शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-२
६३० शतपथ ब्राह्मण
ये दी॒र्घस॒त्रमास॑ते संवत्स॒रं वा भूयो॑ वा॒ सर्व॑मेता एव॒मेव॒ यथा॒पूर्व॒म् ॥ १२॥ अ॒-
थोद॑वसानी॒येष्ट्या॒ यज॑ते । स आ॒ग्ने॒यं प॒ञ्चक॑पालं पु॒रोडाशं॒ निर्व॑पति॒ तस्य॑ प॒ञ्च-
पदाः प॒ङ्क्तयो॒ याज्यानुवा॒क्या भ॑वन्ति यात॒यामिव॒ वाऽए॒तद्दीक्षा॒नस्य॑ य॒ज्ञो भ॑वति॒
सो॑ऽस्मात्प॒राङि॑व॒ भव॑त्य॒ग्निर्वै सर्वे॒ य॒ज्ञा अ॒ग्नौ हि सर्वा॒न्य॒ज्ञांस्त॑न्व॒ते ये च॑ पाक-
य॒ज्ञा ये चेत॑रे॒ तद्य॒ज्ञमे॒वैत॒त्पुन॒रार॑भते॒ तथा॑स्यायातयामा य॒ज्ञो भ॑वति॒ तथो॒ऽअ॑-
स्मान्न प॒राङ् भव॑ति ॥ १३॥ तद्यत्प॒ञ्चक॑पालः पु॒रोडाशो॒ भव॑ति । प॒ञ्चप॑दाः प॒ङ्क्तयो॒
याज्यानुवा॒क्याः पा॒ङ्क्तो वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञमे॒वैत॒त्पुन॒रार
कां० ४, अ० ५, ब्रा० १-२, कं० १२-१६ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६३१
वर्ष-भर के लिए या अधिक काल के लिए ॥१२॥
अब वह उदवसानीय इष्टि करता है। वह अग्नि के लिए पाँच कपालों का पुरोडाश
बनाता है। उसके याज्य और अनुवाक पाँच पद की पंक्तिवाले होते हैं। इस समय यज्ञ करनेवाले
का यज्ञ थक-सा जाता है, वह उससे विमुख-सा हो जाता है। अग्नि 'सब यज्ञ' है, क्योंकि अग्नि में
ही सब यज्ञ किये जाते हैं चाहे पाक यज्ञ हों या अन्य। वह इसी यज्ञ को फिर लेता है। इस प्रकार
यह यज्ञ थकने नहीं पाता, वह उससे विमुख नहीं होने पाता ॥१३॥
पाँच कपालों का पुरोडाश इसलिए होता है कि याज्य और अनुवाक में पाँच पद की
पंक्तियाँ होती हैं और यज्ञ भी पाँचवाला है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को ही आरम्भ करता है।
इस प्रकार यज्ञ थकता नहीं और इससे विमुख नहीं होता ॥१४॥
उसकी दक्षिणा सोना है। यह यज्ञ अग्नि का है। सोना अग्नि का वीर्य है। इसलिए सोना
दक्षिणा है या बैल, यह ढोने के कारण अग्नि का है। क्योंकि इसका कन्धा ऐसा हो जाता है मानो
अग्नि में जला दिया गया ॥१५॥
अब चार भाग घी लेकर विष्णु की ऋचा द्वारा आहुति देता है, "उरु विष्णो विक्रमस्वोरु
क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा" (यजु० ५।३८)—"हे विष्णु,
चौड़ी टाँगें बढ़ाओ। हमारे लिए खुले मकान बनाओ। हे घृतयोनि, घृत पियो और यज्ञपति की
उन्नति करो।" यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह यज्ञ को फिर आरम्भ करता है। इस प्रकार यज्ञ
थकता नहीं और वह उससे विमुख नहीं होता। इस समय जितनी शक्ति हो उतनी दक्षिणा दे,
क्योंकि यज्ञ बिना दक्षिणा के नहीं होना चाहिए ऐसा कहते हैं। जब यह उदवसानीय इष्टि समाप्त
