शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-३, ब्राह्मण-१
यो॒ऽभव॒त्तस्मादे॒तदामायां॑ ग॒वि स॒त्याꣳ शृतम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्माद्यदि॑ कृ॒ष्णायां॒ यदि॑
रोहि॒ण्याꣳ शु॒क्लमे॒व भव॑त्य॒ग्निसंकाशम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्मात्प्रथमदुग्धमुष्णं॑ भवत्य॒ग्नेर्हि
रेत॑: ॥ १५॥ ते॒ होचु॑: । ह॒न्तेदं जु॒हुवाम॒हाऽऽइति॒ कस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य-
न्तीति॒ मह्य॒मिति॒ हैवा॒ग्निरु॑वाच॒ मह्य॒मिति॒ यो॒ऽयं पव॑ते॒ मह्य॒मिति॒ सूर्य॑स्ते न स-
म्पाद॒यां चक्रुस्ते हासम्पा॒द्योचु॑: प्र॒जाप॑तिमे॒व पि॒तरं॑ प्रत्य॒याम॒ स यस्मै॑ न इ॒दं प्र-
थ॒माय॑ होत॒व्यं॑ व॒क्ष्यति॒ तस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य॒न्तीति॒ ते प्र॒जाप॑तिं पि॒तरं॑
प्रतीत्योचुः कस्मै न इदं प्रथमाय होष्यन्तीति ॥ १६॥ स॒ होवाच॑ । अ॒ग्नये॒ऽग्निर-
नुध्या॒ स्वꣳ रेत॑: प्र॒जन॑यिष्यते॒ तया॑ प्र॒जनि॑ष्यध॒ऽइत्यथ॒ तुभ्य॒मिति॒ सूर्य॒मथ॒ यदे॒व
हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं पव॑त॒ऽइति॒ तदे॒भ्य इ॒दमप्ये॑त॒र्हि तथै॒व जु-
ह्वत्य॒ग्नय॒ऽएव सा॒यं सूर्य्याय॑ प्रा॒तरथ॒ यदे॒व हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं
पव॑ते ॥ १७॥ ते हु॒त्वा दे॒वाः । इ॒मां प्र॒जातिं॑ प्रा॒जाय॑न्त॒ येषा॒मियं प्र॒जाति॑रि॒मां वि-
जितिं॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां॒ विजि॑तिरि॒ममे॒व लो॒कम॒ग्निर॒जय॑द॒न्तरि॑क्षं वा॒युर्द्दिव॑मेव॒ सूर्य॑:
स यो॒ हैवं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्ये॒ताꣳ है॒व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तत्प्राजा॑-
यन्तै॒तां विजि॑तिं वि॒जय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तद्व्यज॑यन्तै॒तैरु॒ है॒व स॒लोको भ॑वति॒ य एवं
वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ तस्माद्वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ होत॒व्यम् ॥ १८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २
[२.४.]॥ अध्यायः ॥२ [११.]॥ ॥
सूर्यो॑ ह वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ । तद्यदे॒तस्या॒ अग्र्य॒ऽआहु॑तेरु॒दैत्तस्मात्सूर्यो॑ऽग्निहोत्रं॑
॥ १॥ स य॒त्सायमस्तमि॑ते जु॒होति॑ । य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीत्यथ॒ य-
त्प्रा॒तरनु॑दिते जु॒होति॑ य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीति॒ तस्मा॑द्धि॒ सूर्यो॑ऽग्निहो-
त्रमित्याहु॑: ॥ २॥ ॥ शतम् १००० ॥ ॥ अथ॒ यद॒स्तमे॑ति । तद्द्यावेव योनौ गर्भो
भू॒त्वा प्र॒विश॑ति॒ तं गर्भं भव॑न्तमि॒माः सर्वा॑: प्र॒जा अनु॑ ग॒र्भा भव॑न्तीलिता हि॒ शेरे॒
संजानाना॒ अथ॒ यद्रात्रिस्ति॒र् ए॒वैतत्क॑रोति ति॒र् इव हि गर्भ॑: ॥ ३॥ स यत्सा-
कां० २, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १५-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / २२६
किया। उसमें वीर्य सींचा। वह दूध हो गया। इसलिए गाय जब तक कच्ची रहती है (वह दूध)
पकता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है। इसलिए चाहे काली गाय में हो चाहे लाल में, दूध
सफेद ही होता है, अग्नि के समान चमकता हुआ, क्योंकि अग्नि का वीर्य है। इसलिए जब वह
पहले दुहा जाता है तो गर्म होता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है ॥१५॥
उन्होंने (मनुष्य ने ?) कहा, 'इसकी आहुति दें।' (देवों ने कहा) 'ये पहले किसके
लिए आहुति देंगे ?' अग्नि ने कहा, 'मेरे लिए।' वायु ने कहा, 'मेरे लिए।' सूर्य ने कहा, 'मेरे
