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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

५८४ शतपथ ब्राह्मण
तन्वत ताꣳ ह त्रिष्टुबुवाचोप वाह्मायानि त्रिभि॒रक्ष॑रै॒रुप॑ मा ह्वयस्व॒ मा मा य-
ज्ञाद॒न्तर्गा॒ इति॒ तथेति॑ तामुपा॑ह्वयत॒ तत॑ एकादशाक्षरा त्रिष्टुब्भवत्तस्मादाहुस्त्रै-
ष्टुभं माध्यन्दिनꣳ सवनमिति ॥ ८॥ तयै॑व तृतीयसवन॒मत॑न्वत । ताꣳ ह॒ जगत्यु-
वाचोप॑ वाह्मायाम्येके॒नाक्ष॑रे॒णोप॑ मा ह्वयस्व॒ मा मा यज्ञाद॒न्तर्गा॒ इति॒ तथेति॑
तामुपा॑ह्वयत॒ ततो॑ द्वादशाक्षरा जग॑त्यभवत्तस्मादाहुर्जागतं तृतीयसवनमिति ॥ ९॥
तदाहुः । गायत्राणि॒ वै सर्वा॑णि॒ सव॑नानि गायत्री ह्ये॑वैतदुपसङ्गमानीदिति॒ तस्मा-
त्सꣳ॑त्सिदं॒ प्रातःसवने॒ प्रति॑गृणीयात्सꣳ॑त्सिद्धा हि गायत्र्याग॒ह्वत्तस्कु॑न्मद्धन्माध्यन्दिने
सवनऽएकꣳ॑ हि॒ साक्षरꣳ॑ ह्त्वाग॒ह्वत्तैनै॒वैना॑मेतत्सम॑र्धयति॒ कृत्स्नां करो॑ति ॥ १०॥
यत्र त्रि॒ष्टुभः॑ शस्यन्ते॑ । त्रिमद्वत्तृतीयसवने॒ त्रीणि॒ हि साक्ष॑राणि ह्त्वाग॒ह्वत्तैरै॒वै-
नामि॑तत्सम॑र्धयति॒ कृत्स्नां करो॑ति ॥ ११ ॥ ॥ शतम् २५०० ॥ ॥ यत्र द्यावा॑पृथि॒व्यꣳ॑
शस्यते॑ । इ॒मे ह॒ वै द्यावा॑पृथिवी॒ऽइमाः॑ प्रजा उप॑जीवन्ति॒ तदन॑यो॒रेवैतद्रू॒द्यावा॑पृ-
थिव्यो॒ रसं॑ दधाति॒ ते र॒सवत्या॒ऽउप॑जीवनीये॒ऽइमाः॑ प्रजा उप॑जीवन्ति॒ स वा
ऽओ३मित्ये॑व प्रति॑गृणीयात्तद्धि स॒त्यं तद्दे॒वा विदुः॑ ॥ १२॥ तद्धैके॑ । ओथामो॑दैव॒
वागि॑ति॒ प्रति॑गृणन्ति वाक्प्रति॒गर् ए॒तद्वाच॑मुपा॒प्नुम॒ इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॑ न कु-
र्याद्यथा॑ वै कथा॒ च प्रति॑गृणात्युपा॒प्तिर्वा॑स्य वाग्भ॑वति वा॒चा हि प्रति॑गृ॒णाति॑
तस्मा॒दो३मित्ये॑व प्रति॑गृणीयात्तद्धि स॒त्यं तद्दे॒वा विदुः॑ ॥ १३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६
[३. २.] ॥ ॥
इ॒ङ्कारऽइ॒ङ्कारऽइ॒त्य॑भिषु॒णोति॑ । इ॒न्द्रमे॒वैतदा॒च्याव॑यति बृ॒हद्वृ॒हदि॒तीन्द्र॑मे॒वै-
तदा॒च्याव॑यति ॥ १॥ स शुक्रा॑मन्थिनौ॑ प्रथ॒मौ गृ॑ह्णाति । शुक्र॑वद्धैतत्सव॑नमथाग्र-
य॒णꣳ सर्वे॑षु॒ ह्येष सव॑नेषु गृह्यतेऽथ मरुत्वतीयमथोक्थ्यमुक्थ्यानि॒ ह्यत्रा॑पि भव॑-
न्ति ॥ २॥ तद्धैके॑ । उ॒क्थ्यं गृ॑ही॒त्वाथ॑ मरुत्वती॒ये गृ॑ह्णन्ति॒ तदु॒ तथा॑ न कुर्यान्मरुत्व-
तीय॑मे॒व गृ॑ही॒त्वाथो॑क्थ्यं गृ॑ह्णीयात् ॥ ३॥ तान्वाऽए॒तान् । पञ्च॒ ग्रहान्गृ॑ह्णात्येष

का० ४, अ० ३, ब्रा० २-३, क० ८-१३ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५८५
उसी से दोपहर का सवन किया गया। उससे त्रिष्टुप् ने कहा, 'मैं अपने तीन अक्षरों के साथ
आता हूँ। मुझे बुला। मुझे यज्ञ से बाहर न निकाल।' 'अच्छा' ऐसा कहकर (गायत्री ने त्रिष्टुप्
को) बुला लिया। इस प्रकार त्रिष्टुप् में ग्यारह अक्षर हो गये। इसलिए कहते हैं कि दोपहर का
सवन त्रैष्टुभ् होता है ॥८॥
उसी गायत्री से तीसरा सवन किया। उससे जगती ने कहा, 'मैं अपने एक अक्षर के साथ
तेरे पास आती हूँ, तू मुझे बुला, यज्ञ से बाहर मत निकाल।' उसने कहा 'अच्छा' और बुला
लिया। तब से जगती बारह अक्षर की हो गई। इसलिए कहते हैं कि तीसरा सवन 'जागत'
है ॥९॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि सभी सवन 'गायत्र' हैं क्योंकि गायत्री ही तो बढ़ती गई।
इसलिए प्रातःसवन में पूरा 'प्रतिगर' कहे, क्योंकि गायत्री पूरी होकर लौटी थी। दोपहर के
सवन में एक बार 'मद्' शब्द कहकर प्रतिगर पढ़े, क्योंकि त्रिष्टुप् एक अक्षर छोड़कर लौटा था।
उसी से वह उसको समृद्ध करता है अर्थात् उसको पूरा कर देता है जबकि—॥१०॥
त्रिष्टुप् से शस्त्र पढ़ता है। तीसरे सवन में तीन बार 'मद्' शब्द से प्रतिगर कहे, क्योंकि
जब जगती लौटी तो तीन अक्षर पीछे छोड़ आई। इससे वह इसकी समृद्धि करता है, उसको
पूरा करता है जबकि—॥११॥
द्यौ और पृथिवी के लिए शस्त्र पढ़ता है। यह प्रजा इन्हीं दोनों अर्थात् द्यौ और पृथिवी
के सहारे रहते हैं; इसके द्वारा इन्हीं द्यौ और पृथिवी में वह रस रखता है। इन्हीं रसवाले द्यौ
और पृथिवी के सहारे प्रजा उत्पन्न होती है। 'ओ३म्' ऐसा कहकर 'प्रतिगर' करे, क्योंकि यही
सत्य है जिसको देव जानते हैं ॥१२॥
कुछ इस प्रकार प्रतिगर करते हैं 'ओथामो दैववाक्' अर्थात् वाणी प्रतिगर है, उसी को
लेते हैं। परन्तु ऐसा न करे। क्योंकि चाहे जैसे प्रतिगर करे, वाणी ही हो जाती है, क्योंकि प्रतिगर
वाणी द्वारा ही हो सकता है। इसलिए 'ओ३म्' कहकर ही प्रतिगर करे। यही सत्य है जिसको
देव जानते थे ॥१३॥
माध्यन्दिनसवनम्—मरुत्वतीयग्रहादि
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
'इहा' 'इहा' कहकर (सोमरस) निकालता है। ('इह' का अर्थ है 'यहाँ। इसी का अन्त
का अक्षर प्लुत करके 'इहा' हो गया। बुलाने में प्लुत हो ही जाता है)। इस प्रकार इन्द्र को
निकट बुलाता है। 'बृहद्-बृहद्' भी कहता है; इससे भी इन्द्र को निकट बुलाता है ॥१॥
पहले शुक्र और मन्थी ग्रहों को लेता है। इससे (सोम यज्ञ) 'शुक्र-युक्त' हो जाता है।
अब आग्रयण ग्रह को लेता है। यह ग्रह तो सभी सवनों में लिया जाता है। फिर मरुत्वतीय ग्रह
लेता है। फिर उक्थ्य ग्रह को। क्योंकि यहाँ भी उक्थ्य मन्त्र होते हैं ॥२॥
कुछ लोग उक्थ्य ग्रह को लेकर मरुत्वतीय को लेते हैं। परन्तु ऐसा न करना चाहिए।
मरुत्वतीय को लेकर उक्थ्य को ले ॥३॥
इस प्रकार यह इन पाँच ग्रहों को लेता है (शुक्र, मन्थी, आग्रयण, मरुत्वतीय और

५८६ शतपथ ब्राह्मण
वै॒ वज्रो॑ यन्माध्य॒न्दिनः॑ पव॑मानस्तस्मात्प॒ञ्चद॒शः पृ॑ष्ठनामा भवति पञ्चद॒शो हि॑
वज्रः॒ स ए॒तैः प॒ञ्चभि॑र्ग्र॒हैः प॒ञ्च वाऽइ॒मा अ॒ङ्गुलयो॒ऽङ्गुलि॑भि॒र्वै प्रह॑रति ॥ ४ ॥
इन्द्रो॑ वृ॒त्राय॒ वज्रं॒ प्रज॑हार । स वृ॒त्रं पा॒प्मानं॑ ह॒त्वा विजि॑ते॒ऽभये॑ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा
निना॑य॒ तस्मा॑द्ये॒तर्हि॒ यदि॒वैते॑न माध्यन्दि॒नेन॑ पव॒माने॑न स्तु॒वते॒ऽथ विजि॑ते॒ऽभये॑
ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा नी॒यन्ते॒ तथो॒ऽएवै॒ष ए॒तैः प॒ञ्चभि॑र्ग्र॒हैः पा॒प्मने॒ द्विष॑ते॒ भ्रातृ॑व्याय॒
वज्रं॒ प्रह॑रति॒ स वृ॒त्रं पा॒प्मानं॑ ह॒त्वा विजि॑ते॒ऽभये॑ऽना॒ष्ट्रे द॑क्षि॒णा न॑यति॒ तस्मा॑-
द्वा॒ऽएता॒न्यञ्च॒ ग्रहा॒न्गृह्णा॑ति ॥ ५ ॥ तद्यन्म॑रुत्वती॒यान्गृह्णा॑ति । ए॒तद्वा॒ऽइन्द्र॑स्य नि॒-
ष्केवल्यं॒ सव॑नं॒ यन्मा॑ध्यन्दि॒नं सव॑नं॒ तेन॑ वृ॒त्रम॑जिघां॒सत्तेन॒ व्य॑जिगीषत म॒रु-
तो वा॒ऽहुत्यश्चत्ये॒ऽपक्र॑म्य तस्थुः॒ क्षत्रं॒ वा॒ऽइन्द्रो॒ विशो॑ म॒रुतो॒ विशा॒ वै क्ष॒त्रियो॒
ब॒लवा॑न्भवति॒ तस्मा॑दाश्व॒त्थेश्च॑तुःपा॒त्रे स्या॑तां का॒र्ष्मर्य॑मये॒ त्वे॑व भ॑वतः ॥ ६ ॥ ता॒-
निन्द्र॒ उप॑मन्त्रयां चक्रे । उप॒ माव॑र्तध्वं यु॒ष्माभि॑र्ब॒लेन॑ वृ॒त्रं ह॒नानीति॑ ते होचुः॒
किं न॑स्ततः॒ स्यादि॑ति॒ तेभ्य॑ ए॒तौ म॑रुत्वती॒यौ ग्र॒हाव॑गृह्णात् ॥ ७ ॥ ते हो॑चुः । अ॒-
पनि॑धायिनमो॒न्न उपा॑वर्तामहा॒ऽइति॒ तऽएन॑मपनि॒धायि॑नो॒ऽन्न उपा॑ववृतु॒स्तद्वा॒ऽइन्द्रो॒
ऽप्यु॑ण॒ताप॑निधाय॒ वै मो॒न्न उपा॑वृत॒न्निति॑ ॥ ८ ॥ स हो॑वाच । स॒हैव मौज॑सो॒पा-
व॑र्तध्व॒मिति॒ तेभ्यो॒ वै न॑स्तृ॒ती॒यं ग्रहं॑ गृह्ला॒णेति॒ तेभ्य॑ ए॒तं तृती॑यं॒ ग्रहम॑गृह्णादु॒प-
यामगृ॑हीतोऽसि म॒रुतां॒ त्वौज॑स॒ऽइति॒ तऽएनं॑ स॒हैवौज॑सो॒पाव॑र्तन्त॒ तैर्व्य॑जयत॒
तैर्वृ॒त्रमहं॒त्क्षत्रं॒ वा॒ऽइन्द्रो॒ विशो॑ म॒रुतो॒ विशा॒ वै क्ष॒त्रियो॒ ब॒लवा॑न्भवति॒ तत्क्ष॒-
त्रऽए॒वैतद्ब॑लं दधाति॒ तस्मा॑न्मरुत्वती॒यान्गृह्णा॑ति ॥ ९ ॥ स वा॒ऽइन्द्रा॑यै॒व म॒रुत्व॑ते
गृह्णी॑यात् । नापि॑ म॒रुद्भ्यः॑ स॒ यद्यपि॑ म॒रुद्भ्यो॑ गृह्णी॒यात्प्रत्यु॒द्या॑मिनीं॒ ह क्ष॒त्राय॑
विशं॑ कुर्या॒द्यथै॒तदिन्द्र॑मे॒वानु॑ म॒रुत॒ आभ॑जति॒ तत्क्ष॒त्रायै॒वैतद्विशं॑ कृतानुका॒रम॑नु-
वर्त्मा॑नं करोति॒ तस्मा॑दि॒न्द्रायै॒व म॒रुत्व॑ते गृह्णी॒यान्नापि॑ म॒रुद्भ्यः॑ ॥ १० ॥ अप॑क्रमादु॒
है॒वेषा॑मेतद्वि॒भयां॑ चकार । यदि॒मे म॒न्नाप॑क्रामे॒युर्यन्ना॒न्यद्व्रि॑ये॒रन्नि॑ति॒ ताने॒वैतदु॑पप्रक्र-

कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, क० ४-११ शतपथब्राह्मण / ५८७
उक्थ्य) । यह जो दोपहर का पवमान है, वह वज्र है। इसमें पांच साम होतें हैं, १५ मन्त्रवाले ।
वज्र पन्द्रहवाला होता है। पांच ग्रहों के द्वारा। ये अँगुलियाँ भी पाँच हैं। इन अँगुलियों से ही
तो वज्र फेंका जाता है ॥४॥
इन्द्र ने वृत्र पर वज्र फेंका । पापी वृत्र को मारकर और विजय तथा अभय प्राप्त करके
दक्षिणा लाया । इसलिए ये उद्गाता लोग भी जब दोपहर के सवन में पवमान पढ़ते हैं और
अभय तथा विजय प्राप्त करते हैं तो दक्षिणा को लाते हैं। इसी प्रकार यह भी इन पाँच ग्रहों
द्वारा दुष्ट पापी शत्रु पर वज्र फेंकता है और पापी वृत्र को मारकर अभय तथा विजय प्राप्त
होने पर दक्षिणा को ले जाता है। इसलिए इन पाँच ग्रहों को लेते हैं ॥५॥
मरुत्वतीय ग्रहों को इसलिए लेता है कि यह जो दोपहर का सवनं है वह इन्द्र का निज
का सवन (निष्केवल्य) है। उसी से उसने वृत्र को मारने और जीतने की इच्छा की। इस समय
मरुत् अश्वत्थ कक्षा पर घूमकर जा खड़े हुए । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य हैं। क्षत्रिय बलवान्
होता है। इसलिए दो पात्र अश्वत्थ लकड़ी के हो सकते हैं। (ऐसी लोगों की राय है) परन्तु
कार्ष्मर्य लकड़ी के तो होते ही हैं ॥६॥
उनको इन्द्र ने बुलाया, 'मेरे पास आइये कि आपकी सहायता से मैं वृत्र को मार डालूं ?'
