शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-३
३० शतपथ ब्राह्मण
दाह ॥ १५॥ यदा॒ शृतो॒ऽथा॑भिवासयति । ने॒देन॑मुपरि॒ष्टा॒न्नाष्ट्रा॒ रक्षा॑ꣳस्यव॒पश्या॒नी-
ति ने॒द्वैव नग्न॒ इव मुषित॒ इव शयाता॒ऽइत्यु चैव तस्मा॒द्वाऽअ॒भिवा॑सयति ॥ १६॥
सो॑ऽभिवासयति । ऋ॒तमेरु॑र्य॒ज्ञोऽत॑मेरुर्यजमानस्य 'प्रजा भूयादिति नेदेतद॑नु य॒ज्ञो
वा यजमानो वा ताम्याद्यदिदमभिवासयामीति तस्मादेवमभिवासयति ॥ १७॥ अथ
पात्रीनिर्णेजनम् । अङ्गुलिप्रणेजनमाग्नीध्रो निनयति तद्यदाग्नीध्रो निनयति ॥ १८॥
ब्राह्मणम् ॥ ६ [२.२.] ॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥
चतुर्द्धाविहितो ह वाऽअग्नेऽङ्गिराः । स यम॑ग्रे॒ऽग्निꣳ होत्रा॑य प्रावृ॑णत स प्रा-
धन्वयं द्वितीयं प्रावृणत स॒ प्रेवा॑धन्वद्यं तृतीयं प्रावृणत स॒ प्रेवा॑धन्वद्यो योऽय-
मे॒तर्ह्य॒ग्निः स भीषा निलिल्ये सोऽपः प्रवि॑वेश तं दे॒वा अनु॑वि॒द्य सह॒सैवा॒द्य
आनिन्युः सोऽपोऽभितिष्ठेवावष्ठूता स्थ या अप्रपदन्ꣳ स्थ याभ्यो वो मामकामं
न्यती॑ति तत आप्याः सम्बभूवुस्त्रितो द्वित एकतः ॥ १॥ तऽइन्द्रेण सह चेरुः ।
यथे॒दं ब्राह्म॑णो रा॒जान॑मनुच॒रति स यत्र त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं विश्वरूपं जघान तस्य
हैतेऽपि वधस्य वि॒दाञ्च॑क्रुः शश्व॑द्धेनं त्रित॒ एव ज॒घानात्य॑हू तदिन्द्रोऽमुच्यत दे॒-
वो हि सः ॥ २॥ त उ हैतऽऊचुः । उपैवेमऽएनो गन्तु येऽस्य वधस्यावेदिषु-
रिति किमिति यज्ञ॒ एवेषु मृष्टामिति तद्वै॒षैतद्य॒ज्ञो मृष्टे य॑द्वैभ्यः पात्रीनिर्णेजनमङ्गु
लिप्रणेजनं निनय॑न्ति ॥ ३॥ तऽउ ह्याप्या ऊचुः । अत्येव वयमिदमस्मत्परो नया-
मेति कमभीति य ए॒वाऽदक्षिणेन ह॒विषा यजाता॒ऽइति तस्मा॒न्नाद॑क्षिणेन ह॒विषा
यजेतान्त्येषु ह यज्ञो मृष्ट आप्या उ ह तस्मिन्मृजते योऽदक्षिणेन हविषा यज॑ते
॥ ४॥ ततो देवाः । एतां दर्शपूर्णमासयोर्दक्षिणामकल्पयन्द्यदन्वाहार्य नेददक्षिणं
ह॒वि॒रस॑दिति तन्नाना निन॒यति तथैभ्योऽसमदं करोति तदभितपति तथैषाꣳ शृतं
भवति स निनयति त्रिताय त्वा द्विताय त्वैकताय त्वेति पश्चूर्ध्व वाऽएष आलभ्यते
यत्पुरोडाशः ॥ ५॥ पुरुषं ह वै देवाः । अग्रे पशुमालेभिरे तस्यालब्धस्य मेधो
कां० १, अ० २, ब्रा० ३, क० १-६ शतपथब्राह्मण./ ३१
छूता हूँ, डर मत' ॥१५॥
जब पक जाय तो ढक देता है कि 'कहीं राक्षस इसको देख न लें', अथवा 'कहीं यह नग!