हो जाय तो सायंकाल की आहुति देता है। परन्तु प्रातःकाल की आहुति प्रातःकाल ही दी जाती
है ॥१६॥
आनुबन्ध्य-यागः
अध्याय ५—ब्राह्मण २
वे वशा का आलभन करते हैं और उसका आलभन करके उसे मारते हैं। मारने के बाद
कहते हैं 'वपा को निकाल।' जब वपा निकल चुके तो मारनेवाले से कहना चाहिए कि गर्भ को
खोजे (अर्थात् यह देखने का यत्न करे कि गाय कहीं गर्भिणी तो नहीं थी) ।१ यदि गर्भ न मिले
तो अच्छा ही है। यदि मिल जाय तो इसका प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥१॥
यह तो ठीक है नहीं कि उसको एक (अकेली गाय) मानकर ही कार्य कर डालें या
उसको दो मानकर (अर्थात् गाय और उसका पेट का बच्चा) ही कार्य करें। तात्पर्य यह है कि
देख-भालकर जाँच कर लेनी चाहिए और उसी के अनुसार बरतना चाहिए। अब कहे कि थाली
और उष्णीष (अँगौछा या कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा) लाओ ॥२॥
अब वपा से जैसा नियम है उसी के अनुसार कृत्य करते हैं। वपा के कृत्य के पश्चात्
अध्वर्यु और यजमान दोनों लौट आते हैं। अध्वर्यु कहता है कि 'गर्भ को निकाल।' क्योंकि बिना
कहे तो कोई गर्भ को निकालता नहीं, जब तक कि माता रोगी न हो या मर न गई हो। या जब
गर्भ पूरा हो जाता है तो जनने के समय स्वयं ही बाहर निकल आता है। उससे कहना चाहे कि
१. गो-हत्या के ये बीभत्स कर्मकाण्ड सर्वथा प्रक्षिप्त हैं। — स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
६३२ शतपथ ब्राह्मण
त॒मपि॑ वि॒रुज्य॑ श्रोणी॒ प्रत्य॑ञ्चं॒ नि॒रुह्यि॒त्वै ब्रूया॑त् ॥ ३॥ तं नि॒रूह्य॑माणम॒भिम॑न्त्र-
यते । ए॒जतु दश॑मास्यो॒ गर्भो॒ जरा॑युणा स॒हेति॑ स यदा॒हैज॑त्विति प्राणमे॒वास्मिन्ने॒-
तद्द॑धाति दश॑मास्य॒ इति॒ यदा॒ वै गर्भः॒ समृ॑द्धो भव॒त्यथ॑ दश॑मास्य॒स्तमे॒तद्यद्द॑श-
मास्यꣳ॒ सन्तं॒ ब्रह्म॑णैव॒ यजु॑षा दश॑मास्यं करोति ॥ ४॥ जरा॑युणा स॒हेति॑ । तद्यथा॑
दश॑मास्यो जरा॑युणा स॒हेया॑दे॒वमे॒तदा॑ह य॒थायं॑ वा॒युरे॑जति॒ यथा॑ समु॒द्र ए॒जतीति॑
प्रा॒णमे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धा॒त्येवायं॑ दश॑मास्यो॒ऽस्रव॑ज्जरा॑युणा स॒हेति॑ तद्यथा॑ दश॑मास्यो
जरा॑युणा स॒ह स्रꣳ॑से॒तैतदा॑ह ॥ ५॥ तदा॑हुः । कथ॑मे॒तं गर्भं॑ कुर्या॒दित्य॑ङ्गादङ्गा॒द्धै-
वास्या॑व॒द्येयु॒र्यथै॒वेतरे॑षामवदा॒नानाम॑वदा॒नं तडु॒ तथा॒ न कु॒र्याद॒ङ्ग क्षेपो॒ऽविकृ॑-
ताङ्गो॑ भव॒त्यध॑स्तादि॒व ग्री॒वा अ॑पि॒कृत्यै॒तस्याꣳ॑ स्था॒त्यामे॒तं मेधꣳ॑ श्रोतयेयुः सर्वे॑-
भ्यो वा॒ऽअस्यै॒षो॒ऽङ्गेभ्यो॒ मेध॒ श्रोत॑ति॒ तद॑स्य॒ सर्वे॑षामि॒वाङ्गा॑नामव॒त्तं भव॒त्यव॑द्य-
न्ति व॒शाया॒ अव॑दानानि॒ यथै॒व तेषा॑मवदा॒नम् ॥ ६॥ तानि॑ पशुश्रप॒णे श्र॑पयन्ति ।
