शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-४, ब्राह्मण-१
२५६ शतपथ ब्राह्मण
र॒णेष्ठित्ये॒ते ह वाऽअ॒ध्वानो वार॑णा य॒ऽइमेऽन्त॒रेण द्यावा॑पृथि॒वीऽए॒तान्त्ये॒तदुप॑-
तिष्ठते तस्मादाह॒ नाध॑सु वार॒णेष्ठि॑ति ॥ ३७॥ अथैन्द्री॑ । इन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॑
सेन्द्र॑मे॒वैतद॒ग्न्युप॒स्थानं॑ कुरुते क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुष॒ऽइति य-
ज॑मानो॒ वै दा॒श्वाञ् य॒जमा॑नाय दुह्युसीत्ये॒वैतदा॒होपो॑पेन्नु म॑घवन्भूय॒ इन्तु ते दानं॑
दे॒वस्य॑ पृच्यत॒ऽइति॒ भूयो॑-भूय ए॒व न इ॒दं पु॒ष्टं कु॑र्वित्ये॒वैतदाह ॥ ३८॥ अथ सा-
वि॒त्री । सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तथो हास्माऽए॒ते स॑वितृप्रसूता ए॒व सर्वे॑
कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि । धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया-
दिति॑ ॥ ३९॥ अ॒थाग्ने॒यी । तद॒ग्नय॑ऽए॒वैतदा॒त्मानम॒न्ततः॑ परि॒ददा॑ति गु॒प्त्यै परि॑ ते
दू॒डभो॒ रथो॒ऽस्मां॥३७अ॒ग्ने॑तु वि॒श्वत॑ः । येन॑ र॒क्षसि॑ दा॒शुष॒ इति॑ य॒जमाना॒ वै दा॒-
श्वां॑सो॒ यो ह वाऽअ॑स्यानाधृष्यतमो॒ रथ॒स्तेने॒ष य॒जमाना॑न॒भिर॑क्षति॒ स यस्ते॑ऽना-
धृष्य॑तमो॒ रथो॒ येन॑ य॒जमाना॑न॒भिरक्ष॑सि॒ तेन॑ नः सर्व॑तोऽभिगोपायेत्ये॒वैतदाह त्रि-
रेत॑ञ्जपति ॥ ४०॥ अथ पुत्रस्य नाम गृ॑ह्णाति । इ॒दं मे॒ऽयं वी॒र्यं॑ पु॒त्रोऽनु॒संत॑नव-
दिति॒ यदि॑ पु॒त्रो न स्याद॒प्यात्मन ए॒व नाम॑ गृ॒ह्णीयात् ॥ ४१॥ ब्राह्म॑णम् ॥ २ [३.
४] ॥ अध्यायः ॥ ३ [१२] ॥ ॥
अथ हुतेऽग्निहोत्र॒ऽउप॑तिष्ठते । भूर्भुवः॒ स्वरिति तत्स॒त्येने॑वैतद्वाच॒ समर्थ॑य-
ति यदाह॒ भूर्भुवः॒ स्वरिति तया समृ॑द्ध्याशिषमाशास्ते सुप्र॒जाः प्र॒जाभि॑ स्यामिति॒
तत्प्र॒जामाशा॑स्ते सु॒वीरो वी॒रैरिति॒ तद्वी॒रानाशा॑स्ते सु॒पोषः॒ पोषैरिति तत्पुष्टि॒मा-
शास्ते ॥ १॥ यद्वाऽअ॒दो दी॒र्घम॒ग्न्युप॒स्थानम् । अशीरिव ताशीरियं तदे॒ताव॑तैवै-
तत्सर्व॑माप्नोति॒ तस्मा॑दे॒तेनै॒वोप॑तिष्ठेतैतेन॒ त्वेव॑ वयमुपचराम॒ इति॑ ह स्माहातु-
रिः ॥ २॥ अथ प्रवत्स्यन् । गा॒र्हप॒त्यमे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते॒ऽथाहावनीय॑म् ॥ ३॥ स गा-
र्हपत्यमुप॑तिष्ठते । नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पा॒हीति॑ प्र॒जाया है॒ष ई॑ष्टे॒ तत्प्र॒जामे॒वास्माऽए॒त-
त्परि॑ददाति गु॒प्त्यै ॥ ४॥ अथाहावनीय॒मुप॑तिष्ठते । शं॒स्य पशून्मे पा॒हीति॑ पशूना॒-
कां० २, अ० ३-४, ब्रा० ४-१, कं० ३७-४१ व १-५ शतपथब्राह्मण / २५७
यहाँ कहा 'नाध्वसु वारणेषु (भयानक मार्गों में)' क्योंकि द्यौ और पृथिवी के बीच के मार्ग
भयानक हैं। इन्हीं मार्गों में उसको चलना है। इसलिए कहता है 'भयानक मार्गों में' ॥३७॥
अब इन्द्र की स्तुति है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। इसलिए इन्द्र से ही अग्नि के उपस्थान
