शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-५
५६८ शतपथ ब्राह्मण
म॒ह्यं प्र॑तिगृह्णी॒त्विति॑ ॥ २९ ॥ अथ वासः प्रत्येति । बृह॒स्पत॑ये त्वा॒ मयं॒ वरु॑णो
ददा॒त्विति॒ बृह॒स्पत॑य ह्येतदरुणोऽद॑दा॒त्सोऽमृ॒तत्वम॑शीय॒ त्वग्दा॒त्रऽए॑धि॒ मयो॒ मयं॑
प्र॑तिगृह्णी॒त्विति॑ ॥ ३० ॥ अथाश्वं प्रत्येति । य॒माय॑ त्वा॒ मयं॒ वरु॑णो ददा॒त्विति॒
य॒माय॒ ह्येतं॒ वरु॑णोऽद॒दा॒त्सोऽमृ॒तत्वम॑शीय॒ हयो॑ दा॒त्रऽए॑धि॒ वयो॒ मयं॑ प्र॑तिग्र-
ह्णी॒त्विति॑ ॥ ३१ ॥ अथ॒ यद॒न्यद्ददा॑ति । का॒मेनै॑व तद्द्॑दाती॒दं मे॒ऽव्यमु॒त्रास॒दिति॑
तत्प्रत्येति॒ कोऽदा॒त्कस्मा॑ऽअदात्कामो॒ऽदा॒त्कामा॑यादात् । कामो॑ दा॒ता कामः॑ प्र-
तिग्रही॒ता कामै॒तत्त्ऽइति॒ तद्देवताया॒ऽअति॑दिशति ॥ ३२ ॥ तदाहुः । न दे॒वता॑या
ऽअति॑दिशेदि॒दं वै यां दे॒वता॒ समि॒न्धे सा दी॒प्यमा॑ना श्वः॒-श्वः॒ श्रेय॑सी भवती॒दं वै
य॒स्मिन्न॒ग्नाव॒भ्याद॑धति स दी॒प्यमा॑न एव॒ श्वः॒-श्वः॒ श्रेया॑न्भवति॒ श्वः॒-श्वो ह॒ वै श्रेया॑-
न्भवति॒ य एवं वि॒द्वान्प्रति॑गृह्णाति॒ तद्यथा॑ स॒मिद्धे॑ जुहु॒यादे॒वमे॒तां जुहोति॒ याम-
धी॒यते॒ ददा॑ति॒ तस्मा॑दधीय॒न्नाति॑दिशेत् ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३.४.] ॥ ॥
त्रयो वै दे॒वाः । वसवो रुद्रा आदित्या॒स्तेषां॒ विभ॑क्तानि॒ सव॑नानि॒ वसू॑नामे॒व
प्रा॒तःसवनं॑ रु॒द्राणां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नमादित्यानां तृतीयसवनं॒ तद्धाऽमिश्र॑मेव
वसू॑नां प्रा॒तःसवन॑ममिश्रं रु॒द्राणां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नं मि॒श्रमा॑दित्यानां तृतीय-
सव॑नम् ॥ १ ॥ ते॒ हादित्या॑ ऊचुः । य॑थे॒दममिश्रं वसू॑नां प्रा॒तःसवन॑ममिश्रं रु॒द्रा-
णां॒ माध्य॑न्दिन॒ सव॑नमे॒वं न इ॒मं पुरा मि॒श्राद॒हं जु॑हु॒थेति॒ तथेति॑ दे॒वा अ॑ब्रुवं॒-
स्ते स॒ꣳस्थिता॑ऽए॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने पु॒रा तृ॑तीयसवनादितमजुहुवुः स एषोऽप्ये-
तर्हि तथैव ग्र॒हो हूयते॒ स॒ꣳस्थिता॑ऽए॒व माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने पु॒रा तृ॑तीयसवनात्
॥ २ ॥ ते॒ हादित्या॑ ऊचुः । नेव वाऽइ॒तरा॑स्मिन्सवने स्मो नेवेत॑रस्मि॒न्यद्वै नो॒ र-
क्षाꣳसि॒ न हि॒ꣳस्युरिति॑ ॥ ३ ॥ ते ह द्विदेव॒त्यानूचुः । रक्षो॑भ्यो वै बिभीम ऋ॒त
यु॒ष्मान्प्रवि॑शामे॒ति ॥ ४ ॥ ते ह द्विदेव॒त्या ऊचुः । किम॒स्माकं ततः॑ स्यादि॒त्यस्मा-
भिरनु॑वषट्कृता भवि॒ष्यथेत्यु॑ हादित्या ऊचुस्तथेति॑ ते द्विदेव॒त्यान्प्रावि॑शन् ॥ ५ ॥
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ४-५, कं० २६-३३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६६
मिलें। मुझ लेनेवाले को वय अर्थात् आयु मिले" ॥२६॥
