शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-४
१०४ शतपथ ब्राह्मण
वि॒ष्ठितमे॒वैतद्य॒त्सर्वं॑ य॒ज्ञꣳ संस्थापय॑ति॒ तस्मा॑द्यद॒त ऊ॒र्ध्वं वि॒ल्लोम य॒ज्ञे क्रि॒येत
न तदाद्रि॑येत॒ सं॑स्थितो मे य॒ज्ञ इति॑ ह वि॒द्यात् सैष य॒ज्ञो यात॑याम॒ एवास॒ यथा॑
व॒षट्कृ॑तं॒ हुतं॒ स्वाहा॑कृतम् ॥ २३॥ ते देवा॒ अका॑मयन्त । कथं॒ न्वि॒मं य॒ज्ञं पु-
नरा॒प्याये॒माया॑तयामं कुर्याम तेना॑यातयाम्ना॒ प्रच॑रे॒मेति॑ ॥ २४॥ स य॒ज्जुह्वा॒माज्यं॑
प॒रिशि॑ष्टमासी॒त् । येन॒ य॒ज्ञंᳵ सम॑स्थापयं॒स्तेनै॒व यथा॒पूर्वꣳ॑ स्रुचो॒ऽभ्य॑घारय॒न्पुन॑रे-
वैना॑नि॒ तदा॑प्यायय॒न्नया॑तयामा॒न्यकु॑र्व॒न्नया॑तयाम॒ ह्याज्यं॒ तस्मा॑द्यत्तं॒ प्रया॒जानि॒ष्ट्वा
यथा॒पूर्वꣳ॑ स्रुचो॒ऽभि॑घारय॑ति॒ पुन॑रे॒वैना॑नि॒ तदा॑प्याययत्यया॑तयामानि करोत्यया-
तयाम॒ ह्याज्यं॒ तस्मा॒द्यस्य॒ कस्य॒ च ह॒विषो॒ऽवद्य॑ति॒ पुन॑रेव॒ तद॒भिघा॑रयति स्वि-
ष्टकृ॒तऽए॒व तत्पुन॑राप्यायत्यया॑तयामं करोत्यथ यदा॑ स्विष्टकृ॒तेऽवद्य॑ति॒ न तत॑:
पुन॑रभिघा॑रयति॒ नो हि ततः॒ कां चन॒ ह॒विषो॒ऽग्नावाहु॑तिᳵ हुता॑ भवति ॥२५॥
ब्रा॒ह्म॒णम् ॥४ [५.३.]॥ ॥
स वै॒ समि॑धो यजति । प्रा॒णा वै समिध॑: प्रा॒णान्वे॒वैतत्सम॒िन्द्धे प्रा॒णैर्ह्य॒यं पुरु॑षः
स॒मिद्ध॒स्तस्मा॑द॒भिमृ॑शेति ब्रूया॒द्यद्यु॑पतापी स्यात्स यद्यु॒ष्णः स्या॑दैव तावदा॑सीत स॒-
मिद्धो॒ हि स ताव॒द्भवति॒ यद्यु॒ शीतः॑ स्यान्नाशा॑सीत॒ तत्प्रा॒णान्वे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धाति
तस्मात्समिधो॑ यज॑ति ॥१॥ अथ तनूनपा॑तं॒ यज॑ति । रे॒तो वै तनू॒नपा॒देत॒द्वैत-
त्सिञ्च॑ति॒ तस्मा॑त्तनू॒नपा॑तं यज॑ति ॥२॥ अथे॒डो यज॑ति । प्र॒जा वा॒ऽइडो॒ यदा॒ वै
रे॒तः सि॒क्तं प्र॒जाय॑ते॒ऽथ तदी॑डितमिवा॒न्नमि॒च्छमा॑नं चर॑ति॒ तत्प्रैवैतज्जन॑यति॒ तस्मा॒-
दिडो॑ यज॑ति ॥३॥ अथ ब॒र्हिर्य॑ज॑ति । भूमा॒ वै ब॒र्हिर्भूमा॑नमे॒वैतत्प्र॒जन॑यति॒ तस्मा॒-
द्ब॒र्हिर्य॑ज॑ति ॥४॥ अथ स्वाहा॑स्वाहाकृ॒ति यज॑ति । हे॒मन्तो वा॒ऽऋतू॒नाᳵ स्वाहा॑का-
रो हे॒मन्तो॒ हीमाः प्र॒जाः स्वं वश॒मुप॑नयते॒ तस्मा॑द्धि॒मन्म्ला॑यन्त्योष॑धयः॒ प्र वन॒स्पती॒-
नां प॒लाशा॑नि मुच्यन्ते प्रतितरा॒मिव॒ वया॑ꣳसि भवन्त्यधस्तरा॒मिव॒ वया॑ꣳसि पतन्ति
वि॒पतितलो॒मेव॒ पाप॑: पु॒रुषो॑ भवति हे॒मन्तो॒ हीमाः प्र॒जाः स्वं वश॒मुप॑नयते स्वी॒-
कां० १, अ० ५, ब्रा० ४, कं० १-५ शतपथब्राह्मण / १०५
