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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-५, ब्राह्मण-१

२७४ शतपथ ब्राह्मण
ति॒ न्वे॒वाग्रे॒यः पु॑रोडाशो॒ऽथैतावे॒वार्धमासौ॑ मित्रावरुणौ॒ य ए॒वापूर्य॑ते॒ स वरु॑णो
यो॒ऽपक्षी॒यते॒ स मि॒त्रस्तावे॒ताꣳ रात्रि॑मु॒भौ समा॑गच्छतस्तद्भावे॒वैतत्सह॒ सन्तो॑ प्री-
णाति सर्वँ॑ ह॒ वाऽअ॒स्य प्री॒तं भ॑वति सर्व॑मा॒प्तं य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १८ ॥ तद्वाऽए॒-
ताꣳ रात्रि॑ । मि॒त्रो वरु॑णे॒ रेतः॑ सिञ्चति॒ तदे॒तेन॒ रेत॑सा प्रजा॒यते॒ यदा॒पूर्य॑ते॒ तद्य॒-
द्वेषा॒त्र मै॑त्रावरु॒णी प॑य॒स्यावकॢ॑प्ततमा॒ भव॑ति ॥ १९ ॥ सां॒नाय्य॑भाजना॒ वाऽअ॑मावा॒-
स्या । तद्द्यस्त॒त्पौर्ण॑मास्यां क्रियते॒ स य॒द्वात्रा॑पि सं॒नये॒त्सामि॑ कुर्यात्स॒मदं॑ कुर्यात्त॒-
देनम॒द्य ओष॑धिभ्यः संभृत्या॒हुति॑भ्यो॒ऽधिप्र॑जनयति॒ स ए॒ष आ॒हुति॑भ्यो जा॒तः प॒-
श्वादृशे॑ ॥ २० ॥ मिथुना॒द्विद्वाऽए॒नमेतत्प्र॒जन॑यति । योषा॒ पय॑स्या॒ रेतो॑ वा॒जिनं॑ त॒-
द्धाऽअनु॒ध्या यन्मिथुना॒ज्जाय॑ते॒ तदे॒नमे॒तस्मान्मिथुना॒त्प्रज॑ननात्प्र॒जन॑यति॒ तस्मा॒द्येषा॒-
त्र पय॑स्या भवति ॥ २१ ॥ अथ वा॒जिभ्यो॑ वा॒जिनं॑ जुहोति । ऋ॒तवो॒ वै वा॒जिनो॒
रेतो॑ वा॒जिनं॒ तदनु॑ह्येवैतद्रेतः॑ सिच्यते॒ तदृतवो॒ रेतः॑ सि॒क्तमि॒माः प्र॒जाः प्र॒जनय॑-
न्ति॒ तस्मा॑द्वा॒जिभ्यो॑ वा॒जिनं॑ जुहोति ॥ २२ ॥ स वै प॒श्चादिव॑ य॒ज्ञस्य॑ जुहोति । प॒-
श्चाद्धि॒ परीत्य॒ वृषा॒ योषा॑मधि॒द्रव॑ति त॒स्याꣳ रेतः॑ सिञ्चति॒ स वै प्रागे॒वाग्रे जुहो-
त्यग्रे॒ वोद्गा॒त्यनु॑वषट्करोति॒ तत्स्वि॑ष्ट॒कृद्भाजनꣳ स वै प्रागे॒व जुहो॑ति ॥ २३ ॥ अथ॑
दि॒शो व्या॒घार॑यति । दि॒शः प्र॒दिश॒ आदि॑शो वि॒दिश॑ उद्दि॒शो दिग्भ्यः॒ स्वाहेति॑
प॒ञ्च दिशः॑ प॒ञ्चऽर्त॒वस्त॒दृतु॑भिरे॒वैतद्दि॒शो मि॑थुनीक॒रोति॑ ॥ २४ ॥ तद्वै प॒ञ्चैव भक्ष॑-
यन्ति । होता॒ चाध्व॒र्युश्च॒ ब्रह्मा॑ चा॒ग्नीध्र॑ यज॑मानः प॒ञ्च वाऽऋ॒तवस्तदृतूनामे॒वैतद्रूपं॑
क्रियते॒ तदृतु॒ष्वेवैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒तिष्ठा॑पयति प्रथमो यज॑मानो भक्षयति प्रथमो॒ रेतः॑