लिए।' वे निश्चय न कर सके और निश्चय न करके कहा, 'पिता प्रजापति के पास चलें। वे
जिसको पहली आहुति के योग्य बतायेंगे, लोग भी उसीको पहली आहुति देंगे।' वे पिता प्रजापति
के पास जाकर बोले, 'हममें से किसको लोग पहले आहुति देंगे ?' ॥१६॥
उसने कहा, 'अग्नि के लिए। अग्नि तुरन्त ही अपने वीर्य को उत्पन्न करेगा। इससे
तुम्हारी भी प्रजा होगी।' फिर सूर्य से कहा, 'इसके पश्चात् तुम्हारे लिए (आहुति दी जायगी)।
और जो (दूध) आहुति देने से बच रहा वह उसके लिए जो बहता है (वायु के लिए)। इसलिए
अब तक लोग इसी प्रकार आहुति देते हैं-सायंकाल में अग्नि के लिए और प्रातःकाल में सूर्य के
लिए; और जो आहुति देने से बच रहता है वह वायु के लिए ॥१७॥
आहुति देकर देवों ने उस प्रकार अपने को प्रजा के रूप में उत्पन्न किया जिस प्रकार
उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन्होंने वह विजय पाई जो सचमुच पाई। अग्नि ने यह लोक जीता,
वायु ने अन्तरिक्ष और सूर्य ने द्यौ । जो कोई इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसके
उसी प्रकार प्रजा होती है जैसे देवों के हुई, और वह उसी प्रकार विजय पाता है जैसे देवों ने।
जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह (उन देवों के साथ) इस लोक का हिस्सेदार
होता है। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥१८॥
अध्याय ३-ब्राह्मण १
सूर्य ही अग्निहोत्र है। क्योंकि वह इस आहुति के पहले उदय हुआ, इसलिए सूर्य अग्निहोत्र
है ॥१॥
सायंकाल को अग्निहोत्र = (अग्ने होत्रस्य) अस्त होते हुए सूर्य के बाद आहुति देता है तो
सोचता है कि जो यह है इसके यहाँ रहते हुए मैं आहुति दे दूँ। और जो सूर्योदय से पहले प्रातः-
काल के समय आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है उसके यहाँ रहते हुए आहुति दूँ।
इसलिए 'सूर्य ही अग्निहोत्र है' ऐसा कहते हैं ॥२॥
अब जब वह अस्त हो जाता है तब अग्निरूपी योनि में गर्भ होकर प्रवेश करता है, और
उसके गर्भ होने पर यह सब प्रजा गर्भ हो जाती है। थपथपाये जाकर मानो वे सन्तुष्ट होकर
सो जाते हैं। रात्रि उस (सूर्य) को इसलिए छिपा लेता है कि गर्भ भी तो छिपा रहता है ॥३॥
२३० शतपथ ब्राह्मण
यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । गर्भ॑मे॒वैतत्संन्त॒मभि॑जु॒होति॒ गर्भ॑ꣳ सन्त॒मभि॑करोति स प्र॒गर्भ॑ꣳ
सन्त॒मभि॑जुहोति॒ तस्मा॑दिमे॒ गर्भा॑ अ॒न्नम॑त्तो जी॒वन्ति॑ ॥ ४॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒-
होति॑ । प्र॒जन॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सो॑ऽयं तेजो॑ भू॒त्वा वि॒भ्राज॑मान उदेति शश्व॒द्ध वै नो॑-
दियाद्य॒दस्मि॑न्ने॒तामाहु॑तिं॒ न जु॑हु॒यात्तस्मा॑दाऽए॒तामाहु॑तिं जु॒होति॑ ॥ ५॥ स यथा॑-
ऽहिस्त्वचो॑ निर्मुच्ये॒त । ए॒वꣳ रात्रेः पाप्म॑ना निर्मुच्यते यथा ह वाऽअ॒हिस्त्वचो॑
निर्मुच्ये॒तैवꣳ सर्व॑स्मात्पा॒प्मनो॑ निर्मुच्यते॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होति॒ तदे॒त-
स्यैवा॒नु प्र॒जाति॒मिमाः सर्वाः प्र॒जा अनु॑ प्र॒जाय॑न्ते वि हि सृ॒ज्यन्ते॒ यथा॒र्थ॑म् ॥ ६॥ स
यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑र॒त्येते वै विश्वे॑ दे॒वा र॒श्मयो॒ऽथ यत्प॑रं
भाः प्र॒जाप॑तिर्वा स इन्द्रो॑ वै॒तदु॑ ह वै विश्वे॑ दे॒वा अ॒ग्निहो॒त्रं जुह्व॑तो गृ॒हानाग॑-
च्छन्ति॒ स यस्या॑नुद्धत॒माग॑च्छन्ति॒ तस्मा॑दि॒वा अप॑प्रयन्ति॒ तद्धा॑ऽअस्मै॒ तद्व्यृ॑ध्यते॒ यस्मा॑द्दे-
वा अप॑प्रयन्ति॒ तस्यानु॑ व्यृ॒द्धिं यश्च॒ वेद॒ यश्च॒ नानु॑द्धतम॒भ्यस्त॑मगादि॒त्याहुः॑ ॥ ७॥
अथ॒ यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑रति यथा॒ श्रेय॒स्याग॑मिष्यत्यावस॒थे-