अब कपड़ा यह पढ़कर लेता है, “बृहस्पतये त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) —
“वरुण तुझे बृहस्पति के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसे बृहस्पति को ही तो दिया था। “सोऽमृतत्त्व-
मstate: मशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमृतत्व को पाऊँ, दाता
को त्वचा मिले । मुझ लेनेवाले को सुख" ॥३०॥
अब घोड़े को यह पढ़कर लेता है, “यमाय त्वा मह्यं वरुणो ददातु” (यजु० ७।४७) —
“वरुण तुझे यम के लिए मुझे दे।” वरुण ने इसको यम को दिया था। “सोऽमृतत्त्वमशीय हयो
दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे” (यजु० ७।४७)—“मैं अमरत्तत्त्व को पाऊँ, घोड़ा दाता के
लिए। आयु मुझ लेनेवाले के लिए" ॥३१॥
अब और जो कुछ देता है इस कामना से देता है कि जो मैं यहाँ दूँ वह मुझको उस लोक
में मिले। उसको इस मन्त्र से लेता है, “कोऽदात् कस्मा ऽ अदात् कामोऽदात् कामायादात् ।
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्त्वे” (यजु० ७।४८)—'किसने दिया, किसको दिया, कामना
ने दिया, कामना को दिया। कामना ही देनेवाली, कामना ही लेनेवाली । हे कामना ! यह सब
तुझको।' इस प्रकार वह इसको एक देवता के लिए निश्चित कर देता है ॥३२॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि किसी देवता को अतिदेश न करे। जिस-जिस देवता को
प्रज्वलित करता है वह देवता प्रकाशित होता और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। जिस
अग्नि में ईंधन डाला जाता है वह प्रकाशित होती है और उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती है।
जो इस रहस्य को समझकर (दक्षिणा) लेता है उसकी शोभा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है।
जैसे जलती हुई अग्नि में ही आहुति डालते हैं उसी प्रकार पढ़े हुए को ही दान देता है। इसलिए
विद्वान् को चाहिए कि किसी देवता को अतिदेश न करे ॥३३॥
आदित्यग्रहः
अध्याय ३- ब्राह्मण ५
देव तीन प्रकार के हैं— वसु, रुद्र, आदित्य । सवन इन्हीं में बँटे हुए हैं। प्रातःसवन केवल
वसुओं का है, दोपहर का रुद्रों का और तीसरा सवन आदित्यों का। प्रातःसवन वसुओं का,
बिना साझे का है। दोपहर का सवन रुद्रों का, बिना साझे का है। लेकिन तीसरे सवन में आदित्यों
के साथ दूसरों का भी साझा है ॥१॥
आदित्यों ने कहा, 'चूंकि प्रातःसवन में वसुओं के साथ किसी का साझा नहीं, दोपहर
में रुद्र के साथ किसी का साझा नहीं, इसलिए इस प्रकार हमारे लिए भी एक ग्रह की आहुति
दो, पूर्व इसके कि सबका मिश्रित सवन हो।' देवों ने कहा 'अच्छा।' दोपहर की समाप्ति पर
तीसरे सवन से पहले-पहले उन्होंने आहुति दे दी। इसी प्रकार अब तक भी इस ग्रह की आहुति
