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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-५

६२ शतपथ ब्राह्मण

त्र॑स्य चैव॒ विश॑श्च॒ विधृ॑त्यै॒ तस्मा॑त्ति॒रश्ची निद॑धाति॒ तस्मा॑दि॒व विधृ॑ती॒ नाम॑ ॥१०॥
तत्प्र॑स्तर॒ꣳ स्तृ॒णाति॑ । ऊ॒र्णाम्रद॑सं त्वा स्तृणामि स्वास॒स्थं दे॒वेभ्य॒ इति॑ सा॒धुं दे॒वेभ्य॒
इत्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॒होर्णाम्रद॑सं॒ वेति॑ स्वास॒स्थं दे॒वेभ्य॒ इति॑ स्वास॒दं दे॒वेभ्य॒ इत्ये॒वैत-
दा॒ह ॥११॥ तम॒भिनिद॑धाति । आ वा॒ वस॑वो रु॒द्रा आ॑दित्याः सदन्त्वित्ये॒ते वै
त्रय॑ दे॒वा यद्वस॑वो रु॒द्रा आ॑दित्या॒ एते वासीदन्वित्ये॒वैतदा॑हाभिनि॒क्षि॑त ए॒व स॒-
व्येन॑ पा॒णिना॑ भवति ॥१२॥ अथ दक्षि॑णेन जु॒हूँ प्रति॑गृह्णाति । नेदि॒ह पु॒रा ना-
ष्ट्रा रक्षा॒ꣳस्यावि॑शानि॒ति ब्राह्म॑णो हि॒ रक्ष॑सामप॒हन्ता॒ तस्मा॑दभिनि॒क्षित॑ ए॒व स॒-
व्येन॑ पा॒णिना॑ भवति ॥१३॥ अथ जु॒हूँ प्रति॑गृह्णाति । घृ॒ताच्या॑सि जु॒हूर्नाम्नेति॑ घृ॒-
ताची॒ हि जु॒हूर्हि॑ नाम्ना॒ सेदं प्रिये॑ण॒ धाम्ना॒ प्रियꣳ॒ सद॒ आसी॑देति घृताच्यस्युपभृ॒-
द्नाम्नेत्युपभृ॑तं घृताची॒ ह्युपभृ॑द्धि नाम्ना॒ सेदं॒ प्रिये॑ण॒ धाम्ना॒ प्रियꣳ॒ सद॒ आसी॑देति
घृताच्य॑सि ध्रु॒वा नाम्नेति॑ ध्रु॒वां घृताची॒ हि ध्रु॒वा हि नाम्ना॒ सेदं॒ प्रिये॑ण॒ धाम्ना॒
प्रियꣳ॒ सद॒ आसी॑देति॒ प्रिये॑ण॒ धाम्ना॒ प्रियꣳ॒ सद॒ आसी॑देति॒ यदन्यद॑विः ॥१४॥ स
वाऽउप॑रि जु॒हूम॑ सादयति । अथ इत॑राः स्रुचः॑ क्ष॒त्रं वै जु॒हूर्विश॑ इत॑राः स्रुचः॑ क्ष॒-
त्रमे॒वैतद्विश॑ उत्त॑रं करोति॒ तस्मा॑दु॒पर्यासी॑नं क्ष॒त्रियमध॒स्तादि॒माः प्र॒जा उ॒पास॑ते त-
स्मा॑दु॒परि॑ जु॒हूम॑ साद॒यत्यथ इत॑राः स्रुचः॑ ॥१५॥ सोऽभि॒मृश॑ति । ध्रुवा॒ अस॑दन्निति
ध्रुवा॒ ह्यसद॑न्नृत॒स्य योना॒विति॑ य॒ज्ञो वाऽऋ॒तस्य॒ योनि॑र्य॒ज्ञे ह्यसद॑ꣳस्ता॒ विष्णो॑ पा॒हि
पा॒हि य॒ज्ञं पा॒हि य॒ज्ञप॑तिमिति तद्यज॑मानमाह॒ पाहि॒ मां य॒ज्ञन्य॑मिति॒ तद्यात्मा॑नं
य॒ज्ञान्नान्त॑रेति य॒ज्ञो वै वि॒ष्णुस्तद्य॒ज्ञायै॒वैतत्सर्वं॑ परि॒ददा॑ति गु॒प्त्यै॒ तस्मा॑दाह॒ ता वि-
ष्णो पाहीति ॥१६॥ ब्राह्मणम् ॥१ [४.]॥
इन्धे॑ ह वा॒ एतद॑ध्व॒र्युः । इन्धे॒नाग्निं॒ तस्मा॒दिध्मो॒ नाम॒ समि॑न्धे सामिधे॒नीभि॒-
र्हेता॒ तस्मा॒त्सामिधे॒न्यो नाम॑ ॥१॥ स आह॑ । अ॒ग्नये॒ समि॑ध्यमानायानुब्रूहीत्य॒ग्नये॑
ह्ये॑तत्समिध्यमानायान्वाह॑ ॥२॥ तदु॒ हैक॑ऽआहुः । अ॒ग्नये॒ समिध्य॑मानाय होत॒र्-

कां० १, अ० ३, ब्रा० ५, कं० १-३ शतपथब्राह्मण / ६३
और दूसरे बर्हि वैश्य। क्षत्रिय और वैश्य को अलग-अलग करने के लिए इनको रखता है। इनको
