सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-४

६३८ शतपथ ब्राह्मण
या॒त् । आ॒ग्रय॒णं गृ॒हीत्वा॒ स प्रा॒तःस॒वने॒ गृही॒त ऐत॒स्मात्कालादुपशेते॒ तदे॒नाग्
सर्वा॑णि सव॒नान्यति॑रिक्थति॑ ॥७॥ माध्य॑न्दिने वैना॑ग् सव॑ने गृह्णीयात् । आग्रयणं
गृ॒हीत्वा॒ सोऽए॒षा मीमाग्॒सैव प्रा॒तःस॒वन॒ऽएवैने॑ गृह्णीयादाग्रयणं गृहीत्वा स प्रा-
तःस॒वने॒ गृही॒त ऐत॒स्मात्कालादुपशेते॑ ॥८॥ अथातो गृह्णात्येव । आति॑ष्ठ वृत्र-
ह॒न्रथं॑ यु॒क्ता ते॒ ब्रह्म॑णा॒ हरी॑ । अ॒र्वाची॒नग् सु॑ ते॒ मनो॒ ग्रावा॑ कृणोतु वग्गुना ।
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन॒ऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा षोडशिन॒ऽइति॑
॥९॥ अनू॑पा वा । यु॒ङ्क्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा । अथा॑ न इन्द्र
सोमपा गि॒रामु॑पश्रु॒तिं च॑र । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन॒ऽए॒ष ते॒ यो-
नि॒रिन्द्रा॑य वा षोडशिन॒ऽइति॑ ॥१०॥ अथैत्य स्तोत्र॒मुपा॑करोति । सोमो॒ऽत्य॑रे-
च्युपावर्त॑ध॒मित्यत्ये॒वैन॑मे॒तद्रे॑चयति॒ तं वै पु॒रास्त॑मया॒दुपा॑करोत्य॒स्तमि॑ते॒ऽनुश॑ग्ंसति
तदे॑नेनाहोरा॒त्रे संद॑धाति॒ तस्मा॑त्पु॒रास्त॑मया॒दुपा॑करोत्य॒स्तमि॑ते॒ऽनुश॑ग्ंसति ॥११॥
ब्राह्मणम् ॥४ [५. ३.] ॥ ॥
सर्वे॑ ह॒ वै देवाः॑ । अग्रे॑ सदृशा आसुः सर्वे॑ पुण्या॒स्तेषाग् सर्वे॑षाग् सदृशानाग्
सर्वे॑षां पु॒ण्यानां॒ त्रयो॑ऽकामयन्तातिष्ठावानः स्याम॒ित्यग्नि॒रिन्द्रः॒ सूर्यः॑ ॥१॥ ते॒ऽर्चन्तः॑
श्रा॒म्यन्त॑श्चेरुः । त॒ऽएतानतिग्राह्यान्ददृशुस्तानत्यगृह्णत तद्यदेनानत्यगृह्णत तस्मा-
द॑तिग्राह्या॒ नाम॒ तेऽति॑ष्ठावानोऽभव॒न्यथैत॒ऽएतदति॑ष्ठेवातिष्ठेव ह॒ वै भ॑वति॒ य-
स्यै॒वं वि॒दुष एतान्य॒हान्गृह्णन्ति॑ ॥२॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ऽग्नौ वर्च॑ आस । यदि॒द-
म॒स्मिन्वर्चः॒ सो॑ऽकामय॒तेदं मयि॒ वर्चः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ त-
तो॒ऽस्मि॑न्ने॒तद्वर्च॑ आस ॥३॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ऽइन्द्र॒ऽओज॑ आस । यदि॒दम॒स्मि-
न्नोजः॒ सो॑ऽकामय॒तेदं मय्योजः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ ततो॒ऽस्मि-
न्नै॒तदोज॑ आस ॥४॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ सूर्ये॒ भ्राज॑ आस । यदि॒दम॒स्मिन्भ्राजः॒ सो
ऽकामय॒तेदं मयि॒ भ्राजः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ ततो॒ऽस्मि॑न्ने॒तद्भ्राज॑

का० ४, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० ७-११ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६३६
इस समय से रक्खा ही रहता है। इस प्रकार वह इसको सब सबनों से बढ़ा देता है ॥७॥
या आग्रयण के लेने के पीछे दोपहर के सबन में इसको लेवे। यह तो मीमांसा मात्र है।
लेना तो प्रातःसवन में ही चाहिए, आग्रयण के पश्चात् । वह प्रातःसवन में लिये जाने के पश्चात्
रक्खा ही रहता है ॥८॥
वह उसमें से इस मंत्र से लेता है-"आतिष्ठ वृत्रहन्त्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी। अर्वाचीनँ
सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय
त्वा षोडशिने" (यजु० ८।३३, ऋ० १।८४।३)-"हे वृत्र को मारनेवाले, रथ पर चढ़। तेरे
घोड़े मंत्रों द्वारा जोत दिये गए। पत्थर (सोम पीसने का) अपने शब्द द्वारा तेरे मन को इधर
खींचे। तू आश्रय के लिए लिया गया है षोडशी इन्द्र के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। इन्द्र
षोडशी के लिए तुझको" ॥६॥
या इस मंत्र से-"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषण। कक्ष्यप्रा। अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरा-
मुपश्रुतिं चर। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने"
(यजु० ८।३४, ऋ० १।१०।३) -"बड़े केशवाले, प्रबल और लगामवाले घोड़ों को जोतो। हे
सोम या इन्द्र ! हमारी वाणी सुनने के लिए यहाँ आ। तू आश्रय के लिए लिया गया है इन्द्र
षोडशी के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। तुझको इन्द्र षोडशी के लिए" ॥१०॥
अब लौटकर स्तोत्र पढ़ता है, 'सोम सबके ऊपर हो गया। लौट आओ।' वस्तुतः वह इसे
ऊपर बढ़ा देता है (षोडशी ग्रह के द्वारा) । सूर्यास्त से ही पढ़ता है। सूर्यास्त के पीछे शस्त्र पढ़ा
जाता है। वह सूर्यास्त से पहले इसको पढ़ता है और सूर्यास्त के पीछे शस्त्र-पाठ करता है। इस
प्रकार वह रात और दिन को मिला देता है ॥११॥
अतिग्राह्या ग्रहाः
अध्याय ५-ब्राह्मण ४
पहले सब देव एकसमान थे। सब भले थे। उन सब एक-से और पुण्य-देवों में से तीन
अर्थात् अग्नि, इन्द्र और सूर्य ने चाहा कि हम बढ़ जावें ॥१॥
वे पूजा और श्रम करते रहे। उन्होंने इन अतिग्राह्य (ग्रहों) को देखा और उनको
(अति + ग्रह) अधिक निकाल लिया। इसलिए इनका नाम 'अतिग्राह्य' पड़ा। वे बढ़ गये जैसे
कि अब तक बढ़े हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इन 'अतिग्राह्य' ग्रहों को निकालता है वह
बढ़ जाता है ॥२॥
अग्नि में पहले वह तेज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें तेज हो जाय । उसने
इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें यह तेज आ गया ॥३॥
इन्द्र में पहले वह ओज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय ।
उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें ओज है ॥४॥
सूर्य में पहले वह चमक न थी जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय।
उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें चमक है। वस्तुतः इस

६४० शतपथ ब्राह्मण
आसितानि ह वै तेजाग्ꣳस्येतानि वीर्याण्यात्मन्धत्ते यस्यैवं विदुष एतान्यहान्गृह्य-
न्ति ॥५॥ तान्वै॒ प्रातःसवने गृह्णीयात् । आग्रय॒णं गृहीत्वा॒त्मा वा॒ऽआग्रय॒णो ऽङ्ग॒
वा॒ऽइ॒दमात्मन॒ एकैकमतिरिक्तं॒ क्लोमहृदयं॒ यद्य॒वत् ॥६॥ माध्यन्दिने वैनान्त्सव॒-
ने गृह्णीयात् । उ॒क्थं गृहीत्वोपाकरिष्यन्वा पूतभृतोऽयग्ꣳ ह॒ वा॒ऽअग्ने॒योषो॒ऽनि-
रुक्त आत्मा यदुक्थ्यः सो॒ऽएषा॒ मीमाग्ꣳसै॒व प्रातःसवन॒ऽए॒वैना॒न्गृह्णीयादाग्रय॒णं
गृहीत्वा॒ ॥७॥ ते मा॒हेन्द्र॒स्यैवानु॒ होमग्ꣳ हूयन्ते । एष वा॒ऽइन्द्रस्य निष्केवल्यो
