शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-७, ब्राह्मण-२
४६६ शतपथ ब्राह्मण
याव॑ती वै वेदि॒स्ताव॑ती पृथि॒वी । वज्रो॒ वै यूपा॒स्तदि॒मामे॒वैतत्पृथि॒वीमे॒तैर्य॒ज्ञे
स्पृणुते॒ऽस्यै स॒पत्नान्नि॒र्भज॑ति॒ तस्मा॒द्यूपैकादशिनी॑ भवति॒ द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति
वित॑स्तस्तं द॑क्षि॒णत॒ उप॑निदधाति॒ तय॒द्द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति ॥ १॥ ॥ शतम्
२००० ॥ ॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वा॒नाः । तेᳪसुररक्ष॒सेभ्य आसङ्गा॒द्विभ॑यां चक्रुस्तद्य॑-
ऽएत॒ऽइक्षिता॒ यथेषु॑रस्ता तया॒ वै स्तृ॑णुते वा॒ न वा स्तृ॑णुते॒ यथा दण्डः प्रहृत-
स्तेन॒ वै स्तृ॑णुते वा॒ न वा स्तृ॑णुते॒ऽथ य ऽए॒ष द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति॒ यथेषुर॑प-
तान॒स्ता यथोद्य॑तमप्रहृतमे॒वमे॒ष वज्र॒ उद्य॑तो दक्षि॒णतो॒ नाष्ट्राणांᳪ रक्ष॑सामप॒हत्यै॒
तस्मा॒द्द्वाद॑श उपश॒यो भ॑वति ॥ २॥ तं नि॒दधा॑ति । ए॒ष ते॑ पृथि॒व्यां लोक आ-
रण्य॒स्ते प॒शुरिति॑ प॒शुश्च॒ वै यूप॑श्च॒ तद॒स्माऽआ॑र॒ण्यमे॒व प॑शू॒नामनु॑दिशति॒ तेनो॑
ऽए॒ष प॒शुमा॒न्भव॑ति॒ तद्ध्यं यूपैकाद॒शिन्यै सं॑श॒यनमा॒हुः श्वःसु॒त्यायै ह्वैके सं-
मि॒न्वन्ति॒ प्रकु॑र्वताये॒ चैव॒ श्वःसु॒त्यायै॒ यूपं॑ मिन्वन्तीत्यु च॑ ॥ ३॥ तदु॒ तथा॒ न कु-
र्यात् । अ॒ग्निष्ठ॑मे॒वोछ्र॑येदि॒दं वै यूप॒मुच्छ्रित्या॑धर्यु॒रा प॑रिव्ययणा॒न्नान्व॑र्त्तयत्य॒परिवी॑ता
वाऽए॒ताᳪ रा॒त्रिं वस॑न्ति॒ सा न्वे॒व परि॑चक्षा प॒शवे॒ वै यूप॒मुच्छ्र॑यन्ति प्रात॒र्वै
प॒शूना॒लभ॑न्ते॒ तस्मा॒त् प्रातरे॒वोछ्र॑येत् ॥ ४॥ स य उत्त॑रो॒ऽग्निष्ठा॒त्स्यात् । तमे॒वाग्र
ऽउच्छ्र॑ये॒दथ दक्षि॑णामयोत्त॑रं दक्षि॒णार्द्धमुत्त॑मं तयोदी॑ची भ॑वति ॥ ५॥ अथो॒ऽइत॑र-
थाहुः । दक्षि॑णामे॒वाग्रे॒ऽग्निष्ठा॑दु॒च्छ्रये॒दथोत्त॑रमथ द॑क्षि॒णमुत्त॒रार्द्धमुत्त॑मं तथो हास्यो-
दगेव कर्मानु॒संति॑ष्ठतऽइति॑ ॥ ६॥ स यो वर्षि॑ष्ठः स दक्षि॑णार्ध्यः स्यात् । अथ ह्र-
सी॑यानथ ह्रसी॑यानुत्त॒रार्ध्यो᳭ ह्रसि॑ष्ठस्तथोदी॑ची भ॑वति ॥ ७॥ अथ पत्नीभ्यः पत्नी-
यूप॒मुच्छ्र॑यन्ति । सर्व॑वाय॒न्वेव पत्नी॑यूप उ॒च्छ्रा॑यते त॒द्यत्त्वा॑ष्ट्रं प॒शुमाल॑भते॒ त्वष्टा॒ वै सि-
क्तᳪ रेतो॒ वि क॑रोति॒ तदे॒ष उ॒वैतत्सि॒क्तᳪ रेतो॒ वि क॑रोति मुष्क॒रो भ॑वत्येष वै
प्र॒जनयि॑ता॒ यन्मु॑ष्क॒रस्तस्मान्मु॑ष्क॒रो भ॑वति॒ तं न सᳪस्थापयेत्पर्य॑ग्निकृतमे॒वोत्सृ॑-
का० ३ अ० ७, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / ४६७
अध्याय ७—ब्राह्मण २
जितनी बड़ी वेदी होती है उतनी बड़ी पृथिवी। यूप वज्र होते हैं। इन्हीं वज्रों के द्वारा
वह पृथिवी पर स्वत्व कर लेता है और शत्रुओं को जीत लेता है। इसलिए ११ यूप होते हैं और
बारहवां छिला-छिलाया अलग पड़ा रहता है। वह उसको वेदी के दक्षिण को डालता है। यह
