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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

३४४ शतपथ ब्राह्मण
अथ॑ यां पञ्चमीꣳ॒ स्रुचा॑ जु॒होति॑ । सा है॒व प्रत्य॑क्षं य॒ज्ञोऽनु॑ष्टुभा हि तां जु॒होति॑
वाग्व्यनु॑ष्टुब्वाग्यि॑ य॒ज्ञः ॥१६॥ अथ॒ यद्ध्रुवा॑यामाज्यं॒ परिशि॑ष्टं भव॑ति । तज्जु॒ह्वा-
मान॑यति त्रिः स्रुवे॑णाज्यविलाप॒न्याऽअधि॑ जु॒ह्वां गृ॑ह्णाति॒ यत्तृ॒तीयं॑ गृ॒ह्णाति॒ तत्स्रु-
वम॒भिपूर्य॑ति ॥१७॥ स जु॑होति । वि॒श्वो दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्त्तो॑ वृरीत स॒ख्यम् । वि॒-
श्वो रा॒य इ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यस॒ इति॑ ॥१८॥ सैषा दे॒वता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भ॑-
वति । वि॒श्वो दे॒वस्येति॑ वैश्वदे॒वं ने॒तुरिति॑ सावित्रं मर्त्तो॑ वृरी॒तेति॑ मै॒त्रं द्यु॒म्नं वृ॑-
णी॒तेति॑ बा॒र्हस्प॒त्यं द्यु॒म्नं हि बृह॒स्पतिः॑ पु॒ष्यस॒ इति॑ पौ॒ष्णं ॥१९॥ सैषा दे॒व-
ता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भव॑ति । पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः पञ्च॒र्त्तवः॑ संवत्स॒रस्यैतमे॒वैतद्या॑प्नोति
यद्वैता॑भिः प॒ङ्क्तिर्भव॑ति ॥२०॥ तां वाऽअनु॑ष्टुभा जु॑होति । वाग्वाऽअनु॑ष्टुब्वाग्य-
ज्ञस्तद्य॒ज्ञं प्रत्य॑क्षमा॒प्नोति॑ ॥२१॥ तदा॑हुः । ए॒तामे॒वैकां॑ जुहुयाद्यस्मै॒ कामा॑येतरा
हूयन्त॒ऽइत॑येव तं काममा॒प्नोतीति॑ तां वै यद्येकां॑ जुहुयात्पूर्णां॑ जुहुयात्सर्वं॒ वै पू-
र्णंꣳ सर्व॑मे॒वैतदा॒प्नोत्य॑थ॒ यत्स्रुवम॒भिपूर्य॑ति स्रुचं तद॒भिपूर्य॑ति तां पूर्णां॑ जु-
होत्य॒न्वेवैतदु॑च्यते॒ सर्वा॑स्त्वेव हूयन्ते॒ ॥२२॥ तां वाऽअनु॑ष्टुभा जु॑होति । सैषानु॑-
ष्टुप्प्रत्ये॑कत्रिꣳशदक्षरा भवति दश पाण्‍या अ॒ङ्गुलयो॒ दश॑ पाद्या॒ दश॑ प्राणा॒ आत्मै-
कत्रिꣳशो॒ यस्मि॑न्नेते प्राणाः॑ प्रति॑ष्ठिता ए॒तावा॒न्वै पुरु॑षः पु॒रुषो॑ य॒ज्ञः पु॒रुषसं॑मि-
तो य॒ज्ञः स यावा॑ने॒व य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑न्तमे॒वैतदा॑प्नोति॒ यदनु॑ष्टुभै-
कत्रिꣳशदक्षरया जु॒होति॑ ॥२३॥ ब्राह्मणं॑ ॥४॥ अध्या॒यः ॥१[१६.]॥ ॥
द॒क्षिणे॒नाह॑वनीयं॑ प्राचीनग्री॒वे कृ॑ष्णाजिने॒ऽउप॑स्तृणाति । तयो॑रे॒नमधि॑ दीक्ष-
यति॒ यदि॒ द्वे भ॑वत॒स्तद॑नयो॒र्लोकयो॑ रू॒पं तदे॑नम॒नयो॒र्लोकयो॒रधि॑ दीक्षयति ॥१॥
संबद्धा॑ते भवतः । संब॒द्धावि॒व हीमौ लो॒कौ तद्य॑त्समु॒द्रे प॒श्चाद्भवतस्तदि॒मावे॒व