और खुला न रहे।' इसलिए वह उसको ढक देता है ॥१६॥
उसको यजु० १।२३ के इस अंश से ढकता है—'यज्ञ हीन न हो, यजमान की सन्तान हीन
न हो जब मैं इसको ढक दूँ।’—ऐसा सोचकर ॥१७॥
अब पात्री को धोकर और अंगुलियों को धोकर धोवन को आप्य देवों के लिए डालता
है। आप्यों के लिए डालने का प्रयोजन (आगे कहा जायगा) ॥१८॥
अध्याय २—ब्राह्मण ३
अग्नि पहले चार प्रकार का था। वह अग्नि जिसको उन्होंने पहले होता के लिए वरण
किया वह भाग गया। दूसरी बार जिसको चुना वह भी भाग गया। तीसरी बार जिसको चुना वह
भी भाग गया। इस पर आजकल जो अग्नि है वह डरकर छिप गया। वह जलों में प्रविष्ट हो
गया। देवों ने उसे खोज लिया और बलात् वहाँ से निकाल लाये। अग्नि ने जलों पर थूक दिया
और कहा कि तुम रक्षा के स्थान नहीं हो, मेरी इच्छा के बिना ये देव मुझको तुममें से खींच
लाये। उनमें से आप्य देव निकले—त्रित, द्वित और एकत ॥१॥
वे इन्द्र के साथ फिरते रहे जैसे आजकल ब्राह्मण राजा के साथ फिरा करते हैं। और
जब इन्द्र ने त्वष्टा के तीन सिरवाले पुत्र विश्वरूप को मारना चाहा तो वे इसके मारे जाने की
बात जान गये और त्रित ने उसको मार डाला। इन्द्र हत्या के इस पाप से बचा रहा। इन्द्र तो
देव है ॥२॥
लोगों ने कहा, 'यह पाप उन्हीं को लगना चाहिए जो यह जानते थे कि इसका वध होगा।'
उन्होंने कहा 'कैसे ?' उत्तर मिला, 'यज्ञ उन तक पाप लगा देगा।' इस प्रकार जब यह पात्री को
धोते हैं और उसी जल में अध्वर्यु अपनी अंगुलियाँ धोता है तो वह पाप यज्ञ द्वारा आप्यों को लग
जाता है ॥३॥
आप्यों ने कहा, 'इस पाप को हम आगे बढ़ा दें।' लोगों ने पूछा 'किस तक ?' आप्यों ने
उत्तर दिया, 'उस तक जो बिना दक्षिणा दिये यज्ञ करता है।' अतः बिना दक्षिणा दिये यज्ञ नहीं
करना चाहिए, अन्यथा यज्ञ उस पाप को आप्यों तक पहुँचा देगा और आप्य उस मनुष्य तक
जो बिना दक्षिणा के यज्ञ करता है ॥४॥
इस पर देवों ने दर्श और पूर्णमास इष्टियों में उस दक्षिणा की योजना की जिसको अन्वा-
हार्य कहते हैं, जिससे हवि बिना दक्षिणा के न रह जाय। इस जल को तीनों आप्यों में अलग-
अलग बाँटता है, गरम करके, जिससे वह उनके लिए पक जाय—'हे त्रित, यह तुझको' 'हे द्वित,
इतना तुझको' 'हे एकत, इतना तुझको' इस प्रकार झगड़ा न हो। यह जो पुरोडाश है वह मानो
यज्ञ के पशु का आलभन है ॥५॥
देवों ने पहले-पहल पुरुषरूपी यज्ञ-पशु का आलभन किया। उस आलभन किये पुरुष से