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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-६, ब्राह्मण-३

त्यु॑रोडाशः पुरो॒दाशो॑ ह॒ वै ना॑मैतद्यत्पुरो॒डाश॒ इति॒ स ए॒ष उ॑भय॒त्राच्यु॑त॒ आ॒ग्ने॒यो
ऽष्टाक॑पालः पुरो॒दाशो॑ भवति ॥ ५॥ स न पौर्णमा॒सँ ह॒विः । नामा॑वास्यम॒ग्नी-
षोमी॑य ए॒व पौर्णमा॒सँ ह॒विः सांना॒य्यमा॑मावा॒स्यं॑ य॒ज्ञ उ॒वैष उ॑भय॒त्रावकॢ॑प्तो ने-
द्य॒ज्ञाद्यानीति॒ न्वे॑व पुरस्ता॑त्पौर्णमा॒सस्य॑ क्रिय॒तऽए॒वमा॑मावा॒स्य॑स्यैतन्नु॒ तयो॒स्मा-
द॒त्र क्रि॑यते ॥ ६॥ य॒द्युऽएन॑मुप॒धावे॑त् । ऋ॒ध्या मा॒ याज॑ये॒त्येतै॑रे॒व याज॑ये॒द्यत्कामा
वाऽए॒तमृषयो॑ऽजुहुवुः स ए॒भ्यः काम॑ः सम॑र्ध्यत॒ यत्कामो ह॒ वाऽए॒तेन य॒ज्ञेन॒ य-
ज॑ते॒ सोऽस्मै॒ काम॑ः समृध्यते॒ यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॑ह्यते॒ऽग्नौ वै तस्यै॑
जुह्व॒त्यग्ना॒ऽउ चेद्बो॑ष्य॒न्त्यात्किमन्यस्यै॑ दे॒वता॑या॒ऽआदिशे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ७॥ अ-
ग्निर्वै सर्वा॑ दे॒वता॑ः । अ॒ग्नौ हि सर्वा॑भ्यो दे॒वता॑भ्यो जु॒ह्वति॒ तद्यथा सर्वा॑ दे॒वता॑
उप॑धावे॒देवं तत्त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ८॥ ॥ शतम् ५०० ॥ ॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वाना॑मद्धा
तमा॑म् । यं वाऽअ॒द्धातमां म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ ९॥ अ॒ग्निर्वै दे॒वानां॑
मृदु॒हृद॑यतमः । यं वै मृदु॒हृद॑यतमं म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑ऽए॒व ॥ १०॥ अ-
ग्निर्वै दे॒वानां॒ नेदि॑ष्ठम् । यं वै नेदि॑ष्ठमुपसर्त॒व्यानां॑ म॒न्ये॑त॒ तमु॑पधावे॒त्तस्माद॒ग्नय॑
ऽए॒व ॥ ११॥ स यदी॑ष्टिं कु॒र्वीत॑ । स॒प्तद॒श सामि॑धेनी॒रनु॑ब्रूया॒ऽपाङ्क्षु दे॒वतां॑ यज-
ति तद्दीक्षि॑त॒रूपं मूर्धन्व॑त्यौ याज्यानुवा॒क्ये॑ स्यातां वार्त्रघ्नावा॒ज्यभा॒गौ वि॒राज्ञी सं-
याज्ये॑ ॥ १२॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ [६. २.] ॥ ॥
त्वष्टु॒र्ह वै पुत्रः । त्रि॒शीर्षा ष॑ड॒क्ष आस॒ तस्य॒ त्रीण्ये॑व मु॒खान्या॑सु॒स्तद्य॒द्विश्व॑रूप
आ॑स॒ तस्मा॑द्वि॒श्वरू॑पो नाम ॥ १॥ तस्य॒ सोम॑पान॒मेवै॒कं मुख॑मास । सु॒रापा॒णमेक॑-
मन्य॒स्माऽअश॑नायै॒कं तमिन्द्रो॑ दिद्वेष॒ तस्य॒ तानि॒ शीर्षाणि॑ प्रचि॒च्छेद॑ ॥ २॥ स य-
त्सोम॑पानमास । ततः कपि॑ञ्जलः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स ब॒भ्रुक॑-इव ब॒भ्रुरि॑व॒ हि सो-
मो राजा॑ ॥ ३॥ अथ॒ यत्सु॒रापा॑णमास । ततः कल॑वि॒ङ्कः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्सोऽभि॑मा-
द्यत्क॑-इव वद॒त्यभि॑माद्यन्निव॒ हि सुरां॑ पी॒त्वा व॑दति ॥ ४॥ अथ॒ यद॒न्यस्मा॒ऽअश॑

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / ११५
यज्ञ को रोचक बनाया, इसलिए इसका नाम 'पुरोडाश' हुआ। पुरोडाश ही पुरोडाश है। अग्नि
के लिए आठ कपालों का पुरोडाश दोनों जगह (अर्थात् दर्श और पूर्णमास यज्ञ में) आवश्यक
है ॥५॥
यह हवि न पूर्णमासी की है न अमावस्या की। पूर्णमासी की हवि अग्नि-षोमीय है और
अमावस्या की सान्नाय्य। दोनों समय यह यज्ञ ही है। कहीं यह यज्ञ हवि-यज्ञ से अलग न रह
जाय, इसलिए यह पूर्णमासी को भी दी जाती है और अमावस्या को भी। यही कारण है कि यह
यहाँ दी जाती है ॥६॥
यदि कोई (गृहस्थी) (अध्वर्यु के पास) जावे और कहे कि मेरे लिए यज्ञ (इष्टि) करो,