नो॑प॒क्लृप्ति॑नोपासी॒तैवं तत्स यस्यो॑द्धत॒माग॑च्छन्ति तस्या॑हव॒नीयं प्र॒विश॑न्ति तस्याह-
व॒नीये॑ नि॒विश॑न्ते ॥ ८॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । अ॒ग्नावे॒वैभ्य ए॒तत्प्र॒वि॑ष्टे-
भ्यो॑ जुहोत्यथ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होत्ये॒तेभ्य ए॒वैभ्य ए॒तज्जु॑होति॒ तस्मा॑दुदितहो-
मिनां॑ वि॒च्छिन्न॑मग्निहो॒त्रं म॑न्याम॒हेऽरु॑ति ह स्माहा॒सुरि॒र्यथा शून्ये॑मावस॒थमाकु॑रुरे॒वं
तदि॑ति ॥ ९॥ द्वयं वाऽइ॒दं जी॑वनं । मू॒लि चै॒वामू॑लं च॒ तदु॑भयं दे॒वानाꣳ स॒न्म-
नु॒ष्या उप॑जीवन्ति प॒शवो मूला ओष॑धयो मू॒लिन्य॑स्ते प॒शवो मूला ओष॑धीर्मू-
लिनी॑र्ग॒ध्वापः॑ पी॒त्वा तत ए॒ष रसः॒ सम्भ॑वति ॥ १०॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ ।
अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑ जुह्वानि॒ यदे॑षामि॒दꣳ स॒दुप॑जीवाम॒ इति॑ स यत्त-
तो रात्र्या॒मश्ना॑ति हु॒तोच्छि॑ष्टमेव॒ तन्नि॒र्वृत्त॑ब॒ल्यश्नाति हु॒तोच्छि॑ष्टस्य॒ ह्येवा॑ग्निहो॒त्रं जु-
ह्वद॑शिता ॥ ११॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होति॑ । अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / २३१
वह सायंकाल को अस्त होने पर इसलिए आहुति देता है कि (सूर्य) जो गर्भरूप है उसको
आहुति दी जाय, और चूंकि उसको गर्भ के रूप में आहुति देता है इसलिए यह गर्भस्थ जीव बिना
खाये जीते रहते हैं ॥४॥
प्रातःकाल उदय होने से पूर्व इसलिए आहुति देता है कि इस (सूर्यरूपी बालक) को जन्म
दे । वह तेज होकर चमकता हुआ निकलता है। अगर वह आहुति न देता तो कदापि न निकलता।
इसलिए वह आहुति देता है ॥५॥
जैसे सांप केंचुली छोड़ता है इसी प्रकार वह पाप-युक्त रात्रि को छोड़ता है। जो रहस्य
को समझकर अग्निहोत्र करता है वह उसी प्रकार पाप-युक्त रात्रि से छूट जाता है जैसे सांप
केंचुली से। उस (सूर्य) के छूटने पर सब प्रजा फिर से उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वे अपने
प्रयोजन के अनुकूल बिचरते हैं ॥६॥
वह जो सूर्यास्त से पहले आहवनीय को (गार्हपत्य से) निकालता है—ये किरणें ही
विश्वेदेव (सब देव) हैं। इससे अधिक जो प्रकाशित होता है प्रजापति या इन्द्र है। अग्निहोत्र
करनेवाले के घर सब देवता पहुँच जाते हैं। और जो कोई आग न निकाल पावे और देवतागण
आ जायें तो वे चले जाते हैं। और जिसके यहाँ से देवतागण लौट जायें वह सफल नहीं होता।
और जिसके यहाँ से देवतागण चले गये और वह विफल हुआ, उसके विषय में लोग कहते हैं कि
चाहे यह जाने या न जाने, इसका सूर्यं अस्त हो गया क्योंकि इसने (गार्हपत्य से आहवनीय अग्नि
को) नहीं निकाला ॥७॥
सूर्यास्त से पहले आहवनीय निकालने का यह कारण है कि जब कोई बड़ा आने वाला
होता है तो घर को साफ करके सत्कार करते हैं, उसी प्रकार यह भी। क्योंकि जिस किसी के
अग्नि निकालने के पीछे (देवतागण) आते हैं, वे उसके आहवनीय गृह में घुस जाते हैं और उसी
आहवनीय गृह में ठहर जाते हैं ॥८॥
वह शाम को सूर्यास्त होने पर अग्नि में इसलिए आहुति देता है कि वह घर में प्रवेश
किये हुए (देवताओं) के लिए आहुति देता है। और सूर्योदय होने से पहले आहुति देने का प्रयोजन
यह है कि जब तक देव जाने न पावें, तब तक आहुति दी जाय। इसीलिए आसुरी का कहना था
कि सूर्योदय होने के पश्चात् आहुति देनेवालों का अग्निहोत्र व्यर्थ हो जाता है जैसे खाली घर में
कोई खाना ले जाय ॥६॥
जीविकाएँ दो प्रकार की हैं—जड़ वाली और बिना जड़ की। ये दोनों देवताओं की
हैं। इन्हीं के सहारे मनुष्य जीते हैं। पशु बिना जड़ के हैं और ओषधियाँ जड़वाली; बिना जड़-
वाले पशु जब जड़वाली ओषधियों को खाते और जल पीते हैं तब रस उत्पन्न होता है ॥१०॥
वह सूर्यास्त के पश्चात् शाम को आहुति इसलिए देता है कि इस जीवन-रस की आहुति
