शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-३
र्त्ये॑धा॒ । त्वं य॒ज्ञष्वीड्य॒ इति॑ ॥ २४ ॥ अथ॒ यद्द्दी॑क्षिताया॒भिजु॒होति॑ । त॒स्मिन्वाच॒पति॒
रास्वे॒यत्सो॒मा भूयो॑ भरे॒ति सोमो॑ ह॒ वाऽअ॒स्माऽए॒तद्यु॑ते॒ यद्द्दी॑क्षिताया॒भिजु॒होति॒ स
यदा॑ह॒ रास्वे॒यत्सोमेति॑ रा॒स्व न इ॒यत्सो॒मित्ये॒वैतदा॑हा॒ भूयो॑ भरे॒त्या नो॒ भूयो॑ ह॒-
रे॒त्ये॒वैतदा॑ह देवो॒ नः॑ सविता वसोर्दा॒ता वस्व॑दा॒दिति॑ तथो हास्माऽए॒तत्स॑वि॒-
तृप्र॑सूतमेव दा॒नाय॑ भवति ॥ २५ ॥ पु॒रास्त॒मया॒दाह॑ । दी॒क्षित॒ वाचं॒ यच्छेति॒ ताम॒-
स्तमि॑ते॒ वाचं॒ विसृ॑जते पुरो॑दया॒दाह॑ दी॒क्षित॒ वाचं॒ यच्छेति॒ तामुदि॑ते॒ वाचं॒ विसृ॑-
जते संतत्याऽए॒वाह॒रेवैतद्रात्र्या॒ संतनोध्या॒ रात्री॑म् ॥ २६ ॥ नैन॑मन्य॒त्र च॑र॒न्तम॒-
भ्यस्त॑मियात् । न स्व॒पन्तम॒भ्युदिया॒त्स यदेन॑मन्य॒त्र चर॑न्तम॒भ्यस्त॑मियाद्रात्रे॒रनं तद॒-
न्तरिया॒द्यत्स्व॒पन्तम॒भ्युदिया॒दह्न एनं॒ तद॒न्तरियान्नात्र प्रायश्चित्तिरस्ति प्रतिगुप्य॑मे॒वै-
तस्मान् न पु॒रावभृथा॒दपोऽभ्य॑वेया॒न्नैनम॒भिव॑र्षेदनवकॢप्तं॑ ह तद्यत्पु॒रावभृथा॒दपो
ऽभ्य॑वेया॒द्यदेनम॒भिव॑र्षेद्य॒त् परिह्वा॒लं वाचं॒ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒तां तद्यत्परि॑-
ह्वा॒लं वाचं॒ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒ताम् ॥ २७॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जि-
ग्यु॒र्यैषामि॒यं जि॑ति॒स्ते होचुः कथं न इ॒दं मनु॑ष्यैरन॒न्वारो॒ह्यᳵ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य
रसं धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॑ निर्धयेयु॒र्विदुह्य॑ य॒ज्ञं यूपेन॒ योपयित्वा॒ तिरो॑ऽभव॒-
न्नथ॒ यदेने॑ना॒योप॑यं॒स्तस्मा॒द्यूपो॒ नाम॑ ॥ २८ ॥ तद्धा॒ऽऋषी॑णामनु॒श्रुतमा॑स । ते य॒ज्ञꣳ
सम॑भर॒न्यथायं य॒ज्ञः सम्भृ॑त ए॒वं वाऽए॒ष य॒ज्ञꣳ सम्भ॑रति॒ यो दी॑क्षते॒ वाग्वै य॒ज्ञ-
स्तद्य॒देवात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑तं॒ यद्विदु॑ग्धं॒ तदे॒वैतत्पुन॑रा॒प्याय॑यति॒ यत्परि॑ह्वा॒लं वाचं॑
वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒तां न ह्याप्याययेद्यत्प्रसृ॒तां मानु॑षीं वाचं॒ वदे॒त्तस्मात्परि॑ह्वा-
लं वाचं॑ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒ताम् ॥ २९॥ स वै दी॑क्षते । वाचे हि दी॑क्षते य-
ज्ञाय॒ हि दी॑क्षते य॒ज्ञो हि वाग्दी॑क्षितो ह॒ वै नामैतद्यद्दी॑क्षित॒ इति॑ ॥ ३० ॥ ब्रा-
ह्मणम् ॥ १ [२.२] ॥ ॥
आ॒दि॒त्यं च॒रुं प्रायणी॑यं॒ निर्व॑पति । दे॒वा ह॒ वाऽअ॒स्यां य॒ज्ञं तन्वा॒ना इ॒मां य॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० २-३, कं० २४-३० व १ शतपथब्राह्मण / ३६३
“त्वमग्ने व्रतपा···यज्ञेष्वीड्यः” (यजु० ४।१६) ॥२४॥
अब लोग दीक्षित पुरुष के लिए जो भेंट देते हैं उस समय (अध्वर्यु) उससे यह जाप कराता
है— “रास्वेयत् सोमा भूयो भर” (यजु० ४।१६)—“हे सोम ! इतने को दे, और अधिक को
