शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-९, ब्राह्मण-२
५०४ शतपथ ब्राह्मण
निविध्यत्येतैरा॒नुदीचो॒ऽतिनीय यथापू॒र्वम् ॥ २५॥ तेषां यत्र वपाभिः प्रचर॑न्ति ।
आग्ने॒यस्यैव प्रथमस्य व॒पया प्रचर॒न्त्येत॑रेषां यथापू॒र्वम् ॥ २६॥ तैर्यत्र प्रचर॑न्ति ।
आग्ने॒येनैव प्रथमेन प्रचर॒न्त्येतै॑र्यथापू॒र्वम् ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ २ [१.१.] ॥ ॥
यत्र॒ वै यज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत । तस्य॒ रसो द्रुत्वापः प्रवि॑वेश तेनैवैतद्र॒सेनापः
स्यन्द॑न्ते तमेवैतद्र॒सꣳ स्यन्दमानं मन्यन्ते ॥ १॥ स यद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति । तमेवैतद्र॒-
समाहृत्य यज्ञे॑ दधाति र॒सवन्तं यज्ञं करोति तस्माद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति ॥ २॥ ता वै
सर्वे॑षु सव॑नेषु विभजति । सर्वे॑ष्वेवैतत्सव॑नेषु रसं दधाति सर्वाणि सव॑नानि र॒-
सव॑न्ति करोति तस्मात्सर्वे॑षु सव॑नेषु विभज॑ति ॥ ३॥ ता वै स्यन्द॑मानानां गृह्णी-
यात् । ए॒द्धि स यज्ञस्य॒ रस॑स्तस्मात्स्यन्द॑मानानां गृह्णीयात् ॥ ४॥ गोपीथाय वा
ऽए॒ता गृह्य॑न्ते । सर्वं वा॒ऽइदमन्यदिलयति यदि॒दं किं चापि योऽयं पव॑ते॒ऽथैता
ए॒व नेलयन्ति तस्मात्स्यन्द॑मानानां गृह्णीयात् ॥ ५॥ दिवा गृह्णीयात् । पश्यन्य॒ज्ञ-
स्य रसं गृह्णानीति॒ तस्माद्दिवा गृह्णीयादे॒तस्मै वै गृह्णाति य॒ एष तपति विश्वे॑भ्यो
ह्येना देवेभ्यो॑ गृह्णाति र॒श्मयो॒ ह्यस्य विश्वे॑ देवा॒स्तस्माद्दिवा गृह्णीयाद्दि॒वेव वा
ऽए॒ष तस्माद्दि॒व दिवा गृह्णीयात् ॥ ६॥ एतद्वै विश्वे॑ देवाः । य॒जमानस्य गृहा-
नागच्छ॑न्ति स यः पु॒रादित्या॑स्यास्तमयाद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति यथा श्रेयस्यागमिष्यत्याव-
सथेनोपकॢप्तेनोपासी॑तैवं तत्स॒ऽएतद्धविः प्रविश॑न्ति त॒ऽएतासु वसतीवरीषूपवस-
न्ति स उपवसथः ॥ ७॥ स यस्यागृ॑हीता अभ्यस्तमिया॑त् । तत्र प्रायश्चित्तिः क्रि-
यते यदि पुरेज्ञानः स्यान्निनाव्याद्गृह्णीयाद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भव॑न्ति
यद्यु॒ऽअनीज्ञानः स्याद्य एनमीज्ञान उपावस॑तो वा पर्यवस॑तो वा स्यात्तस्य नि-
नाव्याद्गृह्णीयाद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भव॑न्ति ॥ ८॥ यद्यु॒ऽएतदुभयं न
विन्देत् । उल्कुषीमेवादा॒योप॑परियात्तामु॒पर्युपरि धारयन्गृह्णीयाद्धिर॒ण्यं वोप॒र्युपरि
धारयन्गृह्णीयात्तदेतस्य रूपं क्रियते य॒ एष तपति ॥ ९॥ अथानो गृह्णात्येव । हृ-
कां० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, क० २५-२७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५०५
को उत्तर की ओर ले जाते हुए उसी क्रम से ॥२५॥