देवताओं के लिए दे दूँ, क्योंकि यह रस उन्हीं का है जिसको खाकर हम जीते हैं। और जो वह
रात्रि में भोजन करता है वह आहुति का शेष भाग है जिसमें से बलि निकाला जा चुका है
(अर्थात् अन्य जीवों के लिए भाग बाँट दिया गया हो)। क्योंकि जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ
के शेष भाग को खाता है ॥११॥
और जो प्रातःकाल सूर्योदय से पहले आहुति देता है, वह सोचता है कि इस जीवन-रस
२३२ शतपथ ब्राह्मण
जुहुवानि य॑देषामिदꣳ सडुपजीवाम॒ इति॑ स यत्ततो॒ऽश्नाति॑ हु॒तोच्छि॒ष्टमेव॒ तन्नि-
र्व्वर्त्तयत्यश्नाति हुतोच्छिष्टस्य॒ ह्येवाग्निहोत्रं जुह्वदशिता ॥ १२॥ तदाहुः । स॒मे-
वान्ये यज्ञास्तिष्ठन्ते॒ऽग्निहोत्रमेव न सं॑तिष्ठते॒ऽपि द्वादशसंवत्सरमन्तवदेवाथैतद्दे-
वानस्तꣳ सायꣳ हि हुत्वा वेद॒ प्रात॑र्हो॒ष्यामीति प्रातर्हु॒त्वा वेद॒ पुनः सायꣳ हो-
ष्यामी॑ति त॒देतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं तस्यानुपस्थितिमनु॑पस्थिता इमाः प्रजाः प्र-
जायन्ते॒ऽनुपस्थितो ह॒ वै श्रिया॑ प्र॒जया॑ प्र॒जायते॒ य ए॒वमेतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं वे-
द ॥ १३॥ तद्दुग्धाधिश्रयति । शृतमस॒दिति तदाहुर्य्यद्युदक्तं तर्हि जुहुयादिति तद्वै
नो॒दक्तं कुर्य्यादुप ह दहेद्यदुदक्तं कुर्य्यात्प्रप्र॒ज्ञि वै रेत॑ उपदग्धं तस्मान्नोदक्तं कुर्य्यात्
॥ १४॥ अधिश्रित्यैव जुहुयात् । पयो॒वैतदग्रे रेतस्तेन॒ नैव शृतं यद्देनदग्नावधिश्रय-
न्ति तेनो॒ऽएव शृतं तस्मादधिश्रित्यैव जुहुयात् ॥ १५॥ तदुद्द्योतयति । शृतं वे-
दानीत्यथापः प्रत्यानयति शा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वायैतद्वि यदा वर्षत्य-
थौषधयो जायन्त॒ऽओषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति तस्माद् रसस्यो
चैव॒ सर्व्वत्वाय तस्माद्यद्येनं क्षीरं केवलं पानेऽभ्याभवेदुदस्तोकमाश्चोतयेदिति ब्रू-
याच्छा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वाय ॥ १६॥ अथ चतुरुन्नयति । चतुर्द्धाविहितꣳ
हीदं पयोऽथ स॒मिधमादायोदाद्रवति समिद्धहोमायेव सो॒ऽनुपसाद्य॒ पूर्वामाहु॑तिं
जुहोति स यदुपसादयेद्यथा यस्मा॒ऽअशनमाहरिष्यन्त्स्यात्तदुत्तरा निदध्यादेवं तद्यथ
यद॒नुपसाद्य यथा यस्मा॒ऽअशनमाह॒रेत्तस्मा॒ऽआहृत्यै॒वोपनिदध्यादे॒वं तदुपसाद्यो-
त्तरां नानाविय्यै॒ऽएवैने॒ऽएतत्करोति मनश्च ह॒ वै वाक्चैते॒ऽआहुती तन्मनसैवैत-
द्वाचं च व्याव॑र्त्तयति तस्मादिदं मनश्च वाक्च समानमेव सन्तानेव ॥ १७॥ स वै
द्विरग्नौ॑ जुहोति । द्विरुपमार्ष्टि द्विः प्राश्नाति चतुरुन्नयति तद्दश दशाक्षरा वै वि-
राड्विराडु यज्ञस्तद्विराजमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ॥ १८॥ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्दे-
वेषु॑ जुहोति तस्माद्देवाः सन्त्यथ यदुपमार्ष्टि तत्पितृषु चौषधीषु च जुहोति त-
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / २३३
की देवताओं के लिए आहुति दे दूं, क्योंकि यह इनका है जिसको खाकर हम जीते हैं। वह जो दिन
में भोजन करता है वह यज्ञ-शेष है, जिसमें से बलि निकाला जा चुका हो। जो अग्निहोत्र करता
है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥१२॥
इस विषय में कहा जाता है कि अन्य सब यज्ञ समाप्त हो जाते हैं परन्तु अग्निहोत्र
समाप्त नहीं होता। बारह वर्ष चलनेवाला यज्ञ भी अन्तवाला है, परन्तु अग्निहोत्र अन्तवाला
नहीं है। क्योंकि सायं को आहुति देकर जानता है कि प्रातःकाल आहुति दूंगा, और प्रातःकाल
आहुति देकर जानता है कि सायं को आहुति दूंगा। इसलिए अग्निहोत्र अनन्त है और इससे
अनन्त सन्तान उत्पन्न होती है। और जो मनुष्य अग्निहोत्र की अनन्तता को समझता है, उसके
अनन्त सन्तान और वैभव होता है ॥१३॥
दूध दुहकर (गार्हपत्य अग्नि पर) पकाने रखता है जिससे पक जावे। इस विषय में
कहते हैं कि जब उबाल आवे तब आहुति दे। परन्तु उबाल आ जायगा तो जल जायगा और जला
हुआ बीज उपजता नहीं। इसलिए उबाल न आने देना चाहिए ॥१४॥
आग पर चढ़ाकर ही आहुति दे, क्योंकि यह (दूध) अग्नि का वीर्य है। इसको आग पर
इसलिए रखते हैं कि गर्म हो जाय। इसलिए आग पर रखकर ही आहुति देनी चाहिए ॥१५॥
अब प्रकाशित करता है (अर्थात् तिनके जलाकर उसके प्रकाश से दूध को देखता है) कि
यह पक गया क्या ? अब उस पर जल छिड़कता है शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए।
जब बरसता है तब ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाने और जल को पीने से यह रस
उत्पन्न होता है। इसलिए रस की वृद्धि के लिए वह जल छोड़ता है। इसलिए यदि 'केवल'
(खालिस) दूध पीना हो तो उसमें एक बूंद जल अवश्य मिला ले, शान्ति के लिए तथा रस की
वृद्धि के लिए ॥१६॥
अब वह दूध को चार (चमचों) में निकालता है, क्योंकि वह दूध चार प्रकार से (चार
थनों से) मिला था। अब वह समिद्ध होम के लिए समिधा को उठाता है और (चमसे को) बिना
नीचे रक्खे हुए पूर्व-आहुति देता है। यदि (चमसे को) नीचे रख देगा तो मानो वह किसी के लिए
खाना ले जाते हुए बीच मार्ग में रख दे। परन्तु बिना नीचे रक्खे हुए (आहुति देना) मानो
किसी को खाना ले जाते हुए पहले उसके पास पहुँचाकर (बर्तन) नीचे रक्खे। नीचे रखने के
बाद एक और (आहुति देता है)। इस प्रकार इन दो आहुतियों को नानावीर्य (भिन्न-भिन्न
पराक्रमवाली) बनाता है। ये दो आहुतियाँ मन और वाणी हैं। इस प्रकार मन और वाणी को
एक-दूसरे से अलग करता है। इस प्रकार मन और वाणी समान होते हुए भी नाना हैं ॥१७॥
दो बार अग्नि में आहुति देता है। दो बार (चमसे को) पोंछता है। दो बार (दूध)
खाता है। चार बार (चमसे में) निकालता है। ये दस (क्रियाएँ) हुईं। विराज् छन्द में दस
अक्षर होते हैं। विराज् ही यज्ञ है। इस प्रकार वह यज्ञ को विराज् बना देता है ॥१८॥
वह अग्नि में जो आहुति देता है, वह देवताओं के लिए देता है। इसी से देव (यज्ञों में)
सम्मिलित हैं। और जो पोंछ डालता है उसको पितरों और ओषधियों के लिए आहुति देता है।
२३४ शतपथ ब्राह्मण
स्मात्पितर॒श्चौष॑धयश्च सन्त्य॑ यदुवा॒ प्राश्ना॑ति तन्मनु॒ष्येषु॑ जुहोति॒ तस्मान्मनु॒ष्याः
सन्ति॑ ॥१९॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽन॑न्वाभक्ताः । परा॒भूता वै ता ए॒वमे॒वैता इमाः
प्र॒जा अप॑राभूतास्ता य॒ज्ञमुख॒ऽआभ॑जति॒ तेनो॑ ह॒ पश॑वोऽन्वा॑भक्ता य॒न्मनुष्या॒ननु॑
पश॒वः ॥२०॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः । न वै य॒ज्ञ इ॑व न्तत्वै पाकय॒ज्ञ इ॑व वा
ऽहुतीदं हि यद॒न्यस्मि॒न्य॒ज्ञे स्रुच्यव॑द्यति॒ सर्वं॒ तद॒ग्नौ जुहोत्यथैतद॒ग्नौ जु॒होत्य्-
प्याचा॑मति॒ निर्ले॑ढि॒ तद्य॑त् पाकय॒ज्ञस्ये॑वेति॒ तद्य॑त् तत्पशव्यं रू॒पं प॑शव्यो॒ हि
पाकय॒ज्ञः ॥२१॥ सैषेकाऽऽहु॑तिरित्ये॒वाग्रे । यन्न्विवामूं प्रजाप॑ति॒रजु॑हो॒दथ य॑देत॒ऽए॒तत्प-
श्चा॒वाधिय॒न्ताम॒ग्नि॒र्ज्योति॒ᳲ प॑वते॒ सूर्य॑स्तस्मादे॒षा द्वि॒तीयाऽऽहु॑तिर्हूयते ॥२२॥ सा या पू-
र्वाऽऽहु॑तिः । सा॒ग्नि॒होत्र॑स्य दे॒वता॒ तस्मा॒त्तस्यै जुहोत्यथ योत्त॑रा स्विष्टकृद्भाजनमेव
सा तस्मा॒त्तामु॑त्तरार्धे॑ जु॒होत्ये॑षा हि दिक् स्विष्टकृतस्तन्मिथुनायै॒वैषा द्वि॒तीयाऽऽहु-
तिर्हूय॑ते द्वन्द्वं हि मिथु॒नं प्र॒जनन॑म् ॥२३॥ तद्द्वयमे॒वैतेऽआहुती । भू॒तं चैव॑ भ-
वि॒ष्यच्च॑ जा॒तं च॑ ज॒निष्य॑माणं॒ चाग॑तं चाशा॑ चा॒द्य च॒ श्वश्च॒ तद्द्वयमे॒वानु॑ ॥२४॥
आ॒त्मैव भू॒तं । अ॒द्धा हि तद्यद्भू॒तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव भ॑वि॒ष्यद॒द्धा हि तद्य-
