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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-२

५५६ शतपथ ब्राह्मण
पर्येत्य प्रतिप्रस्थातार्धयोः पात्रे सꣳस्रवमवनयत्यच्छ॑ण्वैतद॒ाद्यं बलिं॑ हारयति
त॒मध्व॑र्यु॒र्होतृ॑चमसे॒ऽवनयति भक्षा॑य वषट्कर्तुर्हि भक्षः॑ प्रा॒णो वै वषट्का॒रः सो॒ऽस्मा-
दे॒तद्वषट्कुर्वतः परा॒डिवाभूत्प्रा॒णो वै भ॒क्षस्तत्प्रा॒णं पुनरा॒त्मन्ध॑त्ते ॥ २९॥ अथ॑
य॒देते प्रतीची॒ पात्रे न हर॑न्ति । हर॒न्त्यन्या॒न्यक्षांश्च॒नूषी ह्येते सꣳस्रव॑मेव॒ होतृ॑-
चमसे॒ऽवनयति ॥३०॥ अथ॑ हो॒त्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति । हुतोच्छिष्टा वा॒ऽएते
सꣳस्रवा भवन्ति नालमाहु॑त्ये तान्निवे॑तत्पुनरा॒प्याय॑यन्ति तथालमाहु॑त्ये भवन्ति
तस्मा॒द्धोत्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति ॥३१॥ अथ॑ हो॒त्राः संया॑जयन्ति । होत्रा॑ ह॒ वै॒
युक्ता दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वह॑न्ति ता॒ एवैतत्सं॑तर्पयन्ति तृप्ताः॑ प्रीता॒ दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वहा॒-
निति तस्मा॒द्धोत्राः॑ संया॑जयन्ति ॥ ३२॥ स प्रथ॒मायां वा हो॒त्रायाम् । इ॒ष्टाया॑मुत्त॒-
मायां वानुमन्त्रयते तृप्य॑न्तु होत्रा॒ मधो॒ याः स्वि॑ष्टा याः सु॒प्रीताः॑ सु॒हुता यत्स्वा-
हेति॑ हो॒त्राणामे॒वैषा तृप्ति॑रे॒त्य प्रत्यङ्ङुपवि॑शत्य॒याड्ग्नीदित्य॒ग्नीध्रा॒त्र य॒ज्ञतामुत्त॒-
मः सं॒यज॑ति तस्मा॒दाहा॒याड्ग्नीदिति॑ ॥ ३३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [२. १.] ॥ प्रथमः प्रपा-
ठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३६ ॥ ॥
आ॒त्मा ह वा॒ऽआग्रयणः॑ । सो॒ऽस्यैष सर्व॑मेव॒ सर्व॒ꣳ ह्ययमात्मा तस्मा॒दन॑-
या गृ॒ह्लात्यस्यै॒ हि स्थाली भव॑ति स्थाल्या ह्ये॑नं गृह्णाति॒ सर्वं वा॒ऽइयꣳ सर्व॑मेष
ग्र॒हस्तस्मा॒दन॑या गृह्णाति ॥ १॥ पूर्णं गृ॒ह्लाति । सर्वं वै पूर्ण॒ꣳ सर्व॑मेष ग्र॒हस्त-
स्मात्पूर्णं गृह्णाति ॥२॥ विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति । सर्वं वै विश्वे॑ दे॒वाः सर्व॑मे-
ष ग्र॒हस्तस्माद्विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो गृह्णाति ॥ ३॥ सर्वे॑षु सव॒नेषु॑ गृह्णाति । सर्वं वै
सव॒नानि सर्व॑मेष ग्र॒हस्तस्मा॒त्सर्वे॑षु सव॒नेषु गृह्णाति ॥४॥ स यदि॒ रात्रोप॑द॒स्येत् ।
तमत एव तन्वीरंस्ततः प्रभावयेयुरात्मा वाऽआग्रयण आत्मा॑नं वा॒ऽइमानि स-
र्वा॒ण्यङ्गानि प्रभवन्त्येतस्मा॒त्तत्तो हारियोज॒नं ग्र॒हं गृह्णाति॒ तदा॒त्मन्ये॒वास्यां प्रति-
ष्ठायामन्त॒तो य॒ज्ञः प्रति॑तिष्ठति ॥५॥ अथ॒ यस्मा॑दाग्रय॒णो नाम॑ । यां वा॒ऽअमूं प्रा-

कां० ४, अ० २, ब्रा० १-२, क० २६-३३ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५५७
