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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-९, ब्राह्मण-३

१८६ शतपथ ब्राह्मण
ल्पय॑ꣳस्तमे॒वैष ए॒तद्भागं॑ करोत्यथ॒ यद॒धोऽधः॑ कृ॒ष्णाजि॑नम॒पास्य॑त्यन॒ग्नावे॒वैष॒
ए॒तद॒न्धे तम॑सि प्र॒वेश॑यति तथोऽए॒वामृ॑क्पशो॒ रक्ष॑सां भा॒गोऽसी॒त्यन॒ग्नाव॒न्धे त॒-
म॑सि प्र॒वेश॑यति त॒स्मात्प॒शोस्ते॑दनीं न कुर्वन्ति॒ रक्ष॑साꣳ हि॒ स भागः॑ ॥ ३५॥ ब्रा-
ह्मणम् ॥ ३ [१.२.]॥ ॥
सꣳस्थि॑ते य॒ज्ञे । द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति तथा॒ ह्युद॑ग्भवति तस्मा-
द्द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति दे॒वलो॒के मे॒ऽप्यस॒दिति॒ वै य॑ज॑ते॒ यो यज॑ते
सो॒ऽस्यै॑ष य॒ज्ञो दे॑वलो॒कमे॒वाभि॒प्रेति॒ तदनू॑ची॒ दक्षि॑णा यां ददा॑ति॒ सेति॒ दक्षि॑णा-
मन्वा॒रभ्य॒ यज॑मानः ॥ १॥ स ए॒ष दे॑वया॒नो वा॑ पितृया॒णो वा॒ पन्थाः॑ । तदु॑भय-
तो॒ऽग्निशि॑खे समोष॑न्त्यौ तिष्ठतः॒ प्रति॑ त॒मोष॑तो यः॒ प्रत्युष्यो॒ऽन्यु तꣳ सृज॑तो॒ यो
ऽतिसृ॑ज्यः॒ शान्ति॒राप॒स्तदे॑तमे॒वैतत्प॒न्थानꣳ॑ शमयति ॥ २॥ पूर्णं निन॑यति । स॒र्वं
वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैन॑मेत॒च्छम॑यति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑नै॒वैन॑मेत॒दव्यव॑च्छि-
न्नेन शमयति ॥ ३॥ यद्वे॑व पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति । यद्वै॒ य॒ज्ञस्य॑ मिथ्या क्रि॒यते॒ व्यस्य
तदृच्छ॑ति॒ यद्व॑र्त्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः संद॑धाति ॥ ४॥ पूर्णं॑
निन॑यति । स॒र्वं वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैत॒त्संद॑धाति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑-
नै॒वैत॒दव्यव॑च्छिन्नेन॒ संद॑धाति ॥ ५॥ तद॒ञ्जलि॑ना प्रति॒गृह्णा॑ति । सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं
तनू॒भिरगन्म॑हि॒ मन॑सा॒ सꣳ शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु रा॒योऽनु॑मार्ष्टुं त॒न्वो
यद्विलि॑ष्ट॒मिति॒ यद्वि॒वृढं॒ तत्संद॑धाति ॥ ६॥ अथ॒ मुख॑मुपस्पृशते । द्वयं तद्य॒स्मान्मु-
खमुपस्पृश॑ते॒ऽमृतं॒ वाऽआपो॒ऽमृते॑नै॒वैतत्संस्पृ॑शत॒ऽएत॒द्वै चैवैतत्कर्मात्मन्कु॑रुते त॒-
स्मान्मु॒खमुप॑स्पृशते ॥ ७॥ अथ वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते । दे॒वान्वाऽए॒ष प्री॑णाति॒ यो य-
जत॒ऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेना॒ऽग्निर्हि वस्व॒ग्नि॑र्हि य॒दाहु॑तिभिरेव य॒त्स दे॒वान्प्री॒त्वा तेष्व-
पि॒त्वी भव॑ति॒ तेष्व॑पि॒त्वी भूत्वा ताने॒वाभिप्रक्राम॑ति ॥ ८॥ यद्वे॑व वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते ।
य॒ज्ञो वै विष्णुः॑ स दे॒वेभ्य॑ इ॒मां वि॒क्रान्तिं॒ विच॑क्रमे॒ येषा॑मि॒यं वि॒क्रान्ति॒रिद॑मे॒व प्र-

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १८७
वह उन असुरों को देता है, अर्थात् (इस भूसी को) हिरन के लिए चमड़े के नीचे फेंक देता है।
इस प्रकार वह इसे अन्धकार में डालता है, जहाँ आग नहीं है। इसी प्रकार पशु का रक्त भी
अन्धकार में डालता है, यह कहकर कि तू राक्षसों का भाग है। इसलिए (यज्ञ में) प्रयुक्त नहीं
करते क्योंकि यह राक्षसों का भाग है ॥३५॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
यज्ञ की समाप्ति पर (अध्वर्यु) दक्षिण की ओर घूमकर पूर्णपात्र के जल को गिरा देता