उन्होंने कहा, 'हमको क्या मिलेगा ?' उसने इन दो मरुत्वतीय ग्रहों को उनके लिए
निकाला ॥७॥
वे बोले, 'इस एक अह अर्थात् ओज को अलग रखकर हम आ रहे हैं।' वे इस ओज को
अलग रखकर आये । परन्तु इन्द्र ने इस (ग्रह अर्थात् ओज) को भी लेना चाहा, यह सोचकर
कि ये ओज को अलग रखकर आ रहे हैं। (ओज के बिना तो कुछ सफलता होती नहीं) ॥८॥
उसने कहा, 'ओज के साथ आइये ।' उन्होंने उत्तर दिया, 'तो हमारे लिए एक तीसरा
ग्रह और लो।' तब उनके लिए उसने एक तीसरा ग्रह निकाला, इस मन्त्र से “उपयामगृहीतोऽसि
मरुतां त्वौजसे—” (यजु० ७।३६) । तब वे ओज के साथ (इन्द्र की सहायता को) गये।
उनकी सहायता से विजय पाई, उनकी सहायता से वृत्र को मारा । इन्द्र क्षत्रिय है। मरुत् वैश्य
है। क्षत्रिय वैश्य की सहायता से ही बलवान् होता है। इसलिए वह क्षत्रिय में बल को रखता
है। इसलिए मरुत्वतीय ग्रहों को लेता है ॥९॥
उन ग्रहों को वह 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, अकेले इन्द्र के लिए नहीं। यदि वह
केवल मरुतों के लिए निकालेगा तो वैश्यों को क्षत्रियों के विरुद्ध कर देगा। इसलिए वह इन्द्र के
पीछे मरुत् का भी भाग रख देता है। इस प्रकार वह वैश्य को क्षत्रिय के अधीन और उसका
आज्ञाकारी बना देता है। इसलिए मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए निकाले, न कि 'मरुतों' के
लिए ॥१०॥
उस (इन्द्र) को उनके छोड़ने का भय था, 'कहीं वे मुझे छोड़ जायें और दूसरे दल में
मिल जायें।' इस प्रकार वह इस भाग के द्वारा उनको ऐसा बना देता है कि वे उसे छोड़ने न

मिणोऽकुरुत तस्मादिन्द्रायैव म॒रुत्व॑ते गृह्णीयान्नापि मरुद्म्यः ॥ ११॥ ऋतुपात्राभ्यां
गृह्णाति । ऋतवो वै संवत्सरो यज्ञस्तेऽद॒ः प्रातःसवने प्रत्यक्षमकल्प्यन्ते यदृतु-
ग्रहान्गृह्णात्यथैतत्परोऽक्षं माध्यन्दिने सवनेऽवकल्प्यन्ते यदृतुपात्राभ्यां मरुवती-
यान्गृह्णाति विशो वै मरुतोऽन्नं वै विश ऋतवो वाऽइदꣳ सर्वमन्नाद्यं पचन्ति
तस्मादृतुपात्राभ्यां मरुवतीयान्गृह्णाति ॥ १२॥ अथातो गृह्णात्येव । इन्द्र मरुत्व
इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒ यथा शार्या॒तेऽअपिबः सु॒तस्य॑ । तव प्रणीती तव शूर॒ शर्म॒न्ना-
विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा म॒रुत्व॑त ऽए॒ष ते॒ योनि॒-
रिन्द्राय त्वा मरुत्वते ॥ १३॥ म॒रुत्व॑न्तं वृष॒भम् । वावृधानम॒कवा॑रिं दि॒व्यꣳ शास॑-
मिन्द्र॑म् । वि॒श्वा॒सा॒हमव॑से नूतनायो॒ग्रꣳ स॑हो॒दामि॒ह तꣳ हु॑वेम । उ॒पया॒मगृ॑ही-
तोऽसीन्द्रा॑य त्वा मरुत्वत ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि
मरुतां त्वौजस ऽइति तृतीयं ग्रहं गृह्णाति ॥ १४॥ अथ माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति । पा-
प्मना वाऽएतदिन्द्रः संसृष्टोऽभूद्यद्विशा मरुद्भिः स यथा विजयस्य कामाय विशा
समाने पात्रेऽश्नीयादेवं तद्यदस्माऽएतं मरुद्भिः समानं ग्रहमगृह्णन् ॥ १५॥ ते दे-
वाः । सर्वस्मिन्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रे यथेषीकां मुञ्जाद्विवृहेदेवꣳ सर्वस्मात्पाप्मनो
व्यवृहन्यन्माहेन्द्रं ग्रहमगृह्णꣳस्तथोऽएवैष एतद्यथेषीकां विमुञ्जा स्यादेवꣳ सर्व-
स्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते यन्माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति ॥ १६॥ यद्वेव माहेन्द्रं ग्रहं गृ-
ह्णाति । इन्द्रो वाऽएष पुरा वृत्रस्य बधादथ वृत्रꣳ हत्वा यथा महाराजो विजि-
ग्यान एवं महेन्द्रोऽभवत्तस्मान्माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति महान्तमु चैवैनमेतत्खलु
करोति वृत्रस्य बधाय तस्माद्वेव माहेन्द्रं ग्रहं गृह्णाति शु० पात्रेण गृह्णात्येष वै