तो उसे यज्ञ करना चाहिए। ऋषियों ने जब यज्ञ किया तो जो कुछ कामनायें कीं, वे सब पूरी
हुईं। इसी प्रकार यजमान इष्टि के करने में जो कुछ कामना करता है वह पूरी ही जाती है। जिस
किसी देवता के लिए हवि दी जाती है, उस-उसके लिए अग्नि में दी जाती है। यदि आहुति अग्नि
में दी जाती है तो दूसरे देवता के लिए क्यों घोषित की जाय ? इसलिए यह अग्नि के लिए ही
है ॥७॥
अग्नि ही सब देवता हैं। अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। इसलिए
अग्नि के लिए घोषणा करे, इससे सब देवताओं तक जा सकता है ॥८॥ यहाँ ॥५००॥ समाप्त
हुए ॥
अग्नि ही सब देवताओं में अधिक फल देनेवाला है। जिसको सबसे अधिक फल देनेवाला
समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥६॥
अग्नि देवताओं में सबसे मृदु हृदय अर्थात् नरम दिल वाला है। जिसको सबसे अधिक
नरम दिल वाला समझे उसी के पास जावे। इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥१०॥
अग्नि देवों में निकटतम हैं। जहाँ जाना हो, उनमें जिसको निकटतम समझे वहीं जावे।
इसलिए अग्नि के लिए (यह हवि है) ॥११॥
यदि वह कोई इष्टि करे तो १७ सामिधेनियों को बोले। वह इनको धीरे-धीरे बोले, यही
इष्टि का रूप है। याज्य और अनुवाक्य में 'मूर्धा' शब्द हो। दो आज्य भाग वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र
के लिए हों और विराज छन्द में ॥१२॥
अध्याय ६—ब्राह्मण ३
त्वष्टा के एक पुत्र था। उसके तीन सिर और छः आँखें थीं, तथा तीन मुख थे। उसका
ऐसा रूप था इसलिए उसका नाम विश्वरूप था ॥१॥
उसका एक मुँह सोम पीने के लिए था, एक सुरा पीने के लिए और एक अन्य प्रकार के
भोजन करने के लिए। इन्द्र उससे द्वेष करता था, इसलिए उसने उन सिरों को काट डाला ॥२॥
जो सोम पीने का मुँह था उसमें से चातक पक्षी उत्पन्न हुआ। इसलिए वह भूरा होता
है। सोम राजा भूरा है ॥३॥
और जो मद्य पीने का (मुँह) था उससे गौरय्या (कलविक पक्षी) उत्पन्न हुई, इसलिए
वह लड़खड़ाती आवाज में बोलती है। क्योंकि जो शराब पीता है उसकी आवाज लड़खड़ाने लगती
है ॥४॥
और जो अन्य खाना खानेवाला मुख था उससे तित्तिरी उत्पन्न हुई, इसलिए उसके शरीर

११६ शतपथ ब्राह्मण
नाया॒स । त॒तस्तित्ति॒रिः सम॑भव॒त्तस्मा॒त्स वि॒द्युद्रूपतम॒ इव॒ सत्ये॒व घृ॒तस्तोका॒-इव
तन्मधु॑स्तोका॒-इव त्वत्प॑र्षिध्वाश्रुतिता ए॒वꣳ रूपꣳ हि स तेना॒शनमा॒वय॑त् ॥ ५ ॥ स
त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॑ पु॒त्रमब॑धी॒दिति॒ सो॒ऽपेन्द्र॑मेव॒ सोम॒माज॑ह्रे स॒ यथाऽच्छ सो-
मः प्रसु॒त ए॒वम॑पेन्द्र ए॒वास॑ ॥ ६ ॥ इन्द्रो॑ ह वाऽईक्षां च॑क्रे । इ॒दं वै मा॒ सोमा-
दन्त॑र्यन्तीति स॒ यथा॒ बली॑यान॒बली॑यस ए॒वमनु॑पहूत ए॒व यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्र
आसी॒त्तं भ॒क्षयां च॑कार॒ स हैनं॑ जिहि॒ꣳस॒ सो॒ऽस्य विष्व॒ङ्गेव प्रा॒णेभ्यो॒ दुद्राव मु-
खाद्वै॒वास्य॒ न दु॒द्रावाथ॒ सर्वे॑भ्यो॒ऽन्येभ्यः॑ प्रा॒णेभ्यो॒ऽद्रवत्तद॒दः सौ॑त्रामणीतीष्टि॒स्त-
स्यां तद्व्या॒ख्याय॑ते॒ यथै॒नं दे॒वा अ॑भिषज्य॒न् ॥ ७ ॥ स त्वष्टा॑ चुक्रोध । कु॒विन्मे॒ऽनुप-
हूतः सो॒मम॑भक्षयदि॒ति स स्व॒यमे॒व य॒ज्ञविश॑सं चक्रे स यो द्रो॑णकल॒शे शु॒क्रः प-
रिशि॑ष्ट॒ आसी॒त्तं प्रव॑र्त्तयां च॒कारिन्द्रा॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॒ सो॒ऽग्निमे॒व प्राप्य॒ सम्ब॑भूवाथै॒व
