शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-१
न्याः स या॒सामेकं॑ प्रथ॒माह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथ॒ त्रीꣳस्ताः प॒राञ्ची॑र्य्य य॒ासां त्रीन्प्रथ॒मा-
ह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथै॒कं ताः पु॒रोऽञ्ची॑र्या वै पु॒रोऽञ्ची॑स्ताः प॒राञ्ची॑र्याः प॒राञ्ची॑स्ताः
पु॒रोऽञ्चीः ॥ २६॥ तप॑सा॒ वै लो॒कं ज॑यति । तद्य॒स्यैतत्प॒रः-पर॑ एव॒ वरी॑यस्तपो॑
भव॑ति प॒रः-परः॒ श्रेयाꣳसं॑ लो॒कं ज॑यति वसी॑यानु॒ हैवा॒स्मिँल्लो॒के भ॑वति॒ य ए॒वं
वि॒द्वान्यु॒रोऽञ्ची॑रुप॒सद॒ उपै॑ति॒ तस्मा॑डु पु॒रोऽञ्ची॑रि॒वोप॒सद॒ उपे॑याद्य॒द्यु द्वाद॑शोप॒सद॒
उपे॒यात्तीꣳश्चतुरो॒हं दो॑हयेद्द्वौ॑ चतुर॒हमेकं॑ चतुर॒हम् ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३.४] ॥
तृतीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः [११] ॥ ॥
तद्य॒ ए॒ष पू॒र्वार्द्धे व॒र्षिष्ठ स्थूणा॒राजो भ॑वति । तस्मात्प्रा॒ङ् प्रक्रा॑मति॒ त्रीन्वि-
क्रमाꣳस्तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ सोऽन्तःपातः ॥ १॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा पञ्चदश
विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सा दक्षि॑णा श्रोणिः ॥ २॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः ।
उदङ् पञ्चदश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सोत्तरा श्रोणिः ॥ ३॥ तस्मान्म-
ध्यमाच्छु॒ङ्कोः । प्राङ् षट्त्रिꣳश॑तं विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स पू॒र्वार्धः ॥ ४॥
तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स दक्षि॑-
णा॒ꣳसः ॥ ५॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । उदङ् द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं नि॒-
हन्ति॒ स उत्त॒रो॒ꣳस ए॒षा मा॒त्रा वेदेः ॥ ६॥ अथ यत्ति॒ꣳश॑त्प्रक्रमा प॒श्चाद्भव॑ति ।
त्रि॒ꣳशद॑क्षरा॒ वै वि॒राड्वि॒राजा॒ वै दे॒वा अ॒स्मिँल्लो॒के प्रत्य॑तिष्ठꣳस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तद्वि॒-
राजा॒वास्मिँल्लो॒के प्रति॑तिष्ठति ॥ ७॥ अथोऽअपि॒ त्रय॑स्त्रिꣳशत्स्युः । त्रय॑स्त्रिꣳशदक्षरा
वै वि॒राड्वि॒रा॒ज्या॑वास्मिँल्लोके प्रति॑तिष्ठति ॥ ८॥ अथ यत्षट्त्रिꣳश॑त्प्रक्रमा प्राची भ॒-
वति । षट्त्रिꣳशद॑क्षरा॒ वै बृ॑ह॒ती बृ॑ह॒त्या वै दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्नु॑वत त॒-
थो॒ऽए॒वैष ए॒तद्बृ॑ह॒त्यैव स्व॒र्गं लो॒कं स॑मश्नु॒ते सो॒ऽस्य दि॒व्याह॑वनी॒यो भ॑वति
॥ ९॥ अथ यच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑ति । चतु॑र्विꣳशत्यक्षरा॒ वै गा॑य॒त्री पू॒-
र्वार्धो वै य॒ज्ञस्य॑ गायत्री पू॒र्वार्ध॑ ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्माच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑-
का० ३, अ० ४-५, ब्रा० ४-१, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४१५
पहले दिन एक थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, वे चौड़े होते जाते हैं। और जिनमें
पहले दिन तीन थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन एक, वे तंग हो जाते हैं। जो तंग होते
जाते हैं वह ऐसे ही हैं जैसे चौड़े । और जो चौड़े होते जाते हैं ऐसे ही हैं जैसे तंग ॥२६॥
लोकों को तप से जीतते हैं। जो इस रहस्य को समझकर उन उपसदों को लेता है जो
तंग होते जाते हैं, उसका तप बढ़ता जाता है और उसका श्रेय बढ़ता है और वह लोक में अच्छा
हो जाता है । इसलिए उन उपसदों को लेना चाहिए जो तंग होते जाते हैं। अगर बारह उपसदों
को लेवे तो चार दिन तक तीन थन दुहने चाहिएँ, चार दिन तक फिर दो थन, और फिर चार
दिन तक एक थन ॥२७॥
अध्याय ५—ब्राह्मण १
शाला के पूर्व की ओर का जो सबसे बड़ा खम्भा होता है उससे पूर्व की ओर तीन पग
चलता है । और वहाँ एक कील गाड़ देता है जिसको 'अन्तः-पात' कहते हैं ॥१॥
इस बीच की कील से दक्षिण की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है। उसको 'दक्षिणा श्रोणि' (दाहिना कूल्हा) कहते हैं ॥२॥
इस बीच की कीली से उत्तर की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'उत्तरा-श्रोणि' (बायाँ कूल्हा) कहते हैं ॥३॥
इस बीच की कील से पूर्व की ओर छत्तीस पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है।
उसको 'पूर्वार्ध' कहते हैं ॥४॥
इस बीच की कील से दक्षिण की ओर बारह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'दक्षिणोऽसः' (दायाँ कंधा) कहते हैं ॥५॥
इस बीच की कील से बारह पग उत्तर की ओर चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'उत्तरोऽसः' (बायाँ कंधा) कहते हैं। यही वेदी की मात्रा (प्रमाण) है ॥६॥
यह पीछे तीस पग इसलिए होती है कि विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। और विराट्
छन्द के द्वारा ही देवों ने इस लोक में प्रतिष्ठा पाई । इसी प्रकार यह भी विराट् छन्द द्वारा इस
लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है ॥७॥
तैंतीस पग भी हो सकते हैं। क्योंकि विराट् में तैंतीस अक्षर भी होते हैं और विराट् के
द्वारा ही वह इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥८॥
पूर्व में छत्तीस पग क्यों होते हैं ? बृहती छन्द छत्तीस अक्षर का होता है। बृहती के द्वारा
ही देव लोग स्वर्गलोक को प्राप्त हुए । इसी प्रकार यह भी बृहती छन्द द्वारा स्वर्गलोक को
प्राप्त करता है । उसकी आहवनीय अग्नि द्यौलोक में होती है ॥९॥
वेदी आगे की ओर २४ पग की क्यों होती है ? गायत्री चौबीस अक्षर की होती है ।
गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए वह आगे को चौबीस पग चौड़ी होती है। वेदी की यही मात्रा
त्वे॒षा मा॒त्रा वे॒देः ॥१०॥ अथ॒ यत्प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति । प॒श्चाद्वरी॑यसी पृ॒थुश्रोणि-
रिति॒ वै योषां॑ प्रशंसन्ति॒ यद्वै॒व प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति प॒श्चाद्देवैतद्वीर्यं॑ प्र॒जननं॑ क-
रोति॒ तस्मा॑त्पश्चाद्वरी॑यसः प्र॒जननादि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते ॥११॥ नासिका ह वा॒
ऽए॒षा य॒ज्ञस्य यदु॑त्तर॒वेदिः॑ । अथ॒ यदे॑नामुत्तरां॒ वेदे॑रुपकिर॑ति॒ तस्मा॑दुत्तरवेदिर्नाम॑
॥१२॥ द्वय्यो ह वाऽइ॒दमग्रे॑ प्र॒जा आ॑सुः । आ॒दि॒त्याश्चैवाङ्गि॑रसश्च॒ ततो॒ऽङ्गि॑रसः
पूर्व्वे॑ य॒ज्ञꣳ स॑म॒भरं॒स्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचु॑र॒ग्निमि॒मां नः श्वःसु॒त्यामा॑दि॒त्येभ्यः॒ प्रब्रू॑ह्यनेन॑
नो य॒ज्ञेन या॑जय॒तेति॑ ॥१३॥ ते ह॒ादित्या॑ ऊचुः । उप॑जानत यथा॒स्मानि॒वाङ्गि॑रसो
याज॒यान् वयमङ्गि॑रस॒ इति॑ ॥१४॥ ते होचुः । न वाऽअन्येन य॒ज्ञादप॑क्रम॒णम॒स्त्य-
त्रा॒मेव॑ सु॒त्यां क्रि॑यामहा॒ऽइति॑ ते य॒ज्ञꣳ सं॑ज॒ह्रुस्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचुः श्वःसु॒त्यां॑ वै
त्वम॒स्मभ्य॒मग्रे॒ प्रावो॑चो॒ऽथ व॒यम॒द्यसु॒त्या॑मेव॒ तुभ्यं॒ प्रब्रू॒मोऽङ्गि॑रोभ्यश्च तेषां॑ नस्त्वꣳ
होतासीति॑ ॥१५॥ ते॒ऽन्यमे॒व प्र॑तिप्रनि॒न्युः । अ॒ङ्गिर॑सो॒ऽह ते ह्वाप्यङ्गिरसो॒ऽग्नये
ऽन्वाग॑त्य चुक्रुधुरिव क॒थं नु नो दूतश्च॒रन् प्रत्या॑द॒था इति॑ ॥१६॥ स होवाच ।
अनि॑न्द्या वै माव॑दूत॒ सो॒ऽनिन्द्यैर्वृ॒तो नाश॑कमप॒क्रमितु॒मिति॒ तस्मा॑ड ह्नानिन्द्य-
स्य वृ॒तो नाप॑क्रामेत्स॒द्येन सद्यःक्रिया॒ङ्गिर॑स आ॒दि॒त्यानया॑जय॒त्स स॒द्यःक्रीः॑ ॥१७॥
तेभ्यो वाचं॒ दक्षि॑णामानयन् । तां न प्रत्य॑गृह्ण॒न्हास्यामहे॒ यदि॑ प्रतिग्रही॒ष्याम
इति॒ तद्व तद्य॒ज्ञस्य॒ कर्म॒ न व्य॑मुच्यत॒ यद्वा॒क्षिणामासी॑त् ॥१८॥ अथैभ्यः॒ सूर्यं॒ दक्षि॑-
णामानयन् । तं प्रत्य॑गृह्णं॒स्तस्मा॑डु ह् स्माहुर॒ङ्गिर॑सो वयं वाऽअ॒र्वाञ्चो॒ऽनाः स्मो
वयं॒ दक्षि॑णीया॒ ऋषि वाऽअ॒स्माभि॑रिश प्रति॒गृही॑तो य॒ एष तप॑तीति॒ तस्मा॑त्स॒द्यः-
क्रियो॒ऽश्वः श्वेतो दक्षि॑णा ॥१९॥ तस्य रु॒क्मः पु॒रस्ता॑द्भवति । तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑-
यते॒ य एष तप॑ति॒ यद्यश्वं॑ श्वे॒तं न वि॒न्देदपि गौरै॒व श्वेतः॑ स्यात्तस्य रु॒क्मः पु॒र-
स्ता॑द्भवति तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑यते॒ य एष तप॑ति ॥२०॥ तेभ्यो ह वा॒चुक्रोध । के-
न मदैष॒ श्रेया॒न्बन्धु॑ना॒३ केना३ यदे॒तं प्रत्य॑ग्रहीष्ट॒ न मामि॑ति॒ सा हैभ्यो॒ऽपचक्रा-
कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० १०-२१ शतपथब्राह्मण / ४१७
है ॥१०॥
यह पीछे चौड़ी क्यों होती है ? स्त्रियों की प्रशंसा करते हैं कि इनकी श्रोणी (पिछला
भाग) चौड़ी है । पिछले भाग के चौड़े होने से कोख बड़ी हो जाती है । कोख से ही सब प्रजा
उत्पन्न होती है ॥११॥
उत्तर वेदी यज्ञ की नाक है। यह ऊपर को उठी होती है इसीलिए इसका नाम 'उत्तर
वेदी' है ॥१२॥
पहले दो प्रकार की प्रजा थी—आदित्य और अंगिरा । सबसे पहले अंगिरों ने यज्ञ का
आरम्भ किया और अग्नि से बोले, 'आदित्यों से कह दो कि कल हमारे सोम-भाग में शामिल
हों' ॥१३॥
आदित्य बोले, 'ऐसी तरकीब करो कि अंगिरा लोग हमारे यज्ञ में आवें, न कि हम उनके
में' ॥१४॥
उन्होंने कहा, 'इसकी तरकीब केवल यज्ञ ही हैं। हम दूसरा सोम-यज्ञ करें।' उन्होंने
यज्ञ की सामग्री इकट्ठी की, "हे अग्नि, तूने तो हमको कल के सोम-याग का बुलावा दिया है,
हम तो तुझको और अंगिरों को आज के ही सोम-याग का न्योता देते हैं। तू हमारे लिए होता
बन' ॥१५॥
उन्होंने किसी को अंगिरों के पास भेजा । परन्तु अंगिरों ने अग्नि का पीछा किया और
इस पर क्रुद्ध होकर बोले कि जब तू हमारा दूत थी तो तूने हमारा आदर क्यों नहीं किया ॥१६॥
उसने कहा कि 'अनिन्द्य' अर्थात् निर्दोष लोगों ने मेरा वरण किया । निर्दोषों से वरी
जाकर मैं उनका कहना टाल न सकी।' इसलिए अगर कोई निर्दोष मनुष्य किसी (होता) का
वरण कर ले तो उसको इनकार नहीं करना चाहिए। तब अंगिरों ने आदित्यों के सोमयाग को
उसी दिन कराया । उसका नाम है 'सद्यः-क्री' ॥१७॥
उन्होंने उनको वाणी की दक्षिणा दी। उन्होंने उस (वाणी) को स्वीकार नहीं किया,
क्योंकि यदि इसे स्वीकार करेंगे तो हमको हानि होगी। इसलिए यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ क्योंकि उसमें
दक्षिणा की कमी रह गई ॥१८॥
इस पर वे दक्षिणा के लिए उनके पास सूर्य को लाये । उन्होंने सूर्य को स्वीकार कर
लिया । इसीलिए अंगिरा लोग कहते हैं, 'हम याज्ञिक होने के योग्य हैं; हम दक्षिणा लेने के योग्य
हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसका हमने ग्रहण किया है।' इसलिए 'सद्यः-क्री' यज्ञ की
दक्षिणा सफेद घोड़ा होता है ॥१९॥
इस घोड़े के आगे एक सोने का आभूषण होता है। इस प्रकार वह उसका प्रतिरूप हो
जाता है जो ऊपर तपता है (अर्थात् सूर्य) ॥२०॥
अब वाणी उनसे नाराज हो गई—'वह मुझसे किस बात में अच्छा है ? उन्होंने उसको
क्यों स्वीकार किया, मुझे क्यों न स्वीकार किया ?' ऐसा कहकर वह वहाँ से चली गई। और
४१८ शतपथ ब्राह्मण
म्॒ सो॒भया॒नन्त॒रेण॑ दे॒वासु॒रात्स॑य॒त्ताꣳत्सि॒ꣳही भू॒त्वाऽद॑दाना चचार॒ तामुपै॑व दे॒वा अ॑-
मन्त्र॑यन्तो॒पासु॑रा अ॒ग्निरे॒व दे॒वानां॑ दू॒त आस॒ सह्र॑क्षा इ॒त्यसु॑ररक्षस॒मसु॑राणाꣳ ॥२१॥
सा दे॒वानु॒पाव॑र्त्ते॒त्यु॑वाच । यद्व॑ उपा॒ब्रवै॑यं॒ किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॒ पूर्व्व॑मेव॒ त्वयि॑-
राहु॑तिः॒ प्राप्स्यती॒त्यथ॒ हैषा॑ दे॒वानु॑वाच॒ यां मया॒ कां चाशि॑ष॒माशा॑सि॒ष्यध्वे॒ सा वः॑
सर्व्वा॒ समृ॑धिष्यत॒ऽइति॒ सैवं दे॒वानु॒पाव॑वर्त्त ॥२२॥ स य॒द्धार्य्य॑माणे॒ऽग्नौ॑ । उत्त॑रवे-
दिं॒ व्याधा॑रयति॒ यद्वै॒वैना॑म॒दो दे॒वा अ॑ब्रुवन्पूर्व्वी॒ त्वय्ये॒राहु॑तिः॒ प्राप्स्यतीति॒ तद्द्॒वै-
नामे॒तत्पूर्व्वा॑मग्रे॒राहु॑तिः प्राप्नोति॒ वाग्ये॒षा नि॒दाने॒नाथ॒ यदु॑त्तरवे॒दिमु॑प॒किर॑ति य॒-
ज्ञस्यै॒व सर्व॑त्वाय॒ वाग्धि य॒ज्ञो वाग् ध्येषा॒ ॥२३॥ तां वै यु॒गश॒म्येन॒ विमि॑मीते ।
यु॒गेन॒ यत्र॒ हर॑न्ति॒ शम्य॑या॒ यतो॒ हर॑न्ति यु॒गश॒म्येन॒ वै यो॒ग्यं यु॑ञ्जन्ति॒ सा यद्दे॒वाद्ः
सिꣳही॒ भूत्वा॒शान्ताव॑चर॒त्तद्द्॒वैना॑मे॒तद्य॒ज्ञे यु॑नक्ति ॥२४॥ तस्मा॑न्निवृ॒त्तद॑क्षिणां॒ न
प्र॒तिगृ॑ह्णीयात् । सिꣳही॒ ह्येनं॒ भूत्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हा॑माकुर्व्विति सिꣳही॒ ह्यै॒वैनं॒ भू-
त्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हान्य॑स्मै दद्याद्य॒शं तद॒न्यत्रा॒त्मनः॑ कुर्व्विति॒ तस्मा॒द्योऽस्यापि॑ पा-
प॒-इव॑ समा॒नबन्धुः॑ स्या॒त्तस्मा॒ऽएनां॑ दद्या॒त्स यद्ददा॑ति॒ तदेनꣳ॑ सिꣳही॒ भूत्वा॒ न
क्षिणो॑ति॒ यड्ड॑ समा॒नब॑न्धवे॒ ददा॑ति॒ तडु॒ नान्यत्रा॒त्मनः॑ कुरुत॒ऽएषो॑ निवृ॒त्तद॑क्षि-
णा॒यै प्रति॑ष्ठा ॥२५॥ अथ॒ शम्यां॑ च॒ स्फ्यं चा॑दत्ते । तय्य॒ एष पूर्व्वार्धः॑ उत्तरा॒र्धः॑
शङ्कु॒र्भव॑ति॒ तस्मा॒त्प्रत्य॑ङ् प्र॒क्राम॑ति॒ त्रीन्वि॑क्र॒मांस्तच्चा॑त्वालं॒ परि॑लिखति॒ सा चा॑वा-
लस्य॒ मात्रा॒ नात्र॒ मात्रा॑स्ति॒ यत्रै॒व स्वय॑म् मनसा॒ मन्ये॒ताग्रे॑णोत्क॒रं तच्चा॑त्वालं॒ प-
रि॒लिखे॑त् ॥२६॥ स वे॒द्यन्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति त-
प्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि तप्त इति॒ ॥२७॥ अथ॑ पु॒रस्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑
श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति वित्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि वि-
विदान॒ इति॑ ॥२८॥ अथा॑नुवे॒द्यन्त॑म् । प्राचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखत्य-
वतान्मा नाथितेतीमामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॒ नायेत॑न्मावता॒दिति॑ ॥२९॥ अथो॑त्त॒रतः॑ ।
कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ४१६
सिंहिनी बनकर उन दोनों देव और असुरों के बीच में जो कुछ मिला उसको खाने लगी। देवों ने
उसको बुलाया और असुरों ने भी। देवों का दूत 'अग्नि' था और असुर-राक्षसों का 'सह-
रक्षा' ॥२१॥
देवों के पास आने की इच्छा करती हुई वह बोली, 'यदि मैं तुम्हारी ओर आ जाऊँ तो
मुझे क्या मिलेगा ?' 'तेरे लिए अग्नि से भी पूर्व आहुति मिलेगी।' तब उसने देवों से कहा,
'तुम मेरे आशीर्वाद द्वारा जो चाहोगे वह तुमको प्राप्त होगा।' अतः वह देवों के पास चली
गई ॥२२॥
इसलिए उत्तर वेदी में अग्नि का आधान करके जब वह आहुति देता है तो वह आहुति
वाणी को अग्नि से भी पूर्व पहुँच जाती है, क्योंकि देवों ने कहा था कि तुझे अग्नि से पहले ही
आहुति पहुँच जाया करेगी, क्योंकि जो उत्तर वेदी है वह वस्तुतः वाणी ही है। यह जो उत्तर वेदी
को बनाता है वह यज्ञ की पूर्णता के लिए ही बनाता है। वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही यह उत्तर
वेदी है ॥२३॥
वह उस वेदी को युग और शम्या से नापता है—युग से उस स्थान को जहाँ मिट्टी लाते
हैं, और शम्या से उस स्थान को जहाँ से मिट्टी लाते हैं। (शायद युग का अर्थ है डण्डा या जुआ
और शम्या का कील ?) क्योंकि बैलों को जुए और कील से जोता जाता है। चूँकि वह सिंहिनी
बनकर अशान्ति से विचरती रही, इसलिए वह उसको यज्ञ में जोतता (बांधता) है ॥२४॥
इसलिए तिरस्कृत दक्षिणा को न ग्रहण करना चाहिए (अर्थात् यदि एक ऋत्विज् दक्षिणा
न ले तो उस दक्षिणा को दूसरा ऋत्विज न ले), नहीं तो वह सिंहिनी बनकर हानि पहुँचाती है।
न (यजमान) उसे घर वापस ले जाये, क्योंकि सिंहिनी होकर वह उसे हानि पहुँचाती है। वह न
किसी दूसरे को दे, नहीं तो अपने यज्ञ को दूसरे का बना देगा। यदि उसका कोई पापी
रिश्तेदार हो उसे दे दे। तब वह सिंहिनी होकर हानि न पहुँचायेगी। और चूँकि वह अपने ही
रिश्तेदार को देता है इसलिए यज्ञ को अपने से अलग नहीं करता। तिरस्कृत दक्षिणा का यही
निर्णय है ॥२५॥
अब वह शम्या और स्फ्या को लेता है। जहाँ पूर्वार्ध की उत्तरी कील (शंकु) होती है
वहाँ से तीन पग पीछे की ओर भरता है और वहाँ 'चात्वाल' का चिह्न बना देता है। चात्वाल
की मात्रा वही होती है जो उत्तर वेदी की। और कोई मात्रा नहीं है। जहाँ उसका मन चाहे उत्कट
अर्थात् कूड़े के चात्वाल बना दे ॥२६॥
वह वेदी के अन्त से उत्तर की ओर शम्या को रखता है और रेखा खींच देता है इस मन्त्र
को पढ़कर—"तप्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"मेरे लिए तू वह स्थान है जहाँ पीड़ित लोग
सहारा पाते हैं।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है जिस पर वह पीड़ित होकर चलता है ॥२७॥
अब वह आगे की ओर उत्तर को शम्या रखता है और रेखा खींचता है, यह पढ़कर—
"वित्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"तू मेरा धन का स्थान है।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है
क्योंकि यहीं वह धन प्राप्त करके चलता है ॥२८॥
अब वह वेदी के किनारे पर पूर्व की ओर शम्या रखता और रेखा खींचता है, यह पढ़-
कर—"अवतान् मा नाथितात्" (यजु० ५।६)—"मुझे दरिद्रता से बचा।" इससे भूमि से तात्पर्य
है अर्थात् जहाँ-जहाँ दरिद्रता हो वहाँ से मुझे बचा ॥२९॥
अब वह उत्तर की ओर पूर्व को शम्या रखता है और रेखा खींचता है यह मन्त्र पढ़कर-
४२० शतपथ ब्राह्मण
प्राचीᳵ शम्यां नि॒दधा॑ति स प॒रिलि॑ख्य॒त्रतान्मा व्यथि॑ता॒दिती॒मामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॑
व्यथे॒तन्मावता॒दिति॑ ॥ ३०॥ अथ हरति । यत्र॒ हर॑ति॒ तद॒ग्नीडुप॑सीदति॒ स वा॒ऽअ॒-
ग्नीनामेव॒ नामा॑नि गृ॒ह्वन्हर॑ति यान्वा॒ऽअ॒मून्ये॒वा अग्रे॒ऽग्नीन्होत्राय॒ प्रावृ॑णत ते