लो॒कौ मिथुनी॒कृत्य तयो॑रे॒नमधि॑ दीक्षयति ॥२॥ यु॒ग्म॒ऽएकं॑ भवति । तदे॑षां लो-
काना॑ꣳ रू॒पं तदे॑नमे॒षु लो॒केष्वधि॑ दीक्षयति यानि शु॒क्लानि॒ तानि॑ दि॒वो रू॒पं या-

कां० ३, अ० १-२, ब्रा० ४-१, कं० १६-२३ व १-३ शतपथब्राह्मण/ ३४५
अब जो स्रुक् से पाँचवीं आहुति दी जाती है वह तो साक्षात् यज्ञ है, क्योंकि यह अनुष्टुभ्
छन्द में दी जाती है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है ॥१६॥
ध्रुवा में जो आज्य बच रहता है वह जुहू में छोड़ा जाता है। अब तीन बार स्रुवा से
आज्य घी पिघलनेवाले पात्र से जुहू में डालते हैं। तीसरी बार जो लेता है उससे स्रुवा को भर
लेता है ॥१७॥
अब वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीतः सख्यम् । विश्वे
रायऽइषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा" (यजु० ४।८; ऋ० ५।५०।१) —"सब आदमी दिव्य
नेता की मित्रता को ग्रहण करें। सब धन को चाहते हैं। अपनी पुष्टि के लिए यश को चाहें" ॥१८॥
यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से सम्बन्धित है—'विश्वो देवस्य' से
तात्पर्य है वैश्वदेव का, 'नेतुः' से सविता का, 'मर्तो वुरीतः' से मित्र का, 'द्युम्नं वृणीत' से
बृहस्पति का, 'पुष्य' से पूषा का ॥१९॥
यह आहुति और ऋचा देवताओं की अपेक्षा से पाँच से सम्बन्धित है। यज्ञ के पाँच भाग
हैं। पशु के पाँच भाग हैं। ऋतुएँ पाँच हैं। इस प्रकार पाँच देवताओं वाली आहुति के द्वारा वह
सम्वत्सर की प्राप्ति कर लेता है ॥२०॥
इसको वह अनुष्टुभ् छन्द में देता है। वाणी अनुष्टुभ् है। वाणी यज्ञ है। इस प्रकार प्रत्यक्ष
यज्ञ की प्राप्ति करता है ॥२१॥
इस पर कहते हैं कि बस इसी एक आहुति को देवे। अन्य आहुतियाँ जिस-जिस कामना
के लिए दी जाती हैं वे सब इसी से पूरी हो जाती हैं। जो इस आहुति को देता है, पूर्ण आहुति को
देता है। 'सर्व' का अर्थ है पूर्ण। स्रुवा को भरकर वह जुहू को भर लेता है और जुहू को पूरा-
पूरा छोड़ देता है। परन्तु यह केवल कथन मात्र है। आहुतियाँ तो पाँचों ही दी जाती हैं ॥२२॥
इसको अनुष्टुभ् छन्द में देते हैं। अनुष्टुभ् में ३१ अक्षर होते हैं। दस हाथ की उँगलियाँ
हैं, दस पैर की, दस प्राण हैं। ३१वाँ आत्मा जिसमें ये प्राण हैं। इतना ही पुरुष है। पुरुष यज्ञ
है। उतने ही यज्ञ के भाग हैं जितने पुरुष के। इसलिए जितना यज्ञ है, जितनी उसकी मात्रा है,
उतनी ही वह इस ३१ अक्षरवाले अनुष्टुभ् की आहुति देकर उसको प्राप्त कर लेता है ॥२३॥
अध्याय २--ब्राह्मण १