द्भवि॒ष्यद॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२५॥ आ॒त्मैव जा॒तम् । अ॒द्धा हि तद्यज्जा॒तम॒द्धो तद्य-
दा॒त्मा प्र॒जैव ज॑नि॒ष्यमा॑णम॒द्धा हि तद्यज्ज॑निष्यमा॑णम॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२६॥
आ॒त्मैवाग॑तम् । अ॒द्धा हि तद्यदाग॑तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैवाशा॒नद्धा हि तद्यदा-
शा॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२७॥ आ॒त्मैवा॒द्य । अ॒द्धा हि तद्यद॒द्याद्धो॑ तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव
श्वो॒ऽनद्धा हि तद्यच्छ्वो॒ऽनद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२८॥ सा या पूर्वा॒ऽऽहुतिः । सात्मान॑म॒भि-
हूय॑ते तां॒ मन्त्रे॑ण जुहोत्यद्धा हि तद्यन्मन्त्रो॒ऽद्धो तद्यदा॒त्माऽथ योत्त॑रा सा प्र॒जा-
म॒भि हूय॑ते तां तू॒ष्णीं जुहोत्यनद्धा हि तद्यत्तूष्णीम॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२९॥ स जु-
होति । अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेत्यथ प्रातः सूर्यो ज्योति॒र्ज्योतिः सूर्यः॒ स्वाहे-
ति॒ तत्स॒त्येनै॑व हूयते यदा॒ ह्ये॑व सूर्या॒ऽस्तमेत्यथा॒ग्निर्ज्योति॒र्यदा सूर्य॑ उ॒देत्यथ॒ सूर्यो॑
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १६-३० शतपथब्राह्मण / २३५
इससे पितर और ओषधियाँ (यज्ञ में) सम्मिलित हैं। यह जो आहुति देकर खाता है वह मनुष्यों
के लिए आहुति देता है। इससे (मनुष्य यज्ञ में) सम्मिलित होते हैं ॥१९॥
जो यज्ञ में सम्मिलित नहीं किये जाते वे तिरस्कृत हैं। इस प्रकार जो प्रजा तिरस्कृत
नहीं है उसके लिए यज्ञ के आरम्भ में ही भाग निकल जाता है। इस प्रकार पशु (मनुष्यों के)
साथ-साथ भाग लेते हैं क्योंकि पशु मनुष्यों के पीछे चलनेवाले हैं ॥२०॥
इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि इस (अग्निहोत्र) को हविर्यज्ञ नहीं मानना चाहिए।
इसको तो पाकयज्ञ (Domestic Sacrifice) कहना चाहिए, क्योंकि हविर्यज्ञ में जो कुछ स्रुक्
में लिया जाता है वह सब अग्नि में छोड़ दिया जाता है। और यहाँ अग्नि में आहुति देने के पश्चात्
आचमन करता और खाता है। यह सब पाकयज्ञ की ही क्रिया है। यह यज्ञ का पाशविक रूप है
क्योंकि पाकयज्ञ पाशविक है ॥२१॥
पहली एक आहुति वही है जिसको प्रजापति ने दिया था और जिसके पीछे देवों ने (यज्ञ)
जारी रक्खा अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य ने। इसलिए यह दूसरी आहुति देता है ॥२२॥
वह जो पूर्वाहुति दी गई वह तो अग्निहोत्र का देवता है, इसलिए उसी के लिए दी जाती
है। और जो दूसरी आहुति है वह स्विष्टकृत् के समान है, इसलिए वह उत्तर की ओर दी जाती
है। (उत्तरा आहुति उत्तर की ओर दी जाने से शब्दों का सादृश्य है), क्योंकि स्विष्टकृत् की यही
दिशा है। यह दूसरी आहुति जोड़ा बनाने के लिए दी जाती है, क्योंकि जोड़े से ही सन्तान
उत्पन्न होती है ॥२३॥
ये दोनों आहुतियाँ दो का जोड़ हैं—भूत और भविष्य का और उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न
होनेवाले का, जो है और जिसकी आशा है उन दोनों का, आज का और कल का ॥२४॥
आत्मा ही भूत है। भूत निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। भविष्यत् प्रजा है।
भविष्यत् अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२५॥
जो उत्पन्न हो गया वह आत्मा है, क्योंकि जो उत्पन्न हो गया वह निश्चित है और आत्मा
भी निश्चित है। जो उत्पन्न होनेवाला है वह प्रजा है, क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला है वह अनिश्चित
है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२६॥