को सम्बद्ध करता है, "कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे" (यजु० ३।३४)- "हे इन्द्र ! तू
कभी रिक्त (barren) नहीं, और कभी अपने सेवक को विफल नहीं करता।" 'दाशुषे' का
तात्पर्य है यजमान । 'तू यजमान से कभी द्रोह नहीं करता' इस मन्त्र के पढ़ने से यही तात्पर्य है।
अब कहता है, "उपोषेन्नु मघवन् भूयऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते" (यजु० ३।३४)-'हे मघवन्,
तुझ देव का दान अधिक ही होता जाता है।" इसका तात्पर्य यह है कि हमको यहाँ अधिक पुष्ट
कर ॥३८॥
अब सावित्री का जाप है। सविता देवों का प्रेरक है। सविता की प्रेरणा से ही सब काम
सफल होते हैं। इसलिए कहा "तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्'
(यजु० ३।३५) ॥३९॥
अब अग्नि के लिए एक मन्त्र है। अपने को अन्त में रक्षार्थ अग्नि के ही समर्पण करता
है, "परि ते दूडभो रथोऽस्माँऽ अश्नोतु विश्वतः । येन रक्षसि दाशुषः" (यजु० ३।३६)-"तेरा
अवध्य रथ हमको चारों ओर से ढक ले जिससे तू पूजकों की रक्षा करता है।" 'दाशुषः' का अर्थ
है यजमान । और अग्नि के पास जो अवध्य रथ है उससे वह यजमानों की रक्षा करता है। इस
कहने का तात्पर्य है कि 'हे अग्नि, जो अवध्य रथ तेरे पास है और जिससे तू यजमानों की रक्षा
किया करता है, उससे हर ओर से हमारी रक्षा कर।' तीन बार इसको जपता है ॥४०॥
अब वह अपने पुत्र का नाम लेता है- 'मेरा यह लड़का (नाम लेकर) मेरे इस एक क्रम
को जारी रखे।' यदि उसके पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ले ॥४१॥
अध्याय ४ - ब्राह्मण १
अग्निहोत्र के पश्चात् वह अग्नि को 'भूर्भुवः स्वः' (यजु० ३।३७) कहकर प्रार्थना करता
है। ऐसा कहकर वह अपनी वाणी को सत्य से पवित्र करता है, और वाणी को पवित्र करके
आशीर्वाद माँगता है- "सुप्रजाः प्रजाभिः स्याँ७" (यजु० ३।३७) अर्थात् "मैं अच्छी सन्तान-
वाला होऊँ।" इससे सन्तान को चाहता है। "सुवीरो वीरैः" (यजु० ३।३७), इससे वीरों को
चाहता है। "सुपोषः पोषैः" (यजु० ३।३७), इससे पुष्टि चाहता है ॥१॥
वह बड़ी प्रार्थना भी आशीर्वाद थी और यह छोटी प्रार्थना भी उसी के लिए। इसलिए
इससे भी वह सबको प्राप्त करता है, इसलिए वह यह प्रार्थना करे। असुरि का कथन है, 'हम इसी
से (अग्निहोत्र) करें' ॥२॥
यदि प्रवास (यात्रा) करना हो तो पहले गार्हपत्य में जावे, फिर आहवनीय में ॥३॥
प्रजापति के पास जाकर कहे, "नर्य प्रजां मे पाहि" (यजु० ३।३७)- "हे नरों के मित्र,
मेरी सन्तान की रक्षा कर।" (गार्हपत्य अग्नि) प्रजा का अधिष्ठाता है, इसलिए रक्षा के लिए
वह प्रजा को उसी के सुपुर्द कर जाता है ॥४॥
अब आहवनीय के पास जाकर कहता है, "शँस्य पशून् मे पाहि" (यजु० ३।३७) -
२५८ शतपथ ब्राह्मण
है॒ष इ॑ष्टे तत्पशूने॒वास्मा॒ऽएतत्परि॑ददाति गु॒प्त्यै ॥५॥ अथ॒ प्र वा॑ व्रजति॒ प्र वा