दी जाती है। दोपहर के सवन की समाप्ति पर और तीसरे सवन के पहले-पहले ॥२॥
आदित्य बोले, 'हम न तो पहले सवन में साझी हैं, न दूसरे में। ऐसा न हो कि राक्षस
हमको हानि पहुँचावें' ॥३॥
उन्होंने द्विदेवत्य अर्थात् उन ग्रहों से जिनमें दो देवताओं का साझा है, कहा, 'हम राक्षसों
से डरते हैं। ऐसा करो कि हम तुममें घुस बैठें' ॥४॥
उन द्विदेवत्य ग्रहों ने उत्तर दिया, 'हमको इससे क्या लाभ होगा ?' आदित्यों ने कहा
कि 'हमारे साथ अनुवषट्कार में तुम्हारा भी साझा होगा।' उन्होंने कहा 'अच्छा' और वे
द्विदेवत्य ग्रहों में घुस बैठे ॥५॥
६०० शतपथ ब्राह्मण
स॒ यत्प्रातःसवने । द्विदे॒वत्यैः प्रचर॑ति॒ तत्प्रतिप्रस्थातादित्यपात्रेण द्रोणकलशा-
त्प्रतिनि॒गृह्णीत॒ऽउपयामगृहीतोऽसीत्येतावताध्वर्यु॑रे॒वाश्रावयत्यध्व॒र्योरनु॒ होमं॑ जु-
होति प्रतिप्रस्थातादित्ये॒भ्यस्त्वेति॒ सꣳस्रावमवनयत्येतावदेव सर्वॆषु ॥ ६ ॥ तद्य॒-
त्प्रतिप्रस्थाता॑ प्रति॒निगृह्णीते॒ । द्विदे॒वत्यान्वै प्राविशन्नस्माभिरनुवषट्कृता भवि-
ष्येत्यु हादित्या ऊचुर्या वाऽअ॒मूं द्वितीयामाहु॑तिं जु॒होति स्वि॒ष्टकृते॒ वै तां जु॒-
होति स्वि॒ष्टकृतो वाऽए॒तेऽनु॑वषट्क्रियन्ते तथो हास्यैते॒ऽनुवषट्कृता इष्टस्वि॒ष्ट-
कृतो भवन्त्युत्तरार्धे॑ जुहोत्येषा॒ ह्येतस्य॑ देवस्य दिक्तस्मादुत्तरार्धे॒ जुहोति ॥ ७ ॥
यद्वेव प्रतिप्रस्थाता प्रति॒निगृह्णीते॒ । द्विदे॒वत्यान्वै प्राविशंस्त यानेव प्राविशंस्ते-
भ्य ए॒वैतन्निर्मिमीतेऽथापिदधाति ऋ॒तोभ्यो ह्य॑बिभयुर्विष्ण्ऽउरुगायैष ते सोमस्तꣳ
रक्षस्व॒ मा त्वा दभन्निति यज्ञो वै विष्ण्स्तद्यज्ञायैवैतत्परिददाति गु॒प्त्याऽअथाह
सꣳस्थितसꣳशव मा॒ध्यन्दिने॒ सवने पुरा तृतीयसवनादेहि यजमानेति ॥ ८ ॥ ते
सम्पद्यन्ते । अध्व॒र्युश्च यजमानश्चाग्नीध्रश्च प्रतिप्रस्थाता चोन्नेताथ योऽन्यः परिचरो
भवत्युभे द्वारे॒ऽअपिदधति ऋ॒तोभ्यो ह्य॑बिभयुरथाध्वर्युरादित्यस्थालीं चादित्यपात्रं
चादत्ते स॒ उप॒र्युपरि पूतभृतं वि॒गृह्णाति नेद्यवश्चोतदिति ॥ ९ ॥ अथ गृह्णाति । क-
दा चन॒ स्तरीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दाशुषे । उपोपेन्नु मघवन्भूय॒ इन्नु ते दानं॑ दे॒वस्य
पृच्यतऽआदित्ये॒भ्यस्त्वेति ॥ १० ॥ तं वै नोपयामेन गृह्णीयात् । अग्रे ह्ये॑ष उप-
यामेन गृहीतो भवत्यभ्रामितायै जामि ह कुर्याद्यदेनमत्राप्युपयामेन गृह्णीयात्
॥ ११ ॥ अथापमृज्य पुनरानयति । कदा चन प्रयुच्छस्युभे निपासि॒ जन्मनी । तुरी-
यादित्य॒ सवनं॑ त॒ऽइन्द्रियमातस्त्यावमृतं॑ दिव्यादित्येभ्यस्त्वेति ॥ १२ ॥ अथ दधि गृ-
ह्णाति । आदित्यानां वै तृतीयसवनमादित्यान्वाऽअनु॒ पशवस्तत्पशुष्वेवैतत्पयो
दधाति तदिदं पशुषु पयो हितं मध्यत॒ इव गृह्णीयादित्याहुर्मध्यत॒ इव हीदं प-