तद्वैतं॒ मेधꣳ॑ श्र॒पय॒न्त्युल्ली॑षेणा॒वेक्ष्य॒ गर्भं॒ पार्श्व॑तः पशुश्रप॒णस्यो॒पनि॑दधाति य॒दा
शृ॒तो भव॒त्यथ॑ समु॒द्याव॑दाना॒न्येवा॒भिजु॑होति॒ नैतं॑ मे॒धमु॑द्वासयन्ति पशुं॒ तद्वैतं॑ मे-
धमु॑द्वास॒यन्ति॑ ॥ ७॥ तं न॒घने॑न चावा॒लम॒न्तरे॑ण॒ यूपं॑ चा॒ग्निं च॒ हर॑न्ति । दक्षि॑णतो
नि॒धाय॑ प्रतिप्रस्था॒ताव॑द्य॒त्यथ॒ सुचो॒रुप॑स्तृणी॒तेऽथ॑ मनो॒तायै॑ ह॒विषो॒ऽनुवा॑च॒ आ-
हाव॑द्यन्ति व॒शाया॒ अव॑दानानां॒ यथै॒व तेषा॑मवदा॒नम् ॥ ८॥ अथ॑ प्र॒चर॑णीति॒ सु-
ग्भ॑वति । तस्यां॑ प्रतिप्रस्था॒ता मे॒धायोप॑स्तृणी॒ति द्विर॑व॒द्यति॑ सकृ॒दभि॑घारयति प्र-
त्यन॒क्त्यव॑दानि॒नोऽन्या॑नु॒वाच॒ आहा॒श्राव्या॑ह॒ प्रेष्येति॑ वषट्कृ॒तेऽध्व॒र्युर्जु॑होत्यध्व॒र्योरनु॑
होमं॑ जुहोति प्रतिप्रस्था॒ता ॥ १॥ यस्यै॑ ते य॒ज्ञियो॒ गर्भ॒ इति॑ । अय॑ज्ञिया॒ वै गर्भा॒-
स्तमे॒तद्ब्रह्म॑णैव॒ यजु॑षा य॒ज्ञियं॑ करोति॒ यस्यै॒ योनि॒र्हिर॑ण्ययी॒त्यदो॒ वाऽए॒तस्यै॒ योनिं॑
वि॒न्दन्ति॒ यद॒दो नि॒ष्कर्ष॒ममृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तामे॒वास्या॑ ए॒तदमृ॑तां॒ योनिं॑ करोत्य-
ङ्गान्यु॑क्थ॒ता यस्य॑ ते॒ मात्रा॒ सम॑जीगमꣳ॒ स्वाहेति॒ यदि॑ पुमाꣳ॒स्याद्यद्यु॑ स्त्री स्या॒दङ्गा
का० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० ३-१० शतपथब्राह्मण / ६३३
चाहें जाँघें चीरना ही क्यों न पड़ें इस गर्भ को निकाल ले ॥३॥
जब वह (गर्भ) निकल आवे तो इस मन्त्र को पढ़े, "एजतु दशमास्यो गर्भः" (यजु०
८।२८)—"जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"दश मास का गर्भ जरायु के साथ स्पन्दन करे।"
'स्पन्दन करे' यह कहकर कि वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है। दश मास का इसलिए कहा
कि दश मास में गर्भ पूर्णतया बढ़ पाता है। यहाँ यह दस मास का नहीं भी हो तो भी यजु० के
मन्त्र पढ़कर वह उसे दस मास का कर देता है ॥४॥
'जरायुणा सह' (यजु० ८।२८)—दस मास का बच्चा जरायु के साथ निकलता है। इसी
प्रकार यह भी निकले। "यथायं वायुरेर्जति यथा समुद्र ऽ एजति" (यजु० ८।२८)—"जैसे यह
वायु चलता है या जैसे यह समुद्र चलता है।" इससे वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है(?)।
"एवायँ दशमास्यो ऽ अस्रज्जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"इसी प्रकार यह दश मास का जरायु
के साथ बाहर निकल आया।" अर्थात्—जैसे दश मास का गर्भ जरायु के साथ निकलता है उसी
प्रकार यह भी निकले ॥५॥
अब कुछ लोग पूछते हैं कि इस गर्भ का करना क्या चाहिए ? क्या इसके अंग-अंग काट
डालने चाहिएँ, जैसे अन्योँ के टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं ? नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए। इसके
अंग तो अभी बन नहीं पाये। गर्दन के नीचे काटकर उसका मेध थाली में टपका देवे। यह मेध
सभी अंगों से टपकता है, इसलिए सभी अंगों का भाग समझा जाता है। अब वह वशा (गाय) के
इसी प्रकार भाग करते हैं जैसे किये जाते हैं ॥६॥
पशुश्रपण (पशु को पकाने की अग्नि) पर उन भागों को पकाते हैं। वहीं उस मेध को
भी पकाते हैं। गर्भ को अँगोछे में चारों ओर लपेटकर पशुश्रपण के पास रख देते हैं। जब पक
जाता है तो उन भागों को इकट्ठा करके आहुति देते हैं (अभिजुहोति), परन्तु मेध की नहीं। अब
वे पशु को निकालते हैं और मेध को भी ॥७॥
इसको चात्वाल के पीछे अग्नि और यूप के बीच में होकर ले जाते हैं। दक्षिण की ओर
रखकर प्रतिप्रस्थाता (यज्ञ के भागों को) काटता है। अब दोनों स्रुचों में घी लगाता है और
(होता से) कहता है कि मनोता के लिए हवि के अवसर पर अनुवाक पढ़। अब वे वशा (गाय)
के टुकड़े-टुकड़े करते हैं, उसी प्रकार जैसे करने चाहिएँ ॥८॥
प्रचरणी नाम की एक स्रुक् होती है। उसमें प्रतिप्रस्थाता मेध की एक तह लगा देता है।
दो भाग काटता है। एक बार घी डालता है और उन दोनों भागों को पूरा करता है। अब अनु-
वाक के लिए कहता है, और श्रौषट् कहलवाकर (मैत्रावरुण से) कहता है कि अनुवाक कहलवा।
वषट्कार के बाद अध्वर्यु आहुति देता है। अध्वर्यु के होम के पीछे प्रतिप्रस्थाता आहुति देता है,
इस मंत्र से—॥६॥
"यस्यै ते यज्ञियो गर्भः" (यजु० ८।२६)—"तू जिसका गर्भ यज्ञ के योग्य हो गया है।"
गर्भ यज्ञ के योग्य नहीं था। इसको वह मंत्र पढ़कर यज्ञ के योग्य बनाता है। "यस्यै योनिर्हिरण्ययी"
(यजु० ८।२६)—"जिसकी सोने की योनि है।" पहले योनि को फाड़ा था जब उसमें से गर्भ
निकाला था। सोना अमर-आयु है। इस प्रकार वह इसकी योनि को अमर बना देता हैं।
"अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजीगम ँ स्वाहा" (यजु० ८/२६)—"जिसके अंग टूटे नहीं हैं
उसको मैंने माता के साथ जोड़ा है।" यदि गर्भ नर हो तो ऐसा कहे और यदि गर्भ मादा हो तो
न्य॑क्ता॒ यस्ये॒ तां मात्रा॒ सम॑जीगम॒ स्वाहेति॒ यद्यु॑ऽअविज्ञातो गर्भो भव॑ति पुꣳ-
स्कृ॒त्येव॑ जुहुयात्पुमाꣳसो हि गर्भा॒ अङ्गान्य॒क्ता यस्य॒ तं मात्रा॒ सम॑जीगम॒ स्वा-
हेत्यदो वा॒ऽएतं॒ मात्रा॒ विष्वंचं॑ कुर्व्वन्ति॒ यद॒दो निष्कर्॒षन्ति॒ तमेतद॒क्षण्यैव यजु॑षा
समर्द्ध्य मध्य॒तो य॒ज्ञस्य पुन॑र्मात्रा॒ सङ्गम॑यति ॥१०॥ अथार्द्धधुर्व्वन॒स्पतिना चरति ।
वन॒स्पतिनाध॒र्युश्च॑रित्वा यान्यु॑पभृत्यव॒दाना॑नि भव॑न्ति॒ तानि॒ समा॒नयमान आहा-