अब उनकी वपा की आहुति देते हैं तो पहले अग्नि की, फिर औरों की उसी क्रम
से ॥२६॥
जब उनसे अन्य आहुतियां देते हैं तो पहले अग्निवाले से । फिर औरों से उसी क्रम
से ॥२७॥
अध्याय ६-ब्राह्मण २
जब यज्ञ का शिर काट दिया गया तो उसका रस बहकर जलों में मिल गया । इसी रस
के कारण वे जल बहते हैं। यह माना जाता है कि वही रस बहता है ॥१॥
जब वह वसतीवरी जल के पास जाता है तो इसी रस को लाकर यज्ञ में रखता है और
यज्ञ को रसयुक्त करता है । इसलिए वह वसतीवरी जल के पास जाता है ॥२॥
उनको वह सब सवनों में बाँट देता है । इससे वह सब सवनों में रस को धारण करता
है । सब सवनों को रसयुक्त करता है । इसलिए सब सवनों में उसे बाँटता है ॥३॥
उसको वह बहते हुए में से लेवे । चूंकि यज्ञ का रस बह रहा था, इसलिए उसे बहते हुए
जलों में से लेना चाहिए ॥४॥
इनको रक्षा के लिए लेते हैं। इस संसार में जो कुछ है वे सब आराम लेते हैं, यहाँ तक
कि यह वायु भी जो चलता है । परन्तु जल आराम नहीं लेते, इसलिए इन बहते हुए जलों में से
ही लेवे ॥५॥
इन (जलों) को दिन में लेना चाहिए, यह सोचकर कि यज्ञ के रस को देखकर ग्रहण
करूँ । इसलिए इनको दिन में लेना चाहिए । यह जो तपता है (अर्थात् सूर्य) उसी के लिए इनका
ग्रहण करता है, क्योंकि विश्वेदेवों के लिए ग्रहण करता है । उसकी किरणें ही विश्वेदेव हैं।
इसलिए दिन में ग्रहण करना चाहिए । वह (सूर्य) केवल दिन में ही (उदय होता है) इसलिए
दिन में ही ग्रहण करना चाहिए ॥६॥
विश्वेदेव यजमान के घर आते हैं। यदि वसतीवरी जलों को सूर्यास्त से पहले ग्रहण
करता है तो यह सर्वथा ऐसा ही है कि जैसे कोई बड़ा (मान्य) आवे तो वह उसे अपने घर को
शुद्ध करके स्वागत करे। ऐसा ही यह है। ये देव हवि के पास आते हैं और उन वसतीवरी जलों
में प्रविष्ट हो जाते हैं। यही उपवसथ कहलाता है ॥७॥
यदि कोई इन जलों को लेने में सूर्यास्त कर दे तो प्रायश्चित्त किया जाता है। यदि उस
पुरुष ने पहले (सोम) यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े (निनाह्य) से ले लेना चाहिए। क्योंकि
उसके जल सूर्यास्त से पहले ही के लिए होते हैं। यदि उसने पहले सोमयज्ञ न किया हो तो यदि
उसके पास या पड़ोस में कोई और पुरुष हो जिसने यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े से लेवे, क्योंकि
उसके जल भी सूर्यास्त से पहले ही ग्रहण किये हुए होते हैं ॥८॥
अगर ये दोनों न मिलें तो एक जलती लकड़ी लेकर उन जलों के ऊपर दिखाकर ग्रहण
करे । वह स्वर्ण को ऊपर दिखाकर ग्रहण करे । इससे उसी का रूप हो जाता है जो ऊपर तपता
है । (अर्थात् जलती लकड़ी या सोने का टुकड़ा सूर्य के बराबर हो जाता है) ॥६॥
इन जलों को इस मन्त्र से लेता है—
५०६ शतपथ ब्राह्मण