'विधृति' कहते हैं। 'विधृति' का अर्थ है अलग-अलग करनेवाला ॥१०॥
अब वह प्रस्तर को (यजु० २।५) पढ़कर बिछाता है--“तू ऊन के समान नरम और देवों
के योग्य आसन है।” 'ऊन के समान नरम' कहने का तात्पर्य है कि बहुत अच्छा है। 'देवों के
योग्य आसन' कहने का तात्पर्य है कि वह देवों को सुख पहुँचानेवाला है ॥११॥
वह (बायें हाथ से) उसको यह पढ़कर दबाता है (यजु० २।५)--“वसु, रुद्र और
आदित्य तुझ पर बैठें।” वसु, रुद्र और आदित्य तीन देवता हैं। यही बैठते हैं। जब उसको बायें
हाथ से दबाये होता है उस समय—॥१२॥
दाहिने हाथ से जुहू को पकड़ता है कि कहीं दुष्ट राक्षस न घुस आवें। ब्राह्मण राक्षसों
को रोकनेवाला है। इसीलिए जब वह प्रस्तर को बायें हाथ से दबाये होता है उस समय-॥१३॥
वह दाहिने हाथ से जुहू को यह पढ़कर पकड़ता है (यजु० २।६)—“तू जुहू नाम वाली
घृताची (घी को प्यार करनेवाली) है। यह घृताची भी है और जुहू भी—“प्रिय धाम वाली,
इस पर सुख से बैठ !” अब उपभृत् को लेता है यह पढ़कर— “तू उपभृत् घृताची है, प्रिय धाम
वाली, सुख से बैठ।” वह उपभृत् भी है और घृताची भी। अब ध्रुवा को लेता है यह पढ़कर —
“ध्रुवा है घृताची, प्रिय धाम वाली, सुख से बैठ ।” वह ध्रुवा भी है, घृताची भी। जो कुछ शेष
रहे उसको यह कहकर आहुति देता है— “प्रिय धाम से, प्रिय स्थान में बैठ” ॥१४॥
वह जुहू को प्रस्तर पर रखता है और अन्य स्रुचों को नीचे । जुहू क्षत्रिय है और अन्य
स्रुचे वैश्य । इस प्रकार क्षत्रिय को वैश्य से महान् करता है। इसीलिए वैश्य नीचे स्थान से काम
करतें हैं और क्षत्रिय ऊपर के स्थान से । इसीलिए जुहू को ऊपर रखता है और अन्य स्रुचों को
नीचे ॥१५॥
वह अब हवियों का स्पर्श करता है इस मंत्रांश (यजु० २।६) को पढ़कर— “ठीक बैठ
गये।” वे ठीक बैठ गये—“ऋत के घर में ।” यज्ञ ऋत की योनि है। यज्ञ में ही वे बैठ गये--“हे
विष्णु ! इनकी रक्षा करो, यज्ञ की रक्षा करो, यज्ञपति की रक्षा करो !” यज्ञपति का अर्थ है
'यजमान'— “यज्ञ के मुझ नेता की रक्षा करो।” इस प्रकार यज्ञ में अपने को भी सम्मिलित
करता है। यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार यज्ञ से ही यज्ञ की रक्षा चाहता है। इसलिये कहता है-
“हे विष्णु, रक्षा कर” ॥१६॥
अध्याय ३-ब्राह्मण ५
अध्वर्यु अग्नि को इध्म (लकड़ी से) इन्धे अर्थात् जलाता है। इसलिये इसको इध्म
(ईंधन) कहते हैं। और होता सामिधेनियों को बोलकर अग्नि को अधिक प्रज्वलित करता है,
अतः उन मंत्रों को सामिधेनी कहते हैं (लकड़ी इध्म है और मंत्र सामिधेनी) ॥१॥
अध्वर्यु होता से कहता है- "जलनेवाली अग्नि के लिए मंत्र बोलो।" होता जलनेवाली
अग्नि के लिए ही मंत्र बोलता है ॥२॥