सम्ब॑भूवेत्यु॒ हैक॑ऽआहुः सो॒ऽग्नीषोमा॑वे॒वाभि॒सम्ब॑भूव॒ सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॒ यशः॒ सर्व-
म॒न्नाद्यꣳ सर्वा॒ꣳ श्रीम् ॥ ८ ॥ स यद्वर्त॑मानः सम॑भवत् । तस्मा॒द्वृत्रोऽथ यदपात्स॒म-
भव॒त्तस्मा॒दहि॒स्तं दनु॑श्च दना॒यूश्च॑ मा॒तेव॑ च पि॒तेव॑ च परि॑जगृहतु॒स्तस्माद्दानव इ-
त्याहुः॑ ॥ ९ ॥ अथ॒ यदब्र॑वीदिन्द्र॑शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ । तस्मा॒द्ध हैन॒मिन्द्र॑ ए॒व ज॑घानाथ॑
यद्ध॑ शश्वद॒वक्ष्य॒दिन्द्र॑स्य शत्रुर्वर्ध॒स्वेति॑ शश्वद्ध ह स ए॒वेन्द्र॑म॒हनि॑ष्यत् ॥ १० ॥ अथ॒
यद॑ब्रवीद॒र्धस्वेति॑ । तस्मा॒द्ध ह स्वेषु॒मात्र॑मेव॒ तिर्य॑ङ्र्धत॒ऽइषु॑मात्रं प्राङ्क्सो॒ऽवेवा-
वरं॑ समु॒द्रं द॑धाव॒व पूर्वाꣳ स याव॑त्स आ॒स सहै॑व ताव॒दन्ना॑द॒ आस॑ ॥ ११ ॥ तस्मै॑
ह स्म पूर्वा॒ह्णे दे॒वाः । अशनम॑भि॒हर॑न्ति मध्यान्दि॒ने मनु॑ष्या अपराह्णे पि॒तरः॑ ॥ १२ ॥
स वा॒ऽइन्द्र॒स्तथै॒व नु॒त्तश्च॑रन् । अ॒ग्नीषोमा॒ऽउप॑मन्त्रयां च॒क्रेऽग्नी॑षोमौ यु॒वं वै मम॑
स्थो यु॒वयोर॒हम॑स्मि॒ न यु॒वयोरिषं॒ किं चन॒ कं म॒ऽइमं॑ दस्युं॑ वर्धय

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ५-१४ :शतपथब्राह्मण/ ११७
पर चितकबरे दाग होते हैं। कहीं घी के-से दाग, कहीं शहद के, से दाग, क्योंकि भिन्न-भिन्न रंग
की वस्तुयें थीं जो उसने खाईं ॥५॥
त्वष्टा को क्रोध हुआ। उसने कहा, 'क्या सचमुच मेरे पुत्र को मार डाला?' वह उस
उपेन्द्र सोम (वह सोम, जिसमें इन्द्र को भाग नहीं दिया गया) को ले आया। इस प्रकार यह
सोम निचोड़ा गया, तब वह इन्द्र के भाग से शून्य था ॥६॥
इन्द्र ने सोचा, 'यह मुझे सोम से निकालते हैं!' बस उसने बिना बुलाये ही कलश में जो
शुक्र अर्थात् शुद्ध सोम था पी लिया, जैसे बली पुरुष निर्बलों की चीज पी जाते हैं। उस (सोम)
ने उसको पीड़ा पहुंचाई। वह उसके सब प्राणों से होकर बहने लगा। केवल मुख से न बहा; सब
अन्य प्राणों से बहने लगा। इससे सौत्रामणि इष्टि हुई। उसी में यह बताया जाता है कि देवों ने
उसको किस प्रकार चंगा किया ॥७॥
त्वष्टा को क्रोध आया- 'क्या यह बिना बुलाये ही सोम पी गया?' उसने स्वयं ही यज्ञ
को बिगाड़ दिया। कलश में जो शुद्ध सोम बचा था उसको (अग्नि में) उँडेलकर कहा- 'इन्द्र-
शत्रुर्वर्द्धस्व'—"हे अग्नि तू 'इन्द्र है शत्रु जिसका' ऐसा होकर बढ़।" वह अग्नि में पहुँचते पहुँचते
(मनुष्य-रूप) हो गया। कुछ कहते हैं कि बीच में ही वह 'अग्निषोम' हो गया अर्थात् सब विद्या,
सब यश, सब अन्न और सब श्री ॥८॥
चूंकि यह वर्त्तमान (वृत् धातु का अर्थ बहना है) अर्थात् बहकर उत्पन्न हुआ, इसलिए
'वृत्र' हो गया। चूंकि बिना पैरों के उत्पन्न हुआ, इसलिए अहि (सर्प) हुआ। दनु और दनायु ने
माता-पिता के समान उसे लिया, इसलिए उसको 'दानव' कहते हैं ॥९॥
चूंकि उसने कहा, 'इन्द्र-शत्रु (बहुव्रीहि समास) बढ़ो' इसलिए इन्द्र ने उसको मार
डाला। यदि कहता, 'इन्द्र के शत्रु बढ़ो' तो अवश्य ही वह इन्द्र को मार डालता ॥१०॥
चूंकि उसने कहा, 'बढ़ो', इसलिए वह तीर के बराबर टेढ़ा और तीर के बराबर सामने
बढ़ा। उसने पश्चिमी और पूर्वी समुद्र को पीछे हटा दिया, और जितना वह बढ़ा उसी के अनुसार
उसने भोजन खाया ॥११॥
सबेरे उसको देव खाना देते हैं, दोपहर को मनुष्य और तीसरे पहर को पितर ॥१२॥