प॒रिगृह्ना॒नीत्यथो॒ऽअप्यु॑त्त॒मो मय्यु॑त्तमे॒ रेतः॒ प्रति॑तिष्ठा॒दित्य॑पृच्छत॒ उप॑ह्वय॒स्वेति॑ सो-
ममे॒वैतत्कुर्वन्ति॑ ॥ २५ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [४. ४.] ॥ अध्यायः ॥ ४ [१३.] ॥ ॥
प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वाऽइ॒दमग्र॒ऽएक॑ ए॒वास॑ । स ऐक्षत क॒थं नु प्र॒जाये॒येति॒ सो॑ऽश्रा-
म्यत्स तपो॑ऽतप्यत॒ स प्र॒जा असृ॑जत ता अस्य प्र॒जाः सृ॒ष्टाः परा॑बभूवुस्ता॒नीमा॑नि

कां० २, अ० ४, ब्रा० ४-५, कं० १८-२५ व १ शतपथब्राह्मण / २७५
अब अग्नि का पुरोडाश इसीलिए है कि अग्नि यज्ञ को छोड़कर न चला जाय। मित्र और वरुण
अर्धमास हैं। बढ़ता हुआ वरुण है और घटता हुआ मित्र । उस (अमावस्या की) रात्रि को वे
दोनों मिलते हैं। और जब वे मिलते हैं तब (यजमान) दोनों को प्रसन्न करता है। जो इस
रहस्य को समझता है सब उससे प्रसन्न रहते हैं और उसको सब-कुछ प्राप्त होता है ॥१८॥
उसी रात को मित्र वरुण में वीर्य सींचता है। और जब यह (चन्द्र) घटता है तो फिर
उसी वीर्य से उत्पन्न होता है। यह जो मित्र और वरुण की पयस्या (दही) है, वह (सान्नाय्य के)
समान है ॥१९॥
अमावस्या सान्नाय्य के ही योग्य है। यह (अमावस्या को भी) और पूर्णमासी को भी
तैयार किया जाता है। अब यदि वह यहाँ भी (अर्थात् पूर्णमासी को भी) सान्नाय्य बनावे तो
दुहराने के दोष का भागी हो और देवताओं में झगड़ा हो जाय। इस (सोम) को जलों और
ओषधियों से इकट्ठा करके आहुतियों में होकर उत्पन्न करता है। और यह (सोम या चाँद)
आहुतियों से उत्पन्न होकर पश्चिम की ओर चमकता है ॥२०॥
इसको जोड़े से उत्पन्न करता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। जो जोड़े से उत्पन्न
होता है वह ठीक होता है। इसलिए वह इसको जोड़े से उत्पन्न करता है और इसीलिए यहाँ
पयस्या तैयार की जाती है ॥२१॥
अब मट्ठे की आहुति दोनों घोड़ों (वाजियों) के लिए दी जाती है। घोड़े (वाजी) ऋतुएँ
हैं और (वाजी) मट्ठा वीर्य है। यह वीर्य अनुष्ठान से सींचा जाता है। सींचे हुए वीर्य से ऋतुएँ
इन प्रजाओं को उत्पन्न करती हैं। इसीलिए 'बाजी' घोड़े के लिए 'वाजी' मट्ठे की आहुति देता
है। ('वाजी' घोड़े को भी कहते हैं और मट्ठे को भी) ॥२२॥
वह यज्ञ के पीछे की ओर से आहुति देता है। पीछे की ओर से ही पुरुष स्त्री के पास