है। इस प्रकार (संकेत से बताता है) उत्तर की ओर गिराया जाता है। इसलिए दक्षिण की
ओर घूमकर पूर्णपात्र को गिराता है। जो यज्ञ करता है वह इस कामना से करता है कि देवलोक
में स्थान मिले। उसका यह यज्ञ भी देवलोक को चला जाता है। इसके पीछे दक्षिणा चलती है,
जिसे वह (पुरोहित को) देता है। दक्षिणा को लेकर यजमान पीछे-पीछे आता है ॥१॥
मार्ग या तो देवयान होता है या पितृयान। दोनों ओर दो अग्नि-शिखाएँ जलती रहती
हैं। जो मुरसाने के योग्य होता है उसे मुरसाती हैं और जो निकल जाने के योग्य होता है उसे
निकल जाने देती हैं। जल शान्ति है इसलिए इसके द्वारा वह मार्ग को शान्त करता है ॥२॥
पूर्णपात्र को वह उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। इस प्रकार ‘सब’ से वह मार्ग को
शान्त करता है। वह निरन्तर बिना धार को तोड़े हुए उँडेलता है। इस प्रकार वह मार्ग को
निरन्तर लगातार शान्त करता है ॥३॥
वह पूर्णपात्र को इसीलिए उँडेलता है। यज्ञ में जो भूल हो जाती है वहाँ काट या फाड़
देते हैं। जल शान्ति हैं इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त करता है अर्थात् जलों से चंगा करता
है ॥४॥
पूर्ण (पात्र) को उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। ‘सब’ के द्वारा इसको चंगा करता है।
वह लगातार बिना धार तोड़े हुए उँडेलता है, इस प्रकार निरन्तर चंगा करता है ॥५॥
उसको अञ्जलि से लेता है यह मन्त्र पढ़कर—'सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि
मनसा सं ॓ शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्तो (तन्वो ?) यद् विलिष्टम्
(विलीष्टम् ?)”(यजु० २।२४)—“तेज, शक्ति, शरीरों और कल्याणकारी मन से हम मिल
गये। दानी त्वष्टा हमको धन दे; और जो कुछ हमारे शरीर में घाव था उसे चंगा कर दे।”
ऐसा कहकर जो व्रण था उसको चंगा कर देता है ॥६॥
अब मुख का स्पर्श करता है। मुख स्पर्श करने के दो कारण हैं—पहला, जल अमृत
है। अमृत से ही इसको स्पर्श करता है। दूसरे यह कि इस प्रकार वह इस कर्म को अपना (निजी)
कर लेता है। इसलिए मुख का स्पर्श करता है ॥७॥
अब वह विष्णु के पगों को चलता है। जो यज्ञ करता है वह देवों को प्रसन्न करता है।
इस यज्ञ द्वारा ऋचाओं से, यजुषों से या आहुतियों से देवों को प्रसन्न करके वह उनका हिस्सेदार
होकर उन तक पहुँच जाता है ॥८॥
विष्णु के पगों को इसलिए चलता है—विष्णु यज्ञ है। उस (यज्ञ) ने देवों के लिए इस
विक्रान्ति (शक्ति) को प्राप्त कर लिया जो इस समय उनके पास है। पहले पद से इस (पृथिवी)

१८८ शतपथ ब्राह्मण
थमेन॑ प॒देन॑ प॒श्या॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षं द्वि॒तीये॑न दि॒वमुत्त॑मेनैतान्त्वे॒वैष ए॒तस्मै॒ वि॒ष्णुर्व्य॑क्रस्तो
विक्रान्तिं॒ विक्र॑मते॒ तस्मा॑द्वि॒ष्णुक्र॒मान्क्रम॑ते॒ तदा॑ऽङ्गत् ए॒व परा॑चीनं॒ भूयि॑ष्ठा-इव
क्रम॑न्ते ॥ ९॥ तडु॒ तत्पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । गा॒य॒त्रेण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो
योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै॒ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑-
क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑सा॒ ततो॒
निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इ॒त्येव॒मिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैषा॒ गति॑रे-
