवों को असुर राक्षसों के आक्रमण का भय हो गया। उन्होंने कहा—
'हममें से कौन दक्षिण की ओर बैठेगा कि हम अभय और निश्चिन्त होकर उत्तर की ओर यज्ञ
करते रहें ?' ॥१॥
वे बोले—'जो हममें सबसे प्रबल हो वह दक्षिण की ओर बैठे जिससे हम अभय और
निश्चिन्त होकर उत्तर की ओर यज्ञ करते रहें' ॥२॥
वे बोले—'इन्द्र ही हममें सबसे प्रबल है। इन्द्र दक्षिण की ओर बैठे जिससे हम अभय