शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-२
ये र॒श्मय॒स्ते विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॒च्छुक्रपात्रे॑ण गृह्णाति ॥ २६ ॥ अ॒थातो गृह्णात्ये॒व ।
ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आगत॑ । दा॒श्वांसो दा॒शुषः॑ सु॒तम् । उप॒यामगृ॑-
हीतोऽसि॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ ए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॒ इति॑ सादयति
विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति॑ ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३. १.] ॥ ॥
गृ॒णाति॑ ह॒ वाऽए॒तद्धोता यच्छ॑सति । तस्मा॑दे॒तद्गृणा॑ते॒ प्रत्ये॑वाध्व॒र्युर्गृणा॑ति
तस्मा॑त्प्रतिग॒रो नाम॑ ॥ १ ॥ तं वै प्राञ्च॑मासी॒नमाह्व॑यते । सर्वे॒ वाऽअन्यऽउद्गातुः
प्राञ्च आ॒र्त्विज्यं॑ कुर्व॒न्ति तथो॒ हास्यैतत्प्रागे॒वार्त्विज्यं॑ कृतं भव॑ति ॥ २॥ प्र॒जाप॑ति-
र्वाऽउद्गाता । योष॒ऽग्यै॑ता स ए॒तत्प्र॒जाप॑तिरुद्गाता॒ योषायमृचि॒ होत॑रि॒ रेतः॑
सिञ्चति॒ यत्स्तु॑ते॒ तद्धोता श॒स्त्रेण॑ प्र॒जन॑यति॒ तद्यति॒ यथायं पुरुषः॑ शितस्त॒द्यदे॑-
नद्यति॒ तस्मा॒च्छ॒स्त्रं नाम॑ ॥ ३॥ तदुपप॒ल्यग्य॑ प्रति॒गृणा॑ति । इ॒दमे॒वैतद्रेतः॑ सि॒क्त-
मुप॒निम॑द्गत्यथ॒ यत्परा॑ङ् ति॒ष्ठन्प्रति॑गृणीयात्पराङ् है॒वैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒णश्ये॒त्तन्न प्र॒-
जायेत सम्प्र॒चाऽउ चैवैतदू॒र्ध्वेवैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒जन॑यतः ॥४॥ या॒त॒यामा॑नि॒ वै दे॒वै-
श्छन्दा॑सि । छन्दो॑भि॒र्हि दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्नु॑वत॒ मदो॒ वै प्र॑तिग॒रो यो
वाऽऋचि॒ मदो॒ यः सामन्॒रसो॒ वै स तच्छन्दः॑स्वै॒वैतद्रसं॑ दधात्ययातयामानि करो-
ति तैरयातया॑मि॒र्ह्यनं तन्वते॑ ॥ ५॥ तस्मा॒द्यद॒र्धर्चशः॑ शं॒सेत् । अ॒र्धर्चे॑ऽर्धर्चे॒ प्रति॑-
गृणीया॒द्यदि॑ प॒दः शं॒सेत्प॒दे-प॑दे प्रतिगृणीया॒द्यत्र॒ वै श॒स्त्रम॒न्ववा॑निति॒ तद्सुररक्ष॒-
सानि॑ य॒ज्ञम॒न्वव॑चरन्ति॒ तत्प्रति॑गरेण॒ संद॑धाति॒ नाष्ट्राणा॑ꣳ रक्ष॑सामनन्ववचाराय॑
यज॑मानस्यो चैवैतद्भा॒तृव्य॑लो॒कं छि॒नत्ति॑ ॥ ६॥ चतुर॒क्षरा॑णि ह॒ वाऽअये॒ च्छन्दा॑-
स्यासुः । ततो॒ जग॑ती॒ सोम॒मछाप॑तत्सा॒ त्रीण्य॒क्षरा॑णि हि॒त्वाऽग॑म॒त्ततस्त्रिष्टुक्सो॑-
मम॒छाप॑तत्सैकम॒क्षरं॑ हि॒त्वाऽग॑म॒ ततो॑ गायत्री॒ सोम॒मछाप॒त्तत्सैतानि चा॒क्षरा॑णि
हर॒त्याग॑छ॒त्सोमं॑ च॒ ततो॑ऽष्टाक्ष॑रा गाय॒त्र्यभ॑व॒त्तस्मा॑दाहुर॒ष्टाक्ष॑रा गाय॒त्रीति॑ ॥ ७॥
तया॑ प्रातःस॒वन॒मत॑न्वत । तस्मा॑द्गाय॒त्रं प्रा॑तःस॒वनं तथै॑व माध्यन्दि॒नꣳ सव॑नम-
कां०४, अ० ३, ब्रा० १-२, कं० २६-२७ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५८३
तपता है, शुक्र (तेजों से) तपता है जिसकी ये सब किरणें हैं। यही विश्वेदेव हैं। इसलिए शुक्र-
ग्रह से लेता है ॥२६॥
वह (द्रोण कलश से सोम) इस मन्त्र से निकलता है—"ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे
देवास ऽ आगत। दाश्वाँसो दाशुषः सुतम् । उपयामगृहीतोऽसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः” (यजु०
७।३३, ऋ० १।३।७) —“हे रक्षक और मनुष्यों के पोषक विश्वेदेव, आओ। आप कामनाओं के
देनेवाले हैं। देनेवाले के निचोड़े हुए सोम को (पीने के लिए)। तुझको आश्रय के लिए लिया
गया है। विश्वेदेवों के लिए तुझको।" "एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः" (यजु० ७।३३) —
"यह तेरी योनि है। विश्वेदेवों के लिए तुझको।" ऐसा कहकर वह उसको रख देता है, क्योंकि
विश्वेदेवों के लिए इसको लेता है ॥२७॥
शस्त्रप्रतिगरः
अध्याय ३—ब्राह्मण २
जब होता शस्त्र पढ़ता है तो गाता है। और जब वह गाता है तो अध्वर्यु उसके प्रत्युत्तर
में गाता है। इसलिए उसको 'प्रतिगर' (प्रति + आ + गृणाति) कहते हैं ॥१॥
होता पूर्वाभिमुख बैठे हुए अध्वर्यु का आह्वान करता है। उद्गाता को छोड़कर और
सब पूर्वाभिमुख होकर ऋत्विज का कार्य करते हैं। इसलिए इसका ऋत्विक का कार्य भी पूर्वा-
भिमुख हो जाता है ॥२॥
उद्गाता प्रजापति है। ऋचा होतारूपी स्त्री है। यह प्रजापतिरूप उद्गाता पुरुष
ऋचारूपी होता स्त्री में वीर्य का सिंचन करता है जबकि वह स्तुति करता है। होता शस्त्र के
रूप में जनता है (जैसे मां बच्चे को जनती है)। वह पैना करता है जैसे यह पुरुष पैना किया
जाता है (चाकू पैना करने के लिए सान पर रखते हैं। इस प्रकार 'शो' का अर्थ है पैना करना,
बनाना) चूंकि पैना करते हैं इसलिए 'शो' से 'शस्त्र' शब्द बना। ('शो तनूकरणे' धातु के रूप
'श्यति' आदि होते हैं) ॥३॥
(अध्वर्यु) घूमकर (होता की ओर मुँह करके) प्रत्युत्तर में गाता है। इस प्रकार यह
सींचे हुए वीर्य को तेज कर देता है। यदि मुँह फेरकर गावे तो सींचा हुआ वीर्य नष्ट हो जाय,
और उत्पत्ति न हो। (स्त्री और पुरुष) एक-दूसरे की ओर मुख करके सींचे हुए वीर्य से उत्पत्ति
करते हैं ॥४॥
देवों द्वारा छन्द थका दिये गये। क्योंकि छन्दों द्वारा ही देव स्वर्गलोक को गये। प्रतिगर
(प्रत्युत्तर का गाना) यह है। यह जो ऋक् में मद है और यह जो साम में, वही रस है। यह रस
वह छन्दों में रख देता है, अर्थात् छन्दों की थकावट दूर कर देता है। इन फिर से पुष्ट छन्दों से
यज्ञ करता है ॥५॥
इसलिए यदि (होता) आधी ऋचाओं से शस्त्र पढ़े तो अध्वर्यु आधी ऋचाओं के द्वारा
प्रत्युत्तर भी दे। यदि पाद-पाद करके तो प्रतिगर भी पद-पद से हो, क्योंकि शस्त्र पढ़ने में ज्योंही
साँस टूटता है त्यों ही असुर राक्षस दौड़ पड़ते हैं। इसको अध्वर्यु प्रतिगर द्वारा बन्द कर देता है।
इससे दुष्ट राक्षस आने नहीं पावे। इस प्रकार वह यजमान के शत्रु-लोक का नाश कर देता है ॥६॥
पहले छन्दों में चार अक्षर होते थे। उनमें से जगती सोम को लेने उड़ गई, और तीन
अक्षर पीछे छोड़कर लौट आई। अब त्रिष्टुप् सोम को लेने उड़ गया और एक अक्षर छोड़कर
घर लौट आया। फिर गायत्री सोम को लेने उड़ी और इन सब अक्षरों को और सोम को भी
लेकर वापस आ गई। इसलिए आठ अक्षर की गायत्री हो गई। इसलिए कहते हैं कि आठ अक्षर
की गायत्री होती है ॥७॥
उस (गायत्री) से प्रातःसवन किया गया। इसलिए प्रातःसवन का नाम गायत्र है।