भरपूर कर ।” जो भेंट लाई जाती है उसका सोम ही देनेवाला है, इसलिए कहता है “रास्वेयत्
सोमा भूयो भर ।” तात्पर्य यह है कि हे सोम ! इतना हमारे लिए दे और आगे के लिए अधिक
ला। अब कहता है—“देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात्” (यजु० ४।१६)—“धन के दाता
सविता देव ने यह धन मुझे दिया ।” इस प्रकार यह दान सविता से प्रेरित हुआ होता है ॥२५॥
सूर्यास्त से पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी को रोक।’ सूर्यास्त से
पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। सूर्योदय के पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी
को रोक।’ सूर्योदय के पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। यह वह सिलसिला कायम रखने के लिए
करता है। दिन का रात के साथ सिलसिला कायम करता है और रात का दिन के साथ ॥२६॥
ऐसा न हो कि वह (यज्ञशाला से) बाहर हो और सूर्य अस्त हो जाय, और न ऐसा हो कि
वह सोता रहे और सूर्योदय हो जाय । यदि वह बाहर हो और सूर्यास्त हो जाय तो सूर्य उसके
और रात के बीच में अन्तर डाल देगा, और अगर सूर्योदय के समय सोता रहेगा तो सूर्य उसके
और दिन के बीच में अन्तर डाल देगा अर्थात् उसका सिलसिला (सन्तति) टूट जायगा। इसका
कोई प्रायश्चित्त भी नहीं है। इसलिए इससे बचा रहे। स्नान से पहले जलों में न जावे और न
वर्षा में भीगे, क्योंकि स्नान से पहले जलों में प्रवेश करना या वर्षा में भीगना अनुचित है। रुक-
रुककर बोलता है, मनुष्य की भाँति नहीं। रुक-रुककर क्यों बोलता है और मनुष्य की भाँति क्यों
नहीं ? इसका कारण नीचे दिया है—॥२७॥
देवों ने उस विजय को जो उनको प्राप्त है यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त किया। उन्होंने कहा—
‘यह जगत् ऐसा कैसे हो जिसमें मनुष्य न रह सकें?’ उन्होंने यज्ञ के रस को चूस लिया जैसे मधु-
मक्खी शहद को। यज्ञ को दुहकर उसे यूप से तितर-बितर करके छिप गये। चूंकि यूप के द्वारा
तितर-बितर किया इसलिए इसका नाम यूप पड़ा ॥२८॥
ऋषियों ने इसको सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे यज्ञ इकट्ठा किया गया,
उसी प्रकार जो दीक्षित होता है वह यज्ञ को इकट्ठा करता है, क्योंकि वाणी ही यज्ञ है। और
यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया उसको रुक-रुककर बोलकर फिर स्थापित कर देता है और
मनुष्य के समान नहीं बोलता। यदि वह मनुष्य की भाँति जल्दी-जल्दी बोले तो उस भाग को
स्थापित न कर सके । इसलिए वह मनुष्य की भाँति नहीं बोलता, किन्तु रुक-रुककर बोलता
है ॥२९॥
अब वह ‘दीक्षते’ अर्थात् दीक्षा लेता है। वाणी के लिए दीक्षा लेता है। यज्ञ के लिए
दीक्षा लेता है। वाणी ही यज्ञ है। ‘धीक्षा’ को ही ‘दीक्षा’ कहते हैं ॥३०॥
अध्याय २-ब्राह्मण ३
अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है। (यहाँ प्रायणीय-इष्टि का वर्णन है।) जब देव
ज्ञाद॑न्त॒रयुः॒ सा हे॑षा॒मियं॑ य॒ज्ञं मो॒रूं॑ चकार क॒थं नु मयि॑ य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना मां य-