जब इन्द्र उसका पीछा कर रहा था तो उसने 'अग्नीषोम' को बुलाया और कहा, 'हे
अग्नि-सोम ! तुम दोनों मेरे हो, मैं तुम दोनों का हूँ। वह तो तुम्हारा कोई नहीं लगता। तुम
उस दस्यु को क्यों बढ़ाते हो? मेरे पास आओ' ॥१३॥
उन दोनों ने उत्तर दिया, 'हमको क्या मिलेगा?' उसने कहा कि ग्यारह कपालों का
पुरोडाश अग्नि-सोम को मिलेगा। इसलिए ग्यारह कपालों का पुरोडाश अग्नि-सोम का होता

११८ शतपथ ब्राह्मण
वति॒ ॥ १४॥ तावे॒नमु॒पाव॑वृततु॒ः । ताव॒नु सर्वे॑ देवाः प्रेयु॒ः सर्वा॑ वि॒द्याः सर्वं॑ य-
शः सर्वमन्नाद्यꣳ सर्वा॒ श्रीस्तेने॒ष्टेन्द्र एतदभवद्यदिदमिन्द्र एष उ पौर्णमासस्य ब-
न्धुः स यो हैवं वि॒द्वाञ्पौर्णमासेन यजतऽ एताꣳ हैव श्रियं गहत्येवं यशो भव-
त्येवमन्नादो भवति ॥ १५॥ तद्धैव खलु हतो वृत्रः । स यथा दृतिर्निष्पीत एवꣳ
संलीनः शिश्ये यथा निर्धूतसक्तुर्भस्त्रैवꣳ संलीनः शिश्ये तमिन्द्रोऽभ्याद्रुद्राव हनि-
ष्यन् ॥ १६॥ स होवाच । मा नु मे प्रहार्षीस्त्वं वै तदेतर्ह्यसि यदहं व्येव मा
कुरु मामुया भूवमिति स वै मेऽन्नमेधीति तथेति तं द्वेधान्वभिनत्तस्य यत्सौम्यं
न्यक्तामास तं चन्द्रमसं चकाराथ यदस्यासुर्यमास तेनेमाः प्रजा उदरेणाविध्यत्तस्मा-
दाहुर्वृत्र एव तर्ह्यन्नाद आसीद्वृत्र एतर्हीतीदꣳ हि यदसावापूर्यतेऽस्माद्वैतच्छो-
कादाप्यायतेऽथ यदिमाः प्रजा अशनमिच्छन्तेऽस्माद्वैतद्वृत्रायोदराय बलिꣳ हरति
स यो हैवमेतं वृत्रमन्नादं वेदान्नादो हैव भवति ॥ १७॥ ता उ हैता देवता ऊचुः ।
या इमा अग्नीषोमावन्वाजग्मुरग्नीषोमौ युवं वै नो भूयिष्ठभाजौ स्थो ययोर्वामिदं
युवयोरस्मानन्वाभजतमिति ॥ १८॥ तौ होचतुः । किमावयोस्ततः स्यादिति यस्यै
कस्यै च देवतायै हविर्निर्वपांस्तद्वां पुरस्तादाज्यस्य यजानिति तस्माद्यस्यै कस्यै च
देवतायै हविर्निर्वपन्ति तत्पुरस्तादाज्यभागावग्नीषोमाभ्यां यजन्ति तन्न सौम्येऽध्वरे
न पशौ यस्यै कस्यै च देवतायै निर्वपानिति ह्यब्रुवन् ॥ १९॥ स ह्वाग्निरुवाच ।
मय्येव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मादग्नौ सर्वेभ्यो देवेभ्यो
जुह्वति तस्मादाहुरग्निः सर्वा देवता इति ॥ २०॥ अथ ह सोम उवाच । मय्येव
वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्बोऽहं मय्याभजामीति तस्मात्सोमꣳ सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति
तस्मादाहुः सोमः सर्वा देवता इति ॥ २१॥ अथ यदिन्द्रे सर्वे देवास्तस्थानाः ।
तस्मादाहुरिन्द्रः सर्वा देवता इन्द्रश्रेष्ठा देवा इत्येतद्ध वै देवास्त्र्येकदे॒वत्या अभ-
वन्स यो हैवमेतद्द्वैकधा हैव स्वानाꣳ श्रेष्ठो भवति ॥ २२॥ द्वयं वाऽइदं न तृ-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १४-२३ शतपथब्राह्मण / ११६
है ॥१४॥
वे दोनों उसके पास चले गये, और उनके पीछे-पीछे सब देवता भी चले गये, सब
विद्यायें, सब यश, सब अन्न, सब श्री भी । इस इष्टि को करके ही इन्द्र वह हो गया जो अब है ।
यह पौर्णमास यज्ञ का महत्व है । जो कोई जानकर पौर्णमास यज्ञ करता है, उसके पास श्री जाती
है, यश होता है और अन्न का भोग करनेवाला होता है ॥१५॥
पीटा हुआ वृत्र अब ऐसी क्षीण दशा में पड़ा था जैसे मशक से पानी निकल जाय,
या सत्तू के थैले में से सत्तू निकल जायें । इन्द्र उसका घात करने के लिए उसकी ओर
झपटा ॥१६॥
वह बोला, 'मुझे मत मार ! तू अब वही है जो मैं पहले था । मेरे दो भाग कर दे । ऐसा
