शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-३
३८० शतपथ ब्राह्मण
तया॒ द्वाभ्या॑मे॒तयै॒कये॒तयै॒कये॒तया॒ द्वाभ्या॑मे॒तया तिसृ॑भिरे॒तया॒ चत॑सृभिरे॒तया॒ स-
र्वाभिः॒ सम॒स्याञ्जलि॑ना॒धाव॑पति ॥ १३॥ स वाऽउ॒दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते । स यदु-
दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते॒ऽइमा॒ एवै॒तद॒ङ्गुलीर्नाना॑नानाः करोति॒ तस्मा॑दि॒मा नाना॑ ज्ञा-
यन्ते॒ऽथ॒ यत्स॒ह सर्वा॑भि॒र्निमी॑ते स॒श्लिष्टा॑-इव॒ ह्येतवे॒मा जा॑येरं॒स्तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्या-
चं॒ मिमी॑ते ॥ १४॥ यद्वेवो॒दाचं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते । इमा॒ एवैतन्ना॑नावी॒र्याः करोति
तस्मा॑दि॒मा ना॑नावी॒र्या॒स्तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते ॥ १५॥ यद्वे॒वोदा॑चं॒ न्याचं॒
मिमी॑ते । वि॒राज॑मे॒वैतद॒र्वाचीं॑ च प॒राचीं॑ च युनक्ति परा॒च्यह दे॒वेभ्यो॑ य॒ज्ञं वह॑-
त्य॒र्वाची मनु॒ष्यानव॑ति॒ तस्मा॑दा॒ऽउदा॑चं॒ न्याचं॒ मिमी॑ते ॥ १६॥ अथ॒ दश॑ कृत्वो
मिमी॑ते । दशा॑क्षरा॒ वै वि॒राडैरा॑जः॒ सोम॒स्तस्मा॒द्दश॑ कृत्वो मिमी॑ते ॥ १७॥ अथ
सोमोपनह॒नस्य॒ समुत्पर्या॑न्तान् । उ॒ष्णीषे॑ण॒ विग्र॑थ्नाति प्र॒जाभ्य॒स्त्वेति॑ प्र॒जाभ्यो॒ ह्ये-
नं क्रीणा॑ति स य॑द्देवै॒दं शिर॑श्चा॒ऽसौ चात्तरोपेनितमिव तद्दे॒वास्यै॒तत्करो॑ति ॥ १८॥
अथ॒ मध्ये॒ऽङ्गुल्त्या॑का॒शं करो॑ति । प्र॒जास्त्वानु॑प्राण॒न्त्विति॒ तम॑यतीव वा॒ऽएनमेतत्स॒-
मापन्नप्राणमिव करोति॒ तस्यैतदृत एव॒ मध्य॑तः प्रा॒णमु॑त्सृज॑ति॒ तं ततः॑ प्रा॒णन्तं॑
प्र॒जा अनु॑प्राणन्ति॒ तस्मा॑दाह प्र॒जास्त्वानु॑प्राण॒न्त्विति॒ त सोम॑विक्र॒यिणे॒ प्रय॑हृत्य-
र्थात्तः प॒णन॑स्यैव ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३.२.]॥ ॥
स वै राजानं॑ पणते । स यद्राजानं॑ पणते॒ तस्मा॑दि॒दं सकृ॒त्सर्वं॑ प॒ण्यं॒ स आ-
ह॒ सोम॑विक्रयिन्क्र॒य्यस्ते॒ सोमो॒ राजा॑३॒इति॒ क्रय्य॒ इत्या॑ह सोम॑विक्रयी॒ तं वै॑ ते
क्री॒णानीति॑ क्री॒णीहीत्या॑ह सोम॑विक्रयी क॒लया॑ ते क्रीणानीति॒ भूयो वा॒ऽअतः॑