षा प्रतिष्ठा॒ य ए॒ष तप॑ति॒ तस्य॒ ये र॒श्मय॒स्ते॑ सु॒कृतो॒ऽथ यत्प॑रं॒ भाः प्र॒जाप॑तिर्वा
स॒ स्वर्गी॑ वा लो॒कस्त॑दि॒वमिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैतां गति॑मेतां प्रति॑ष्ठां गच्छति प-
र॒स्ता॒द्रे॒वार्वाङ् क्रमे॑त॒ य इतो॒ऽनु॒शासनं॑ चिकीर्षेद्वयं तद्य॒स्मात्पर॒स्ता॒दर्वाङ् क्र॑मति
॥ १०॥ अप॒सरणा॒तो ह॒ वाऽग्रे॑ दे॒वा जयन्तो॒ऽजय॑न् । दि॒वमे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम-
थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नाननु॑दत॒ तथो॒ऽए॒वैष ए॒तदप॑सरणात ए॒वाग्रे॒ जय॒न्जय॑ति दि॒-
व॑मे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम॒थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नान्नु॑दत॒ऽइयं वै पृ॑थि॒वी प्रति॑ष्ठा तद्-
स्याने॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥ ११॥ तडु॒ तद्दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । जाग॑तेन
छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै-
ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्र-
स्त गा॒यत्रे॑ण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽस्माद॒न्नाद॒स्यै
प्रति॑ष्ठायाऽहु॒त्यस्या॑ऽ कीदृ॒ सर्व॒मन्ना॑द्यं प्रति॑ष्ठित॒ तस्मा॑दाका॒स्माद॒न्नाद॒स्यै प्रति॑ष्ठा-
याऽहुति ॥ १२॥ अथ॒ प्राङ् प्रेक्ष॑ते । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दि॒क्तस्मा॒त्प्राङ् प्रेक्ष॑ते ॥१३॥
न प्रेक्ष॑ते । अगन्म॒ स्व॒रिति॑ दे॒वा वै स्व॒रग॑न्म दे॒वानित्ये॒वैतदा॑ह॒ सं ज्योति॑षा-
भू॒मति॒ सं दे॒वैर॒भूमेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १४॥ अथ॒ सूर्य्यमुदीक्ष॑ते । सैषा ग॒तिरे॒षाप्र॑तिष्ठा
तदे॑तां ग॒तिमे॒तां प्रति॑ष्ठां गछति॒ तस्मात्सूर्य्यमुदीक्ष॑ते ॥ १५॥ स उ॒दीक्ष॑ते । स्वय-
म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र॒श्मिरित्येष वै श्रेष्ठो॑ र॒श्मिर्यत्सूर्य्यस्तस्मा॑दाह॒ स्वय॒म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / १८६
को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौ को। यह विष्णु-यज्ञ यजमान के लिए इस शक्ति को
प्राप्त करा देता है। इसीलिए विष्णु के पगों को चलता है। अब इसी (पृथिवी) से बहुत-से (ऊपर
को) चलते हैं ॥६॥
वह इस मन्त्र से-“पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि
यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५), “अन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो
योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः”(यजु० २।२५), “दिवि विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त जागतेन च्छन्दसा ततो
निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५) – “पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से
चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “अन्तरिक्ष
में विष्णु त्रिष्टुभ् छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से
बहिष्कृत है”, “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करते हैं या जिससे हम द्वेष
करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है।” जब इन लोगों को प्राप्त हो गया तो यही गति है, यही
प्रतिष्ठा है। जो यह तपता है अर्थात् सूर्य, उसकी ये किरणें हैं वे सुकृत हैं। यह जो परम-प्रकाश