जाता और वीर्य-सिंचन करता है। वह पहले पूर्व की ओर आहुति देता है। 'अग्ने वीहि' (हे अग्नि,
स्वीकार करो) यह पढ़कर वषट्कार को दुहराता है। यह स्विष्टकृत् के बदले में है। इसको पूर्व
की ओर देता है ॥२३॥
अब वह इस मन्त्र से दिशाओं के लिए आहुति देता है—'दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिश-
ऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा' (यजु० ६।१९)। पाँच दिशाएँ हैं और पांच ऋतुएँ। इस प्रकार दिशाओं
का जोड़ा मिलाता है ॥२४॥
(चमसे में जो मट्ठा बच रहता है उसे) पाँच लोग चखते हैं—होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा,
आग्नीध्र और यजमान। पाँच ही तो ऋतुएँ हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं का तद्रूप हो जाता है।
और जो वीर्य सींचा जाता है वह प्रतिष्ठित हो जाता है। यजमान (यह सोचते हुए) पहले चखता
है कि मुझे पहले वीर्य की प्राप्ति हो। और वह पीछे भी चखता है कि मुझमें वीर्य अन्त तक रहे।
'उपहूत उपह्वयस्व' कहकर वह इस (मट्ठे) को मोम बना लेता है ॥२५॥
चातुर्मास्यानि
अध्याय ५—ब्राह्मण १
पहले केवल प्रजापति ही था। उसने सोचा कि कैसे प्रजा उत्पन्न करूँ.? उसने श्रम किया
और तप तप। उसने प्रजा उत्पन्न की। वह उत्पन्न हुई प्रजा गुजर गई। यह वे पक्षी हैं। पुरुष

२७६ शतपथ ब्राह्मण
व्‍॒याग्‍ꣳसि॑ पु॒रुषो॒ वै प्र॒जाप॑ते॒र्नेदि॑ष्ठं द्वि॒पाद्वाऽअ॒यं पु॑रु॒षस्तस्मा॑द्द्वि॒पादो॒ व्‍॒याग्‍ꣳसि॑
॥ १॥ स॒ ऐक्ष॑त प्र॒जाप॑तिः । य॒था॒ न्वे॑व॒ पुरोको॒ऽभूव॑मे॒वम् न्वे॒वाय॑त्ये॒कैक॑ ए॒वास्मी॒-
ति॒ स द्वि॒तीयाः॑ ससृजे ता अ॑स्य॒ परे॑व बभूवु॒स्तदि॒दं क्षु॒द्रꣳ स॑रीसृ॒पं यद॒न्यत्स॑र्पे-
भ्यस्तृ॒तीयाः॑ ससृज॒ऽइत्या॑हु॒स्ता अ॑स्य॒ परे॑व बभूवु॒स्तऽइ॒मे सर्पा॒ इता॒ ह॒ न्वे॑व॒
द्वयोर्या॑ज्ञवल्क्य उवाच त्रयी॑रु तु॒ पुन॒र्मृचा॑ ॥ २॥ सो॒ऽर्चञ्छ्राम्यन्प्र॒जाप॑तिरी॒क्षां च॑-
क्रे । क॒थं नु मे प्र॒जाः सृ॒ष्टाः प॒राभव॑न्तीति॒ स है॒तदे॒व द॑र्शानशनत॒या वै मे प्र॒-
जाः प॒राभव॑न्तीति॒ स आ॒त्मन॑ ए॒वाग्रे॒ स्तन॑योः पय॒ आप्या॑ययां चक्रे॒ स प्र॒जा अ॑-
सृजत॒ ता अ॑स्य प्र॒जाः सृ॒ष्टा स्तना॑वे॒वाभि॑पद्य॒ तास्ततः॒ सम्ब॑भूवु॒स्ता इ॒मा अप॑रा-
भूताः॑ ॥ ३॥ तस्मा॑देतदृषि॑णा॒भ्यनू॑क्तम् । प्र॒जा ह॒ तिस्रो॒ऽअत्या॑य॒मीयु॒रिति॒ तयाः॑ प॒-
राभू॑ता॒स्ता ए॒वैतद॒भ्यनू॑क्तं॒ न्यन्या अ॒र्कम॑भि॒तो वि॑विश्रु॒रित्‍य॒ग्निर्वाऽअ॒र्कस्तद्य॒ा इ॒-
माः प्र॒जा अप॑राभूता॒स्ता अ॒ग्निम॑भि॒तो निवि॑ष्टा॒स्ता ए॒वैतद॒भ्यनू॑क्तम् ॥ ४॥ म॒हद्द्ध॒
तस्थौ॒ भुव॑नेष्व॒न्तरिति॑ । प्र॒जाप॑तिमे॒वैतद॒भ्यनू॑क्तं पव॑मानो॒ हरित॒ आवि॑वेशेति दि॒-
शो वै हरि॑त॒स्ता अ॒यं वायुः॑ पव॑मान॒ आवि॑ष्ट॒स्ता ए॒वैषो॑ऽर्ग॒भ्यनू॑क्ता॒ ता इ॒माः प्र॒-
जास्तथै॑व प्र॒जाय॑न्ते॒ यथै॑व प्र॒जाप॑तिः प्र॒जा अ॒सृज॑तै॒तद्ध॑ ह्य॒ य॒दैव स्त्रियै॒ स्तना॒वा-
प्यायेते॒ऽऽधः प॒शूना॒मथै॑व यज्जाय॑ते॒ तज्जाय॑ते॒ तास्तत॑ स्तना॑वे॒वाभि॒पद्य॒ सम्भ॑व-
न्ति ॥ ५॥ तद्वै पय॑ ए॒वान्न॑म् । ए॒तद्ध्य॑ग्रे प्र॒जाप॑तिर॒न्नमज॑नयत॒ तद्धाऽअन्न॑मेव॒ प्र॒जा
अ॒न्नाद्धि सम्भ॑वती॒तद्ध॑ हि॒ यासां॒ पयो॒ भव॑ति स्तना॑वे॒वाभि॑पद्य॒ तास्ततः सम्भ॑व-
न्‍त्‍यथ॒ यासां॒ पयो॒ न भव॑ति जा॒तमे॑व॒ ता अथा॑दयन्ति॒ तद्वा ता अ॒न्नादे॑व॒ सम्भ॑वन्ति
तस्मा॒दन्न॑मेव॒ प्र॒जाः ॥ ६॥ स यः प्र॒जाका॑मः । ए॒तेन॑ ह॒विषा॒ यज॑त॒ऽआत्मान॑मे॒वै-
तद्य॒ज्ञं वि॑धत्ते प्र॒जाप॑तिं भू॒त्व ॥ ७॥ ॥ शतम् १२०० ॥ ॥ स वाऽऽग्ने॒योऽष्टाक॑-
पालः पुरोडा॑शो भव॑ति । अ॒ग्निर्वै दे॒वतानां॑ मु॒खं प्र॒जनयि॑ता स॒ प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑-
दाग्ने॒यो भव॑ति ॥ ८॥ अथ सौम्यश्चरुर्भव॑ति । रेतो॒ वै सोम॑स्तद॒ग्नौ प्र॒जनयि॑तरि

कां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २७७
प्रजापति के निकटतम है। पुरुष के दो पैर होते हैं, इसलिए चिड़ियों के भी दो पैर होते हैं ॥१॥
प्रजापति ने सोचा कि मैं पहले भी अकेला था और अब भी अकेला हूँ। इसलिये उसने
दुबारा सृष्टि की। वह भी गुजर गई। ये वे कीड़े हैं जो साँप के अतिरिक्त हैं। कहते हैं कि
उसने तीसरी बार सृष्टि की। वह भी गुजर गई। वे साँप हैं। याज्ञवल्क्य उसको दो प्रकार के
बताते हैं, परन्तु ऋग्वेद के अनुसार तीन प्रकार के हैं ॥२॥
प्रजापति ने पूजा और श्रम करते हुए सोचा कि मेरी बनाई प्रजा गुजर कैसे जाती है ?
तब उसे मालूम हुआ कि मेरी प्रजा बिना भोजन के मर जाती है। इसलिये उसने अपने स्तनों में
पहले से ही दूध भर दिया। तब उसने प्रजा उत्पन्न की, और यह उत्पन्न प्रजा स्तनों का दूध
पीकर जीती रही। ये वे हैं जो मरे नहीं ॥३॥
इसीलिये ऋषि ने ऐसा कहा—"प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः" (ऋ० ८।१०१।१४)—
"तीन प्रजाऐं मर चुकीं" यह उसके लिए कहा गया जो मर चुकीं। "न्यन्याऽअर्कमभितो विविश्रे"
(ऋ० ८।१०१।१४)--"दूसरी आग (प्रकाश) के चारों ओर बस गई।" 'अग्नि' ही 'अर्क' है।
इसलिये कहा कि जो प्रजा जीती रही वह अग्नि के चारों ओर बस गई ॥४॥
"महद्ध (बृहद्व) तस्थौ भुवनेष्वन्तः" (ऋ० ८।१०१।१४)—"महान् (आत्मा) भुवनों के
भीतर रही।" यह प्रजापति के विषय में कहा गया। "पवमानो हरितऽआविवेश" (ऋग्वेद
८।१०१।१४)—"पवमान (पवित्र करनेवाला वायु) देशों में प्रवेश हो गया।" 'हरित' का अर्थ
है दिशाएं। 'पवमान' यह हवा है। यह हवा ही दिशाओं में भर गई। इसी का ऋचा में संकेत
है। जिस प्रकार प्रजापति ने इन प्रजाओं को उत्पन्न किया, उसी प्रकार ये उत्पन्न होते हैं।
क्योंकि जब स्त्रियों और पशुओं के थनों में दूध आ जाता है तभी बच्चा पैदा होता है, और स्तन
को पीकर ही वे जीते हैं ॥५॥
यह दूध ही अन्न है, क्योंकि प्रजापति ने पहले इसी भोजन को उत्पन्न किया। अन्न ही
प्रजा है क्योंकि अन्न ही से यह उत्पन्न होती हैं। जिनके स्तनों में दूध है उसको पीकर ही वे
जीते हैं। और जिनके दूध नहीं होता वे अपने बच्चों को जन्मते ही 'चुगा' देते हैं। इस प्रकार
वे अन्न से ही जीते हैं, इसलिये अन्न ही प्रजा है ॥६॥
जो सन्तान की कामना करता है वह इस हवि से यज्ञ करता है। इस प्रकार अपने को
प्रजापतिरूपी यज्ञ बना लेता है ॥७॥
अग्नि का पुरोडाश आठ कपालों में होता है। अग्नि ही देवतागणों का मुख और उत्पादक
है। वह प्रजापति है। इसलिए अग्नि के लिए पुरोडाश होता है ॥८॥
इसके पीछे सोम का चरु होता है। सोम वीर्य है और वह उत्पादक अग्नि में है। वह

२७८ शतपथ ब्राह्मण
सोम॑ꣲ रे॒तः सिञ्चति॒ तत्पु॒रस्तान्मिथु॒नं प्र॒जन॑नम् ॥ ९॥ अथ सावि॒त्रः। द्वाद॑शक-
पालो वा॒ष्टाक॑पालो वा पुरो॒डाशो॑ भवति सविता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता प्र॒जाप॑-
तिर्मध्य॒तः प्र॒जनयिता॒ तस्मा॑त्सावि॒त्रो भ॑वति ॥ १०॥ अथ सारस्व॒तश्च॒रुर्भवति ।
पौष्णश्च॒रुर्योषा॒ वै सर॑स्वती॒ वृषा॑ पू॒षा तत्पुन॑र्मिथु॒नं प्र॒जनन॑मे॒तस्माद्द्वाऽउ॒भयतो
मिथु॒नात्प्र॒जन॑नात्प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः स॒सृज॒ऽइत॒श्चोर्ध्वा इत॑श्चावाची॒स्तथो॒ऽए॒वैष ए॒त-
स्मादु॒भयत॑ ए॒व मिथु॒नात्प्र॒जन॑नात्प्र॒जाः सृ॑जत॒ऽइत॒श्चोर्ध्वा इत॑श्चावाची॒स्तस्मा॑द्वाऽए॒-
तानि॒ पञ्च॑ ह॒वीꣳषि॒ भव॑न्ति ॥ ११॥ अथातः पयस्याया ए॒वायत॑नं । मारु॒तस्तु स॒-
प्तक॑पालो॒ विशो॒ वै म॒रुतो॑ दे॒ववि॒शस्ता हेद॒मनि॑षेद्धा-इव चेरुर॒न्तः प्र॒जाप॑तिं य-
जमानमुपेत्योचुर्वि॒ वै ते मथिष्यामहू॒ऽइमाः प्र॒जा या ए॒तेन॑ ह॒विषा॒ सद्य॒त्सꣳ॑ऽस्कृति
॥ १२॥ स ऐक्षत प्र॒जाप॑तिः । पु॒रा मे पूर्वाः प्र॒जा अभू॑वन्नि॒मा उ॒ चेदि॒मे विम॑थुते
न॑ ततः॒ किं चन परि॑शेक्ष्यत॒ऽइति॑ तेभ्य ए॒तं भाग॒मक॑ल्पयदे॒तं मारु॒तं स॒प्तक॑पा-
लं पु॒रोडाशं॒ स ए॒ष मारु॒तः स॒प्तक॑पालस्तद्यत्स॒प्तक॑पालो भ॑वति स॒प्त-स॒प्त हि
मारु॒तो ग॒णस्तस्मा॑न्मारु॒तः स॒प्तक॑पालः पुरो॒डाशो॑ भवति ॥ १३॥ तं वै स्वत॑वो-
भ्य॒ इति॑ कुर्यात् । स्व॒यꣳ हि त॒ऽए॒तं भाग॒मकु॑र्वत॒ोतो स्वत॑वोभ्यो याज्यानुवाक्ये॒
न वि॒न्दन्ति॒ स उ॒ खलु मारुत॑ ए॒व स्यात्स वा॒ऽए॒ष प्र॒जाभ्य ए॒वाहि॑ꣳसायै क्रियते
तस्मान्मारु॒तः ॥ १४॥ अथातः पय॒स्यैव । पयसो॒ वै प्र॒जाः सम्भ॑वन्ति॒ पय॑सः सम्भू-
तास्तद्य॒त ए॒व सम्भू॒ता यतः सम्भ॑वन्ति॒ तदे॒वाभ्य ए॒तत्करोति तया॑ः पू॒र्वैर्ह॒विर्भिः
प्र॒जाः सृ॒जते॒ ता ए॒तस्मात्पयस ए॒तस्यै॑ पय॒स्यायै॒ सम्भ॑वन्ति ॥ १५॥ तस्यां॑ मिथु॒नम॑-
स्ति । योषा॒ पय॒स्या रेतो वा॒जिनं॒ तस्मान्मिथु॒नाद्वि॒श्वमसं॑मितमनु॒ प्राजा॑यत तद्य॒-
देत॒स्मान्मिथु॒नाद्वि॒श्वमसं॑मितमनु॒ प्राजा॑यत॒ तस्मा॑द्वैश्वदे॒वी भ॑वति ॥ १६॥ अथ द्या-
वापृथि॒व्य ए॑ककपालः पुरो॒डाशो॑ भव॑ति । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा
ता द्यावा॑पृथिवी॒भ्यां पर्य॑गृह्णात्ता इमा द्यावा॑पृथिवी॒भ्यां परि॑गृहीतास्तथो॒ऽए॒वैष

कां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० ९-१७ शतपथब्राह्मणं / २७६
अग्नि उस सोम या वीर्य को सींचता है। इस प्रकार उत्पादक जोड़ा होता है ॥९॥
अब आठ या बारह कपालों में सविता के लिए पुरोडाश होता है। सविता देवों का प्रेरक
है। वह प्रजापति है। बीच का जनक है। इसलिये पुरोडाश होता है ॥१०॥
अब सरस्वती के लिए चरु आता है, और एक चरु पूषा के लिए। सरस्वती स्त्री है और
पूषा पुरुष। इस प्रकार जननेवाला जोड़ा मिल गया। इस प्रकार दो प्रकार के जोड़ों के मिलने से
प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न किया-एक से ऊपर की और एक से नीचे की। इसलिये इनके पाँच
हवियाँ होती हैं (अर्थात् १. अग्नि का पुरोडाश, २. सोम का चरु, ३. सविता का पुरोडाश,
४. सरस्वती की चरु, ५. पूषा का चरु) ॥११॥
अब इसके पश्चात् पयस्या का आयतन एवं मरुत् का सात कपालों का पुरोडाश। मरुत्
हैं वैश्य अर्थात् देवों के आदमी। वे स्वतन्त्र फिरते थे। जब प्रजापति यज्ञ कर रहा था तो उन्होंने
उसके पास जाकर कहा—'तू इस यज्ञ के द्वारा जो प्रजा उत्पन्न करेगा, उसे हम नष्ट कर
डालेंगे' ॥१२॥
प्रजापति ने सोचा कि मेरी पहली प्रजाजायें तो मर चुकीं। यदि (मरुत्) इस प्रजा को भी
मार डालेंगे, तो कुछ न बचेगा। इसलिये उसने उनके लिए अलग भाग रख दिया, अर्थात् सात
कपालों में मरुत् के लिए पुरोडाश। ये सात कपाल इसलिए होते हैं कि मरुत् लोगों के सात-
सात के गण* होते हैं। इसलिये मरुतों के सात कपाल होते हैं ॥१३॥
'स्वतवोभ्यः' (अपने स्वत्व को बढ़ानेवालों के लिए) ऐसा कहकर आहुति देनी चाहिए,
क्योंकि उन्होंने अपने स्वत्व को ले लिया। परन्तु यदि याज्ञिकों को याज्य-अनुवाक्य न मिले तो
केवल 'मरुतों के लिए' ऐसा कर देवें। यह प्रजा की अहिंसा के लिए किया जाता है, इसलिये
मरुतों के लिए होता है ॥१४॥
अब इसके बाद पयस्या की आहुति। दूध से ही प्रजाएँ पलती हैं, दूध से ही प्रजाएँ पली
थीं। इसलिये वह अब उनके लिए उसी की आहुति देता है जिसके द्वारा वे पली थीं। जिसको
प्रजापति ने पहली हवियों से उत्पन्न किया, वे दूध से ही पलती हैं अर्थात् उसी पयस्या
से ॥१५॥
इसमें जोड़ा हो जाता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। इसी जोड़े से क्रमानुसार
अनन्त विश्व उत्पन्न हुआ। और चूंकि इस जोड़े से विश्वदेव उत्पन्न हुआ इसलिए इसको 'वैश्व-
देवी' अर्थात् सब देवों की आहुति कहते हैं ॥१६॥
अब एक कपाल पर द्यावापृथिवी की आहुति होती है। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा
को उत्पन्न करके द्यौ और पृथिवी के बीच में रख दिया, इसलिये ये द्यौ और पृथिवी के बीच

  • त्रिः षष्टिरत्वा मरुतो वावृधाना उस्रा इव राशयो यज्ञियासः। उप त्वेमः कृधि नो भागधेय
    शुष्मं त एना हविषा विधेम (ऋ० ८।६६।८)। यहाँ ६३ मरुत् हैं। उनके सात-सात के नौ
    गण हुए।