बारहवां अलग क्यों रहता है, इसका कारण आगे दिया है—॥१॥ [शतम् २०००]
यज्ञ करनेवाले देवताओं कोअसुर राक्षसों के आक्रमण का भय हुआ। यहजो ग्यारह यूप
खड़े कर दिये गये वे उन तीरों के समान थे जो छोड़ दिये गये हों, चाहे किसी (शत्रु) के लगे
हों या न लगे हों; या वे उस लाठी के समान थे जो मार दी गई, चाहे वह लगी या न लगी।
और जो यह बारहवां यूप पड़ा हुआ है वह उस तीर के समान है जो खींचा तो गया है परन्तु
अभी छोड़ा नहीं गया। यह उस शस्त्र के समान है जो उठा तो लिया गया लेकिन अभी छोड़ा
नहीं गया। यह यूप वह वज्र था जो दक्षिण की ओर शत्रु राक्षसों को मारने के लिए रक्खा गया
था। इसलिए बारहवां यूप पड़ा रहता है ॥२॥
वह इस यूप को इस मन्त्र से रखता है—"एष ते पृथिव्यां लोकऽआरण्यस्ते पशुः" (यजु०
६।६) —"पृथिवी में तेरा यह स्थान है। जंगली पशु तेरे हैं।" पशु भी हैं और यूप भी। इसलिए
जंगलों के पशुओं का इसकी ओर निर्देश करता है। इसलिए यह भी पशुवाला कहा जाता है।
ये ग्यारह यूप दो तरह के होते हैं। कुछ लोग तो सब यूपों को एक-साथ लगाते हैं, दूसरे दिन के
सोम-याग के लिए। कुछ दूसरे दिन के सोमयोग के लिए एक ही यूप लगाते हैं (अर्थात् कुछ तो
एक-साथ लगाते हैं और कुछ एक-एक करके) ॥३॥
परन्तु ऐसा न करना चाहिए। केवल अग्नि के सम्मुख एक लगाना चाहिए, क्योंकि
इसको लगाकर अध्वर्यु इसको नहीं छोड़ता जब तक कि वह इसको घेरता नहीं (परिव्ययण) ;
और दूसरे यूप रात-भर अपरिवीत रहते हैं। यह दोष होगा क्योंकि यूप पशु के लिए हैं। पशु
(पशुता) की बलि दूसरे दिन प्रातःकाल के समय होगी।' इसलिए औरयूपों को दूसरे दिन प्रातः-
काल ही लगाना चाहिए ॥४॥
अब उसको वह यूप लगाना चाहिए जो अग्नि के सामनेवाले यूप के ठीक उत्तर में है,
फिर दक्षिण को, फिर उत्तर को, अन्तिम दक्षिण की ओर। इस प्रकार यूपों की पंक्ति उत्तर
की ओर होती है ॥५॥
कुछ इसके विरुद्ध भी कहते हैं। अर्थात् पहले अग्नि के सामनेवाले यूप के दक्षिण की
ओर लगाये, फिर उत्तर की ओर, फिर दक्षिण की ओर, अन्तिम उत्तर की ओर। इस प्रकार
उसका उत्तर का काम समाप्त हो जाता है ॥६॥
दक्षिण की ओर सबसे बड़ा होना चाहिए। फिर उससे छोटा, फिर उससे छोटा, जो
सबसे उत्तर में हो वह सबसे छोटा। इस प्रकार पंक्ति उत्तर की ओर हो जाती है ॥७॥
तत्पश्चात् पत्नियों के लिए पत्नी-यूप गाड़ते हैं। पत्नी-यूप सम्पूर्णता के लिए गाड़ा जाता
है। यहाँ त्वष्टा के पशु को पकड़ते हैं, क्योंकि त्वष्टा वीर्य का पोषक है। इस प्रकार वह सींचे हुए
वीर्य को बनाता है। यदि यह पशु अण्डकोषों वाला है तो उत्पादक है। इसकी बलि न दे। इसको
अग्नि के चारों ओर फिराकर छोड़ दे। यदि बलि देगा तो प्रजा का अन्त हो जायगा। परन्तु इस
१. वेदों में पशु-प्रेम के मन्त्र तो जहाँ-तहाँ मिलेंगे, पशु-बलि के कहीं नहीं; अतः 'शतपथ ब्राह्मण'
में 'पशु-बलि' के सन्दर्भ प्रक्षिप्त हैं। — स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती