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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-२

२३८ शतपथ ब्राह्मण
य॒त्स्रुचि॒ परिशि॒नष्टि॒ तद॒ग्निहो॒त्रोच्छि॑ष्ट॒मथ॒ यत्स्थाल्यां॒ यथा॒ परीण॒हो नि॒र्व॑पेदे॒वं
तत्त्स्मा॒त्तद्य॒ एव॒ कश्च॒ पिबे॒त्तद्वै नाब्रा॑ह्मणः पिवेद्ग्रौ व्य॑धिय्य॒न्ति तस्मा॒न्नाब्रा-
ह्मणः॑ पिबेत् ॥ ३१॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [३. १.] ॥ ॥
ए॒ता ह॒ वै दे॒वता॒ योऽग्निः । तस्मिन्न्वसतीन्द्रो॑ य॒मो राजा॒ नडो॑ नैषि॒धोऽन-
श्चत्स॒ांगमनो॒ऽस॒न्या॑ऽसवः ॥ १॥ तद्वाऽए॒ष ए॒वेन्द्रः॑ । यदा॑हव॒नीयोऽथै॒ष ए॒व गा-
र्हपत्यो य॒मो राजा॑थै॒ष ए॒व नडो॑ नैषि॒धो य॒दन्वा॑हार्यपच॒नस्तद्य॒देत॒मह॒रह॒र्द्दक्षि-
णात् आ॒हर॑न्ति॒ तस्मा॑दाहुरह॒रह॒र्वै नडो॑ नैषि॒धो यमं॑ रा॒जानं॑ दक्षि॒णात उप॑नय-
तीति॑ ॥ २॥ अथ॒ य ए॒ष स॒भायाम॒ग्निः । ए॒ष ए॒वानश्चत्सांगम॒नस्तद्य॒देत॒मन॑शिश्वे-
वोप॒संगृह्ण॑ते॒ तस्मा॑देषो॒ऽननश्नन्नथ॒ यदेतद्भस्मोद्धृ॒त्य परावपन्त्ये॒ष ए॒वास॒न्या॑ऽस॒वः स
यो॒ है॒वमे॒तद्दे॒वं म॒न्येता॒ देवता॑ वसन्तीति॒ सर्वा॒न्द्धैवैतांल्लो॒कान्जयति॒ सर्वांल्लो-
का॒ननु॒संच॑रति ॥ ३॥ तेषामुपस्थान॑म् । यदि॑व॒ सायं॒ प्रातरा॑हव॒नीय॒मुप॑ च तिष्ठ॑त
ऽउप॑ चास्ते॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यदे॑व॒ प्रति॒परे॑त्य॒ गार्ह॑पत्यमा॒स्ते वा॒ शेते॑ वा॒
तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ संप्र॒ज्ञन्नन्वा॑हार्यपच॒नमुप॒स्मरे॒त्तदे॑व॒ तं मन॑सोप॑ति-
ष्ठेत॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थानम् ॥४॥ अथ प्रा॒तः । अन॑शित्वा मु॒हूर्त्तं॑ स॒भाया॒मासि॑त्वा-
पि कामं॑ प॒ल्प्ये॒त तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ भस्मो॒द्धृत॒मुप॑नि॒गृह्णी॑या॒त्तदे॑व त॒स्यो-
पस्थान॑मेवमु॒ ह्वास्यै॒ता दे॒वता॑ उप॑स्थिता भ॑वन्ति ॥ ५॥ य॒जमान॑दे॒वत्यो॒ वै गार्ह॑-
पत्यः । अथै॒ष भ्रातृ॑व्यदे॒वत्यो॒ यद॒न्वाहा॑र्यपच॒नस्तस्मा॑दे॒तं नाह॒रह॒राहरे॒युर्न ह॒ वा
ऽअ॒स्य स॒पना॑ भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तं नाह॒रह॒राहर॑न्त्यन्वाहार्यपच॒नो वाऽए-
षः ॥ ६॥ उपवसथऽए॒वैन॒माह॑रेयुः । यत्रै॒वास्मिन्द्यद्य॒त्तो भव॑न्ति॒ तन्नो॒ ह्वास्यै॒षो
ऽमो॒धायाहृ॑तो भव॑ति ॥ ७॥ नवा॑वसिते वैन॒माह॑रेयुः । तस्मिन्पचेयुस्तद्ब्राह्म॒णा
अ॒श्नीयु॑र्यद्यु॒ तन्न वि॒न्देद्य॒द्युचेदपि॒ गोरि॑व दु॒ग्धम॒धिश्रय॑ति॒वै ब्रूया॒त्तस्मि॑न्ब्राह्म॒णा-
न्याय॑यित॒वै ब्रूया॒त्पापी॑यांसो ह वाऽअ॒स्य स॒पन्ना भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒वं

का० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २३६
स्रुवे में रह जाता है वह अग्निहोत्र का उच्छिष्ट है। जो थाली में रह जाता है वह वैसा ही है
जैसा कि (गाड़ी के) घेरे में से (चावल निकालना)। यदि कोई इसे पिये तो ब्राह्मण के सिवाय
अन्य न पीवे। यह अग्नि में रखा हुआ (पवित्र) है, इसलिए अब्राह्मण न पीवे ॥३६॥
अध्याय ३—ब्राह्मण २
जो कोई (यजमान) होता है उसमें ये देवते होते हैं—इन्द्र, राजा, यम, नड-नैषिध (या
नैषध), अनश्नत् सांगमन, असन्पांसव ॥१॥
यह जो आहवनीय है वह इन्द्र है, जो गार्हपत्य है वह राजा यम है। यह जो अन्वाहार्य-
पचन (दक्षिणाग्नि) है वह नड-नैषिध है। चूँकि प्रतिदिन दक्षिण से (अग्नि) लाते हैं, इसलिए
कहते हैं कि नड-नैषिध प्रतिदिन राजा यम को दक्षिण से लाता है ॥२॥
और यह जो सभा में अग्नि है वह अनश्नत् सांगमन है। इसको अनश्नत् इसलिए कहते
हैं कि लोग बिना खाये उसके पास जाते हैं। और उसमें से राख निकालकर जहाँ फेंकते हैं वह
असन्पांसव है। जो इस बात को जानता है वह सब लोकों को जीतता है, सब लोकों में विचरता
है और समझता है कि ये देवतागण मुझमें विद्यमान हैं ॥३॥
अब उन (अग्नियों) के उपस्थान (उपासना) के विषय में। जो सायं और प्रातः को
आहवनीय के पास खड़ा होना और बैठना है यही उसकी उपासना है, और जब लौटकर गार्हपत्य
के पास बैठना या लेटना है वह उसकी उपासना है, और जब (आहवनीय से) निकलकर
अन्वाहार्य-पचन का स्मरण करना तथा मन में उसके पास ठहरना है वह उसकी उपासना है ॥४।
और प्रातःकाल बिना खाये मुहूर्त्त-भर सभा में बैठना और यथेच्छा परिक्रमा देना है वही
उसकी उपासना है। और जहाँ उसमें से लेकर भस्म डाली जाती है वहाँ ठहरना है, वही उसकी
उपासना है। इस प्रकार उन देवताओं की उपासना हो गई ॥५॥
गार्हपत्य का देवता यजमान है, और अन्वाहार्य-पचन का देवता उसका शत्रु है, इसलिए
(दक्षिणाग्नि को) रोज-रोज (गार्हपत्य से) नहीं ले जाना चाहिए। उसके कोई शत्रु नहीं होते ।
जो इस बात को जानता है उसके यहाँ इस अग्नि को रोज-रोज नहीं निकालते। यह अन्वाहार्य-
पचन है ॥६॥
उपवास के दिन ही उसको लाना चाहिए जब इसमें यज्ञ करनेवाले हों, और यह
(यजमान के) अमोघ (निश्चित सफलता) के लिए लाई जाती है ॥७॥
या इसको नये घर में ले जायें। उसमें पकावें और ब्राह्मणों को खिलाएँ। यदि पकाने के
लिए और कुछ न मिले तो गाय के दूध को ही अग्नि पर रख दें और ब्राह्मणों को पिला दें। जिस
किसी यह जाननेवाले के लिए वे ऐसा करते हैं उसके शत्रु पापी (अवनति-शील) हो जाते हैं।

