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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-२

३७६ शतपथ ब्राह्मण
ऽअ॒हं त्व॒द्वीरं॑ विदेय॒ तव॑ देवि सं॒दृशी॒त्याशि॑षमे॒वैतदा॒शास्ते॑ पु॒त्रो वै वीरः॑
पु॒त्रं वि॑देय॒ तव॑ सं॒दृशी॒त्ये॒वैतदा॑ह ॥ १२॥ सा या ब॒भ्रुः पि॒ङ्गाक्षी । सा सो॑मक्रय-
णी॒ यत्र॒ वाऽइन्द्रावि॒ष्णू त्रे॒धा स॒हस्रं॒ व्यैर॑येतां॒ तदेकात्य॑रिच्यत॒ तां त्रे॒धा प्राऽन-
यतां॒ तस्माद्योऽप्ये॒तर्हि॑ त्रे॒धा स॒हस्रं॒ व्याकु॒र्यादेकैवाति॑रिच्येत ॥ १३॥ सा या ब॒भ्रुः
पि॒ङ्गाक्षी॑ । सा सो॑मक्रय॒ण्यथ॒ या रोहि॑णी॒ सा वा॑र्त्र॒घ्नी यामि॒द राजा॑ सं॒ग्रामं॑ जि-
ग्वी॒षाकु॑रु॒तेऽथ॒ या रोहि॑णी श्वे॒ताक्षी सा पि॒तृदे॑वत्या॒ यामि॒दं पि॒तृभ्यो॑ प्र॒त्ति ॥१४॥
॥ शतम् १६०० ॥ ॥ सा या ब॒भ्रुः पि॒ङ्गाक्षी॑ । सा सो॑मक्रयणी स्याद्य॒दि ब॒भ्रुं पि॒-
ङ्गाक्षीं॒ न वि॒न्देदरु॒णा स्याद्यद्य॑रु॒णां न वि॒न्देद्रोहि॑णी वा॑र्त्र॒घ्नी स्या॒द्रोहि॑ण्यै ह्यु
त्वे॑व॒ श्वेता॒क्ष्याऽऽशा॑शां नेया॒त् ॥ १५॥ सा स्यादप्रवीता । वाग्वाऽए॒षा निदा॑नेन
यत्सो॑मक्रय॒ण्यया॑तयाम्नी॒ वाऽइ॒यं वाग्या॒तयात॒म्येवाप्र॑वीता॒ तस्मा॒दप्र॑वीता स्यात्सा॒
स्याद॒व्यण्डाऽकूटाऽकाणाऽकर्णाऽश्लि॑षितासप्रशफा सा ह्ये॒कच्छि॒करू॑पा॒ ह्ये॑यं वाक् ॥ १६॥
ब्राह्मणम् ॥ ४ [३. १.] ॥ ॥
प॒द सम्मु॒ष्य पाणी॒ऽअवनि॑नेक्ते । तद्यत्पाणी॒ऽअवनि॑नेक्ते॒ वज्रो॒ वाऽआ॒ज्यं॑
रेतः॒ सोमो॒ नेद॒ग्रेणा॒ज्येन॒ रेतः॒ सोमं॑ हि॒न॒सानी॑ति॒ तस्मा॑त्पाणी॒ऽअवनि॑नेक्ते
॥ १॥ अ॒थास्या॑ऽ हिर॒ण्यं ब॑ध्नीते । द्वयं॒ वाऽइ॒दं न तृतीय॑मस्ति स॒त्यं चै॒वानृ॑तं च
स॒त्यमे॒व दे॒वा अ॒नृतं॑ मनु॒ष्या अ॒ग्निरेतसं॒ वै हिर॑ण्य॒ꣳ स॒त्येना॑ऽनू॒नू॒प॑स्पृशानि स॒-
त्येन॒ सोमं॑ प॒राह्णा॒नीति॒ तस्मा॒द्वाऽअ॒स्यां हिर॑ण्य ब॒ध्नीते ॥ २॥ अथ॒ सम्प्रेष्य॑-
ति । सोमोप॒नहन॒माह॑र॒ सोम॑पर्याणह॒नम॒होष्णी॑षमाहरे॒ति स यदे॒व शोभ॑नꣳ
तत्सो॑मोपन॒हनꣳ स्याद्वासो॒ ह्यस्यैतद्भव॑ति॒ शोभ॑नꣳ ह्येतस्य॒ वासः॑ स॒ यो हैन॑ꣳ
शोभ॑नेनोपचर॑ति॒ शोभ॑ते हाय य आ॒ह यदे॒व किं चेति॒ यद्देव किं च भव॑ति॒ त-
स्मा॒द्यदे॒व शोभ॑नं तत्सो॑मोप॒नहनꣳ स्या॒द्यदे॒व किं च सोम॑पर्याणह॒नम् ॥ ३॥
य॒द्युष्णी॑षं वि॒न्देत् । उ॒ष्णीषः॑ स्या॒द्यद्यु॒ष्णीषं॒ न वि॒न्देत्सो॑मपर्याणह॒नस्यै॒व व्यङ्गुलं॑

कां० ३, अ० ३, ब्रा० १-२, कं० १२-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३७७
मऽआयुः प्रमोषीर्माऽअहं तव वीरं विदेय तव देवि संदृशि" (यजु० ४।२३) - "दिव्य बुद्धि से मैंने
तुझको देखा। दीर्घ दृष्टिवाली आँख से मैंने तुझको देखा। तू मेरा जीवन न ले और न मैं तेरा
जीवन लूं। हे देवी, तेरे दर्शन करके मैं पुत्र को प्राप्त होऊँ।" इस प्रकार पत्नी आशीर्वाद मांगती
है। वीर का अर्थ है पुत्र, अर्थात् वह कहती है कि मैं तेरे दर्शन पाकर पुत्र को प्राप्त होऊँ ॥१२॥
सोम-गौ भूरी होती है और उसकी आँखें पिंगल होती हैं। जब इन्द्र और विष्णु ने एक
हजार गायों को तीन भागों में विभक्त किया तो एक रह गई। उससे उन्होंने तीन प्रकार सन्तान
जनाई। इसलिए आज भी अगर एक हजार को तीन में बाँटें तो एक बच रहता है ॥१३॥
जो भूरी और पिङ्गल आँखोंवाली है वह सोम-गौ है। जो रोहिणी है वह वृत्र को मारने-
वाली है जिसको राजा संग्राम में विजय प्राप्त करके लेता है। जो लाल और सफेद आँखोंवाली
है वह पितरों की है और पितरों के लिए मारी जाती है (घ्नन्ति) ॥१४॥ [शतम् १६००]
जो भूरी और भूरी आंखवाली हो वही सोम-गौ हो। यदि भूरी और भूरी आंखवाली
न मिले तो अरुण हो। यदि अरुण न मिले तो वृत्र को मारनेवाली रोहिणी हो। लेकिन लाल
और श्वेत नेत्रवाली कभी न हो ॥१५॥
वह गर्भिणी न हो। क्योंकि जो सोम-गौ है वह वास्तव में वाणी है। यह जो वाणी है वह
पूर्ण बलवाली है। पूर्ण बलवाली वही होती है जो गर्भिणी न हो। यह सोम-गौ गर्भिणी न हो।
ऐसी हो जो पूंछ-रहित न हो, बिना सींगों की न हो। कानी न हो। न बिना कान की हो, न
विशेष चिह्नवाली हो, न सात खुरवाली हो। यह एकरूपा है। वाणी भी एकरूपा है ॥१६॥
अध्याय ३-ब्राह्मण २
पद-धूलि को फेंककर हाथ धोता है। वह हाथ क्यों धोता है ? घी वज्र है। सोम वीर्य
है। वह हाथ इसलिए धोता है कि वीर्य-सोम को वज्र-घी से कोई हानि न पहुंचे ॥१॥
इस (अनामिका अँगुली) में सोना बाँधता है। संसार में दो ही होते हैं सत्य और अनृत,
तीसरा नहीं। देव सत्य हैं, मनुष्य अनृत है। अँगुली में सोना इसलिए बाँधता है कि अग्नि के वीर्य
से सोना उत्पन्न हुआ है। मैं सत्य से सोम की डाली को छुऊँ, अर्थात् सत्य के द्वारा मैं सोम को
खरीदूँ ॥२॥
अब वह आदेश देता है कि सोम-वस्त्र को लाओ, सोम का अँगोछा लाओ, सोम की
पगड़ी लाओ। सोम-वस्त्र शोभन (सुन्दर) हो, क्योंकि यह सोम राजा का वस्त्र है। जो शोभन
वस्तु से सोम की पूजा करता है वह स्वयं भी शोभन हो जाता है। और जो कहता है, 'अभी
कैसा भी हो', वह कैसा भी हो जाता है। इसलिए सोम वस्त्र सुन्दर होना चाहिए। सोम का
अँगोछा कैसा भी क्यों न हो ॥३॥
उष्णीष (पगड़ी) हो तो हो और न हो तो अँगोछे में से दो या तीन अंगुल फाड़ ले और

३७८ शतपथ ब्राह्मण
वा॒ ऽऋ॒तुलं॑ वाव॒कृते॒ऽङ्गुली॒भाज॑न॒मध्व॒र्युर्वा॒ यज॑मानो वा सोमोपनह॒नमाद॑त्ते॒ य ए॑व
कश्च॑ सोमपर्याण॒हनम् ॥४॥ अथ॒ग्रेण॒ राज्ञा॑नं वि॒चिन्व॑न्ति। तद्यत्कु॒म्भ उप॑नि-
हितो भ॑वति॒ तद्ब्राह्मणा उपा॑सते॒ तद॒भ्याया॑न्ति प्राञ्चः॑ ॥५॥ तदा॒यन्त्सु॑ वाचयति ।