न कर जिससे मेरा अस्तित्व ही न रहे ।' (इन्द्र ने) कहा, 'तू मेरा खाद्य-पदार्थ होगा ।' उसने कहा,
'अच्छा ।' उसके दो टुकड़े कर दिये । उसका जो सौम्य (सोमयुक्त) टुकड़ा था उसका चन्द्रमा
बना दिया, और जो उसका असुर्यं (असुर-युक्त) भाग था उसमें यह प्रजा पेट के रूप में प्रविष्ट
हुई अर्थात् उससे लोगों का पेट बना । इसी से लोग कहा करते हैं कि पहले भी वृत्र अन्न का खाने
वाला है और अब भी, क्योंकि जब यह चाँद पूर्ण होता है तो इसी लोक से भर जाता है । जब यह
प्रजा खाने की इच्छा करती है तो इसी पेट अर्थात् वृत्र को बलि देती है । जो इस वृत्र को अन्न का
खानेवाला जानता है, स्वयं भी अन्न का खानेवाला होता है ॥१७॥
उन देवताओं ने कहा, 'हे अग्नि और सोम, हम तुम्हारे पीछे आये और तुम सबसे अच्छा
भाग ले लेते हो । जो कुछ तुम पाते हो उसमें से हमको भी भाग दो' ॥१८॥
उन देवों ने कहा, 'फिर हमको क्या मिलेगा ?' उन्होंने उत्तर दिया 'जिस किसी देवता
के लिए लोग हवि देंगे, उससे पहले तुमको घी की आहुति देंगे ।' इसीलिए जिस किसी देवता के
लिए हवि देते हैं तो पहले घी की दो आहुतियां अग्नि और सोम के लिए दिया करते हैं । यह
सोम-यज्ञ में नहीं होता, न पशु-यज्ञ में । क्योंकि उन्होंने कहा, 'जिस किसी देवता के लिए आहुति
दें' इत्यादि -॥१९॥
तब अग्नि ने कहा, 'मुझमें ही तुम सबके लिए आहुति देवेंगे, इसलिये मैं तुमको भाग
दूंगा ।' इसीलिए अग्नि में सब देवों के लिए यज्ञ करते हैं । इसीलिए कहा था कि 'अग्नि सब
देवता है' ॥२०॥
अब सोम ने कहा, 'मुझे ये लोग आप सबके लिए आहुति में देंगे । इसलिए मैं तुमको
अपने में भाग दूंगा ।' इसलिए सोम की आहुति सब देवों के लिए दी जाती है । इसीलिए कहा,
'सोम सब देवता है' ॥२१॥
और चूंकि इन्द्र में सब स्थित हैं इसलिए कहते हैं कि इन्द्र सब देवता है । इन्द्र देवताओं
में श्रेष्ठ (उच्च) है । इस प्रकार देव तीन प्रकार से एक देवता के रूप में आ गये । जो इस रहस्य
को समझता है वह अपने आदमियों में श्रेष्ठ हो जाता है ॥२२॥
यह दो प्रकार से होता है, तीसरे से नहीं—एक आर्द्र (गीला), एक शुष्क (सूखा) । जो

१२० शतपथ ब्राह्मण
तीयमस्ति । आर्द्रं॑ चैव शुष्कं॑ च यच्छुष्कं॒ तदा॑ग्नेयं यदार्द्रं॒ तत्सौ॒म्यमथ॒ यदिदं॑ द्वयमे॒-
वाथ॒ किमेता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइत्य॒ग्नीषोम॑यो॒रेवाज्य॑भागाव॒ग्नीषोम॑यो॒रूपाꣳशुयाजो॒ऽग्नीषो-
मयोः॑ पुरोडा॒शो यदृत॒ एक॑तमेनैवेदꣳ सर्व॑माप्नोत्यथ॒ किमेता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइत्य॒ग्नीषो-
मयो॒र्ह्वेवैताव॑ती विभू॑तिः प्र॒जातिः॑ ॥ २३॥ सूर्य्य॑ ए॒वाग्नेयः॑ । च॒न्द्रमाः॑ सौम्यो॒ऽहरे॒-
वाग्नेयꣳ रात्रिः॑ सौम्या॒ य ए॒वापूर्य्य॑ते॒ऽर्धमा॒सः स आ॑ग्ने॒यो यो॒ऽपक्षीय॑ते॒ स सौम्यः॑
॥ २४॥ आज्य॑भागाभ्यामेव । सूर्याचन्द्रमसावाप्नोत्युपाꣳशुयाजेनैवाहोरत्रे॒ऽआप्नो॑ति
पुरोडाशे॒नैवार्धमा॒सावाप्नो॑तीत्यु॒ ह्वैकऽआहुः॑ ॥ २५॥ तदु॑ होवाचासु॒रिः । आज्य॑-
भागाभ्यामेवातो॒ यत॑मे वा॒ यत॑मे वा॒ द्वेऽआप्नो॑त्युपाꣳशुयाजे॒नैवातो॒ऽहोरा॒त्रे॒ऽआ-
प्रोति॑ पुरोडा॒शेने॑वातो॒ऽर्धमा॒सावाप्नो॑ति॒ सर्वं॑ म॒ऽआप्त॑मस॒त्सर्वं॑ जि॒तꣳ सर्वे॑ण वृ॒त्रꣳ
हनानि॒ सर्वे॑ण द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यꣳ हनानीति॒ तस्मा॑द्वा॒ऽएता॒वत्क्रिय॑त॒ऽइति॑ ॥ २६॥
तदा॑हुः । किमि॒दं जा॒मि क्रि॑यते॒ऽग्नीषोम॑योरे॒वाज्य॑स्या॒ग्नीषोम॑योः पुरोडा॒शस्य॒ यद्-