शूनां पय॒ इति पश्चादिव॒ त्वेव॑ गृह्णीयात्पश्चादिव॒ हीदं॑ पशूनां पयः ॥ १३ ॥ यद्वेव
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ५, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ६०१
इसलिए जब प्रातःसवन में (अध्वर्यु) द्विदेवत्य ग्रहों को तैयार करता है तो प्रतिप्रस्थाता
द्रोण कलश से आदित्य-पात्र में इस मन्त्र से सोम निकालता है, "उपयामगृहीतोऽसि” (यजु०
८।१)। अब अध्वर्यु श्रौषट् कहता है और उसके आहुति देने के पश्चात् प्रतिप्रस्थाता।
"आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।१) कहकर बचे-खुचे को (आदित्य-स्थाली में) छोड़ देता है।
इसी प्रकार अन्य सब (द्विदेवत्य ग्रहों में भी ऐसा ही होता है) ॥६॥
प्रतिप्रस्थाता (सोमरस को) क्यों लेता है ? इसलिए कि द्विदेवत्य ग्रहों में प्रवेश करते
आदित्यों ने कहा कि हमारे अनुवषट्कार में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। यह जो दूसरी आहुति
देता है वह अग्नि-स्विष्टकृत् के लिए देता है, स्विष्टकृत् से ही अनुवषट्कार हो जाता है। इस
प्रकार यह स्विष्टकृत् के लिए दी हुई आहुतियां अनुवषट्कार से युक्त हो जाती हैं। वह उत्तरार्द्ध
में आहुति देता है क्योंकि उस देवता की दिशा यही है। इसलिए उत्तरार्द्ध में आहुति देता है ॥७॥
प्रतिप्रस्थाता इसलिए भी लेता है कि वे द्विदेवत्य ग्रहों में घुस गए। जिनमें वे घुस गए
उनमें से वह लेता है। चूंकि वे राक्षसों से डरते थे, इसलिए वह इस मन्त्र से ढक देता है,
"विष्ण ऽ उरुगायेष ते सोमस्त ॅरक्षस्व मा त्वा दभन्" (यजु० ८।१)- 'हे ऊर्ध्वगति वाले विष्णु,
यह सोम तुम्हारे लिए है। इसकी रक्षा करो, जिससे वे तुमको हानि न पहुँचा सकें।" विष्णु यज्ञ
है। यज्ञ को ही वह देता है रक्षा के लिए। अब दोपहर के सवन की समाप्ति पर और तृतीय
सवन के पहले वह कहता है 'यजमान, यहाँ आओ' ॥८॥
ये सब (हविर्धान में) साथ घुसते हैं—अध्वर्यु, यजमान, आग्नीध्र, प्रतिप्रस्थाता, और
इनके साथ दूसरा जो कोई परिचर हो। दोनों द्वारों को बन्द कर देता है क्योंकि वे राक्षसों से
डरते थे। अब अध्वर्यु आदित्य-स्थाली और आदित्य-पात्र को लेता है और पूतभृत् के ऊपर
रखता है कि कहीं सोमरस गिर न जाय ॥६॥
अब वह (स्थाली में से पात्र में) इस मन्त्र से लेता है, "कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि
दाशुषे। उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्तु ते दानं देवस्य पृच्यत ऽ आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।२,
ऋ० ८।५१।७) - "हे इन्द्र, तू कभी संकुचित नहीं होता। तू दानशील सेवक के सदा समीप रहता
है। हे शक्तिशाली मधवा ! तुझ देव का दान अधिक बढ़ता है। हे ग्रह ! तुझको आदित्यों के