जो प्राप्त हो गया (आगत, actual) वही आत्मा है, क्योंकि जो प्राप्त हो गया वह
निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। आशा प्रजा है क्योंकि प्रजा भी अनिश्चित है और आशा
भी अनिश्चित है ॥२७॥
आत्मा आज है, क्योंकि आज भी निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। कल प्रजा
है क्योंकि कल भी अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२८॥
यह जो पूर्वाहुति है वह आत्मा के लिए दी जाती हैं। यह मन्त्र से दी जाती है, क्योंकि
मन्त्र निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। दूसरी प्रजा के लिए दी जाती है। वह मौन होकर
दी जाती है, क्योंकि मौन अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२९॥
(सायंकाल की) आहुति इस मन्त्र से दी जाती है—"अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा"
(यजु० ३।६), और प्रातःकाल इस मन्त्र से—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६)।
सत्यता के साथ आहुति दी जाती है, क्योंकि जब सूर्य डूब जाता है तो अग्नि ही ज्योति रहती है।
ज्यो॒ति॒र्यदे॒ सत्येन॑ हू॒यते॒ तद्दे॒वाना॒हुति॑ ॥ ३०॥ तद् धैतदे॒वारु॑णये ब्रह्मवर्चसका-
माय॒ तन्नानू॑वाचाग्नि॒र्वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ सूर्यो वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्च॒ इति॑ ब्रह्मवर्च॒सी है॒व
भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॑ ॥ ३१॥ तद्वस्त्वे॒व प्र॒जनन॑स्येव रू॒पम् । अ-
ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेति॒ तदु॒भयतो॒ ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या परि॒गृह्णा॒त्युभ॑यतः-
परिगृहीतं वै रेत॑: प्र॒जाय॑ते॒ तदु॑भयत एवैतत्परि॒गृह्य॑ प्र॒जनय॑ति ॥ ३२॥ अथ प्रा-
तः । सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑: सूर्य॑: स्वाहेति॒ तदु॒भयतो॒ ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या परि॒गृ-
ह्णा॒त्युभ॑यतःपरिगृहीतं वै रेत॑: प्र॒जाय॑ते॒ तदु॑भयत एवैतत्परि॒गृह्य॑ प्र॒जनय॑ति॒ त
त्प्र॒जनन॑स्य रू॒पम् ॥ ३३॥ तदु॑ होवाच जीव॒लश्चैलाकि॑: । गर्भ॑मे॒वारु॑णिः करो॒ति
न प्र॒जनय॑तीति॒ स ए॒तेनैव सायं॑ जुहुयात् ॥ ३४॥ अथ प्रातः । ज्योति॑: सूर्य॑: सूर्यो॒
ज्योति॒: स्वाहेति॒ तद्वहि॑र्द्धा ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या करोति ब॒हिर्द्धा वै रेत॑: प्र॒जातं
भव॑ति॒ तदे॒तत्प्र॒जनय॑ति ॥ ३५॥ तदाहुः । अ॒ग्नावे॒वैतत्साय॒ ँ सूर्य॑ जुहोति॒ सूर्ये॑ प्रा-
तर॒ग्निमिति॒ तद्वै तदु॑दितहो॒मिनामेव॒ यदा॒ ह्ये॑व सूर्यो॑ऽस्तमे॒त्यथा॒ग्निर्ज्योति॒र्यदा॒ सूर्य॑
उ॒देत्यथ॒ सूर्यो॒ ज्योति॒र्नास्य॒ सा परि॑च॒न्नेयमे॑व॒ परि॑चक्षा॒ यत्तस्यै॒ नाष्ट्रा दे॒वता॑यै हू-
यते॒ या॒ग्निहोत्रस्य दे॒वता॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेति॒ तन्न नाग्नये॒ स्वाहेत्यथ॒ प्रा-
तः सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑: सूर्य॑: स्वाहेति॒ तन्न सूर्या॑य॒ स्वाहेति॑ ॥ ३६॥ अनेनैव॑
जु॑हुयात् । स॒मूर्द्वेवेन॑ सवि॒त्रेति॒ तत्स॑वि॒तृप्र॑सवाय॒ सन्नू रात्र्येन्द्व॑त्ये॒ति तद्रात्र्या
मिथु॒नं करो॑ति॒ सेन्द्रं॑ करोतीन्द्रो॒ हि य॒ज्ञस्य दे॒वता जुषाणो॒ऽअ॒ग्निर्वेतु॒ स्वाहेति॒
तद॒ग्नये॒ प्रत्यनं॑ जुहोति ॥ ३७॥ अथ प्रातः । स॒मूर्द्वेवेन॑ सवि॒त्रेति॒ तत्स॑वि॒तृप्र॑-
सवाय॒ सन्नूष॒सेन्द्व॑त्येत्यह्नेति वा॒ तदह्नां वोष॑सां वा मिथु॒नं करो॑ति॒ सेन्द्रं॑ क-
रोतीन्द्रो॒ हि य॒ज्ञस्य दे॒वता जुषाणः॒ सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहेति॒ तत्सूर्या॑य॒ प्रत्यनं॑ जुहुया-