है वह प्रजापति या स्वर्ग-लोक है। इस प्रकार इन लोकों को प्राप्त होता है। वह इस गति और
प्रतिष्ठा को पाता है। जो अनुशासन या उपदेश देना चाहे वह ऊपर से नीचे आता है। दो कारण
हैं कि वह ऊपर से नीचे आता है—॥१०॥
(शत्रु के) भागने पर विजयी देवों ने पहले द्यौ को जीता, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उन
शत्रुओं को इस (पृथिवी) से भी निकाला जहाँ से भाग जाना कठिन था। उसी प्रकार यह (होता)
भी (शत्रुओं के) भागने पर पहले द्यौ लोक को जीतता है, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उनको इस
(पृथिवी) से निकालता है जहाँ से भाग जाना नहीं बन सकता। यह पृथिवी की प्रतिष्ठा है इसलिए
वह इस प्रतिष्ठा में ही प्रतिष्ठित होता है ॥११॥
और इस प्रकार भी-“दिविविष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त । जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान्
द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि
यं च वयं द्विष्मः पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मोऽस्मादन्नादान्द्यं प्रतिष्ठाया” (यजु० २।२५) – “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से
चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं।
अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है
या जिससे हम द्वेष करते हैं। पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया
गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। इस अन्न से और प्रतिष्ठा से (निकाल
दिया गया)।” इस पृथिवी में ही सब अन्न आदि प्रतिष्ठित हैं इसीलिए कहा, 'इस अन्न से और
इस प्रतिष्ठा से' ॥१२॥
अब वह पूर्व की ओर देखता है। पूर्व देवों का दिशा है। इसलिए पूर्व की ओर देखता
है ॥१३॥
वह यह मन्त्र पढ़कर देखता है-“अग्न्म॒ स्वः”(यजु० २।२५) - “हम स्वर्ग को पहुँच
गये।” देव ही स्वर्ग हैं इसलिए तात्पर्य है 'देवों को प्राप्त हो गये।' अब कहता है-“सं ज्योतिषा-
भूम” (यजु० २।२५) -- “प्रकाश से हम मिल गये।” इससे तात्पर्य है कि हम देवों से मिल
गये ॥१४॥
अब वह सूर्य की ओर देखता है, क्योंकि वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। इस गति को
और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है, इसलिए सूर्य की ओर देखता है ॥१५॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर देखता है- “स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिः”(यजु०२।२६) – “हे
श्रेष्ठ किरण ! तू स्वयम्भू है।” सूर्य श्रेष्ठ किरण है इसलिए कहा, 'हे श्रेष्ठ किरण, तू स्वयम्भू है।'

ेभ्यः" - "शतादर्धेभ्यः" (from शतात् + अर्धेभ्यः / शतादर्धेभ्यः).
In line 12: शता-
In line 13: र्द्धेभ्यः (with anudatta underneath).
Wait, look at line 13: र्द्धे॒भ्यः or र्द्धेभ्यः?
There is an anudatta under the first consonant cluster: र्द्धे॒भ्यः.

Line 14:
मन्वावर्त्तऽइति॒ तदेतां गतिमेतां प्रतिष्ठां गतेतस्यैवावृतमन्वावर्तते ॥ २०॥ अथ
मन्वावर्त्तऽइति॒: anudatta under ति. ग॒ते-: anudatta under ग. त॒स्यैवावृतमन्वावर्तते: anudatta under त. अ॒थ: anudatta under अ.

Line 15:
पुत्रस्य नाम गृह्णाति । इदं मे॒ऽङ्गं वी॒र्यं पुत्रो॒ऽनुसंतनवदिति यदि पुत्रो न स्याद्-
इदं: इ॒दं or इदं? Under दं or इ: इ॒दं.
मे॒ऽङ्गं: anudatta under मे.
वी॒र्यं: anudatta under वी.

