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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-३, ब्राह्मण-२

५० शतपथ ब्राह्मण
भिरिति॒ सोऽसावेव॒ बन्धुः॑ ॥ २३॥ ॥ शतम् २००॥ ॥ अथाऽञ्जलिताभ्यां॑ पवित्रा-
भ्याम् । प्रोक्ष॑णीरुत्पुनाति सवि॒तुर्व्वः॑ प्रसवऽउत्पु॑-- बन्धुः॑ ॥ २४॥ तद्यदाऽञ्जलिता-
भ्यां॑ पवित्राभ्याम् । प्रोक्ष॑णीरुत्पुनाति॒ तद॒प्सु पयो॒ दधाति॒ तदि॒दम॒प्सु पयो॒ हितमि॒दꣳ
हि॒ यदा॒ वर्ष॑त्यथो॒षधयो जायन्त॒ऽओष॑धीर्जग्ध्वापः॑ पीत्वा॒ तत एष रसः॒ संभवति त-
स्मादु॒ रस॒स्यो चैव॒ सर्व॑त्वाय ॥ २५॥ अथाऽज्यमवे॑क्षते । तद्धैके यज्ञमानमवख्या॑पयन्ति
तदु॒ होवाच याज्ञवल्क्यः कथं नु न॒ स्वयमध्व॒र्युर्व्वो भव॑ति कथ॒ꣳ स्वयं नान्वा॒ङ्य॑-
त्र भूयस्य-इवाशिषः॑ क्रियन्त॒ कथं॒ न्वेषा॒मत्रैव श्रद्धा भवतीति॒ यां वै कां च य॒ज्ञऽऋ-
त्विज॒ आशिष॒माशा॑सते यज॑मानस्यैव सा तस्मादध्व॒र्युुरेवावे॑क्षेत ॥ २६॥ सोऽवे॑क्षते ।
सत्यं॒ वै चक्षुः॑ सत्य॒ꣳ हि वै चक्षु॒स्तस्मा॒द्यदिदानीं द्वौ वि॒वद॑मानावियाताम॒हम॒दर्शम॒-
हमश्रौष॒मिति॒ य ए॒व ब्रूयाद॒हम॒दर्श॒मिति॒ तस्माऽए॒व श्र॒द्दध्याम॒ तत्सत्येनैवैतत्सम॑र्धय-
ति ॥ २७॥ सोऽवे॑क्षते । तेजो॑ऽसि शुक्रम॒स्यमृत॑मसीति स ए॒ष सत्य॒ एव॒ मन्त्रस्तेजो॒
ह्येतच्छुक्रꣳ ह्येतदमृत॒ꣳ ह्येतत्तत्सत्येनैवैतत्सम॑र्धयति ॥ २८॥ ब्राह्मणम् ॥ ४. [३. १.] ॥
पुरु॑षो वै य॒ज्ञः । पुरु॑षस्तेन य॒ज्ञो यदेनं॑ पुरु॑षस्तनु॒तऽए॒ष वै ताय॑मानो
यावा॑नेव पुरु॑षस्तावा॑न्विधीयते॒ तस्मात्पुरुषो य॒ज्ञः ॥ १॥ तस्ये॒यमेव॒ जुहूः॑ ।
दियमुपभृदा॒त्मेव॒ ध्रुवा तद्यथाऽऽत्मन् ए॒वेमानि॒ सर्वाण्यङ्गानि॒ प्रभव॑न्ति॒ तस्मादु
ध्रुवाया॒ एव॒ सर्वे॑ य॒ज्ञाः प्रभव॑न्ति ॥ २॥ प्राण॒ एव स्रुवः॑ । सोऽयं प्राणः॒ सर्वा-
ण्य॒ङ्गान्यनु॒संच॑रति॒ तस्मादु स्रुवः॒ सर्वा॒ अनु॒ स्रुचः॒ संच॑रति ॥ ३॥ तस्यासावेव॒
द्यौर्जुहूः॑ । अथे॒दमुन्तरिक्षमुपभृदियमेव॒ ध्रुवा तद्यथाऽस्यां॑ ए॒वेमे सर्वे॑ लोकाः
प्रभव॑न्ति॒ तस्मादु ध्रुवाया॒ एव॒ सर्वे॑ य॒ज्ञाः प्रभव॑न्ति ॥ ४॥ अयमे॒व स्रुवो॒ यो-
ऽयं पव॑ते । सोऽयमिमा॑न्त्सर्वांल्लोका॑ननुपव॑ते॒ तस्मादु स्रुवः॒ सर्वा॒ अनु॒ स्रुचः॒
संच॑रति ॥ ५॥ स ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑मानो । दे॒वेभ्यस्तायत॒ऽऋतुभ्यश्छन्दोभ्यो॒ यद्ध॒वि-
र्न्निरवा॑पां यत्सोमो॒ राजा॒ यत्पुरो॒डाशास्तत्तदादिश्य गृ॒ह्यत्यमुष्मै॑ त्वा जुष्टं॑ गृह्णामी-

कां० १, अ० ३, ब्रा० २, क० १-६ शतपथब्राह्मण / ५१
पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से तुझे पवित्र करता हूँ।' शेष स्पष्ट है ॥२३॥