॒ग्नये᳖ स्वि॑ष्ट॒कृते॒ऽनुब्रूहीत्यत्या॑क्रामति प्रतिप्रस्थाता॒ स ए॒तꣳ सर्व्वमेव मेधं᳖ गृही॒ते
ऽथो॒परि॑ष्टाद् द्विडावत्या॑भिघारयत्याश्राव्याह॒ प्रेष्ये॑ति वषट्कृ॒तेऽध॒र्युर्जुहोत्यध॒र्युमनु
होमं᳖ जुहोति प्रतिप्रस्थाता॒ ॥११॥ पुरुद॒स्मो वि॒षुरूप॒ इन्दु॑रिति । बहुदान॒ इति
ह्येतदा॒ह पुरुद॒स्म इति॒ विषुरूप॒ इति॒ विषुरूपा-इव॒ हि गर्भा॒ इन्दु॑र॒न्तर्महिमा-
नमानञ्ज धीर॒ इत्य॒न्त॒र्ह्येष मातर्य॒क्तो भव॑त्येकप॒दीं द्विप॒दीं त्रिप॒दीं चतु॑ष्पदीम॒ष्टा-
प॒दीं भुव॑नानु प्रथन्ता॒ꣳ॒ स्वाहेति॑ प्रथयत्ये॒वैनामेतत्स॒भूयो ह्य जयत्य॒ष्टाप॒द्येष्टा षड्
चान॒ष्टाप॒द्या ॥१२॥ तदाहुः । क्वैतं गर्भं᳖ कुर्य्यादिति॒ वृक्ष॒ऽएवैन॒मुद्बध्युर॒न्तरि॑क्षाय-
तना वै गर्भा॒ अन्तरि॑क्षमिवैतद्यद्वृ॒क्षस्त॒देनꣳ॒ स्वऽए॒वायत॑ने प्रतिष्ठापयति तदु॒ वा
ऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे᳖द॒न्तः᳖ऽएनं मृतमुद्वास्यन्तीति तथा हैव स्यात् ॥१३॥
अप॒ एवैनम॒भ्यव॑हरेयुः । आपो॒ वाऽअ॒स्य सर्व्वस्य प्रतिष्ठा॒ तदेनम॒प्स्वेव प्रति॑ष्ठा-
पयति तदु॒ वाऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे॒द॒प्स्वेव मरिष्यतीति तथा हैव स्यात्
॥१४॥ आ॒खूत्क॒रऽए॒वैनमुप॑किरेयुः । इयं वाऽअ॒स्य सर्व्वस्य प्रतिष्ठा॒ तदेनम॒स्या-
मेव प्रति॑ष्ठापयति तदु॒ वाऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे᳖त्क्षि॒प्रेऽस्मै मृताय श्म-
शानं᳖ करिष्यन्तीति तथा हैव स्यात् ॥१५॥ प॒शु॒श्रप॒णऽए॒वैनं॑ म॒रुद्भ्यो॑ जुहुयात् ।
अहुतादो वै दे॒वानां᳖ म॒रुतो विड्हुतमिवावैतद्यदशान्तो गर्भं᳖ आहवनीयाद्धा॒ऽएष
आहु॑तो भवति प॒शुश्र॒पणस्तस्मा॒न्न ब॒हिर्द्धा यज्ञाद्भवति॒ न प्रत्यक्षमिवार्हवनीये᳖
दे॒वानां᳖ वै म॒रुतस्त॒देनं॑ म॒रुत्स्वेव प्रति॑ष्ठापयति ॥१६॥ स ध्रुवैव समिष्टयजूꣳषि ।
का० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ६३५
'यस्य' के स्थान में 'यस्यै' और 'तं' के स्थान में 'तां' कह दे अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्यै तां मात्रा
समजीगम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६) । "यदि गर्भ में (नर-मादा का भेद) ज्ञात न हो सके तो
नर मानकर ही कार्य करे क्योंकि 'गर्भ' पुंल्लिग है अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजी-
गम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६)। पहले इसको इसकी माता से अलग किया था जब इसे माँ के
गर्भ से निकाला था। अब इसको मंत्र-पाठ के द्वारा पूर्ण करके इसकी माँ से मिला देता है ॥१०॥
अब अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देता है। अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देने के