लिए" ॥१०॥
'उपयाम गृहीतोऽसि' कहकर न ले। ऐसा कहकर तो आगे ही निकाला था। पुनरुक्ति से
बचने के लिए। यदि 'उपयाम' कहकर लेगा तो अवश्य ही पुनरुक्ति-दोष लगेगा ॥११॥
(उस ग्रह को एक बार कुछ) हटाकर फिर उसी में (सोम रस) लेता है, इस मन्त्र से-
"कदा चन प्रयुच्छस्युभे निपासि जन्मनी। तुरीयादित्य सवनं त ऽ इन्द्रियमातस्थावमृतं दिव्या-
दित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।३, ऋ० ८।५२।७) - "हे आदित्य ! तुम कभी आलस्य नहीं करते ।
तुम दोनों जन्मों की रक्षा करते हो। आपका जो यह तीसरा (या चौथा) सवन है, उस दिव्य सवन
में आपका 'इन्द्रियं अमृतं' अर्थात् पराक्रमशील अमरत्व रक्खा हुआ है। हे ग्रह ! तुझको आदित्य
के लिए ॥१२॥
अब दही लेता है। तीसरा सवन आदित्य का है। पशु आदित्यों के पीछे हैं। इस प्रकार
पशुओं में दूध रखता है। इसीलिए तो पशुओं में दूध होता है। कुछ लोग कहते हैं कि 'इस ग्रह को
ठीक बीच में रक्खे; क्योंकि पशुओं के मध्य में ही दूध होता है', परन्तु उसको कुछ पीछे हटाकर
रखना चाहिए क्योंकि पशुओं में दूध कुछ पीछे की ओर ही होता है ॥१३॥
६०२ शतपथ ब्राह्मण
दधि॑ गृह्णाति । हु॒तोहिष्टा॒ वाऽए॒ते स॒ंस्रवा भ॑वन्ति ना॒लमाहु॑त्यै ताने॒वैतत्पुन॑-
रा॒प्याय॑यति तया॒लमाहु॑त्यै भव॑न्ति तस्माद्दधि॑ गृह्णाति ॥ १४ ॥ स गृह्णाति । य॒ज्ञो
दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमा॑दित्यासो भवता मृडयन्तः॑ । आ वो॑ऽर्वाची सु॒मति॑र्ववृत्या-
द॒ं॒होश्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॒रास॒दादि॑त्येभ्यस्त्वेति॑ ॥ १५ ॥ तमु॒पाँ॒शुस॑वनेन मे॒क्षय॑ति
। वि॒वस्वाँ॒न्वाऽए॒ष आ॑दि॒त्यो निदा॑नेन यदुपाँ॒शुस॑वन आ॑दित्यग्रहो वाऽए॒ष भ-
वति॒ तदे॒नꣳ स्वऽए॒व भागे॑ प्रीणाति ॥ १६ ॥ तं न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णो॒पस्पृ॑शति
ए॒ते वै शु॒क्रवती॑ रस॒वती॒ सव॑ने य॒त्प्रातः॑सव॒नं च माध्यं॑दिनं च सव॑नम॒थैतन्नि॑-
र्धौतिशुक्रं यत्तृतीयसवनꣳ स यन्न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णोप॒स्पृश॑ति॒ तेनो हा॒स्यैतच्छु-
क्रवद्वस॒वत्तृतीयसवनं॑ भवति तस्मान्न द॒शभि॑र्न प॒वित्रे॑णोप॒स्पृश॑ति ॥ १७ ॥ स
कां० ४, अ० ३, ब्रा० ५, क० १३-२३ शतपथब्राह्मण / ६०३
दही इसलिए लेता है कि यह जो बचा-खुचा सोमरस होता है वह आहुतियों के लिए
काफी नहीं होता। उसको दही से बढ़ा लेता है और यह दही के लिए काफी हो जाता है।
इसलिए दही मिलाता है ॥१४॥
वह इस मन्त्र से लेता है, "यज्ञो देवानां प्रत्येति सुन्ममादित्यासो भवता मृडयन्तः। आ
वोऽर्वाची सुमतिर्ववृत्याद॒होश्चिद्या वरिवोवित्तरासदात्। आदित्येभ्यस्त्वा" (यजु० ८।४; ऋ०