शुक्रो य एष तपत्येष उऽएव महांस्तस्माच्छुक्रपात्रेण गृह्णाति ॥ १७॥ अथातो गृ-
ह्णात्येव । म॒हाँ२॥ऽइन्द्रो॒ नृवदा च॑र्षणि॒प्रा उत् वि॒ब॒र्हा म॒हिनः सहो॑भिः । अ॒-
स्म॒द्र्यग्वावृधे वी॒र्या॑योरुः पृथुः सु॒कृतः कर्तृभिर्भूत् । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि म॒हेन्द्रा॑य

कां० ४, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ११-१८ शतपथब्राह्मण / २८६
पावें। इसलिए भी 'मरुत्-युक्त इन्द्र' के लिए निकाले, मरुतों के लिए नहीं ॥११॥
दो ऋतु-पात्रों से निकालता है। ऋतु संवत्सर यज्ञ है। प्रातःसवन में तो प्रत्यक्ष ही
लिये जाते हैं, जब ऋतु-ग्रह निकाले जाते हैं। परन्तु दोपहर के सवन में परोक्ष रूप से निकलता
है जब दो मरुत्वतीय ऋतुपात्रों को निकालता है, इसलिए दो मरुत्वतीय ऋतु-पात्रों में निकालता
है ॥१२॥
वह इस मन्त्र से निकालता है—"इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः
सुतस्य । तव प्रणीती तव शूर शर्मन्नाविवासन्ति कवयः सुयज्ञाः । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा
मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते” (यजु० ७।३५, ऋ० ३।५१।७)—"हे मरुतों से
युक्त इन्द्र ! यहाँ सोम को पी, जैसे शार्यात के सोम को पिया था। सुयज्ञ कवि लोग तेरी
प्रसन्नता और तेरी शरण की सहायता से ही यज्ञ में तेरी सेवा करते हैं। तुझे आश्रय के लिए
लिया है। इन्द्र मरुत्-युक्त के लिए तुझको ! यह तेरी योनि है। मरुत्-युक्त इन्द्र के लिए
तुझको” ॥१३॥
दूसरे ग्रह को इस मन्त्र से निकालता है—"मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यँ
शासमिन्द्रम् । विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रँ सहोदामिह तँ हुवेम । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा
मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते" (यजु० ७।३६, ऋ० ३।४७।५)—"मरुतवाले,
बलवान्, वृद्धि-शील, दोष-रहित, दिव्य, शासक, सबके पालक इन्द्र को हम इस यज्ञ में नई रक्षा
के लिए बुलाते हैं। आश्रय के लिए तुझे लिया जाता है। इन्द्र-मरुतवाले के लिए तुझको। यह
तेरी योनि है। इन्द्र मरुतवाले के लिए तुझको।' इस मन्त्र से तीसरा ग्रह निकालता है- "उपयाम-
गृहीतोसि मरुतां त्वौजसे” (यजु० ७।३६)—"तुझे आश्रय के लिए लिया गया है। मरुतों के
ओज के लिए तुझको” ॥१४॥
अब वह माहेन्द्र ग्रह को लेता है। जैसे विजय की कामना के लिए वैश्यों के साथ एक ही
पात्र में खा लेवे, इसी प्रकार इन्द्र भी वैश्य मरुतों के साथ मिलकर पाप-युक्त हो गया, क्योंकि
मरुतों के साथ-साथ इन्द्र के लिए भी एक ही ग्रह निकाला गया ॥१५॥
तब देवों ने जीत हो जाने और अभय और शान्ति प्राप्त हो जाने पर इन्द्र को उस पाप
से मुक्त किया जैसे सिरकी से मूंज निकाल लेते हैं, इस माहेन्द्र ग्रह को लेकर। जैसे सिरकी बिना
मूंज के (साफ) हो जाती है इसी प्रकार माहेन्द्र ग्रह को निकालकर वह सब दोषों से दूर हो
जाता है ॥१६॥
माहेन्द्र ग्रह को इसलिए भी निकालता है, वृत्र के वध से पहले वह इन्द्र था। अब किसी
बड़े विजयी राजा के समान, वृत्र को मारकर माहेन्द्र बन गया। इसलिए माहेन्द्र ग्रह को लेता
है। वृत्र के वध के लिए उसको बड़ा बनाता है, इसलिए भी माहेन्द्र ग्रह को लेता है। शुक्र-पात्र
से लेता है। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। शुक्र महान् है, इसलिए शुक्र-पात्र से
निकालता है ॥१७॥
इस मन्त्र से निकालता है—"महाँ२ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः
सहोभिः । अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् । उपयामगृहीतोऽसि महेन्द्राय