पश्चात् उपभृत् में जो भाग हैं उनको मिलाकर कहता है, 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक
पढ़।' अब प्रतिप्रस्थाता आता है और सम्पूर्ण मेध को लाता है। उसके ऊपर दो बार घी छोड़ता
है। श्रौषट् कहलवाकर अध्वर्यु कहता है 'प्रेष्य' अर्थात् आरम्भ करो। वषट्कार के पीछे अध्वर्यु
आहुति देता है। अध्वर्यु के पीछे प्रतिप्रस्थाता होम करता है—॥११॥
इस मंत्र से—"पुरुदस्मो विषरूप ऽ इन्दुः" (यजु० ८।३०)—'पुरुदस्म' का अर्थ है बहु-
दान (बहुत दान करनेवाला); विषरूप का अर्थ है बहुरूप वाला, क्योंकि गर्भ कई रूपों के
होते हैं। "इन्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः" (यजु० ८।३०)—"मेधावी रस ने अपने भीतर
महत्ता को धारण किया।" वस्तुतः यह गर्भ माता में स्थित हुआ। "एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं
चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ताँ स्वाहा" (यजु० ८।३०)—'एक पैर वाली, दो पैर वाली,
तीन पैर वाली, चार पैर वाली, आठ पैर वाली में ये भुवन प्रसरित हों।" यह गाय की बड़ाई
है। अष्टापदी न होने के स्थान में यदि अष्टापदी से आहुति दी जाय तो अधिक फल होगा॥१२॥
इस पर कुछ लोग पूछते हैं कि गर्भ का क्या किया जाय ? उसको वृक्ष पर फैला दें। गर्भ
अन्तरिक्ष में स्थित रहते हैं। वृक्ष भी अन्तरिक्ष है, इस प्रकार इसकी इसी से प्रतिष्ठा हो जायगी,
परन्तु इस पर लोग कहते हैं कि यदि कोई गाली दे कि वह 'इसको काटकर वृक्ष पर लटका देंगे'
तो उसी के समान यह भी है ॥१३॥
इसको जल में छोड़ दें। क्योंकि जल तो इस सबकी प्रतिष्ठा है। इस प्रकार जल में
इसकी स्थापना हो जाएगी। परन्तु इस पर भी लोग कहते हैं कि जैसे कोई गाली दे कि 'वह जल
में डूबकर मर जाय' यह भी वैसा ही है ॥१४॥
उसको घूरे में गाड़ दें। यह पृथिवी तो सभी की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह इसकी
पृथिवी में स्थापना करता है। इस पर भी लोगों का कहना है कि यह भी वैसा ही होगा जैसे कोई
गाली दे कि यह मर गया, इसके लिए श्मशान तैयार है ॥१५॥
पशुश्रपण में इसकी मरुतों के लिए आहुति दे देवे। देवों में मरुत् या साधारण पुरुष तो
आहुति को खाते नहीं। बे-पका गर्भ तो आहुति में गिना नहीं जाता (अहुत है)। पशुश्रपण तो
आहवनीय में से लिया जाता है। इस प्रकार इसका यज्ञ से बहिष्कार नहीं होगा, और न यह
प्रत्यक्ष रूप में आहवनीय में डाला जाता है। मरुत् देवों के ही हैं। इस प्रकार वह इसकी मरुतों में
स्थापना कर देता है ॥१६॥
समिष्ट यजुओं की आहुति के पीछे जब अंगारे कुछ शान्त हो रहे हों तो अंगोछे में गर्भ