ए॒ष ते॑ गाय॒त्रो भा॒ग इति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूतादे॒ष ते॒ त्रैष्टु॑भो भा॒ग इति॑ मे सोमा॑य
ब्रूतादे॒ष ते॒ जा॒गतो॑ भा॒ग इति॑ मे॒ सोमा॑य ब्रूताच्छन्दो॑नामाना॒ꣳ सा॒म्राज्यं॑ ग॒च्छेति॑
मे॒ सोमा॑य ब्रूतादित्येकं॑ वा॒ऽए॒ष क्रिय॒माणो॒ऽभिक्री॑यते॒ छन्द॑सामेव॒ राज्या॑य॒ छन्द॑-
साꣳ साम्रा॑ज्याय॒ यन्न्वे॑ वा॒ऽए॒नमेतद्‍यद॑भिषु॒ण्वन्ति॑ त॒मेतदा॑ह॒ छन्द॑सामेव॒ वा रा-
ज्या॑य॒ क्रियाणा॑नि॒ छन्द॑साꣳ सा॒म्राज्या॑य॒ न्व॑ ब॒धाय॒त्येत्य॑ प्राङुप॑विशति ॥६॥ सो
ऽभि॒मृश॑ति । आ॒स्मा॒को॒ऽसीति॑ स्व॒ऽइव॒ ह्यस्यैतद्भव॑ति॒ यदाग॑तस्त॒स्मादा॑हास्मा॒को
ऽसी॑ति शुक्र॒स्ते॒ ग्रह्य॒ इति॑ शु॒क्रꣳ ह्य॑स्माद॒हं ग्र॑हीष्य॒न्भव॑ति॒ विचि॑तस्त्वो॒ विचि॑-
न्वन्विति॑ सर्वत ए॒वैतदा॑ह ॥७॥ अत्र॒ हैके॑ । तृणं॑ वा॒ काष्ठं॑ वा वि॒ह्लापा॒स्यन्ति॑
तदु॒ तथा॑ न कुर्यात्तन्त्रं॒ वै सोमो॑ वि॒टन्या॒ ओष॑धयो॒ऽन्त्रं॒ वै क्ष॑त्रियस्य॒ विट् स
यथा॒ ऽसितम॑नुद्या॒याच्छि॒द्य परा॑स्येदे॒वं तत्स्तस्मादु॑भयैव मू॒र्तेर्विचितस्त्वो॒ विचि॑न्वन्त्वि-
ति॒ तद्य॒ऽङ्गुर्वा॒स्य वि॑चे॒तार॒स्तऽए॒नं वि॑चिन्वन्ति ॥८॥ अथ वासः । द्वि॒गुणं॑ वा
च॒तुर्गुणं॑ वा प्राग्द॑शं वोद॑ग्दशं वोप॑स्तृणाति॒ तद्राज्ञा॑नं मिमी॒ते स यद्राजा॑नं मि-
मी॒ते त॒स्मान्मात्रा॑ मनु॒ष्येषु॑ मात्रो॒ यो चाप्यन्या मात्रा॑ ॥९॥ सावि॒त्र्या मिमी॑ते ।
सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तयो॒ ह्यस्माऽए॒ष स॑वितृप्रसूत ए॒व क्रया॑य भव॑ति
॥१०॥ अति॑च्छन्दसा मिमीते । ए॒षा वै सर्वा॑णि॒ छन्दा॑ꣳसि॒ यदति॑च्छन्दा॒स्तथा॒ ह्य-
स्यैष सर्वै॑रेव॒ छन्दो॑भिर्मीतो भ॑वति॒ तस्मादति॑च्छन्दसा मिमीते ॥११॥ स मि-
मीते । अ॒भि त्यं दे॒वंꣳ स॑वि॒तार॑मोण्योः क॒विक्र॑तुम॒र्चामि॑ स॒त्यस॑वꣳ रत्न॒धाम॒भि
प्रि॒यं म॒तिं क॒विम् । ऊ॒र्ध्वा य॒स्याम॑तिर्भा अ॒द्युदौत्तत्स॒वीम॑नि॒ हिर॑ण्यपाणिरमिमीत
सुक्रतुः॑ कृ॒पा स्वरिति॑ ॥१२॥ ए॒तया सर्वा॑भिः । ए॒तया॒ चत॑सृभिरे॒तया ति॒सृभि॑रे-

कां० ३, अ० ३, ब्रा० २, क० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३७६
उसकी उष्णीष बना ले। सोम-वस्त्र को अध्वर्यु ले या यजमान। अंगोछा कोई और ले ले ॥४॥
अब सोम राजा को चुनते हैं। उसके निकट जल के घड़े को रखते हैं। और एक ब्राह्मण
पास बैठता है। अब वे पूर्व की ओर जाते हैं ॥५॥
जाते हुए यह मन्त्र बोलते हैं—‘‘एष ते गायत्रो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते
त्रैष्टुभो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताद्, एष ते जागतो भागऽइति मे सोमाय ब्रूताच्छन्दोनामानाꣳ
साम्राज्यं गच्छेति मे सोमाय ब्रूतात्’’ (यजु० ४।२४)—‘‘मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा
गायत्र भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि यह तुम्हारा त्रैष्टुभ भाग है। मेरे लिए सोम से कहो
कि यह तुम्हारा जगती का भाग है। मेरे लिए सोम से कहो कि छन्दों के साम्राज्य को प्राप्त
करो।’’ सोम राजा को क्रय करते हैं तो एक उद्देश्य के लिए— छन्दों के राज्य के लिए, छन्दों के
साम्राज्य के लिए। उसको निचोड़ते हैं तो मानो उसको मारते हैं। इसीलिए कहते हैं कि तुझे
छन्दों के राज्य के लिए और छन्दों के साम्राज्य के लिए मोल लेते हैं, मारने के लिए नहीं। अब
चलकर वह (सोम के) पूर्व में बैठता है ॥६॥
इस मन्त्र को पढ़कर (सोम के पौधे को) छूता है—‘‘अस्माकोऽसि’’ (यजु० ४।२४)—
‘‘तू हमारा है।’’ जब सोम आ गया तो वह अपना ही हो गया। इसलिए कहते हैं कि तू हमारा
है। ‘‘शुक्रस्ते ग्रह’’ (यजु० ४।२४)—‘‘तेरा शुक्र(रस) ग्रहण के योग्य है’’ क्योंकि वह उसको
ग्रहण करेगा ही। ‘‘विचितस्त्वा विचिन्वन्तु’’ (यजु० ४।२४)—‘‘चुननेवाले तुझे चुनें।’’ वह
सम्पूर्णता के लिए ऐसा कहता है ॥७॥
कुछ लोग (सोम के साथ) तृण या काष्ठ को देखकर उसे फेंक देते हैं। परन्तु ऐसा नहीं
करना चाहिए। सोम राजा है और अन्य वृक्षादि प्रजा। प्रजा राजा का अन्न है, इसलिए
(इसको फेंक देना ऐसा ही होगा) जैसा किसी के मुँह में रखे हुए अन्न को निकालकर फेंक
देना। इसलिए केवल उसको छूकर कहे कि ‘चुननेवालो, इसको चुन लो।’ चुननेवाले उसको
चुन लेंगे ॥८॥
अब वह कपड़े को दुल्लर या चौलर करके बिछाता है इस प्रकार कि झालर पूर्व या
उत्तर की ओर रहे। उस पर सोम राजा को तोलता (मापता, मिमीते) है। चूंकि उससे सोम
राजा को तोलता है इसलिए उसको मात्रा कहते हैं—चाहे वह मनुष्यों में प्रचलित मात्रा हो या
अन्य कुछ ॥६॥
वह सावित्री मन्त्र पढ़कर तोलता है। सविता सब देवों का प्रेरक है। ऐसा करने से
मानो सोम-क्रय सविता की प्रेरणा से होता है ॥१०॥
अतिछन्द पढ़कर तोलता है। अतिछन्द में सब छन्द आ जाते हैं। अतिछन्द से इसलिए
तोलता है कि वह सब छन्दों से तुला होने के बराबर हो जाता है ॥११॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर तोलता है—‘‘अभि त्यं देवँ॒ सवितारमोण्योः कविक्रतुमर्चामि
सत्यसवँ॒ रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम्। ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भाऽअदियुतत् सवीमनि हिरण्य-
पाणिरमिमीत सुक्रतुः कृपा स्वः’’ (यजु० ४।२५)—‘‘मैं उस द्यावापृथिवी के प्रेरक, कवि, ऋतु,
सत्यसव, रत्नधा, प्रिय, बुद्धिमान्, कवि की पूजा करता हूँ, जिसकी न नापी जानेवाली ज्योति
ऊपर चमकती है और जिस प्रकाश-युक्त किरणोंवाले यज्ञ-साधक ने संसार में शक्ति की प्रेरणा
की है’’ ॥१२॥
इसी मन्त्र को पढ़कर वह सोम को लेता है सब अँगुलियों से, फिर चार से, फिर तीन