ज्ञाद॑न्त॒रयु॒रिति॒ तं च॒ य॒ज्ञं न प्र॑ज॒ज्ञुः ॥१॥ ते हो॑चुः । यन्न्व॑स्या॒मेव॑ य॒ज्ञमत॑न्म॒-
न्हि क॒थं नु नो॒ऽमुहू॒त्कथं॑ न प्र॒जानी॒म इति॑ ॥२॥ ते हो॑चुः । अ॒स्यामे॒व य॒ज्ञं त-
न्वा॒ना इ॒मां य॒ज्ञाद॑न्त॒रगा॑म॒ सा न इ॒यमे॒व य॒ज्ञम॑मूमूहदि॒मामे॒वोप॑धावा॒मेति॑ ॥३॥
ते हो॑चुः । यन्नु॒ वय्ये॒व य॒ज्ञमत॑न्मन्हि क॒थं नु नो॒ऽमुहू॒त्कथं॑ न प्र॒जानी॒म इति॑
॥४॥ सा हो॑वाच । मय्ये॒व य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना मां य॒ज्ञाद॑न्त॒रगा॑त॒ सा वो॒ऽहमे॒व य॒ज्ञ-
म॒मूमू॒हं भा॒गं नु मे॑ कल्पयताथ य॒ज्ञं द्र॑क्ष्यथाथ प्र॒ज्ञास्य॒थेति॑ ॥५॥ तथेति॑ दे॒वा
अब्रुवन् । तवै॒व प्रा॑यणी॒यस्त्वो॑दय॒नीय॒ इति॒ तस्मा॑दे॒ष आ॑दि॒त्य ए॒व प्रा॑यणी॒यो
भव॑त्यादि॒त्य उ॑दय॒नीय॒ इयꣳ॑ ह्ये॒वादि॑ति॒स्ततो॑ य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्वत ॥६॥ स य-
दादि॒त्यं च॒रुं प्रा॑यणी॒यं नि॒र्व॑पति । य॒ज्ञस्यै॒व दृष्ट्यै॑ य॒ज्ञं दृष्ट्वा॑ क्रीणा॑नि॒ तं त॑नवा॒-
ऽइति॒ तस्मा॑दादि॒त्यं च॒रुं प्रा॑यणी॒यं नि॒र्व॑पति॒ तद्वै निरु॑क्तꣳ ह॒विरा॑सीदनि॑रुक्ता दे॒व-
ता ॥७॥ अथै॑भ्यः प॒थ्या स्व॒स्तिः प्रारो॑चत । ताम॑यज॒न्वाग्वै प॒थ्या स्व॒स्तिर्वाग्य॒ज्ञ-
स्तद्य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्वत ॥८॥ अथै॑भ्यो॒ऽग्निः प्रारो॑चत । तम॑यजं॒स्तद्य॒दाग्ने॒यं य॒ज्ञ-
स्यासी॒त्तद॑पश्य॒न्यद्धि शुष्कं॑ य॒ज्ञस्य॒ तदा॑ग्ने॒यं तद॑पश्यं॒स्तदत॑न्वत ॥९॥ अथै॑भ्यः॒ सोमः॑
प्रारो॑चत । तम॑यजं॒स्त यत्सौ॒म्यं य॒ज्ञस्यासी॒त्तद॑पश्य॒न्यद्वाऽआ॒र्द्रं य॒ज्ञस्य॒ तत्सौ॒म्यं
तद॑पश्यं॒स्तदत॑न्वत ॥१०॥ अथै॑भ्यः सवि॒ता प्रारो॑चत । तम॑यज॒न्पश॑वो॒ वै स॑वि॒ता
पश॑वो य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्व॒ताथ॒ यस्यै॑ दे॒वता॑यै ह॒विर्नि॑रु॒प्तमासी॒त्ताम॑यजन्
॥११॥ ता वा॒ऽए॒ताः । पञ्च॑ दे॒वता॑ यजति॒ यो वै स य॒ज्ञो मु॒ग्ध आसी॑त्पा॒ङ्को वै
स आसी॒त्तमे॒ताभिः॑ प॒ञ्चभि॑र्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१२॥ ऋ॒तवो॑ मु॒ग्धा आ॑संस्तूंश्च॑ ।
ताने॒ताभि॑रेव॒ पञ्च॑भिर्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१३॥ दिशो॑ मु॒ग्धा आ॑संस्तूंश्च॑ । ता ए॒-
ताभि॑रेव॒ पञ्च॑भिर्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१४॥ उदी॑चीमेव दिशम् । प॒थ्या स्व॒स्त्या
प्राजा॑नं॒स्तस्मा॑दुत्त॒राद्धि वाग्व॑दति कुरुपञ्चा॒लत्रा वाग्व्ये॒षा निदा॑नेनोदीचीꣳ॒ ह्ये-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ३, कं० १-१५ शतपथब्राह्मण / ३६५
इस पृथिवी पर यज्ञ रचाने लगे तो उन्होंने इस पृथिवी को ही यज्ञ से बहिष्कृत कर दिया। उस
पृथिवी ने उनके इस यज्ञ को मोहित (गड़बड़) कर दिया। उसने कहा कि ये लोग मेरे ऊपर
तो यज्ञ रचते हैं और मुझी को यज्ञ से बाहर निकाले देते हैं ! उनको इस यज्ञ का प्रज्ञान न
हुआ ॥१॥
उन्होंने कहा—'हमने जिस यज्ञ को इस पृथिवी में रचा, वह यज्ञ गड़बड़ कैसे हो गया ?