अब आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी पात्रों को पवित्र करता है, उसी मन्त्र
(यजु० १।३१) से—"सविता की प्रेरणा से, छिद्ररहित पवित्रों से, सूर्य्य की रश्मियों से, तुझे
पवित्र करता हूँ" ॥२४॥
आज्य में लिपटे हुए पवित्रों से प्रोक्षणी को पवित्र करने का अर्थ यह है कि जल में दूध
रख दिया। जल में दूध हितकर होता है। जब बरसता है तो ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं।
ओषधियों को खाकर और जल को पीकर ही रस बनता है। ऐसा करने से वह यजमान को रस-
युक्त और पूर्ण कर देता है ॥२५॥
अब अध्वर्यु आज्य को देखता है। कुछ लोगों का मत है कि यजमान को देखना चाहिए।
इस पर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि यजमान स्वयं ही अध्वर्यु क्यों नहीं बन जाते ? स्वयं ही आशीर्वाद
के मन्त्र क्यों नहीं पढ़ लेते ? इनमें इनको श्रद्धा कैसे हो जाती है ? यज्ञ में ऋत्विज लोग जो भी
कृत्य करते हैं वह सब यजमान के लिए ही तो होता है। अतः अध्वर्यु को ही देखना चाहिए ॥२६॥
वह इसका अवलोकन करता है। सत्य चक्षु है। सत्य चक्षु ही है, क्योंकि यदि किसी
विषय में विवाद उपस्थित हो जाय और एक कहे 'मैंने देखा है', दूसरा कहे 'मैंने सुना है', तो देखे
हुए की बात पर श्रद्धा की जाती है। इस प्रकार वह सत्य से इसकी वृद्धि करता है ॥२७॥
वह यजु० १।३१ से उसका अवलोकन करता है—"तू तेज है, तू शुक्र है, तू अमृत है।"
यह मन्त्र ठीक तो है। क्योंकि आज्य तेज है, अमृत है। इस प्रकार वह इसकी सत्य से अभिवृद्धि
करता है ॥२८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण २
यज्ञ पुरुष है। यज्ञ पुरुष क्यों है ? इसलिए कि पुरुष ही यज्ञ को तानता है; और जब
तन जाता है तो यज्ञ इतना बड़ा हो जाता है जितना पुरुष १ ॥१॥
यज्ञ की यह भुजा (दाहिनी) जुहू है और यह भुजा (बाईं) उपभृत् है। ध्रुवा धड़ है।
धड़ से ही सब अंग उपजते हैं। इसलिए ध्रुवा से ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥२॥
स्रुवा प्राण है। प्राण सब अंगों में जाता है। इसलिए स्रुवा, सब स्रुचों (चमचियों) में
जाता है ॥३॥
जुहू द्यौ लोक है, उपभृत् अन्तरिक्ष और ध्रुवा पृथिवी। पृथिवी से ही सब लोक उपजते
हैं। इसी प्रकार ध्रुवा में ही सब यज्ञ उत्पन्न होता है ॥४॥
स्रुवा बहनेवाला वायु है। वायु का संचार सब लोकों में होता है। इसीलिए स्रुवा सब
स्रुचों तक जाता है ॥५॥
जब यज्ञ ताना जाता है तो देवों के लिए, ऋतुओं के लिए और छन्दों के लिए। हवि,
सोमराजा और पुरोडाश देवों के लिए होती है। वह जब इनको लेता है तो उन-उन देवताओं का
नाम लेकर कहता है 'मैं अमुक देवता के लिए तुझ प्रिय को लेता हूँ'। इस प्रकार वह उस देवता