प्राध॑न्वंस्त॒ऽइमा॒ एव॒ पृथिवीमुप॑सर्पन्न्नि॒मामिव॒ ह्ये॒ऽअस्याः पू॒रे तेनै॒वैता॒न्निदा॑नेन
हर॑ति ॥ ३१॥ स प्रहरति । वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्ने॑ऽअङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेति॑ स
यत्प्राध॑न्वंस्तदायुर॑धाति॒ तत्स॒मीर॑यति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या॒मसीति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या-
मसी॑ति कृत्वा नि॒दधा॑ति प॒त्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेति प॒त्तेऽना॑धृष्टᳵ
॒रक्षोभिर्नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेत्ये॒वैतदा॑हा॒नु वा देव॒वीतय॒ऽइति चतु॒र्थᳵ हर-
ति दे॒वेभ्य॑स्त्वा जु॒ष्टाᳵ हरामीत्ये॒वैतदा॑ह॒ तां वै च॑तुःस्र॒क्तिंश्वा॑वालाद्धरति च॒तस्रो
वै दिश॑ः सर्वाᳵभ्य ए॒वैनमेतद्दि॒ग्भ्यो हर॑ति ॥ ३२॥ अथानु॒व्यूह॑ति । सि॒ꣳह्य॑सि स-
प॒त्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति सा यद्देवा॒दः सि॒ꣳही॑ भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तद्धै॒वैनामेत-
दा॑ह सि॒ꣳह्य॑सीति सपत्नसाहीति॒ वया॒ वयꣳ स॑प॒त्नान्यापो॑यसः क्रि॒यास्मेत्ये॒वैतदा॑ह
दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्य॑ः कल्पयति ॥ ३३॥ तां
वै यु॑गमा॒त्रीं वा स॑र्व॒तः करो॑ति । यज॑मानस्य वा द॒श-द॑श प॒दानि॑ दशाक्षरा॒ वै
वि॒राड्वै वि॒राड्य॒ज्ञो म॑ध्ये नाभिकामिव करोति समा॒नन्नासीनो॒ व्याधा॑रया-
णीति॑ ॥ ३४॥ तामद्भि॒रभ्यु॑क्षति । सा॒ यद्देवा॒दः सिꣳही भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तन्नि॒राप-
स्ताम॒द्भिः श॑मयति॒ योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्यो॑ हिन॒द्मि तस्मा॑दद्भि॒रभ्यु॑-
क्षति ॥ ३५॥ सोᳵऽभ्यु॑क्षति । सि॒ꣳह्य॑सि स॒पत्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः शुन्ध॒स्वेत्य॑थ सि॒कता-
भिरनु॑वि॒किर॒त्यल॑ङ्कारो॒ न्वेव सि॑कता भ्रातृव्य॒ऽइव हि सि॑कता अ॒ग्नेर्वाऽए॒तद्वैश्या-
नर॒स्य भस्म॒ यत्सि॑कता अ॒ग्निं वा॒ऽअस्यामाधास्यन्भव॑ति॒ तथो है॑नाम॒ग्निर्न॑ हिन॒स्ति
त॒स्मात्सि॑कताभि॒रनु॑वि॒किर॑ति॒ सोᳵनु॑वि॒किर॑ति सि॒ꣳह्य॑सि सपत्नसाही दे॒वेभ्य॑ः शु-
म्भस्वेत्यथेनां छादयति सा हूनैताᳵ रात्रिं वसति ॥ ३६॥ ब्राह्मणम् ॥ १[५.१] ॥ ॥
कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / ४२१
“अवतान् मा व्यथि॒तात्” (यजु० ५।६) – “मुझे व्यथा से बचा ।” इससे भी भूमि से तात्पर्य है
अर्थात् 'जहाँ कहीं व्यथा हो वहाँ से बचा' ॥३०॥
अब वह स्फ्या को फेंकता है। जहाँ स्फ्या को फेंकता है वहाँ आग्नीध्र बैठता है। जब वह
फेंकता है तो अग्नियों के नाम लेता जाता है। देवों ने जिन अग्नियों को पहले होत्र के लिए चुना
था वे चली गईं और पृथिवी में घुस गईं-एक इस पृथिवी में और दो उनमें जो इससे परे हैं। वह