मिला-जुला आदेश है। प्रतिप्रस्थाता घूमकर अध्वर्युओं के पात्र में बचा-खुचा सोम डाल देता है।
मानो खानेवाले के लिए खाद्यपदार्थ में से बलि दिलवाता है। अध्वर्यु उसको होता के चमसे में
डाल देता है पीने के लिए। वषट्कार पढ़नेवाले का यह भक्ष्य है। वषट्कार-प्राण है। यह प्राण
वषट् करने के समय निकल-सा गया। प्राण भक्ष है, अर्थात् प्राण को फिर उसमें धारण करता
है ॥२६॥
इन पात्रों को वे पीछे क्यों नहीं ले जाते और दूसरे ग्रहों को क्यों पीछे ले जाते हैं ? इस-
लिए कि ये दोनों आँखें हैं। वह बचे-खुचे को होता के चमसे में डाल देता है ॥३०॥
अब होताओं के चमसों को भरते हैं। ये बचे-खुचे भाग जो आहुतियों के अवशिष्ट हैं
आहुतियों के लिए काफी नहीं हैं। इनको भर देता है तो ये आहुतियों के लिए काफी हो जाते हैं,
इसलिए वह होताओं के चमसों को भर देता है ॥३१॥
अब होता लोग मिलकर ही देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। इन सबको वह एक साथ
सन्तुष्ट करता है कि तृप्त होकर वे देवों के लिए यज्ञ को ले जावें। इसलिए होता लोग एक-साथ
आहुति देते हैं ॥३२॥
पहले या पिछले होता की आहुति हो चुकने पर उनसे वह कहता है, "तृम्पन्तु होत्रा
मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहा" (यजु० ७।१५)—"मीठे सोम को पीनेवाले,
भलीभांति प्रसन्न होनेवाले होता लोग सन्तुष्ट होवें।" यह होताओं की सन्तुष्टि है। अब वह
आता है और पश्चिमाभिमुख बैठ जाता है। "याऽग्नीत्" (यजु० ७।१५)—"अग्नीध्र ने आहुति
दी।" अग्नीध्र सबसे पीछे आहुति देता है। इसलिए कहा, 'याड् अग्नीत्' अर्थात् अग्नीध्र ने
आहुति दी ॥३३॥
आग्रयणग्रहः
अध्याय २—ब्राह्मण २
आग्रयण ग्रह इसका आत्मा है। इस प्रकार यह उसका सर्वस्व है। आत्मा सर्वस्व होता
है। इसलिए वह इस (पृथिवी) के द्वारा लेता है। स्थाली इसी (मिट्टी) की होती है। स्थाली में ही
इस आहुति को निकालता है। यह पृथिवी सब-कुछ है, इसलिए यह ग्रह सब-कुछ है। इसलिए
वह इसको इस पृथिवी के द्वारा लेता है ॥१॥
वह इसको पूरा भरकर लेता है। पूर्ण का अर्थ है सब। यह ग्रह 'सब' है। इसलिए पूरा
भरता है ॥२॥
विश्वेदेवों के लिए लेता है। 'विश्वेदेवा' सब हैं। यह ग्रह भी सब है। इसलिए सब देवों
के लिए ग्रहण करता है ॥३॥
सब सवनों में लेता है। सवन 'सब' हैं। यह ग्रह भी 'सब' है। इसलिए सब सवनों में
लेता है ॥४॥
यदि सोम राजा चुक जावे, तो उसे इसी ग्रह में से भर देते हैं। इसी में से निकालते हैं।
यह आग्रायण ग्रह आत्मा (शरीर) है। आत्मा (शरीर) से ही वे सब अंग निकलते हैं। इस-
लिए अन्त में हारियोजन ग्रह को लेते हैं। इस प्रकार अन्त में यज्ञ इसी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित हो
जाता है ॥५॥