कुछ लोग कहते हैं 'हे होता, जलनेवाली अग्नि के लिए मंत्र बोलो', परन्तु ऐसा नहीं

६४ शतपथ ब्राह्मण

नुब्रूहीति॒ तद्व तथा॒ न ब्रूयाद॒होता वाऽए॒ष पु॒रा भ॑वति॒ यद्वे॑वं वृणीतेऽथ
होता॒ तस्माद् ब्रूयादग्नये॑ समिध्य॒मानायानु॑ब्रूही॒त्येव ॥ ३॥ अग्नि॒मी॒न्वाह॑ । स्व॒यै-
नमे॒तद्दे॑वतया समि॒न्धे गाय॒त्रीर॒न्वाह॑ गाय॒त्रं वाऽअ॒ग्नेश्छन्द॑ः स्वेनै॒वैनमेत॒च्छन्द॑सा
समि॒न्धे वीर्यं॑ गायत्री॒ ब्रह्म॑ गायत्री॒ वीर्ये॑णै॒वैनमेतत्समि॒न्धे ॥ ४॥ एका॑द॒शान्वा॑ह ।
एका॑दशाक्षरा॒ वै त्रि॒ष्टुब्ब्रह्म॑ गायत्री क्ष॒त्रं त्रि॒ष्टुब्देताभ्या॑मे॒वैनमेतदुभाभ्यां॑ वी॒र्याभ्याग्ं
समि॒न्धे तस्मा॒देका॑द॒शान्वा॑ह ॥ ५॥ स वै त्रिः प्रथ॒मामन्वा॑ह । त्रि॒रुत्त॒मां त्रि॒वृत्प्रा-
यणा हि य॒ज्ञास्त्रिवृ॒दुद॑यना॒स्तस्मा॒त्त्रिः प्रथ॒मामन्वा॑ह त्रि॒रुत्त॒माम् ॥ ६॥ ताः पञ्च॑-
दश सामिधे॒न्यः संप॑द्यन्ते । पञ्चद॒शो वै व॒ज्रो वीर्यं॒ वज्रो वीर्ये॑णै॒वैतत्सामिधेनी॒र-
भिसं॒पादय॑ति तस्मा॑दे॒तास्वनू॒च्यमा॑नासु॒ यं द्वि॒ष्यात्त॑म॒ङ्गुष्ठाभ्यामव॑बाधेतै॒दमह॒ममुमव॑-
बबाध॒ऽइति॒ तदे॑नमे॒तेन॒ वज्रे॑णावबाधते ॥ ७॥ पञ्च॑दश वा अ॑र्धमा॒सस्य॒ रात्र॑यः ।
अर्धमासशो वै सं॑वत्स॒रो भव॑तीति॒ तद्रात्री॒राप्नो॑ति ॥ ८॥ पञ्चदशानामु वै गाय॒त्री-
णाम् । त्रीणि॑ च शता॒नि ष॒ष्टिश्चा॒क्षरा॑णि॒ त्रीणि॑ च॒ वै शता॑नि ष॒ष्टिश्च॑ संवत्सर॒-
स्याह्ना॑नि॒ तद॒ह्नान्याप्नो॑ति॒ तद्वे॒व सं॑वत्स॒रमाप्नो॑ति ॥ ९॥ स॒प्तद॑श सामिधे॒नीः । इ॒-
ष्ट्याऽअनु॑ब्रूयादु॒पांशु तस्यै दे॒वता॑यै॒ यज॑ति॒ यस्या॒ऽइष्टिं॑ निर्व॑प॒ति द्वाद॑श॒ वै मा॒-
साः सं॑वत्स॒रस्य॒ पञ्च॑र्तव ए॒ष ह्व प्रजाप॑तिः सप्तद॒शः सर्वं॑ वै प्र॒जाप॑तिस्तत्स॒र्वे-
णैव तं काम॒मन॑पराधं॑ राध्नोति॒ यस्मै॑ कामा॒येष्टिं॑ निर्व॑पत्युपां॒शु दे॒वता॑ यज॒त्यनि॑-
रुक्तं॒ वाऽउ॑पां॒शु सर्वं॒ वाऽअ॑निरु॒क्तं तत्सर्वै॑णैव॒ तं काम॒मन॑पराधं॒ राध्नो॑ति॒ यस्मै॑
कामा॒येष्टिं॑ निर्व॑पत्येष इष्टेरुपचारः ॥ १०॥ एक॑विग्ंशतिं सामिधे॒नीः । अ॒पि दर्श॑-
पूर्णमासयोरनु॑ब्रूयादित्याहुर्द्वाद॑श॒ वै मा॒साः सं॑वत्स॒रस्य॒ पञ्चर्तव॒स्त्रयो॑ लो॒कास्त-
द्विग्ंशतिरे॒षऽए॑कविग्ंशो॒ य ए॒ष तप॑ति तेषा गतिरे॒षा प्रति॑ष्ठा तदे॒तां गति॑मे-
तां प्रति॑ष्ठां गच्छति॒ तस्मा॒देक॑विग्ंशतिमनुब्रूयात् ॥ ११॥ ता हेता गत॒यश्चैवानु॑ब्रू-
यात् । य इ॒हेन्न श्रेयां॑त्स्यां न पापी॑यानिति यादृशाय ह्व सतेऽन्वा॒हुस्तादृशा-

का० १, अ० ३, ब्रा० ५, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ६५
कहना चाहिए, क्योंकि अभी वह 'होता' तो बना नहीं। जब यजमान उसका वरण कर लेगा