२४० शतपथ ब्राह्मण

कुर्व्व॒न्ति॒ तस्मा॑दि॒वमे॒व चिकी॒र्षेत् ॥ ८ ॥ तद्य॑त्रैतत्प्रथ॒मꣳ स॒मिद्धो भव॑ति । धू॒म्यत
ऽइ॑व॒ तर्हि॒ ह्येष भव॑ति रु॒द्रः स यः का॒मये॑त य॒थेमा रु॒द्रः प्र॒जा अ॒श्रद॒द्येवं॑ वत्स॒रु-
से॑व स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है-
वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ ९॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्त॑तरो भ॒वति॑ । त॒-
र्हि॒ ह्येष भव॑ति वरु॑णः स यः का॒मये॑त य॒थेमा वरु॑णः प्र॒जा गृ॒ह्णन्नि॑व वत्स॒रुसे॑व
स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒-
न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १०॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्तो भव॑ति । उ॒र्ध्वर्चिः
पर॒मया॒ भ्रूत्या॒ ब्बल्ब॑लीति॒ तर्हि॒ ह्येष भ॑वती॒न्द्रः स यः का॒मये॒तेन्द्र॑ इव श्रि॒या य॒-
शसा॑ स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु-
॒होति॑ ॥ ११॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्रति॒तरा॒मिव । ति॒रश्ची॑वार्चिः संशा॒म्यतो॒ भव॑ति॒ तर्हि॒
ह्येष भव॑ति मि॒त्रः स यः का॒मये॑त मैत्रे॒णेद॒मन्न॑म॒द्यामि॑ति य॒माहुः सर्व॑स्य वा॒ऽअयं
ब्रा॒ह्म॒णो मि॒त्रं न वा॒ऽअयं कं च॒न हि॒नस्तीति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है-
वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १२॥ अथ॒ यत्रै॒तद॒ङ्गारा॒श्चाक॑श्यन्त॒ऽइव॑ ।
तर्हि॒ ह्येष भव॑ति ब्र॒ह्म स यः का॒मये॑त ब्रह्मवर्च॒सी स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हु-
या॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १३॥ ए॒तेषामेकꣳ संवत्स-
रमु॒पेत्से॑त् । स्व॒यं जु॑हुया॒दि वा॒स्यान्यो॑ जुहुया॒द्य यो॑ऽन्य॒थान्‍यथा जु॒होति॑ यथापो॑
वाभि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यꣳ॒ स सा॒मि नि॒वर्त्ते॑तै॒वं तद्यः सा॒र्द्धं जु॒होति॑ यथापो॑ वा-
भि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यं॑ तत्त्छि॒न्द्रेऽभि॒तृन्द्यादे॒वं तत् ॥ १४॥ अ॒भ्रयो ह॒ वा॒ऽएता अ॒न्ना-
द्यस्य यदा॒हुत॑यः । अ॒भि हैवैतद॒न्नाद्यं॑ तृणत्ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानग्निहोत्रं जु॒होति॑
॥ १५॥ सा या पू॒र्वाहु॑तिः । ते दे॒वा अथ॒ योत्त॑रा॒ ते म॑नु॒ष्या अथ॒ यत्स्रुचि॒ परि॑-
शिन॒ष्टि ते प॒शवः॑ ॥ १६॥ स वै कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ । भूय॑ इवो-
त्त॒रां भूय॑ इव॒ स्रुचि परि॑शिनष्टि॒ ॥ १७॥ स यत्कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ ।

कां० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० ८-१८ शतपथब्राह्मण / २४१
इसलिए ऐसा ही करना चाहिए ॥८॥
जब अग्नि पहले ही जलाई जाती है और उसमें धुआँ ही निकलता है, तब यह अग्नि रुद्र
होती है। जैसे रुद्र इन प्रजाओं को कभी अश्रद्धा से, कभी कड़ेपन में, कभी मारकर बरतता है,
उसी प्रकार यदि कोई चाहे कि अन्न खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता
है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है।
जब अग्नि अधिक प्रदीप्त हो जाती है तो वरुण हो जाती है। जैसे वरुण प्रजा को कभी
पकड़कर, कभी कड़ेपन से और कभी मारकर बरसता है, इसी प्रकार यदि कोई चाहे कि मैं अन्न
खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१०॥
जब अग्नि बहुत प्रज्वलित होती है और पुष्कल धुआँ चक्कर काटता हुआ ऊपर को
उठता है तो यह इन्द्र हो जाती है। जो कोई चाहे कि इन्द्र के समान श्री और यश वाला हो जाऊँ
तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥११॥
जब यह अग्नि घटती हुई शान्त-सी तिरछी जलती है तो मित्र हो जाती है। यदि कोई
चाहे कि मित्रता से अन्न खाऊँ, जैसे कहा करते हैं कि अमुक ब्राह्मण मित्र है, वह किसी की
हानि नहीं करता, तो वह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है वह अन्न को प्राप्त कर लेता
है ॥१२॥
जब इस (अग्नि) के अङ्गारे जलते हैं तब यह ब्रह्म हो जाती है। जो चाहे कि मैं ब्रह्म-
वर्चसी हो जाऊँ वह यह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है उसे अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१३॥
उसको साल-भर तक इनमें से एक का सेवन करना चाहिए, चाहे स्वयं आहुति दे या
किसी से दिलावे। और जो कभी किसी के और कभी किसी के लिए आहुति देता है तो वैसा ही
व्यर्थ है जैसे पानी के लिए कभी यहाँ खोदे, कभी वहाँ, या अन्न के लिए और बीच में छोड़ दे।
और यदि लगातार आहुति देता जाय तो ऐसा है जैसे जल या अन्न के लिए खोदता-खोदता शीघ्र
प्राप्त कर ले ॥१४॥
ये जो आहुतियां हैं वे अन्न के (खोदने के) लिए अभ्रि या खुरपा हैं। जो समझकर
अग्निहोत्र करता है वह अन्न की प्राप्ति करता है।
जो पूर्वाहुति है वह देव है, जो पिछली है वह मनुष्य और जो स्रुक् में बच रहे वह
पशु ॥१६॥
पूर्वाहुति में थोड़ा ही डालता है, पिछली में अधिक और उससे भी अधिक स्रुक् में बचा
रखता है ॥१७॥
पूर्वाहुति में थोड़ा-सा इसलिए डालता है कि देव आदमियों से कम हैं। दूसरी आहुति में