सोमो॒ राजा॑र्ह॒तीत्या॑ह॒ सोम॑विक्रयी॒ भूय॒ एवातः॒ सोमो॒ राजा॑र्हति म॒हांस्त्वेव गोर्म-
हि॒मेत्य॑ध्व॒र्युः ॥ १॥ गोर्वै प्रतिधुक् । तस्यै॑ शृ॒तं तस्यै॑ श॒रस्तस्यै॒ दधि॒ तस्यै॑ म॒स्तु
तस्या॑ऽऽतञ्चनं॒ तस्यै॒ नव॑नीतं॒ तस्यै॑ घृ॒तं तस्या॑ऽऽमि॒क्षा तस्यै॑ वा॒जिनं॑ ॥ २॥
श॒फेन॑ ते क्रीणानी॑ति । भूयो॒ वा॒ऽअतः॒ सोमो॒ राजा॑र्ह॒तीत्या॑ह सोम॑विक्र॒यी भूय॑
कां० ३, अ० ३, ब्रा० २-३, कं० १३-१६ व १-३ शतपथब्राह्मण / ३८१
से, फिर दो से, फिर एक से, फिर एक से, फिर दो से, फिर तीन से, फिर चार से, फिर सब
से ॥१३॥
वह अँगुलियों को झुकाकर और ऊपर को उठाकर सोम को तोलता है। उठाकर और
झुकाकर इसीलिए तोलता है कि अँगुलियों को अलग-अलग मान लेता है। इसीलिए ये अलग-
अलग उत्पन्न होती हैं। और सब अँगुलियों से इसलिए तोलता है कि वे संयुक्त उत्पन्न हों।
इसीलिए वह अंगुलियों को उठाकर और झुकाकर तोलता है ॥१४॥
अँगुलियों को उठाकर और झुकाकर इसलिए लेता है कि ये भिन्न शक्तिवाली हो
जायें। इसीलिए अँगुलियाँ भिन्न-भिन्न शक्तिवाली हैं ॥१५॥
अंगुलियों को उठाने और झुकाने का प्रयोजन यह है कि विराज् (विराज् छन्द को
जिसमें दश अक्षर के पद होते हैं) को ले जाता और ले आता है। अर्थात् यज्ञ को पहले देवों के
लिए ले जाता है, फिर मनुष्यों के लिए वापस लाता है ॥१६॥
इस बार तोलने का तात्पर्य यह है कि विराट् छन्द में दश अक्षर होते हैं। सोम विराट्
के समान है। इसलिए दश बार तोलता है ॥१७॥
सोम-वस्त्र के किनारों को पकड़कर अध्वर्यु उसको पगड़ी से बाँधता है यह पढ़कर—
“प्रजाभ्यस्त्वा” (यजु० ४।२५)—“सन्तान के लिए तुझे।” सन्तान के लिए ही सोम को मोल
लिया जाता है। शिर और कन्धों के बीच में जो शक्ल होती है वैसी ही बना देता है (अर्थात्
सोम की गठरी ऐसी बाँधी जाती है कि लड़के की आकृति हो जाय, सिर निकला रहे) ॥१८॥
अब इस मन्त्र को पढ़कर गांठ में अँगुली जाने के लिए छेद कर देता है—“प्रजास्त्वाऽनु-
प्राणन्तु” (यजु० ४।२५), अर्थात् सन्तान तेरे समान प्राण (साँस) लें। जब गाँठ बाँधी तो
मानो उसका गला घोंट दिया। वह साँस न ले सका। अब वह इस प्रकार प्राणों को छोड़ता है
