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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-३

६३६ शतपथ ब्राह्मण
प्रथमावाशान्तेऽङ्गारेष्वे॒तꣳ सोष्णी॒षं गर्भ॒माद॑त्ते॒ तं प्राङ् तिष्ठ॑न्जुहोति मारु॒त्यर्च्चा
म॒रुतो॒ यस्य॒ हि क्षये॒ पाथा॑ दि॒वो विम॑हसः॒ स सु॑गो॒पात॑मो॒ जन॒ इति॒ न स्वा-
हाकरोत्यहुतादो॒ वै दे॒वानां॑ म॒रुतो वि॒ऽहुतमिवे॑तद्य॒दस्वा॑हाकृतं दे॒वानां॒ वै म-
रुतस्तदे॑नं म॒रुत्स्वे॑व प्र॑तिष्ठापयति ॥ १७॥ अथा॒ङ्गारैर॒भिस॒मूह॑ति । म॒ही द्यौः पृ॑-
थिवी॑ च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिरिति ॥ १८॥ ब्राह्मणम्
॥ ३ [५. २.] ॥ ॥ शतम् २७०० ॥ ॥
इन्द्रो ह॒ वै षोड॒शी । तं नु स॒कृदिन्द्रं॑ भू॒तान्य॑त्यरिच्यन्त प्र॒जा वै भू॒तानि॒ ता
ह्येनेन सदृग्भवमिवासुः ॥ १॥ इन्द्रो॑ ह॒ वाऽई॑क्षां चक्रे । कथं॒ न्वह॒मिदꣳ सर्व॑म-
तितिष्ठेयम॒र्वागे॑व॒ यदि॒दꣳ सर्वꣳ॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्यत्त॒मगृ॑ह्णीत॒ स इ॒दꣳ
सर्व॑मे॒वात्य॑तिष्ठद॒र्वागे॒वास्मादि॒दꣳ सर्व॑मभवत्सर्वं॑ ह॒ वाऽइ॒दम॑तितिष्ठत्य॒र्वागे॒वा-
स्मादि॒दꣳ सर्वं॑ भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तं ग्र॒हं गृ॒ह्लन्ति॑ ॥ २॥ तस्मादेतदृषिणाभ्या-
नूक्तम् । न ते॑ महि॒त्वमनु॑भूद॒ध द्यौर्न्य॑न्या स्फि॒ग्या क्षाम॒वस्था॒ इति॒ न ह॒ वा
ऽस्यासौ॒ द्यौर॒न्यतरां॑ च॒न स्फि॒गीम॑नुबभूव॒ तथेदꣳ सर्व॑मे॒वात्य॑तिष्ठद॒र्वागे॒वा-
स्मादि॒दꣳ सर्व॑मभवत्सर्वं॑ ह॒ वाऽइ॒दम॑तितिष्ठत्य॒र्वागे॒वास्मादि॒दꣳ सर्वं॑ भवति॒ य-
स्यैवं वि॒दुष ए॒तं ग्र॒हं गृ॒ह्लन्ति॑ ॥ ३॥ तं वै ह॒रिव॑त्य॒र्च्चा गृ॑ह्णाति । ह॒रिव॑तीषु
स्तुवते ह॒रिव॑ती॒रनु॑शꣳसति वी॒र्यं॑ वै हर॒ इन्द्रो॒ऽसुरा॑णाꣳ स॒पन्नानाꣳ सम॑वृङ्क
तथो॒ऽष्वैष ए॒तद्वी॒र्यꣳ॑ हरः स॒पन्नानां॒ संवृ॑ङ्क्ते॒ तस्माद्धरिव॑त्य॒र्च्चा गृ॒ह्लाति॒ हरि॑-
वतीषु स्तुवते ह॒रिव॑ती॒रनु॑शꣳसति ॥४॥ तं वाऽअनुष्टुभा गृह्णाति । गाय॒त्रं वै
प्रातःसवनं त्रैष्टुभं माध्यन्दिनꣳ सवनं जागतं तृतीयसवनमथातिरिक्तानुष्टुबत्येवै-
नमेतद्रेचयति तस्मादनुष्टुभा गृह्णाति ॥ ५॥ तं वै चतुःस्रक्तिना पात्रेण गृह्णाति ।
त्रयो॒ वाऽइ॒मे लो॒कास्तदि॒माने॒व लो॒कांस्तिसृभिः॒ स्रक्तिभिरा॒प्नोत्य॒त्ये॑वैनं॒ चतुर्थ्या
स्रक्त्या॑ रेचयति॒ तस्माच्चतुःस्रक्तिना पा॒त्रेण गृ॒ह्लाति॑ ॥६॥ तं वै प्रातःसवने गृह्णी-

का० ४, अ० ५, ब्रा० २-३, कं० १७-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६३७
को लेकर पूर्वाभिमुख होकर मरुतों के लिए इस मंत्र से आहुति दे देता है, “मरुतो यस्य हि क्षये
पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः" (यजु० ८।३१) - "हे द्यौलोक के वीर मरुतो !