वि॒ष्मन्तीरि॒मा आप॒ इति॒ यज्ञ॑स्य॒ ह्यासु॒ रसः॒ प्रावि॑श॒त्तस्मा॑दाह ह॒विष्मती॑रि॒मा
आप॒ इति॒ ह॒विष्माँ२॥ऽआ॒विवा॑सतीति॒ ह॒विष्मान्ह्ये॑ना यज॑मान॒ आ॒विवा॑सति
तस्मा॑दाह ह॒विष्माँ२॥ऽआ॒विवा॑सतीति ॥ १०॥ ह॒विष्मान्दे॒वोऽअ॑ध्वर॒ इति॑ । अ-
ध्व॒रो वै य॒ज्ञस्तद्यस्मै॑ य॒ज्ञाय॑ गृह्णाति॒ तꣳ ह॒विष्म॑तं करोति॒ तस्मा॑दाह ह॒विष्मा-
न्दे॒वोऽअ॑ध्वर॒ इति॑ ॥ ११॥ ह॒विष्माँ२॥ऽअ॑स्तु॒ सूर्य॒ इति॑ । ए॒तस्मै॑ वै गृह्णाति॒ य
ए॒ष त॑पति॒ विश्वे॑भ्यो ह्येना दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति र॒श्मयो॑ ह्यस्य॒ विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॑दाह
ह॒विष्माँ२॥ऽअ॑स्तु॒ सूर्य॒ इति॑ ॥ १२॥ ता आ॒वृत्य॑ ज॒घने॑न गा॒र्हप॑त्यꣳ सादयति ।
अग्ने॒र्वैऽप॑त्नगृहस्य॒ सद॑सि सादयामीत्यग्ने॒र्वैऽनार्त॑गृहस्य॒ सद॑सि सादयामीत्ये॒वैत-
द्दाहाय॒ यदा॒ग्नीषो॒मीयः॑ प॒शुः संतिष्ठ॑ते॒ऽथ परि॑हरति॒ व्युत्क्रा॒मतेत्या॑ह ह॒वि-
र्धाने यज॑मान आस्ते॒ ता आद॑त्ते ॥ १३॥ स दक्षि॑णेन निष्क्रा॑मति । ता दक्षि॑णा-
याꣳ श्रोणौ सादयतीन्द्रा॒ग्न्योर्भा॑ग॒धेयी॑ स्थेति॒ विश्वे॑भ्यो ह्येना दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाती-
न्द्रा॒ग्नी हि विश्वे॑ दे॒वास्ताः पुन॑रा॒हृत्याग्रे॑ण पत्नीꣳ सादयति॒ स ज॒घने॑न पत्नीं॒ पर्ये॑-
त्य ता आद॑त्ते ॥ १४॥ स उत्तरे॑ण निष्क्रा॑मति । ता उत्त॑रायाꣳ श्रोणौ सादयति
मित्रावरु॑णयोर्भाग॒धेयी॑ स्थेति॒ नैवꣳ सा॑दयेदति॒रिक्त॒मेतन्नैवꣳ सम्पत॑त्सम्पद्यत॒ऽइन्द्रा-
ग्न्योर्भा॑ग॒धेयी॒ स्थेत्ये॑व ब्रूयात्तद्दे॒वानति॑रिक्तं॒ तथा॒ सम्पत॑त्सम्पद्यते ॥ १५॥ गुप्त्यै॑ वा
ऽए॒ताः प॒रिशि॑ष्यन्ते । अ॒ग्निः पु॒रस्ता॑दु॒द्येताः सम॑न्तं पर्य्यङ्गयन्ते॒ नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यपघ्नं-
त्यस्ता आग्नीध्रे सादयति॒ विश्वे॑षां दे॒वानां॑ भाग॒धेयी॑ स्थेति॒ तदा॑सु॒ विश्वान्दे॒वात्स॑-
वेशयन्त्ये॒ते वै व॑सतां॒ वरं॒ तस्मा॑द्वसतीवर्य्यो नाम॒ वसता॑ꣳ ह वै व॒रं भव॑ति॒ य
एवमे॒तद्वेद॑ ॥ १६॥ तानि॒ वाऽए॒तानि॑ सप्त॒ यजूं॑षि भवन्ति । च॒तुर्भि॑र्गृह्णात्येके॑न
ज॒घने॑न गा॒र्हप॑त्यꣳ सादयत्येके॑न॒ परि॑हरत्येके॑नाग्नी॒ध्रे तानि॑ सप्त॒ यत्र॒ वै वाचः॒
प्र॒जाता॑नि॒ च्छन्दा॑ꣳसि सप्त॒पदा॒ वै तेषां॑ परा॒र्ध्या शक्कर्यताम॒भिसम्प॑दं॒ तस्मा॑त्सप्त य-
जूं॑षि भवन्ति ॥ १७॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [१. २.] ॥ ॥
का० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ५०७
"हविष्मतीरिमा आपः" (यजु० ६।२३) - "ये जल हवि-युक्त हैं।" यज्ञ का रस इनमें
मिला है। इसलिए कहा 'हविष्मती'। "हविष्माँ२ऽआविवासति" (यजु० ६।२३) - "हवि-
युक्त पुरुष इनको काम में लावे।" हवियुक्त यजमान इनको काम में लाता है। इसलिए कहा