कां० १, अ० ९, ब्रा० ३, कं० १६-२३ शतपथब्राह्मणम् / १६१
अब कहता है—‘‘वर्चोदाऽसि वर्चो मे देहि’’ (यजु० २।२६)—‘‘तू तेज देनेवाला है, तू
तेज दे।’’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘मैं यही कहता हूँ कि ब्राह्मण यह चाहे कि मैं ब्रह्मवर्चसी होऊँ।’
औपदितेय ने कहा, ‘वह मुझे गायें देगा। इसलिए मैं कहता हूँ, तू गाय देनेवाला है मुझे गाय
दे।’ इस प्रकार (यजमान) जो चाहता है वही उसको मिल जाता है ॥१६॥
अब वह (बाईं ओर से दाहिनी ओर को) मुड़ता है यह पढ़कर—‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’
(यजु०२।२६)—‘‘मैं सूर्य के मार्ग को लौटता हूँ।’’ इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर वह
लौटता है ॥१७॥
अब वह गार्हपत्य अग्नि के पास जाता है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है इसलिए
वह घर में अर्थात् प्रतिष्ठा में ठहरता है और दूसरे, जो मनुष्य की पूरी आयु हो सकती है उसको
प्राप्त करता है। इसलिए गार्हपत्य अग्नि के पास ठहरता है ॥१८॥
वह यह मन्त्र पढ़कर जाता है—‘‘अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाऽग्नेऽहं गृहपतिना भूयासँ॒
सुगृहपतिस्त्वम् मयाऽग्ने गृहपतिना भूयाः’’(यजु०२।२७)—‘‘हे गृहपति अग्नि ! मैं तुझ गृहपति
की सहायता से अच्छा गृहपति हो जाऊँ। हे अग्नि ! मुझ गृहपति की सहायता से तू अच्छा
गृहपति हो जा।’’ यह स्पष्ट ही है। अब कहता है —‘‘अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु’’ (यजु०
२।२७) —‘‘हमारे घर के मामले एक बैल की गाड़ी जैसे न हों।’’ इस कहने का तात्पर्य है कि
हमारे घर के मामले दुःख-रहित हों। अब कहता है—‘‘शतं॒ हिमाः’’ (यजु० २।२७)—‘‘सौ वर्ष
तक।’’ इसका तात्पर्य है ‘मैं सौ वर्ष तक जीऊँ।’ परन्तु उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि
मनुष्य सौ वर्ष से अधिक जीता है। इसलिए उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए ॥१९॥
अब वह (बाईं ओर से दाईं ओर) मुड़ता है यह पढ़कर —‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु०
२।२७)—‘‘सूर्य के मार्ग से लौटता हूँ।’’ वह इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त करके इस (सूर्य के)
मार्ग से लौटता है ॥२०॥
अब (यह मन्त्र पढ़ता हुआ) अपने पुत्र का नाम लेता है—‘‘इदं मेऽयं वीर्यं पुत्रोऽनुसन्तन्-
वत्’’—‘‘मेरा पुत्र मेरे इस वीर्य को जारी रखे।’’ यदि पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ॥२१॥
अब आहवनीय के पास खड़ा होता है। वह चुपके से खड़ा होता है यह जानकर कि पूर्व
में मेरा यज्ञ समाप्त होगा ॥२२॥
अब व्रत का विसर्जन करता है (यह मन्त्र पढ़कर)—‘‘इदमहं यऽएवाऽस्मि सोऽस्मि’’
(यजु०२।२८)—‘‘यह मैं वहीं हूँ जो हूँ।’’ जब व्रत को किया था तो मनुष्य से ऊपर (देव) हो
गया था। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि मैं सच से झूठ को प्राप्त होऊँ; और वह मनुष्य
हो ही जाता है, इसलिए उसको इस मन्त्र को पढ़कर ही व्रत का विसर्जन करना चाहिए-‘मैं वही
हूँ जो हूँ।’ (यजु० २।२८) ॥२३॥
माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत ‘रत्नकुमारी-दीपिका’
भाषा व्याख्या का हविर्यज्ञनाम प्रथम काण्ड समाप्त हुआ।
प्रथम काण्ड
प्रपाठक कण्डिका-संख्या
प्रथम [ १.२.२ ] १२१
द्वितीय [ १.३.३ ] १२२
तृतीय [ १.४.४ ] १२८
चतुर्थ [ १.६.१ ] १२१
पंचम [ १.७.२ ] १२१
षष्ठ [ १.८.२ ] १११
सप्तम [ १.६.३ ] ११४
योग ८३८