धावय॑ति । स यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तत्स्यन्द्वा॒ वाचं॒ विसृ॑जतेऽथ॒ प्रोष्य॒ परे॑त्य॒ यत्र
वेलां॒ मन्य॑ते तद्वाचं यच्छति स यद्यपि रात्रात्तरेण स्यान्नैव तमुपेयात् ॥६॥ स
आ॒ह॒व॒नी॒यमे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते । अथ गार्हपत्यं गृहा वै गार्हपत्यो गृहा वै प्रति-
ष्ठा तद्गृ॒हे॒ष्वे॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥७॥ स आ॒ह॒व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते । आ॒गन्म॒
विश्ववे॑दसम॒स्मभ्यं॒ वसु॑वित्तमम् । अग्ने॒ सम्राड॒भि द्यु॒म्नम॒भि सह॒ आय॑च्छ॒स्वेत्यथो॑प-
विश्य॒ तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पति ॥८॥ अथ॒ गार्ह॑पत्यमु॒पति॑ष्ठते । अ॒यम॒ग्निर्गृहप॑ति॒र्गार्ह॑प-
त्यः प्र॒जाया॒ वसु॑वित्तमः । अग्ने॒ गृह॑पते॒ऽभि द्यु॒म्नम॒भि सह॒ आय॑च्छ॒स्वेत्यथो॑प॒विश्य॒
तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पत्ये॒तन्नु॑ रूपे॒नैते॒न न्वे॑व भूयि॑ष्ठा इ॒वोपति॑ष्ठन्ते ॥९॥ स वै खलु तू-
ष्णीमे॒वोपति॑ष्ठेत । इदं॒ वै यस्मि॒न्वस॑ति ब्राह्म॒णो वा राजा॑ वा श्रेया॒न्मनु॒ष्यो॒
न्वे॑व॒ तमे॑व॒ नार्ह॑ति॒ वक्तु॑मि॒दं मे॒ त्वं गो॑पाय॒ प्राहुं॑ वत्स्यामी॒त्यास्म॒न्नेते श्रेयाꣳ॑सो
वस॑न्ति देवा॒ अग्न॑यः क उ॒ तान॑र्हति॒ वक्तु॑मि॒दं मे यूयं गो॑पायत॒ प्राहुं॑ वत्स्यामी-
ति ॥१०॥ मनो॑ ह॒ वै देवा॒ मनुष्य॑स्याजा॒नन्ति॑ । स वे॑द॒ गार्ह॑पत्यः परि॒दां मे॒दमु॑-
पागा॒दिति॑ तूष्णीमे॒वाह॑व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते स वे॑दाहव॒नीयः॑ परि॒दां मे॒दमु॑पागा॒दिति॑
॥११॥ अथ॒ प्र वा॑ व्रजति॒ प्र वा धावय॑ति । स यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तत्स्यन्द्वा॒ वा-
चं॒ विसृ॑जतेऽथ॒ प्रोष्य॒ परे॑त्य॒ यत्र॒ वेलां॒ मन्य॑ते तद्वाचं॒ यच्छ॑ति स यद्य॑पि रा॒त्रात्त॑-
रेण स्यान्नैव तमुपेयात् ॥१२॥ स आ॒ह॒व॒नीय॑मे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते । अथ॒ गार्ह॑पत्यं
तूष्णीमे॒वाह॑व॒नीय॑मु॒पति॑ष्ठते तूष्णीमुप॒विश्य॒ तृणा॒न्यप॑ल्लुम्पति तूष्णीमेव गार्हपत्य-
मुपतिष्ठते तूष्णीमुपविश्य तृणान्यपल्लुम्पति ॥१३॥ अथातो गृहाणामेवोपचारः ।
ए॒तद्वै॒ गृहपतेः प्रो॒षु॒ष आ॒ग॒ताद्गृ॒हाः समुत्त्र॒स्ता इ॑व भवन्ति किम॒यमि॒ह वदि॑-
ष्यति॒ किं वा करिष्यतीति स यो॒ ह॒ तत्र॒ किंचि॒द्वद॑ति वा करो॑ति वा तस्मा॒द्गृ-
हाः प्रत्र॒सन्ति तस्येश्व॒रः कुलं विलोभ्यो॒रथ॒ यो॒ ह॒ तत्र॒ न वद॑ति॒ न किं च॒न क॑-
का० २, अ० ४, ब्रा० १, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / २५६
"हे प्रशंसनीय, मेरे पशुओं को बचा।" (आहवनीय अग्नि) पशुओं का अधिष्ठाता है, इसलिए
पशुओं की रक्षा के लिए (आहवनीय के) सुपुर्द करता है ॥५॥