जिसके घर में तुम पीते हो वह सबसे अधिक सुरक्षित होता है।" इसके साथ 'स्वाहा' का उच्चा-
रण नहीं होता; देवों में मरुत् (साधारण जन) आहुति दिये हुए को नहीं खाते। 'स्वाहा' के बिना
जो आहुति दी जाती है वह आहुति नहीं समझी जाती। मरुत् देवों में से हैं। इस प्रकार वह इसको
मरुतों के साथ प्रतिष्ठित कर देता है ॥१७॥
अब वह इसको कोयले से ढक देता है, इस मंत्र से, “मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं
मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः" (यजु० ८।३२, ऋ० १।२२।१३) - "बड़े द्यौ-पृथिवी इस
हमारे यज्ञ को मिलावें और हमको शक्ति देनेवाले पदार्थों से पूर्ण करें" ॥१८॥
षोडशिग्रहः
अध्याय ५-ब्राह्मण ३
षोडशी ग्रह इन्द्र है। एक बार भूत अर्थात् प्राणी-वर्ग इन्द्र से बढ़ गये। प्राणी ही प्रजा
हैं। वे उसकी बराबरी करने लगे ॥१॥
इन्द्र ने सोचा मैं इन सबसे कैसे बढ़ सकूँ और ये सब मुझसे नीचे किस प्रकार रहें ?
उसने इस ग्रह (षोडशी) को देखा और इसको ले लिया। वह इन सबसे बढ़ गया और ये सब
उससे नीचे हो गये। जो इस रहस्य को समझकर इस ग्रह को ग्रहण करता है वह सबसे बढ़ जाता
है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥२॥
इसीलिए तो ऋषि का वचन है- “न ते महित्वमनु भूदध द्यौर्यदन्यया स्फिग्या क्षाम-
वंस्थाः” (ऋ० ३।३२।११)- "जब तू अपनी दूसरी जांघ के सहारे पृथिवी पर ठहरा तो द्यौलोक
तेरी बड़ाई का अनुभव नहीं कर सका, या तेरी बड़ाई को न पहुँच सका।" वस्तुतः यह द्यौ
उसकी दूसरी जांघ तक न पहुँच सका। इस प्रकार वह यहाँ की सब वस्तुओं से बढ़ गया और
सब वस्तुएँ उसके नीचे हो गईं। वस्तुतः इस रहस्य को समझकर यदि जिस किसी के लिए इस
ग्रह को निकालते हैं, वह सबसे बढ़ जाता है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥३॥
इस ग्रह को लेते समय 'हरिवती' ऋचा पढ़ी जाती है (अर्थात् वह मंत्र जिसमें 'इन्द्र
हरिवान्' का उल्लेख हो)। (उद्गाता लोग) 'हरिवती' से ही स्तुति करते हैं और होता 'हरि-
वती' का ही पाठ करता है। इन्द्र ने अपने शत्रु असुरों का वीर्य अर्थात् 'हर' ले लिया। इसी प्रकार
यह (यजमान) भी अपने शत्रुओं के 'हर' को छीन लेता है। इसीलिए वह 'हरिवान्' वाली
ऋचा से ग्रह को लेता है। हरिवान् की स्तुति होती है और हरिवती ऋचाओं का ही (उद्गाता
लोग) पाठ करते हैं ॥४॥
वह इसको अनुष्टुभ् छन्द से लेता है। प्रातःसवन गायत्री का है, दोपहर का सवन
त्रिष्टुभ् का, तीसरा सवन जगती का। अनुष्टुभ् इन सबके ऊपर है। इसी प्रकार इस ग्रह को भी
सबके ऊपर रखता है। इसीलिए इसको अनुष्टुभ् छन्द से ग्रहण करता है ॥५॥
उसको चौकोर पात्र में लेता है। ये लोक तीन हैं। तीन कोनों से वह तीन लोकों का
ग्रहण करता है। चौथे कोने से वह इस सोने को सबके ऊपर स्थापित करता है। इसलिए वह
इसके चौकोर पात्र लेता है ॥६॥
इसको प्रातःसवन के आग्रयण के लेने के पीछे लेना चाहिए। प्रातःसवन में लेने के पश्चात्