इसका आग्रयण नाम यों पड़ा। यह जो पत्थर (सोम निचोड़ने का) को लेते समय मौन

वाणामादानो वाचं प्र॒हृत्य॒त्र वै स॒ग्निऽव॑दत्त॒द्यत्स॒ात्राग्ने॒ऽवद॒त्तस्मा॑दाग्रयणो नाम
॥ ६॥ रक्षोभ्यो वै तां भीषा वाचमयछन्। षडाऽऋत॒वः प्राचो ग्रहान्गृह्णात्यैष
सप्तमः षडाऽऋत॒वः संवत्सरस्य सर्वं वै संवत्स॒रः ॥ ७॥ तां देवाः। सर्वस्मि-
न्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्राये वाचमव॑दंस्तथोऽए॒वैष एताꣳ सर्वस्मिन्विजितेऽभयेऽना-
ष्ट्रेऽत्रये वाचं वदति ॥ ८॥ अथातो गृह्णात्येव। ये दे॒वासो॑ दि॒व्येका॑दश स्थ पृ-
थिव्याम॒ध्येका॑दश स्थ। अप्सुक्षितो महि॒नैका॑दश स्थ ते दे॒वासो॑ य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम्
। उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि स्वाग्रयण इति वाचमेवैत॒द्यतातयाम्नीं करोति
तस्मादनया समानꣳ सद्विपर्यासं वदत्यनामितायै जामि न कुर्याद्यदाग्रयणो॒ऽस्याग्र॒-
यणो॒ऽसीति॑ गृह्णीयात्तस्मादाग्रय॒णोऽसि॑ स्वाग्रय॒ण इति॑ ॥ ९॥ पाहि॒ यज्ञं॑ पाहि॒
यज्ञप॑तिमिति। वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज्ञ॒मिति॒ पाहि॒ यज्ञप॑तिमिति वा-
चमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज॑मानमिति॒ यज॑मानो हि॒ यज्ञप॑तिर्विष्णु॑स्त्वामिन्द्रियेण
पातु॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञो वै विष्णु॑र्य॒ज्ञस्त्वां वी॒र्ये॑ण गो-
पाया॒त्विति॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञं॒ त्वं गो॑पायेत्य॒भि सव॑नां-
नि पा॒हीति॒ तदे॒तं गृ॑ह्णाह॒ सर्वा॑णि ह्ये॒ष सव॑नानि॒ प्रति॑ ॥ १०॥ अथ दशापवि-
त्रमुपगृह्य हिङ्करोति। सा हैषा वागनुद्यमाना तताम तस्यां देवा वाचि तान्ता-
याꣳ हिङ्कारेणैव प्राणमदधुः प्राणो वै हिङ्कारः प्राणो हि वै हिङ्कारस्तस्मादपि-
गृह्य नासिके न हिङ्कर्तुꣳ शक्नोति सैतेन प्राणेन संजानीते यदा वै तान्तः प्राणं
लभतेऽथ स संजानीते तथोऽए॒वैष एतद्वाचि तान्तायांꣳ हिङ्कारेणैव प्राणं दधा-
ति सैतेन प्राणेन संजानीते त्रिष्कृत्वो हिङ्करोति त्रिवृद्धि यज्ञः ॥ ११॥ अथाह
सोमः॑ पवत॒ऽइति॑। स यामेवामूं भीषामसुररक्षसेभ्यो न निरब्रूवंस्तामेवैतत्सर्व-
स्मिन्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्र निराह तामाविष्करोति तस्मादाह सोमः॑ पवत॒ऽइति॑
॥ १२॥ अस्मै॒ ब्रह्म॑णेऽस्मै॒ क्ष॒त्रायेति॑। तद्ब्रह्म॑णे च क्ष॒त्राय॑ चाहास्मै॒ सुन्व॒ते

का० ४, अ० २, ब्रा० २, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ५५६
धारण किया था, इसके बाद अभी मुंह खोला गया। और चूंकि सबसे आगे वचन बोला, इसलिए
आग्रयण नाम हुआ ॥६॥
राक्षसों के डर से मौन साधन किया था। इसके पहले वह छः ग्रह लेता है। यह सातवाँ
है। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। वर्ष सब है ॥७॥