१. यज्ञ पुरुष की कृति है। कृति कर्त्ता के अनुरूप होती है।

त्ये॑वमु॒ ह्नैते॑षाम् ॥ ६॥ अथ॒ या॒न्या॒न्यानि॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । ऋ॒तुभ्य॑श्चैव॒ तानि॒ छन्दो॑भ्यश्च
गृ॒ह्यन्ते॒ तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति स वै चतुर्जुह्वां गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उप-
भृति॑ ॥ ७॥ स यच्चतुर्जुह्वां गृ॒ह्णाति॑ । ऋ॒तुभ्य॑स्तद्गृह्णाति प्रया॒जेभ्यो॒ हि तद्गृह्णात्यृत॑-
वो॒ हि प्रया॒जास्तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णात्य॒जामितायै॒ जामि॑ ह कुर्याद्य-
द्वस॒न्ताय॑ वा ग्री॒ष्माय॑ वेति॑ गृह्णीया॒त्तस्माद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ ८॥
अथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृ॒ह्णाति॑ । छन्दो॑भ्यस्तद्गृह्णात्यनुया॒जेभ्यो॒ हि तद्गृह्णाति
छन्दाँ॑सि॒ ह्य॑नुया॒जास्तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णात्य॒जामितायै॒ जामि॑ ह कु-
र्याद्यद्गायत्र्यै॑ वा त्रि॒ष्टुभे॑ वेति॑ गृह्णीया॒त्तस्माद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ ९॥
अथ॒ यच्च॑तुर्ध्रुवायां॑ गृह्णाति॑ । सर्व॑स्मै॒ तद्य॒ज्ञाय॑ गृह्णाति॒ तत्तद॒नादिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू-
पेण॑ गृह्णाति कस्मा॒ऽऽ व्यादिशेद्य॒तः सर्वा॑भ्य ए॒व दे॒वता॑भ्यो॒ऽवद्य॑ति॒ तस्माद॒ना-
दिश्या॒ऽन्यस्ये॑व रू॒पेण॑ गृह्णाति ॥ १०॥ य॒जमान॒ एव जु॒हूमनु॑ । यो॒ऽस्माऽअ॑रातीय॑ति
स उप॒भृत॑मन्वे॑तद्य॒द्ये॒व जु॒हूमन्वा॒द्य उप॒भृत॑मन्वे॒व जु॒ह्वाम॒थोप॒भृत्स वै चतुर्जुह्वां
गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ ॥ ११॥ स यच्चतुर्जुह्वां गृ॒ह्णाति॑ । अ॒त्तार॑मे॒वैतत्परि॑मिततरं
कनीया॑ꣳसं करोत्यथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णात्या॒द्यमे॒वैतद॑परि॑मिततरं॒ भूया॑ꣳसं
करोति॒ तद्धि समृ॑द्धं॒ यत्रात्ता कनी॑याना॒द्यो भूयान् ॥ १२॥ स वै चतुर्जुह्वां गृह्न् ।
भूय॒ आज्यं॑ गृह्णात्य॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णन्कनीय॒ आज्यं॑ गृह्णाति ॥ १३॥ स यच्च-
तुर्जुह्वां गृह्न् । भूय॒ आज्यं॑ गृह्णात्य॒त्तार॑मे॒वैतत्परि॑मिततरं कनीया॑ꣳसं कुर्वꣳस्तस्मि॒-
न्वी॒र्यं॒ बलं॑ दधात्यथ॒ यद॒ष्टौ कृत्व॒ उपभृति॑ गृह्णन्कनीय॒ आज्यं॑ गृह्णात्या॒द्यमे॒वैतद॑-
परि॑मिततरं॒ भूया॑ꣳसं कुर्वꣳस्तमवीर्यमब॑लीयाꣳसं करोति॒ तस्माड्त॒ राज्ञापारां विशं॑
प्रावसायाण्ये॒कवेश्म॑नेव जिनाति॒ यद्यथा वत्कामय॑ते॒ तथा सचतऽए॒तेनो॑ ह तद्वी-
र्येण॒ यज्जुह्वां॒ भूय॒ आज्यं॑ गृह्णाति॒ स यज्जुह्वां गृह्णाति जु॒ह्वैव तज्जुहोति॒ यदुपभृति॑