ग्रहो॒ यन्माहेन्द्रो॒ऽप्यस्यैतन्निष्केवल्यमेव॒ स्तोत्रं॒ निष्केवल्यग्ꣳ शस्त्रमिन्द्रो॒ वै यज॒-
मानो यजमानस्य वा॒ऽएते॒ कामाय गृह्यन्ते तस्मान्माहेन्द्रस्यैवानु॒ होमग्ꣳ हूयन्ते
॥८॥ अथातो गृह्णात्येव॒ । अग्ने॒ पव॑स्व स्व॒पा अ॒स्मे वर्चः॑ सु॒वीर्य॑म् । दध॒द्रयिं म॑-
यि॒ पोष॑म् । उपयामगृहीतोऽस्यग्नये त्वा वर्चस॒ऽएष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे
॥९॥ उत्ति॑ष्ठन्नो॒ सा । सह॑ पी॒वी शिप्रै॒ऽअवे॑पयः । सोम॑मिन्द्र चमू॒सुतम्॑ । उपया-
मगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौजस॒ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वौज॑से ॥१०॥ अदृ॑श्रमस्य केत॒-
वो॒। वि र॒श्मयो॒ जना॑ग्ꣳ अनु॑ । भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो यथा । उपयामगृहीतोऽसि सू-
र्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजायेति ॥११॥ तेषां भक्षः । अग्ने व-
र्चस्विन्वर्चस्वाग्ꣳस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासमिन्द्रौजस्विन्नौजस्त्वाग्ꣳस्त्वं देवे-
ष्वस्यौजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासग्ꣳ सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं
मनुष्येषु भूयासमित्येतानि ह वै भ्राजाग्ꣳस्येतानि वीर्याण्यात्मन्धत्ते यस्यैवं विदुष
एतान्यहान्गृह्णन्ति ॥१२॥ तान्वै पृष्ठ्ये षडहे गृह्णीयात् । पूर्वे त्र्यह॒ऽआग्नेयमेव
प्रथमेऽहन्नेन्द्रं द्वितीये सौर्यं तृतीयऽएवमेवान्वहम् ॥१३॥ तानु॒ हैकऽउत्तरे
त्र्यहे गृह्णन्ति । तत्तथा॒ न कुर्यात्पूर्व॒ऽएवैनांस्त्र्यहे गृह्णीयाद्यद्युत्तरे त्र्यहे गृह्णी-
यात्स्यात्पूर्व॒ऽएवैनांस्त्र्यहे गृहीत्वायोत्तरे त्र्यहे गृह्णीयादेवमेव यथापूर्वं विष्वञ्चिति
सर्वपृष्ठऽएकाह॒ऽएव गृह्यन्ते ॥१४॥ ब्राह्मणम् ॥५ [५.४.]॥ ॥

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ६४१
रहस्य को समझकर जिसके लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं वह इन तेज, पराक्रमोंवाला हो जाता
है ॥५॥
इनको प्रातःसवन में लेना चाहिए, आग्रयण ग्रह को लेने के पीछे। आग्रयण आत्मा है।
अन्य इसके एक-एक करके अतिरिक्त अंग हैं जैसे क्लोम (फेफड़े) और हृदय तथा अन्य ॥६॥
या इन ग्रहों को दोपहर के सवन में पूतभृत् में से लेना चाहिए, उक्थ्य ग्रह को लेने के
पीछे अथवा स्तोत्र पढ़ने के समय (उपाकरिष्यन्) । उक्थ्य इसका अनिरुक्त आत्मा है। परन्तु
यह तो मीमांसा मात्र है। वस्तुतः इसको आग्रयण के पीछे प्रातःसवन में ही लेना चाहिए ॥७॥
माहेन्द्र ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है। यह जो माहेन्द्र ग्रह है, इन्द्र का निष्के-
वल्य (अकेला या अपना निज का) ग्रह है। इसी प्रकार स्तोत्र तथा शस्त्र भी इन्द्र के अपने निज
के (निष्केवल्य हैं।) यजमान इन्द्र है, उसी के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं। इसलिए माहेन्द्र
ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है ॥८॥
इन ग्रहों को इस प्रकार निकालता है (पहला इस मंत्र से)-"अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे
वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् । उपयामगृहीतोऽस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा
वर्चसे" (यजु० ८।३८, ऋ० ६।६६।२१)- "हे अग्नि, अपने कार्य में दक्ष, तू पवित्र हो, मुझे
तेज और पराक्रम दे। धन और पुष्टि दे। तू आश्रय के लिए लिया गया है अग्नि के लिए तुझे,
तेज के लिए। यह तेरी योनि है। अग्नि के लिए तुझको, तेज के लिए तुझको" ॥९॥
दूसरा इस मंत्र से-"उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे ऽ अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ।"
उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौ जस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे" (यजु० ८।३६, ऋ० ८।७६।१०)
"हे इन्द्र ! अपने ओज के साथ ग्रह में निकाले हुए सोम को इस प्रकार पिया है कि ठोढ़ी आदि
काँप गए हैं। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र के लिए ओज के साथ। यह तेरी योनि
है। तुझे इन्द्र के लिए, ओज के लिए" ॥१०॥
तीसरा इस मंत्र से- "अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँर ऽ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो
यथा । उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय" (यजु० ८।४०,
ऋ० १।५०।३) - "जैसे तेजयुक्त अग्नियां दिखाई देती हैं उसी प्रकार इसके केतु और रश्मियां
चमकें। तुझे आश्रय के लिए लिया गया। सूर्य के लिए तुझको, चमकनेवाले के लिए तुझको। यह
तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको" ॥११॥
अब सोम-पान इस प्रकार है (पहला) - "अग्ने वर्चस्विन् वर्चस्वांस्त्वं देवेष्वसि
वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।३८) - "हे वर्चस्वी अग्नि ! तू देवों में वर्चस्वी है।
मैं मनुष्यों में वर्चस्वी हो जाऊं।" (दूसरा) - "इन्द्रौजस्वीञ्जिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु
भूयासम्" (यजु० ८।३६) - "हे ओजवाले इन्द्र ! तू देवों में ओजवाला है। मैं मनुष्यों में ओजिष्ठ
हो जाऊँ।" (तीसरा) - "सूर्य्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्"
(यजु० ८।४०) - "हे तेजयुक्त सूर्य ! तू देवों में तेजयुक्त है। मैं मनुष्यों में तेजयुक्त हो जाऊँ।"
इस रहस्य को जाननेवाले जिस मनुष्य के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं उसके लिए ये ऋत्विज्
उसमें तेज और पराक्रम की स्थापना करते हैं ॥१२॥
इनको पृष्ठ्य षडह (छः दिन षडह होता है) के पहले तीन दिनों में निकालना चाहिए,
अर्थात् अग्नि का पहले दिन, इन्द्र का दूसरे दिन और सूर्य का तीसरे दिन। इस प्रकार एक-एक
प्रतिदिन ॥१३॥
कुछ लोग इनको पिछले तीन दिन में निकालते हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए। इनको
पहले तीन दिन में ही निकालना चाहिए। यदि पिछले तीन दिनों में ही निकालने की इच्छा हो
तो पहले इनको पहले तीन दिन में निकाल ले और फिर पिछले तीन दिन में। 'विश्वजित् सर्व-
पृष्ठ' में ये तीनों ग्रह यथाक्रम एक ही दिन में निकाले जाते हैं ॥१४॥