तभी तो वह होता बनेगा। इसलिये (बिना होता को सम्बोधन किये) केवल इतना ही कहना
चाहिए 'जलती हुई अग्नि के लिए मंत्र बोलो' ॥३॥
अग्नि की ऋचाएँ बोली जाती हैं, अर्थात् अग्नि को उसीके देवता के द्वारा प्रज्वलित
करता है। गायत्री छन्द के मंत्र बोलता है। गायत्री अग्नि का छन्द है, अतः अपने ही छन्द से अग्नि
प्रज्वलित होती है। गायत्री वीर्य है। गायत्री ब्रह्म है। अतः वीर्य से ही इसको प्रज्वलित करता
है ॥४॥
ग्यारह मंत्र बोलता है। त्रिष्टुभ् में ग्यारह ही अक्षर होते हैं। गायत्री ब्राह्मण है।
त्रिष्टुभ् क्षत्रिय है। इन्हीं दो शक्तियों द्वारा आग को प्रज्वलित करता है। इसीलिये ग्यारह मंत्र
बोलता है ॥५॥
पहले मंत्र को तीन बार बोलता है और अन्तिम मंत्र को तीन बार। यज्ञ आदि में त्रिवृत्
है और अन्त में भी त्रिवृत्। इसलिये वह आदिम और अन्तिम मंत्रों को तीन-तीन बार बोलता
है ॥६॥
सामिधेनियां १५¹ होती हैं। १५ का अंक वज्र है। वज्र वीर्य है। अतः वीर्यरूपी वज्र
से वह यज्ञ को समन्वित करता है। यदि वह किसी से द्वेष करता हो तो जब सामिधेनियों का
उच्चारण हो रहा हो, उस समय वह अपने पैर से शत्रु को कुचल सकता है। वह उसको उस वज्र
से मार सकता है ॥७॥
अर्ध-मास या आधे महीने में पन्द्रह रातें होती हैं। वर्ष पाख-पाख करके ही समाप्त हो
जाता है। इसलिये वह रातों की प्राप्ति करता है ॥८॥
पन्द्रह गायत्रियों में ३६० अक्षर हुए। एक वर्ष में ३६० दिन होते हैं। इस प्रकार वह
दिनों की प्राप्ति करता है और वर्ष की भी ॥६॥
यदि (किसी विशेष उद्देश्य से) इष्टि करना हो तो सत्रह सामिधेनियां पढ़नी चाहिएँ।
जिस देवता की इष्टि देनी होती है उसके लिए चुपचाप धीरे से इष्टि दी जाती है। वर्ष में बारह
मास होते हैं और पाँच ऋतुएँ। इस प्रकार प्रजापति में सत्रह हो गये। प्रजापति है सम्पूर्ण, इस-
लिये जिस देवता के लिए इष्टि की जाती है वह सब सम्पूर्णता के लिए, अर्थात् यज्ञ करनेवाले
को सम्पूर्णता प्राप्त हो जाती है। इष्टि के लिए यही उपचार है ॥१०॥
कुछ लोगों का कहना है कि दर्श और पूर्णमास यज्ञों में इक्कीस सामिधेनियां पढ़नी
चाहिएँ। बारह मास हुए, पाँच ऋतुएँ, तीन लोक और इक्कीसवाँ वह जो नित्य तपता है अर्थात्
सूर्य। वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है। इसलिये इक्कीस
सामिधेनियां पढ़नी चाहिएँ ॥११॥
इनको गतश्री ही पढ़े, जो चाहे कि मुझे न इससे अधिक होना है न कम। क्योंकि जिस
देवता के लिए पढ़ते हैं, पढ़नेवाला उसी देवता के समान होगा या कम। जो इस रहस्य को
१. ग्यारह मंत्रों में से पहले और पिछले को तीन-तीन बार पढ़ने से १५ हो जाते हैं।