(साँस को लेता है)। इसी के समान सन्तान भी साँस लेगी। इसीलिए कहा ‘सन्तान तेरे समान
साँस लें।’ अब वह उसको सोम बेचनेवाले को दे देता है। अब आगे मोल चुकाने की बात
आवेगी ॥१९॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
सोम राजा के लिए मोल किया जाता है। चूंकि सोम राजा का मोल किया जाता है
इसलिए सभी चीजों का मोल करते हैं। पहले सोम बेचनेवाले से पूछता है, ‘क्या सोम राजा
बिकाऊ है?’ वह उत्तर देता है, ‘हाँ, बिकाऊ है।’ वह पूछता है, ‘मैं तुझसे मोल लूंगा।’ सोम
बेचनेवाला उत्तर देता है, ‘ले लो।’ अध्वर्यु कहता है कि, ‘कला (गौ के सोलहवें भाग) के बदले
सोम को लूंगा।’ सोम बेचनेवाला कहता है, ‘सोम राजा का मोल इससे अधिक है।’ अध्वर्यु
कहता है कि ‘निस्सन्देह सोम राजा का मोल इससे अधिक है, परन्तु गाय की महिमा भी तो
अधिक है’ ॥१॥
गाय से दूध मिलता है, उसी से शृत, उसी से मलाई, उसी से दही, उसी से मस्तु,
आतंचन, नवनीत, घी, आमिक्षा और वाजी। (ये सब दूध से बनी चीजों के नाम हैं) ॥२॥
‘मैं गाय के एक शफ (खुर) के बदले इसको मोल लूंगा।’ सोम बेचनेवाला कहता है,
३८२ शतपथ ब्राह्मण
॒श्वातः॑ सोमो॒ राजा॑र्हति म॒हांस्त्वेव गोर्म॑हि॒मेत्य॑ध्व॒र्यु॒रेता॒न्येव दश॑ वी॒र्या॑ण्युदाच॒क्षा-
णा॒ह पदा॒ तेऽर्धेन ते॒ गवा॑ ते क्रीणामीति क्रेतः सोमो राजेत्याह सोमविक्रयी
वयांसि प्रब्रूहीति ॥३॥ स॒ आह॑ । च॒न्द्रं ते॒ वस्त्रं॑ ते॒ छागा॑ ते धे॒नुस्ते॑ मिथुनौ
ते॒ गावौ॑ ति॒स्रस्ते॒ऽन्या इति॒ स यद॒र्वाक्य॑णान्ते॒ परः॑ सम्पाद॒यन्ति॒ तस्मादि॒दं सकृ॑-
त्स॒र्वं पण्यम॒र्वाक्य॑णान्ते परः सम्पादयन्त्यथ यदध्व॒र्युुरेव गोर्वी॒र्या॑ण्युदाच॒ष्टे न सोम॑-
स्य सोमविक्रयी महितो वै सोमो देवो हि सोमोऽथैतदध्वर्युंर्ग महयति तस्यै
पश्यन्वी॒र्या॑णि क्रीणा॒दिति॒ तस्मादध्व॒र्युुरेव गोर्वी॒र्या॑ण्युदाच॒ष्टे न सोम॑स्य सोम-
विक्रयी ॥४॥ अथ यत्पञ्च कृत्वः प॒णते॒ । सं॒वत्स॑रसंमितो वै य॒ज्ञः पञ्च॒ वा ऋ॒त-
वः सं॑वत्स॒रस्य॒ तं प॒ञ्चभिराप्नो॑ति॒ तस्मा॑त्पञ्च कृत्वः प॒णते॒ ॥५॥ अथ हिर॑ण्ये वा-
चयति । शु॒क्रं त्वा शु॒क्रेण॑ क्रीणामीति शुक्रं॒ ह्येतच्छुक्रेण॑ क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हि॒-
रण्येन च॒न्द्रं च॒न्द्रेणेति॑ च॒न्द्रं ह्येतच्चन्द्रेण क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हिर॑ण्येन॒ामृतम॒मृ॑-
तेने॒त्यमृ॑तं॒ ह्येतद॒मृते॑न क्रीणा॒ति यत्सोमं॑ हि॒रण्येन ॥६॥ अथ सोमविक्रयि-
णम॑भिकम्पयति । स॒ग्मे ते॒ गोरिति॒ यज॑माने ते॒ गौरित्ये॒वैतदा॑ह॒ तद्यद्यज॑मानम-
भ्यावृत्य॒ न्यस्ये॑त्स॒मे ते॒ चन्द्राणी॑ति॒ स आत्म॒न्नेव वीर्यं॑ धत्ते॒ शरीर॑मेव॒ सोम॑वि-
क्रयी कुरुते तत्ततः सोमविक्रय्यादत्ते ॥७॥ अथैतायां प्रतीचीनमुख्यां वाचयति ।
तप॑सस्त॒नूर॑सीति तपसो ह॒ वा॒ऽए॒षा प्र॒जाप॑तेः संभूता यदजा तस्मादाह तपस-
स्तनूरसीति प्रजापतेर्वर्ण॒ इति सा यन्त्रिः॒ संवत्सरस्य विजायते तेन प्रजापतेर्वर्णः
परमेण पशुना क्रीतस्त॒ऽइति॒ सा यन्त्रिः॒ संवत्स॒रस्य॑ वि॒जाय॑ते तेन पर॒मः पशुः॑ स॒-
हस्रपोषं पुषेयमित्याशिषमेवैतदाशास्ते भूमा वै सहस्रं भूमानं गछानीत्येवैतदाह
॥८॥ स वा॒ऽअने॑नैवैनां प्र॒युन॑क्ति । अनेन राजानमादत्तऽआज्ञा॒ ह वै नामैषा
यदजेतया ह्येनमेतत आप्नोति तमेतत्परोऽक्षमजेत्याचक्षते ॥९॥ अथ राजानमा-
दत्ते । मित्रो न एहि सुमित्रध इति शिवो नः शान्त एहीत्येवैतदाह तं यजमा-
कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० ३-१० शतपथब्राह्मण / ३८३
'सोम राजा इससे कहीं अधिक कीमती है।' अध्वर्यु कहता है, 'सोम राजा अवश्य कीमती है
परन्तु गाय की महिमा भी तो अधिक है।' इस प्रकार दश गुण वर्णन करके अध्वर्यु कहता जाता
है कि 'एक पद के बदले खरीदूँगा, आधी गाय के बदले, पूरी गाय के बदले।' यहाँ तक कि सोम
बेचनेवाला कह उठता है, 'बस सोम राजा खरीदा जा चुका। क्या-क्या दोगे, यह बताओ'
(वयांसि प्रब्रूहि) ॥३॥
अध्वर्यु कहता है, 'चन्द्र (सोना ?) तुम्हारा हुआ, वस्त्र तुम्हारा हुआ, बकरी तुम्हारी
हुई, गाय तुम्हारी हुई, एक बैल का जोड़ा तुम्हारा हुआ। तीन और गायें तुम्हारी हुईं।' पहले
वे मोल करते हैं और फिर मोल का निश्चय होता है। इसीलिए हर एक बिक्री की चीज में
पहले मोल किया जाता है, फिर निश्चय करते हैं। केवल अध्वर्यु ही गाय के गुण क्यों कहता है ?
सोमवाला सोम के गुण क्यों नहीं कहता ? इसका कारण यह है कि सोम देवता है, उसकी
महिमा तो प्रख्यात है। इसलिए अध्वर्यु गाय के गुण कहता है, सोमवाला सोम के नहीं। सोम-
वाला गाय के गुण सुनकर उसको ले लेगा। इसीलिए अध्वर्यु गाय के गुण गाता है, सोमवाला
सोम के गुण नहीं कहता ॥४॥
पाँच बार क्यों मोल करता है ? यज्ञ संवत्सर के तुल्य है। संवत्सर में पाँच ऋतु होते
हैं। पाँच बार मोल करने से इसको भी पाँच अंगवाला बना देता है ॥५॥
अब वह यजमान से स्वर्ण के लिए कहलवाता है- "शुक्रं त्वा शुक्रेण क्रीणामि" (यजु०
४।२६) - "तुझ शुद्ध को शुद्ध के बदले खरीदता हूँ।" वस्तुतः जब वह स्वर्ण के बदले सोम को
लेता है तो शुद्ध के बदले ही शुद्ध को खरीदता है। "चन्द्रं चन्द्रेण" (यजु० ४।२६) - "चन्द्र को
चन्द्र के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले लेना मानो चमकी ली चीज के बदले लेना है। "अमृतं
अमृतेन" (यजु० ४।२६) - "अमृत को अमृत के बदले।" सोम को स्वर्ण के बदले खरीदना मानो
अमृत को अमृत के बदले खरीदना ही है ॥६॥
अब सोमवाले को धमकाता है, "सग्मे ते गोः" (यजु० ४।२६) - "गायवाले अर्थात्
यजमान के साथ तेरी गाय हो।" अब (स्वर्ण को) यजमान की ओर लाकर फेंक देता है-
"अस्मे ते चन्द्राणि" (यजु० ४।२६) - "ये चमकीले सोने के टुकड़े हमारे हों।" इससे यजमान
वीर्य (शक्ति) धारण करता है। और सोम-विक्रेता के पास केवल शरीर रह जाता है। इसके
पीछे सोम-विक्रेता उस सोने को ले लेता है ॥७॥
पश्चिमाभिमुखी बकरी के प्रति यजमान से कहलवाता है- "तपस्तनूरसि" (यजु०
४।२६) - "तू तप का शरीर है।" यह जो बकरी है वह प्रजापति के तप से उत्पन्न हुई। इसी-
लिए कहता है कि 'तू तपःका शरीर है।' अब कहता है- "प्रजापतेर्वर्णः" (यजु० ४।२६) -
"प्रजापति का वर्ण है।" चूंकि वर्ष में तीन बार जनती है, इसलिए प्रजापति के समान हुई।
"परमेण पशुना क्रीयसे" (यजु० ४।२६) - "तूपरम पशु के बदले खरीदा गया।" बकरी तीन बार
वर्ष में जनती है, इसलिए परम पशु है। "सहस्रपोषं पुषेयम्" (यजु० ४।२६) - "मैं सहस्रों
वस्तुओं से पुष्ट हो जाऊँ।" यह आशीर्वाद है। सहस्र का अर्थ है भूमा या बहुत। तात्पर्य यह है
कि मुझे बहुत-सी चीजें मिल जायें ॥८॥
इस (बायें हाथ) से बकरी को देता है और इस (दाहिने हाथ) से सोम को लेता है।
यह जो 'अजा' है वह 'आजा'। इसी बकरी के द्वारा वह अन्त में सोम को ले जाता है (आजाति)
इसलिए उसका परोक्ष नाम 'आजा' या 'अजा' हुआ ॥६॥
इस मन्त्र को पढ़कर सोम राजा को लेता है, "मित्रो नऽएहि सुमित्रधः" (यजु० ४।२७) -
"तू मित्र बनकर हमारे पास आ, अच्छे मित्रों का देनेवाला।" इसका अर्थ यह हुआ कि तू कल्याण-
कारी है, हमारे लिए कल्याण कर। उसको यजमान की दाहिनी जाँघ पर रखकर वस्त्र से ढाँपकर
३८४ शतपथ ब्राह्मण
नस्य दक्षिण॒ ऊरौ॑ प्रत्यु॑च्य॒ वामो॑ निद॒धानीन्द्र॑स्योरुमा॒विश॒ दक्षि॑णमित्येष वा
ऽअत्रेन्द्रो॒ भव॑ति॒ यद्यज॑मानस्तस्मादाहेन्द्र॑स्योरुमा॒विश॒ दक्षि॑णमित्युशुश॒तमिति॑
प्रियः प्र॒ियमित्ये॒वैतदाह स्यो॒नः स्यो॒नमिति॑ शि॒वः शि॒वमित्ये॒वैतदाह ॥१०॥ अथ
सोम॑क्रय॒णाननु॒दिश॑ति । स्वान भ्राजा॑ङ्घ्रे॒ बम्भा॑रे॒ हस्त॒ सु॒हस्त॒ कृशा॑नवे॒ते वः॑
सोम॑क्रय॒णास्तान्त्सर्वान् रक्ष॒ मा वो॑ दभन्निति धिष्याणां वाऽए॒ते भाङ्गिनैतानि वै धि-
ष्याणां॒ नामा॑नि तान्ये॒वैभ्य ए॒तदन्व॑दिशन ॥११॥ अथात्रापोर्णुते । गर्भो वाऽए॒-
ष भ॑वति यो दीक्षते प्रावृता वै गर्भा उल्वेनेव जरायुणेव तमत्राजीजनत् तस्मा-
द्वयोर्णुतः स्य वाऽअत्र॒ गर्भो भ॑वति॒ तस्मात्परिवेष्टितो भव॑ति॒ परिवृता-इव हि ग-
र्भा उल्बेनेव जरायुणेव ॥१२॥ अथ वाचयति । परि॒ माग्ने॑ दु॒श्च॒रिता॑द्बाधस्वा॒ मा
सु॒चरि॑ते भजेत्यासीनं वाऽएनमेष आगच्छति स आगतोऽउत्तिष्ठति तन्मिथ्याकरोति
व्रतं प्रमीणाति तस्यो हेषा प्रायश्चित्तिस्तथो हास्यैतन्न मिथ्याकृतं भवति न व्रतं
प्रमीणाति तस्मादाह परि माग्ने दुश्चरिताद्बाधस्वा मा सुचरिते भजेति ॥१३॥ अथ
राजानमादायापोत्तिष्ठति । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ२ऽअन्वित्यमृ॒तं वाऽए॒षो
ऽनुत्तिष्ठात यः सोमं क्रीतं तस्मादाहोदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ२ऽअन्विति
॥१४॥ अथ राजानमादायारोहणमभिप्रैति । प्रति पन्थामपद्महि स्वस्ति गामने-
हसम् । येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥१५॥ देवा ह वै य-
ज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद्विभयां चक्रुस्तऽएतद्यजुः स्वस्त्ययनं ददृ-
शुस्तदेतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपकृत्यैतस्य यजुषोऽभयेऽनाष्ट्रे निवाते स्वस्ति
समाश्नुवत तथोऽएवैष एतेन यजुषा नाष्ट्रा रक्षांस्यपकृत्यैतस्य यजुषोऽभयेऽनाष्ट्रे
निवाते स्वस्ति समश्नुते तस्मादाह प्रति पन्थामपद्महि स्वस्ति गामनेहसम् । ये-
न विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वस्विति ॥१६॥ तं वाऽइति हरति ।
अनसा परिवहन्ति मध्यन्त्येनमेतत्त्माक्षीला वीतं हरन्त्यनसोदावरुति ॥१७॥
कां० ३, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३८५
कहता है, “इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणम्” (यजु० ४।२७)—“इन्द्र की दाहिनी जंघा पर बैठ।” यहाँ
यजमान इन्द्र है। इसलिए कहता है कि इन्द्र की जांघ पर बैठ। “उशन्नुशन्तम्” (यजु० ४।२७)
—“प्यारा प्यारे के पास।” ’स्योनःस्योनम्” (यजु० ४२७)—“कोमल कोमल के पास।” अर्थात्
कल्याणकारक कल्याणकारक के पास ॥१०॥
अब सोम के मोल को सुपुर्द करता है यह कहकर कि—‘हे स्वान, हे भ्राज, हे अंघारि,
हे बंभारि, हे हस्त, हे सुहस्त, हे कृशानु, ये-ये चीजें तुम्हारे सोम का मोल हैं। इनकी रक्षा
करो। ये तुमको प्रतिकूल सिद्ध न हों (यजु० ४।२७)। स्वान—उपदेश देनेवाला। भ्राज—