'हविष्मान् आविवासति' ॥१०॥
"हविष्मान्देवोऽअध्वरः" (यजु० ६।२३) - "देव अध्वर हवियुक्त है।" अध्वर कहते हैं
यज्ञ को। इस प्रकार जिस यज्ञ के लिए वह इन जलों को लेता है उसको वह हवियुक्त कर देता
है। इसलिये कहा कि 'हविष्मान्देवोऽअध्वरः' ॥११॥
"हविष्माँ२ऽअस्तु सूर्यः" (यजु० ६।२३) - "सूर्य हवि-युक्त हो।" यह जो सूर्य तपता है
उसी के लिए इनको ग्रहण करता है। यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण करता है। विश्वे-देव दस
किरणें हैं। इसलिये कहा कि 'सूर्य हवि-युक्त हो' ॥१२॥
इनको लाकर वह गार्हपत्य के पीछे देता है- "अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि"
(यजु० ६।२४) अर्थात् "सुरक्षित गृहवाले अग्नि के घर में तुमको रखता हूँ।" जब अग्निसोम-
वाला पशु निकट आवे तो वह (वसतीवरी जलों को) उसके पास ले जाता है और कहता है
'उत्क्राम' (चले जाओ)।' यजमान हविर्धान के सामने बैठता है और (अध्वर्यु जलों को) वहीं
लेकर खड़ा होता है ॥१३॥
वह दक्षिण द्वार से निकलता है और दक्षिणी श्रोणि में रख देता है। "इन्द्राग्न्योर्भागधेयी
स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम इन्द्र-अग्नि के भाग हो।" क्योंकि यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण
करता है। इन्द्र-अग्नि विश्वे-देव हैं। वह इन जलों को लेकर पत्नी के आगे रख देता है और
पत्नी के पीछे से घूमकर उनको उठा लेता है ॥१४॥
वह उत्तर द्वार से निकलता है। उन जलों को उत्तरी श्रोणि में रख देता है। "मित्रा
वरुणयोर्भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम मित्र-वरुण के भाग हो।" उसी प्रकार न रखे।
यह व्यर्थ है। इससे काम भी सिद्धनहीं होता। ऐसा कहे कि तू इन्द्र-अग्नि के भागधेय हो। इसमें
कोई अनर्थकता नहीं है और काम भी सिद्ध हो जाता है ॥१५॥
इन जलों को रक्षा के लिए लाते हैं। अग्नि आगे है। और जल चारों ओर घूमकर दुष्ट
राक्षसों को हटाते हैं। इनको वह आग्नीध्र (के स्थान) में रख देता है। "विश्वेषां देवानां
भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम विश्वे-देवों के भाग हो।" इस प्रकार वह विश्वे-देवों
को इनमें प्रवेश कराता है। यह 'वसतां' अर्थात् रहनेवालों के लिए 'वरं' शुभ होते हैं। इसलिए
इनका नाम 'वसतीवरी' है। जो इस रहस्य को समझता है वह निवासियों के लिए श्रेष्ठ हो जाता
है ॥१६॥
ये सात यजुः हैं। चार यजुओँ से ग्रहण करता है। एक से गार्हपत्य के पीछे ले जाता है।
एक से चारों ओर फिराता है। एक से आग्नीध्र के स्थान में रखता है। ये सात हुए। जब वाणी
से सात छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्तिम शक्वरी था। इससे सम्पूर्ति हुई। इसलिए सात यजुः
होते हैं ॥१७॥