नलक्षि॑तं॒ तेन॑ जा॒मीत्यने॑न॒ ह्वेवाज्ञा॒प्याज्य॒स्येत॑रं पुरोडा॒शस्येत॑रं॒ तद॒न्यदि॑वे॒त-
रमन्य॒दिवे॑तरं भवत्यृ॒चम॑नू॒च्य जु॑षा॒णेन॑ यजत्यृ॒चम॑नू॒च्य॒र्चा य॑जति॒ तद॒न्यदि॑वे॒तर॑म-
न्य॒दिवे॑तरं भवत्य॒नेन॑ ह्वेवाज्ञा॒ग्युपाꣳ॑शुया॒ज्यस्य॑ यजत्यृ॒चैः पुरोडा॒शस्य॑ स यदु॑-
पांꣳशु॒ तत्प्रा॑जाप॒त्यꣳ रूपं॒ तस्मा॒त्स्याम॑नु॒ष्टुभ॑मनुवा॒क्याम॒न्वाह॑ वा॒ग्यनु॒ष्टुब्वान्धि॑
प्र॒जाप॑तिः ॥ २७॥ ए॒तेन॒ वै दे॒वाः । उपाꣳ॑शुया॒जेन॒ यंयम॑सुरा॒णामका॑मयन्त॒ तमु॑पा-
वर्त्स्य॒ वज्रे॑ण वषट्का॒रेणाघ्नꣳ॑स्तथो॒ऽह्रवैष॑ ए॒तेनो॑पाꣳशुया॒जेन॑ पा॒प्मानं॑ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑-
व्यमुपावर्त्स्य॒ वज्रे॑ण वषट्का॒रेण॑ हन्ति॒ तस्मा॑दुपाꣳशुया॒जं य॑जति ॥ २८॥ स वा॒ऽऋच॑-
मनू॒च्य जु॑षा॒णेन॑ यजति॒ तद्वि॒न्मा अ॑न्यत॒स्तोद॑त्ताः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽस्थि॒ ह्यृगस्थि॑
हि द॒न्तो॒ऽन्यत॑र॒तो ह्ये॑तद॒स्थि करो॑ति ॥२९॥ अथ॒र्चम॑नू॒च्य॒र्चा य॑जति । तद्वि॒न्मा
उ॒भय॑तोदत्ताः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽस्थि॒ ह्यृगस्थि॑ हि द॒न्त उ॒भय॑तो॒ ह्येतद॒स्थि क॑रोत्ये॒-
ता वा॒ऽइमा द्वय्यः॑ प्र॒जा अ॑न्यत॒रतो॑दत्ताश्चै॒वोभय॑तोदत्ताश्च॒ स यो ह्वैवं वि॒द्वानग्नी-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० २३-३० शतपथब्राह्मण / १२१
सूखा है वह अग्नि का; जो गीला है वह सोम का। (यहां एक प्रश्न उठता है कि) यदि दो ही
प्रकार से है तो इतना खटराग क्यों किया जाता है कि अग्नि-सोम के लिए दो घी की आहुतियां,
अग्नि-सोम के लिए दो मन्द स्वर के याज। अग्नि-सोम के लिए पुरोडाश ? जब इनमें से एक के
द्वारा ही सब प्राप्ति हो सकती है तो इतना झमेला क्यों किया जाता है ? (इसका उत्तर यह है
कि) अग्नि और सोम को उत्पन्न करनेवाली विभूति ऐसी ही है ॥२३॥
सूर्य अग्नि का है, चन्द्रमा सोम का। दिन अग्नि का है और रात सोम की। बढ़ता हुआ
आधा मास अग्नि का है और घटता हुआ सोम का ॥२४॥
कुछ लोगों का कहना है कि दो घी की आहुतियों से सूर्य और चांद की प्राप्ति होती है,
मन्द स्वर प्रयाजों से दिन-रात की और पुरोडाश से अर्द्धमास की प्राप्ति होती है ॥२५॥
परन्तु आसुरि का कहना है कि घी की दो आहुतियों से किन्हीं दो को प्राप्त होता है,
मन्द स्वर के प्रयाजों से दिन-रात को प्राप्त होता है और पुरोडाश से दोनों अर्द्धमासों (पक्षों)
को प्राप्त होता है। 'सब मुझे प्राप्त हो गया। मैंने सब जीत लिया। सबसे वृत्त को मार डालूं।
सबसे अहितकारी शत्रु को मार डालूं।' वह ऐसा विचारता है। इसलिए यह सब-कुछ किया
जाता है ॥२६॥
इस पर कुछ लोगों का आक्षेप है कि एक ही बात का दुहराना क्यों ? अग्नि-सोम की
आज्याहुति और अग्नि के पुरोडाश के बीच में जो कुछ किया जाता है वह 'जामि' अर्थात् एक ही
बात का दुहराना मात्र है। परन्तु (इसका उत्तर यह है कि) इसी के द्वारा तो दुहराने के दोष से
बचते हैं। एक आज्य है, दूसरी पुरोडाश। इस प्रकार एक दूसरे से भिन्न है। एक बार ऋचा को
पढ़कर 'जुषाण' से यज्ञ करते हैं, दूसरी बार ऋचा को बोलकर ऋचा बोलते हैं। इस प्रकार एक
का दूसरे से भेद हो जाता है। 'जामि' (दुहराने के) दोष से इस प्रकार भी बचते हैं— आज्य
आहुति के लिए मन्द स्वर से पढ़ते हैं और पुरोडाश के लिए उच्च स्वर से। जो मन्द स्वर से