चमकनेवाला। अंघारि—अघ अर्थात् पाप का शत्रु। बंभारि—विश्व का धारण करनेवाला।
हस्त—जिसके द्वारा हँसते या प्रसन्न होते हैं वह। सुहस्त—जिसके द्वारा हाथ की क्रियाएं
ठीक होती हैं। कृशानु—जो कृश अर्थात् दुर्बलों को जिलाता है (कृशं अनीति इति) या जो दुष्टों
को दुबला करता है (दुष्टान् कृशति इति)। ये सात नाम धिष्ण्या अर्थात् यज्ञ की वेदी के हैं,
और इसलिए वेदी के अधिष्ठाताओं के भी ये नाम हैं। अतः इन्हीं के लिए ये अनुदेश हैं ॥११॥
अब वह अपने सिर को खोलता है। जो दीक्षा लेता है वह गर्भ के तुल्य होता है। गर्भ
उल्ब और जरायु से लिपटा होता है। उसी गर्भ का अब जन्म हुआ। इसलिए वह सिर को
खोल लेता है। अब वह सोम गर्भ का रूप धारण करता है, इसलिए ढका हुआ होता है, क्योंकि
गर्भ उल्ब और जरायु से ढका होता है ॥१२॥
अब वह इस वेदमन्त्र को पढ़वाता है—‘‘परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते
भज” (यजु० ४।२८)—‘हे अग्नि ! तू मुझे दुश्चरित से हटा और अच्छे चरित में ले जा।” जब
सोम राजा आया था तब वह यजमान बैठा था। उसके आने पर वह यजमान खड़ा हो जाता है।
यही मिथ्या आचरण है। इससे व्रत भंग होता है (क्योंकि उसने व्रत किया था कि सोमरस
निकालने तक गर्भ की अवस्था में ही बैठा रहूँगा)। यह मन्त्र पढ़ना मानो इस दोष का
प्रायश्चित्त है। इस पाठ से मिथ्या आचरण नहीं होता और न व्रत भंग होता है, इसलिए ‘परि
माग्ने’ मन्त्र का पाठ किया जाता है ॥१३॥
अब सोम राजा को लेकर उठता है यह मंत्रांश पढ़कर—“उदायुषा स्वायुषोदस्था-
ममृताँ २ ऽ अनु’ (यजु० ४।२८)—“उत्कृष्ट और अच्छी आयु के द्वारा मैं अमृृतों का अनुसरण
करके उठूं (उन्नत होऊँ)।” वस्तुतः वह मोल लिये हुए सोम के पीछे उठता है, मानो अमृत के
पीछे उठता है। इसलिए इस ‘उदायुषा’ मन्त्र का पाठ करता है ॥१४॥
अब सोम राजा की लेकर गाड़ी तक आता है इस मन्त्र को पढ़कर—“प्रति पन्थामपद्महि
स्वस्तिगामनेहसम्। येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु” (यजु० ४।२६)—“हमने
कल्याणकारक और पाप-रहित मार्ग का अवलम्बन किया है जिससे मनुष्य सब बुराइयों (शत्रुओं)
को छोड़ता और धन को प्राप्त करता है” ॥१५॥
एक बार देवों ने यज्ञ ताना। वे असुर राक्षसों के आक्रमण से भयभीत हुए। तब उन्होंने
इस यजुः (प्रार्थना) को कल्याण-गृह के रूप में देखा और इस यजुः के द्वारा राक्षस दुष्टों को
मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त की। इसी प्रकार इस यजुः की
सहायता से दुष्ट राक्षसों को मारकर इस यजुः के अभय और क्लेशरहित घर में शान्ति प्राप्त
करता है। इसीलिए ‘प्रति पन्थाम्’ मंत्र का पाठ करता है ॥१६॥
इस सोम को पहले इस प्रकार (हाथ में सिर पर रखकर) ले जाते हैं और फिर गाड़ी
में ले जाते हैं। इससे वे उसकी महत्ता बढ़ाते हैं। इसलिए वे बीज को सिर पर रखकर
(खेत में) ले जाते हैं ॥१७॥