१।१०७।१)-"यज्ञ देवों के साथ सुख के लिए आता है। हे आदित्यो ! कृपा करो। आपकी सुमति
हमारे समक्ष हो।" यज्ञ देवों के सुख का सम्पादन करता है। हे आदित्यो ! आप हमको सुख
देनेवाले हों। आपकी अच्छी मति (सुमति) हमारे समक्ष आवे (अर्थात् हम सुमतिवाले हों)।
जो मति दरिद्रतायुक्त मनुष्य को भी अत्यन्त धन देनेवाली है वह भी हमारे समक्ष आवे। हे
ग्रह, तुझको आदित्य के लिए" ॥१५॥
उपांशु सवन पत्थर से पीसकर उसको मिलाता है। यह जो उपांशु सवन है वह तो
वास्तव में आदित्य विवस्वान् (सूर्य) ही है और यह आदित्य का ग्रह है। इस प्रकार इसको
इसी के भाग से प्रसन्न करता है ॥१६॥
इसको न झालर से और न पवित्रे से छूता है। ये जो प्रातःसवन और दोपहर के सवन
हैं ये दोनों शुक्रवाले और रसवाले हैं। परन्तु यह जो तीसरा सवन है वह सोम से शून्य है
(सोम इसमें से निकल चुका है)। झालर या पवित्रे से न छूने से यह शुक्रवाला और रसवाला
हो जाता है। इसलिए वह न झालर से और न पवित्रे से छूता है ॥१७॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है, "विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन् मत्स्व" (यजु०
८।५)-"हे प्रतापी आदित्य ! आ ! यह तेरा सोम-भाग है। इससे तृप्त हो।" अब उपांशु सवन
को उन्नेता को दे देता है। फिर उन्नेता से कहता है, 'ग्रावा (पत्थर) को डाल दे।' उसको
आधवनीय या चमसे में डाल देता है ॥१८॥
सोम राजा को निकालकर-तीसरा सवन आदित्यों का है। ये पत्थर भी आदित्य
ही हैं। इस प्रकार इनको इन्हीं के भाग से प्रसन्न करता है। अब दरवाजे को खोल देते हैं ॥१९॥
उस ग्रह को ढककर बाहर निकल आता है, क्योंकि आदित्यों को राक्षसों से भय था।
अब वह कहता है कि आदित्यों के लिए अनुवाक कहो। यदि चाहे तो (उनके गुणों को) गिना
दे। श्रौषट् कहकर गिनावे, इस प्रकार-'प्रिय, प्रियधाम, प्रियव्रत, महान् घर के पति, बड़े
अन्तरिक्ष के अधिपति, आदित्यों के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करके आहुति देता है। अनु-
वषट्कार नहीं किया जाता कि कहीं पशुओं को अग्नि के समर्पण न कर दे। बचा-खुचा प्रति-
प्रस्थाता को दे देता है ॥२०॥
अब वह फिर (हविर्धान में) आकर आग्रयण को लेता है। उत्तर की ओर झालर और
पवित्रे को फैला देते हैं। अध्वर्यु आग्रयण में से (रस) उंडेलता है। प्रतिप्रस्थाता बचे-खुचे दोनों
भागों को पकड़ता है। उन्नेता (आधवनीय में से) कुछ रस मिलाता है, चमसे या उदंचन
से ॥२१॥
इस प्रकार आग्रयण को चार धाराओं में लेता है। तीसरा सवन आदित्यों का है। गायें
आदित्यों के पीछे हैं। इसीलिए गायों का दूध चार प्रकार का होता है। इसलिए आग्रयण को
चार धाराओं में लेता है ॥२२॥
प्रतिप्रस्थाता उन बचे-खुचे दोनों भागों को इसलिए पकड़ता है कि बचा-खुचा आदित्य