सबके जीतने और भयरहित तथा हानिरहित होने पर पहले देवों ने वाणी बोली थी।
यह भी सबके जीतने पर और भयरहित तथा हानिरहित होने पर वाणी को बोलता है ॥८॥
इसको वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है, "ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश-
स्थ। अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥ उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि
स्वाग्रयणः” (यजु० ७।१६,२०, ऋ० १।१३६।११) —“जो आप देव लोग, द्यौलोक में ११ हैं,
पृथिवी में ११ और जलों में (अन्तरिक्ष में) प्रकाशयुक्त ११ हैं। ये तेंतीसों देव मेरे यज्ञ को ग्रहण
करें। तू रक्षा के लिए लिया गया है तो आग्रयण है। अच्छा आग्रयण है।” इस प्रकार वाणी
जोरदार कर देता है कि एकार्थ होते हुए भी कुछ भेद कर देता है। यदि 'आग्रयणोऽसि, आग्र-
यणोऽसि' दो बार कहेगा तो एक ही बात को दुहराने का दोष आ जायगा, इसलिए पहले 'आग्र-
यणोऽसि' कहता है फिर 'स्वाग्रयणोऽसि' ॥६॥
“पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिम्” (यजु० ७।२०) —अर्थात् “यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की
रक्षा कर।” यज्ञपति से यजमान का तात्पर्य है, क्योंकि यजमान ही यज्ञपति है। “विष्णुस्त्वा-
मिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाहि” (यजु० ७।२०) —विष्णु नाम है यज्ञ का, अर्थात् “यज्ञ अपनी
शक्ति द्वारा तेरी रक्षा करे। तू यज्ञ की रक्षा कर।” “अभि सवनानि पाहि” (यजु० ७।२०) —
इससे तात्पर्य ग्रह का है क्योंकि यह (आग्रयण ग्रह) सभी सवनों में आता है ॥१०॥
(ग्रह को) छन्ने में लपेटकर हिंकार बोलता है। यह वाणी विना आश्रय के थक गई
थी। देवों ने उस थकी हुई वाणी में हिंकार के द्वारा प्राण स्थापित किये। प्राण हिंकार है। प्राण
ही हिंकार है। इसीलिए तो नाक बन्द करके हिंकार नहीं बोल सके। वह इस प्राण के द्वारा
फिर ताजा हो गई। जब थका आदमी प्राण को पाता है तो प्राण के कारण ताजा हो जाता है।
इसी प्रकार यह उस वाणी में हिंकार से प्राण को धारण कराता है। वह उस प्राण के द्वारा ताजा
होती है। हिंकार तीन बार करता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तीन लड़ी वाला) है ॥११॥
अब कहता है, "सोमः पवते” (यजु० २१) —“सोम पवित्र करता है।” असुर राक्षसों
से डरकर उन्होंने अब तक यह वाणी न बोली थी। जब सबको जीत लिया और भय-रहित तथा
हानि-रहित हो गये तब इस वाणी को स्पष्ट किया और कहा। इसलिए कहता है कि 'सोम पवित्र
करता है' ॥१२॥
“अस्मै ब्राह्मणोऽस्मै क्षत्राय” (यजु० ७।२१) —“इस ब्राह्मण के लिए, इस क्षत्रिय के
लिए।” क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए यह यज्ञ किया गया। “यजमानाय पवते” (यजु०