गृह्णाति जु॒ह्वैव तज्जुहोति ॥ १४॥ तदाहुः॑ । कस्मा॒ऽऽ तर्ह्यु॑पभृ॒ति गृ॒हीयाद्यदुप-

का० १, अ० ३, ब्रा० २, क० ६-१५ शतपथब्राह्मण / ५३
की हो जाती हैं ॥६॥
जो आज्य लिये जाते हैं वे ऋतुओं और छन्दों के लिए लिये जाते हैं। इनको बिना नाम
लिये लेता है। जुहू में चार बार आज्य लिया जाता है, उपभृत् में आठ बार ॥७॥
जुहू में जो चार बार लेता है वह ऋतुओं के लिए लेता है, प्रयाजों के लिए लेता है। प्रयाज
ही ऋतु हैं। वह आज्य को लेने में किसी का नाम नहीं लेता; अजामिता के लिए। यदि कहे कि
'वसन्त के लिए लेता हूँ या ग्रीष्म के लिए लेता हूँ' तो जामिता आ जाय, इसलिए बिना नाम लिये
ही आज्य को लेता है ॥८॥
आठ बार उपभृत् से जो लेता है वह छन्दों के लिए, अनुयाजों के लिए। अनुयाज छन्द
हैं। इनको बिना नाम लिये ही लेता है, अजामिता के लिए। यदि कहे कि 'गायत्री के लिए या
त्रिष्टुभ के लिए' तो जामिता आ जाय, इसलिए इसको आज्य के रूप में ही बिना देवता का नाम
लिये ही लेता है ॥९॥
ध्रुवा में जो चार बार लेता है वह समस्त यज्ञ के लिए। इसको भी वह आज्य के रूप में
बिना देवता का नाम लिए ही लेता है। नाम किस देवता का लिया जाय ? वह तो सभी देवताओं
के लिए निकालता है। इसलिए बिना नाम लिये ही आज्य के रूप में उसको लेता है ॥१०॥
यजमान जुहू के पीछे खड़ा होता है और जो उसका अशुभचिन्तक है वह उपभृत् के
पीछे। खानेवाला जुहू के पीछे खड़ा होता है और खाई जानेवाली चीज उपभृत् के पीछे। जुहू
खानेवाला है और उपभृत् खाद्य। जुहू में चार बार लेता है और उपभृत् में आठ बार ॥११॥
जुहू में चार बार लेता है, इसलिए कि खानेवाला परिमित और छोटा हो जाय। उपभृत्
में आठ बार लेता है कि खाद्य पदार्थ अपरिमित और बहुत हो जाय। जहाँ खानेवाला छोटा हो
और खाद्य पदार्थ बहुत हो, वहाँ यह समृद्धि का सूचक है ॥१२॥
जुहू में चार बार में बहुत आज्य ले लेता है और उपभृत् में आठ बार में कम आज्य लेता
है ॥१३॥
जुहू में जो चार बार लेता है और अधिक लेता है, इससे वह खानेवाले को छोटा और
परिमित बनाकर उसमें अधिक वीर्य (बल) दे देता है। उपभृत् में जो आठ बार में थोड़ा आज्य
लेता है उससे खाद्य को अपरिमित और बहुत बना देता है, और उसको शक्तिहीन तथा निर्बल
बना देता है। जैसे राजा एक एक ही स्थान से बैठा-बैठा बहुत-सी प्रजा को वश में करके उन पर
मन-चाहा राज करता है, इसी प्रकार अध्वर्यु जुहू में बहुत-सा घृत ले लेता है। जो जुहू में लेता
है उसकी भी जुहू से आहुति देता है, और जो उपभृत् में लेता है उसकी भी जुहू से ही आहुति
देता है ॥१४॥
इस पर शंका करते हैं कि जब उपभृत् से आहुति नहीं देना तो उपभृत् में लेना क्यों ?