उस अग्नि के साथ फेंकता है जो इस (पृथिवी) में घुसी थी ॥३१॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर फेंकता है- “वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्नेऽअ॒ङ्गिर॒ऽआयु॑ना नाम्ना
एहि” (यजु० ५।६) – “नभ नामवाली अग्नि तुझे जाने, हे अङ्गिरा अग्नि, आयु नाम के साथ
जा ।” जिस आयु से वे गुजर गये उस आयु को दिलाता है। फिर प्राणों से सम्पन्न करता है।
नीचे लिखे मन्त्रांश से मिट्टी उठाता है - “योऽस्यां पृथिव्यामसि” (यजु० ५।६) – और नीचे के
मन्त्रांश से उस मिट्टी को उत्तर वेदी में रखता है - “यत्ते॒ऽनाधृ॑ष्टं नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ त्वा दधे”
(यजु० ५।६) – “जो तेरा आदर का नाम हो उससे तुझको रखता हूँ ।” इससे उसका तात्पर्य
यह है कि मैं तुझको उस नाम से रखता हूँ जिसे राक्षसों ने अपमानित नहीं किया। इस मन्त्रांश
से चौथी बार लेता है—"अनु॑ त्वा दे॒ववी॑तये” (यजु० ५।६) – “देवों की प्रसन्नता के लिए
तुझको ।” इससे तात्पर्य है कि तुझसे देव प्रसन्न हैं। इसको वह चौकोर चत्वाल से लेता है। चार
दिशाएँ हैं। अर्थात् वह चारों दिशाओं से लेता है ॥३२॥
अब वह मिट्टी को इस मन्त्रांश से अलग करता है - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः
कल्पस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है। शत्रुओं पर विजयिनी। देवों के योग्य बन ।” चूंकि
वह पहले सिंहिनी बन गई और अशान्त विचरती रही, इसलिए वह उसको कहता है, 'तू सिंहिनी
है।' 'शत्रुओं पर विजयिनी' से तात्पर्य है कि 'तेरे द्वारा हम अपने शत्रुओं पर विजय पावें।' 'देवों
के योग्य बन' अर्थात् उत्तर वेदी स्त्री है, उसको देवों के योग्य बनाता है ॥३३॥
वे इसको चारों ओर से या तो 'युग' के बराबर बनाता है या यजमान के दस-दस पद के
बराबर । विराट् छन्द दश अक्षर का होता है। विराट् वाणी है और वाणी यज्ञ है। बीच में नाभि
के समान है कि एक ही स्थान पर बैठा-बैठा आहुति दे सकूँ ॥३४॥
वह इसे जल से सींचता है। चूंकि वह सिंहिनी होकर अशान्त विचरती रही, अतः जल
शान्ति है, इसलिए वह उसको जल से शान्त करता है। उत्तर वेदी स्त्री है। वह इसको देवों के
योग्य बनाता है, इसलिए वह उसको जल से सींचता है ॥३५॥
वह यह मन्त्रांश पढ़कर जल सिंचन करता है— “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व”
(यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए पवित्र बन ।” अब वह
रेत डालता है। रेत अलंकार है क्योंकि रेत चमकता है। रेत अग्नि वैश्वानर की भस्म है। अब
वह इस पर अग्नि रखेगा, इसलिए अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए वह उस पर रेत
डालता है। इस मन्त्रांश को पढ़कर - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व” (यजु० ५।१०)
“तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए सज ।” अब वह उसे ढक देता है। वह रात-
भर ढकी रहती है ॥३६॥