बोला जाता है वह प्रजापति का रूप है। इसलिए इसको अनुष्टुभ् छन्द में पढ़ते हैं। वाणी ही
अनुष्टुभ् है। वाणी प्रजापति है ॥२७॥
इसी मन्द उच्चारण से देवों ने वषट्काररूपी वज्र से जिस-जिस असुर को चाहा उसके
पास चुपके से जाकर मार डाला। इसी प्रकार यह (यजमान) भी मन्द उच्चारण से वषट्कार-
रूपी वज्र के द्वारा जिस पापी अहितकारी शत्रु को चाहता है उसके पास चुपके से जाकर उसको
मार डालता है। इसीलिए मन्द स्वर से उच्चारण किया जाता है ॥२८॥
वह ऋचा को पढ़कर 'जुषाण' को पढ़ता है। इससे एक ओर के दाँतवाली प्रजा
उत्पन्न होती है। ऋक् हड्डी है। दाँत भी हड्डी है। इस प्रकार एक ओर की हड्डी उत्पन्न करता
है ॥२६॥
अब ऋचा को पढ़कर फिर एक और ऋचा को बोलता है। इससे दोनों ओर के दाँत-
वाली प्रजा उत्पन्न होती है। ऋक् हड्डी है। दाँत भी हड्डी है। इस प्रकार वह दोनों ओर हड्डी
उत्पन्न करता है। ये प्रजाएँ दो प्रकार की होती हैं— एक वह जिनके दाँत एक ओर हों, एक वह
जिनके दाँत दोनों ओर हों। जो अग्नि और सोम की उत्पन्न करनेवाली शक्ति को इस प्रकार

१२२ शतपथ ब्राह्मण
ष्टोमयोः प्र॒जा॑तिं प्र॒जा॑ति ब॒हुर्हैव प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भवति ॥३०॥ स वै पौर्णमासिनो-
प॒वत्स्यन्‌॑ । न॒ सत्रा सुहित-इव स्यात्तन्नेदु॑दरमुत्सूर्यं वि॒नात्या॑हुतिभिः प्रातर्दे॒वेभ्य॒
ऽ उत्पौ॑र्णमा॒सस्योपचारः॑ ॥३१॥ स वै संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् । संप्र॑ति वृ॒त्रं हनानि सं-
प्रति॑ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं हनानीति॑ ॥३२॥ स वाऽउत्तरामेवोप॑वसेत् । स॒मिव वा
ऽए॒ष क्र॑मते यः संप्र॒त्युप॒वस॑त्यनड्वा वै संक्रान्तयोर्यद॒तरो वेतर॑मभिभव॒तीत॑रो
वेत॑रमथ य उत्तरामुप॒वस॑ति यथा पु॒राञ्च॒मावृत्तं॑ संपि॑ष्यादे॒वन्तद्यत्प्रत्याल॒भमान॒ꣳ सो॒-
ऽन्यतोघात्येव स्यादे॒वं तद्य उत्तरामुप॒वस॑ति ॥३३॥ स वै संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् । य-
था वाऽअन्यस्य कृत॒ꣳ संपि॑ष्यादे॒वं तद्य उत्तरामुप॒वस॑ति सो॒ऽन्यस्यै॒व कृ॒ताम॒नु॑क॒-
रो॒ऽन्यस्योप॑ावसायी भवति तस्मात्संप्र॒त्ये॒वोप॑वसेत् ॥३४॥ प्र॒जाप॑ते॒र्ह वै प्र॒जाः
ससृ॑जानस्य । पर्वा॑णि विसस्रंसुः स वै सं॑वत्स॒र ए॒व प्र॒जाप॑तिस्तस्यैतानि पर्वा॑-
ण्यहोरा॒त्रयोः सं॑धी पौर्णमा॒सी चा॑मावा॒स्या च॒र्तुमु॑खानि ॥३५॥ स विस्रस्तैः पर्व॑-
भिः । न शशाक सं॑हातुं तम॑तै॒र्हवि॑र्य॒ज्ञैर्दे॒वा अ॑भिषज्यन्नग्निहो॒त्रेणै॑वाहोरा॒त्रयोः
सं॑धी तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒मदधुः पौर्णमा॒सेन चैवा॑मावास्ये॒न च पौर्णमा॒सीं चा॑मा-
वा॒स्यां च॒ तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒मदधुश्चातुर्मा॒स्यैरे॒वर्तुमु॑खानि तत्पर्वा॑भिषज्यंस्तत्स॒-
मदधुः ॥३६॥ स सं॑हिति॑ः पर्व॑भिः । इ॒दमन्नाद्यम॒भ्युत्त॑स्थौ यदि॒दं प्र॒जाप॑तेर॒न्नाद्यं॒
स यो है॒वं वि॒द्वात्संप्र॒त्युप॑वसति संप्र॑ति हैव प्र॒जाप॑तेः पर्व॑ भिषज्यत्यव॑ति हैनं
प्र॒जाप॑तिः स ए॒वमे॒वान्नादो॑ भवति य ए॒वं वि॒द्वात्संप्र॒त्युप॑वसति तस्मात्संप्र॒त्ये॒-
वोप॑वसेत् ॥३७॥ चक्षु॑षी ह वाऽए॒ते य॒ज्ञस्य यदा॑ज्यभागौ । तस्मात्पुरस्ता॑ज्जुह्वो-
ति पु॒रस्ता॒द्धीमे चक्षु॑षी तत्पु॒रस्ता॑दे॒वैतच्चक्षु॑षी दधाति॒ तस्मा॑दि॒मे पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी
॥३८॥ उत्तरा॒र्धपूर्वार्धे हैके । आग्ने॒यमाज्य॑भागं जुह्वति दक्षिणा॒र्धपूर्वार्धे सौम्यमा॒-
ज्यभागमेतत्पुरस्ता॑च्चक्षु॑षी दध्म इति॒ वद॑न्तस्तदु॒ तदवि॑ज्ञान्यमिव ह॒वीꣳषि ह वा
ऽआ॒त्मा य॒ज्ञस्य स यदे॑व पु॒रस्ता॑द्ध॒विषां॑ जु॒होति तत्पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी दधाति यत्रो

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० २०-३६ शतपथब्राह्मण / १२३
समझकर यज्ञ करता है वह बहुत प्रजा और पशु से युक्त होता है ॥३०॥
पौर्णमास उपवास में वह भरपेट न खाये। ऐसा करने से वह पेट को जो आसुरी है
क्षीण कर देता है, और दूसरे दिन प्रातःकाल आहुतियों से देवों वाले भाग को (पुष्ट कर देता
है)। अब पौर्णमास (यज्ञ) इस प्रकार होता है ॥३१॥
वह उसी समय (पौर्णमास को) उपवास कर सकता है, यह कहकर कि मैं अभी वृत्र को
मारूँगा, मैं अभी अहितकारी शत्रु को मारूँगा ॥३२॥
दूसरे दिन भी उपवास कर सकता है। उसी समय उपवास करने से वह 'संम + क्रमते'
अर्थात् किसी से मुठभेड़ करता है। दो मुठभेड़ करनेवालों में कौन जाने कौन जीत जाय !
दूसरे दिन उपवास करने से मानो वह शत्रु को पीछे से मारता है, पूर्व इसके कि वह फिर-
कर आक्रमण कर सके। इस प्रकार जो दूसरे दिन उपवास करता है वह 'अन्यतो घाति' अर्थात्
एक ओर मारता है ॥३३॥
(ऊपर दो बातें दी हैं-एक तो उसी समय अर्थात् पूर्णमासी के दिन ही उपवास करना,
दूसरा दूसरे दिन उपवास करना। इसमें पहली को ठीक बताया गया है)। उसको तभी उपवास
करना चाहिए, क्योंकि जो दूसरे दिन उपवास करता है वह उसके समान है जो किसी दूसरे के
द्वारा मारे हुए को मारता है, या किसी दूसरे के किये हुए का अनुकरण करता है, दूसरे के
पीछे चलता है। इसलिए उसी दिन उपवास करे ॥३४॥
प्रजापात जब प्रजा बना चुका तो उसके जोड़ शिथिल हो गये। संवत्सर प्रजापति है
और उसके जोड़ हैं रात-दिन की संधियाँ, पूर्णमासी, अमावस्या और ऋतुओं का आरम्भ ॥३५॥
वह थके हुए जोड़ों से उठ नहीं सकता था। देवों ने उसको इन हवियों और यज्ञों द्वारा
चंगा किया। अग्निहोत्र द्वारा उन्होंने रात-दिन की संधिवाले जोड़ को चंगा किया, और पौर्ण-
मास तथा अमावस्या यज्ञ से पूर्णमासी और अमावस्या के जोड़ को ठीक किया, एवं चातुर्मास्य
यज्ञ से उन्होंने ऋतु के आरम्भवाले जोड़ों को चंगा किया ॥३६॥
इन ठीक हुए जोड़ों से उसने अपने अन्न को पाया, उसको जो प्रजापति के लिए है। जो
इस रहस्य को जानकर उसी समय उपवास करता है वह प्रजापति के जोड़ों को चंगा करता है
और प्रजापति उसकी रक्षा करता है। जो इस भेद को जानकर उसी समय उपवास करता है वह
अन्न खानेवाला होता है। इसलिए उसी समय (पूर्णमासी को ही) उपवास करे ॥३७॥
ये जो दो आज्य भाग आहुतियां हैं वे यज्ञ की दो आँखें हैं। इसलिए उनको पहले देता
है क्योंकि दो आँखें सामने होती हैं। इस प्रकार वह दोनों आँखों को सामने रखता है। इसीलिए
आँखें सामने होती हैं ॥३८॥
कुछ लोग अग्नि की आहुति उत्तरार्द्ध पूर्व की ओर और सोम की आहुति दक्षिणार्द्ध पूर्व
की ओर देते हैं, यह समझकर कि हम दोनों आँखों को सामने रखते हैं; परन्तु यह बात समझ में
नहीं आती, क्योंकि हवि यज्ञ की आत्मा है; जब वह हवियों से पहले आहुति देता है तो आँखों को
सामने रखता है। इसलिए आहुतियों को उस स्थान पर देवे जहाँ आग सबसे अधिक जलती हो,