हमको इसका प्रज्ञान क्यों न हो सका ?' ॥२॥
उन्होंने कहा—'हमने इसी पर यज्ञ रचा और इसी को यज्ञ से बाहर कर दिया। इसी ने
यज्ञ को गड़बड़ा दिया। इसलिए इसी के पास चलें' ॥३॥
उन्होंने कहा—'जब हमने तेरे ही ऊपर यज्ञ रचा तो यह यज्ञ गड़बड़ा कैसे गया ? हमको
इस यज्ञ का प्रज्ञान कैसे न हो सका ?' ॥४॥
उसने उत्तर दिया—'तुमने मेरे ही ऊपर यज्ञ रचा, मुझी को यज्ञ से बाहर कर दिया।
मैंने ही यज्ञ को गड़बड़ा दिया। मेरा भाग निकाल दो। तब तुम यज्ञ को देखोगे, तभी तुमको
इसका परिज्ञान होगा' ॥५॥
देवों ने कहा—'अच्छा ऐसा ही करेंगे। प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ तेरी ही
होंगी।' इसलिए प्रायणीय आहुति अदिति की होती है और उदयनीय भी अदिति की। यह पृथिवी
ही अदिति है। तब उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको रच डाला ॥६॥
वह जो अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है, वह यज्ञ के दर्शन के लिए। 'यज्ञ को
देखकर मैं (सोम) को खरीदूँगा और यज्ञ को रचूँगा' ऐसा सोचकर वह अदिति के लिए प्रायणीय
चरु तैयार करता है। हवि तो तैयार हो गई थी, परन्तु (अदिति) देवता के लिए दी नहीं गई
थी ॥७॥
अब इनको पथ्य-स्वस्ति (मार्ग का कल्याण) मिली। उसके लिए इन्होंने आहुति दी।
वाणी ही पथ्य-स्वस्ति है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको
रचा ॥८॥
अब उनको अग्नि मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग
को देखा जो अग्नि का भाग था। यज्ञ का जो शुष्क भाग है वह अग्नि का है। उसको उन्होंने
देखा और रचा ॥९॥
अब इनको सोम मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग
को देखा जो सोम का भाग था। यज्ञ का जो गीला भाग है वह सोम का भाग है। उसको उन्होंने
देखा और रचा ॥१०॥
अब इनको सविता मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। पशु ही सविता है। पशु ही
यज्ञ हैं। उस यज्ञ को उन्होंने देखा। उस यज्ञ को रचा। इस प्रकार जिस देवता के लिए हवि
बनाई गई उसी के लिए दी गई ॥११॥
अब वह पाँच देवताओं को आहुति देता है। क्योंकि जब यह यज्ञ गड़बड़ाया गया तो
इसके पाँच भाग हो गये। इन पाँच देवताओं के द्वारा उनको उनका ज्ञान हुआ ॥१२॥
ऋतुएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा जाना
गया ॥१३॥
दिशाएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा पहचाना
गया ॥१४॥
पथ्य-स्वस्ति के द्वारा उन्होंने उत्तर दिशा को पहचाना। इसलिए कुरु-पांचालों में वाणी
ही उत्तर (उत्कृष्ट) होती है। यह (पथ्य-स्वस्ति) वाणी ही तो है। इसी के द्वारा उन्होंने उत्तर