दिति॒ तस्मा॑दे॒वमेव जु॑हुयात् ॥ ३८॥ ते होचुः । को न इ॒द ँ होष्यतीति ब्राह्म॒णा
ꣳ॒ह्वेति॒ ब्राह्म॒णो॑ नो जुहुधीति॒ किं मे ततो॑ भविष्यतीत्य॒ग्निहोत्रोच्छि॑ष्टमे॒वेति॒ स
का० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / २३७
और जब सूर्य निकलता है तो सूर्य ज्योति होता है। जो सत्यता के साथ आहुति देता है वह देवों
को प्राप्त होता है ॥३०॥
ब्रह्मवर्चस् की कामना के लिए तक्षा ने अरुण के प्रति यही कहा था—'अग्निर्वर्चो
ज्योतिर्वर्चः सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चः' (यजु० ३।६) । जो पुरुष समझकर अग्निहोत्र करता है वह
ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥३१॥
यह मन्त्र सन्तानोत्पत्ति का रूप है। "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" कहकर वह
ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है। दोनों ओर से घिरकर ही तो
वीर्य से उत्पत्ति होता है। इस प्रकार दोनों ओर से घेरकर ही वह इससे सन्तानोत्पत्ति कराता
है ॥३२॥
प्रातःकाल की आहुति का मन्त्र—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६) ।
कहकर वह ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है, क्योंकि दोनों ओर से
घिरकर ही वीर्य से उत्पत्ति होती है। इस प्रकार दोनों ओर से इसे घेरकर ही वह इससे
सन्तानोत्पत्ति कराता है ॥३३॥
जीवल चैलकि का कथन है कि आरुणि गर्भ ही धारण करता है, सन्तानोत्पत्ति नहीं
कराता। इसलिए उसी आहुति से सायंकाल को होत्र करे ॥३४॥
प्रातःकाल "ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा" (यजु० ३।६), कहकर वह देवता के
द्वारा ज्योति रूपी वीर्य को बाहर कर देता है। बाहर आकर ही वीर्य उत्पत्ति करता है, इसलिए
इसके द्वारा उत्पत्ति करता है ॥३५॥
इसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह सायंकाल को अग्नि में सूर्य के लिए आहुति
देता है और प्रातःकाल सूर्य में अग्नि के लिए। यह उनके लिए सच है जो 'उदितहोमि' अर्थात्
सूर्योदय के पश्चात् होम करनेवाले हैं। क्योंकि जब सूर्य अस्त होता है तब अग्नि ज्योति होती है
और जब सूर्य उदय होता है तो सूर्य ज्योति होता है। इसमें कोई दोष नहीं है। दोष इसमें है कि
जो अग्निहोत्र के देवता हैं उनको निश्चय करके न कहा जाय (अर्थात् सूर्य और अग्नि को अलग-
अलग) । वह कहता है 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' न कि 'अग्नये स्वाहा।' इसी प्रकार
प्रातःकाल के समय 'सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा' न कि 'सूर्याय स्वाहा' ॥३६॥
(सायंकाल को) इससे भी आहुति दे—'सजूर्देवेन सवित्रा' (यजु० ३।१०)। इस प्रकार
सवितृ-युक्त हो जाता है, प्रेरणा के लिए। फिर कहता है 'सजूरात्र्येन्द्रवत्या', इससे वह इसका
रात्रि से जोड़ मिलाता है और इन्द्र से युक्त करता है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। 'जुषाणो
अग्निर्वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कहकर वह प्रत्यक्ष रूप से अग्नि के लिए आहुति देता है ॥३७॥
अब प्रातःकाल को 'सजूर्देवेन सवित्रा' कहकर प्रेरणा के लिए सवितृ-युक्त करता है। अब
कहता है—'सजूरुषसेन्द्रवत्या', इस प्रकार वह इसका दिन या उषा से जोड़ मिलाता है और इसे
इन्द्र-युक्त करता है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। 'जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कह-
कर वह प्रत्यक्ष रूप से सूर्य के लिए आहुति देता है। इसलिए इसी प्रकार आहुति दे ॥३८॥
उन्होंने कहा—'हमारे लिए कौन आहुति देगा?' 'ब्राह्मण ही।' 'हे ब्राह्मण, हमारे
लिए आहुति दे।' 'तब मेरा भाग क्या होगा?' 'अग्निहोत्र का उच्छिष्ट (बचा हुआ)।' यह जो