अब वह चलता है या (किसी यान में बैठकर) रवाना होता है, और जिस किसी सीमा
को मान लेता है वहां तक चलकर बोलता है (अर्थात् अब तक मौन था, अब बोलता है)। और
जब यात्रा से वापस आता है तो मानी हुई सीमा के भीतर आने पर मौन रहता है और चाहे
उस समय घर में राजा भी उपस्थित हो (तो भी उसके पास न जाकर) पहले अग्नि के पास
जाता है ॥६॥
पहले आहवनीय के पास और फिर गार्हपत्य के पास जाता है। गार्हपत्य ही घर है
और घर ही प्रतिष्ठा का स्थान है। इसलिए वह अपने को घर में अर्थात् प्रतिष्ठा के स्थान में
स्थापित करता है ॥७॥
वह इस मन्त्र से आहवनीय में जाता है—"आगन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम् ।
अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व" (यजु० ३।३८) —"हे सम्राट् अग्नि ! हम तुझ
विश्ववेद (सबके जाननेवाले), वसुवित्तम (धन बांटनेवाले) के पास आते हैं। हमको प्रकाश
और बल दे।" और तृणों से आग को हाँकता है ॥८॥
इस मन्त्र से गार्हपत्य के पास जाता है—"अयमग्निर्गृहपतिर्गाहपत्यः प्रजाया वसुवित्तमः ।
अग्ने गृहपतेऽभि द्युम्नमभि सहऽ आयच्छस्व' (यजु० ३।३९) —"गार्हपत्य अग्नि घर का स्वामी
और हमारी सन्तान के लिए दान देनेवाला है। हे घर के स्वामी ! अग्नि हमको प्रकाश और
बल दे।" अब वह बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। इस प्रकार (यजमान) जपकरके अग्नि
के पास जाया करते हैं ॥९॥
मौन होकर भी जा सकता है और वह इसलिए—'यदि किसी स्थान में कोई ब्राह्मण
राजा या श्रेष्ठ मनुष्य रहता हो तो कोई उससे यह नहीं कह सकता कि मैं यात्रा पर जा रहा हूँ,
तुम मेरें माल की रक्षा करना। यहाँ भी श्रेष्ठ अग्नि देवों का निवास हैं। इसलिए इनसे कौन
कह सकता है कि आप रक्षा कीजिए, मैं यात्रा को जा रहा हूँ ॥१०॥
देव मनुष्यों के मन को जानते हैं। गार्हपत्य पर अग्नि को मालूम है कि यह अपने को
मुझे सौंपने आया है। आहवनीय में भी मौन होकर जावे, क्योंकि आहवनीय को भी मालूम है
कि यह अपने को मुझे सौंपने आया है ॥११॥
अब वह पैदल या सवारी में चल पड़ता है और नियत सीमा तक जाने के बाद बोलता
है (मौन तोड़ता है)। और जब लौटता है तो जिसको सीमा मान रक्खा है उसको देखते ही मौन
धारण कर लेता है, और चाहे भीतर राजा भी क्यों न हो वह उसके पास नहीं जाता ॥१२॥
वह पहले आहवनीय के पास जाता है और फिर गार्हपत्य के पास। आहवनीय के पास
मौन होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है। गार्हपत्य में भी मौन
होकर जाता है और मौन ही बैठकर तृणों से अग्नि को हाँकता है ॥१३॥
अब घर (में आने) के विषय में यह उपचार है। जब कोई गृहपति बाहर से वापस
आता है तो घरवाले डर जाते हैं कि यह क्या कहेगा या क्या करेगा। और जब वह कुछ कहता
या करता है तो घरवाले डर जाते हैं और उसके कुल में क्षोभ होता है। और जो गृहपति न