हैं। जीत के पश्चात् वह यज्ञ की दृढ़ता से संस्थापना करता है, इसलिए यदि वह यज्ञ में 'विलोम'
अर्थात् उलटा क्रम कर दे तो अवहेलना न हो। क्योंकि वह जानता है कि मेरा यज्ञ दृढ़ता से
संस्थापित है। अब वषट्कार और स्वाहाकार से जो यज्ञ रह गया था वह हो जाता है ॥२३॥
अब देवों ने चाहा कि हम इस यज्ञ को कैसे प्राप्त करें और प्राप्त करके किस प्रकार करें,
किस प्रकार उसका पालन करें ॥२४॥
अब जुहू में जो कुछ घी बच रहा था जिससे कि यज्ञ की संस्थापना की थी, उसी से
पहले के समान हवियों को सींचता है। उसी से इनको प्राप्त करता है, उसी से उसको पूर्ण
करता है क्योंकि 'आज्य' (घी) पूर्ण होता है। इसलिए पिछले प्रयाज को करके पहले के समान
हवियों को सींचता है, फिर उनको पूर्ण करता है। आज्य (घी) ही पूर्णता है। इसलिए जिस
किसी की हवि को काटता है उसी को फिर सींचता है और स्विष्टकृत् आहुति के लिए पूर्ण करता
है। परन्तु जब स्विष्टकृति के लिए काटता है तो फिर नहीं सींचता, क्योंकि इसके पश्चात् कोई
आहुति अग्नि में नहीं दी जायगी ॥२५॥
अध्याय ५—ब्राह्मण ४
अब वह समिध-यजन करता है। प्राण ही समिधा है। इस प्रकार वह प्राणों को प्रज्वलित
करता है। यह पुरुष प्राणों द्वारा ही प्रज्वलित किया जाता है। इसलिए यदि (यजमान को) ज्वर
हो तो (अध्वर्यु) कहेगा 'अभिमृश' (छुओ)। यदि गरम हो तो सन्तुष्ट होगा क्योंकि वह प्रज्वलित
हो जाता है। यदि ठण्डा हो तो चिन्ता होती है। वह इस प्रकार प्राणों को उसमें रखता है।
इसीलिए समिध-यजन करता है ॥१॥
अब तनूनपात-यजन करता है। वीर्य (रेत) ही तनूनपात है। इस प्रकार रेत को सींचता
है, इसलिए तनूनपात यज्ञ करता है ॥२॥
अब ईड-यजन करता है। प्रजा ही ईड है। जब सींचा हुआ वीर्य प्रजा के रूप में उत्पन्न
होता है तब प्रशंसा करते हुए के समान अन्न की खोज में विचरता है। इस प्रकार वह यजमान से
मानो सन्तानोत्पत्ति कराता है। इसलिए वह ईड-यजन करता है ॥३॥
अब बर्हि-यजन करता है। बर्हि का अर्थ है बहुतायत। इस प्रकार वह बहुतायत
(आधिक्य) को उत्पन्न करता है। इसीलिए वह बर्हि-यजन करता है ॥४॥
अब स्वाहा-यजन करता है। ऋतुओं में हेमन्त स्वाहाकार (सबसे पिछली) है। हेमन्त
ही इन प्रजाओं को अपने वश में करता है। इसीलिए हेमन्त में ओषधियां सूख जाती हैं, वृक्षों के
पत्ते झड़ जाते हैं। चिड़ियां छिप जाती हैं, या नीचे उतर-सी आती हैं। पापी पुरुष के बाल झड़
जाते हैं। हेमन्त इन सब प्रजाओं को वश में कर लेता है। जो इस रहस्य को समझता है वह उस