आहवनीय के दक्षिण की ओर दो मृगचर्मों को इस प्रकार बिछाता है कि उनकी गर्दन
पूर्व की ओर रहे। उन पर वह उसको दीक्षा देता है। ये जो दो होते हैं ये दोनों लोकों के रूप हैं।
इस प्रकार वह उसको इन दोनों लोकों में दीक्षित करता है ॥१॥
ये दोनों सिरों पर जुड़े होते हैं। ये दोनों लोक भी सिरे पर जुड़े होते हैं। पीछे की ओर
ये छिद्रों द्वारा जुड़े होते हैं। इन दोनों लोकों को जोड़कर वह उसको दीक्षा देता है ॥२॥
यदि एक ही चर्म हो तो वह इन तीनों लोकों का रूप है। इस प्रकार वह उसको इन
तीनों लोकों में दीक्षित करता है। जो श्वेत बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं, जो काले हैं वे इस पृथिवी

नि॒ कृ॒ष्णा॑नि ता॒न्यस्यै॒ यदि॒ वेत॑र्या॒ यान्ये॒व कृ॒ष्णा॑नि॒ तानि॑ दि॒वो रू॒पं यानि॑ शु-
क्ला॑नि ता॒न्यस्यै॒ यान्ये॒व ब॑भ्रू॒णोव॑ रू॒राणि॒ तान्य॒न्तरि॑क्षस्य रू॒पं तदे॑नमे॒षु लो॒के-
ष्व॑धि दी॒क्षय॑ति ॥३॥ अ॒क्तकं॒ नु॒ तर्हि॑ प॒श्चात्प्रत्यस्ये॑त् । तदि॒माने॒व लो॒कानि॒म्युनी-
कृत्य॒ तेष्वे॑नमधि॑ दीक्षयति ॥४॥ अथ जघने॑न कृ॒ष्णाजि॑ने प॒श्चात् प्राङ् जा॒न्वाच्य॑
उप॑विशति स यत्र॑ शु॒क्लानां॑ च कृ॒ष्णानां॑ च सं॒धिर्भ॑वति॒ तद॑व॒मनि॑मृश्य॒ ज॒पत्यृक्सा-
म॒योः शिल्पे॑ स्थ॒ऽइति॒ यद्वै प्रति॑रूपं॒ तच्छिल्प॑मृ॒चां च॒ साम्नां॑ च प्रति॒रूपे स्थ॒ इत्ये॒-
वैतदा॑ह ॥५॥ ते वा॒मार॑भ॒ऽइति॑ । गर्भो वा॒ऽए॒ष भ॑वति॒ यो दी॒क्षते॒ स छन्दा॒ꣳ-
सि प्रवि॑शति तस्मा॒न्न्यञ्चा॑ङ्गुलिरिव भवति॒ न्यञ्चा॑ङ्गुलय-इव॒ हि गर्भाः॑ ॥६॥ स
यदा॑ह । ते वा॒मार॑भ॒ऽइति॒ ते वां प्रवि॑शामी॒त्येवैतदा॑ह॒ ते मा पातम॒स्य य॒ज्ञ-
स्यो॒दृच॒ इति॒ ते मा गोपायत॒मस्य॑ य॒ज्ञस्य॒ सꣳस्था॑या॒ इत्ये॒वैतदा॑ह ॥७॥ अथ॑ दू-
षि॒पेन॒ जानु॒नारो॑हति । शर्म॑ऽसि॒ शर्म॑ मे य॒च्छेति॒ चर्म॒ वा॒ऽए॒तत्कृ॑ष्ण॒स्य तद॑स्य॒ त-
न्मानुष॒ꣳ शर्म॑ दे॒वत्रा तस्मा॑दाह॒ शर्म॑ऽसि॒ शर्म॑ मे य॒च्छेति॒ नम॒स्तेऽस्तु॒ मा मा॑ हि॒ꣳ-
सी॒रिति॒ श्रेयाꣳसं॒ वा॒ऽए॒ष उपाधि॑रोहति॒ यो य॒ज्ञं य॒ज्ञो हि॑ कृ॒ष्णाजि॑नं॒ तस्मा॑ऽए॒-
वैतद्य॒ज्ञाय॑ निह्लुते॒ तथो॒ हैने॑मे॒ष य॒ज्ञो न हि॑नस्ति॒ तस्मा॑दाह॒ नम॒स्तेऽस्तु॒ मा
मा हिꣳसी॒रिति॑ ॥८॥ स वै ज॒घना॒र्धऽइ॒वैवाग्र॒ऽआसी॑त । अथ॒ यदग्र॒ऽएव मध्य॑
ऽउप॑वि॒शेद्य॒ एनं॒ तत्रा॑नु॒ष्या हु॑रे॒द्रुध्ये॑ति वा॒ प्र वा॑ पतिष्यती॑ति॒ तथा॒ हैव स्या॒-
त्तस्मा॒ज्जघना॒र्धऽइ॒वैवाग्र॒ऽआसी॑त ॥९॥ अथ॑ मे॒खलां॒ परि॑हरते । अ॒ङ्गिरसो ह॒ वै
दी॒क्षिता॑नब॒ल्यम॑विन्द॒न्ने नान्यद्रुताद॒शनम॑वाकल्पयंस्त॒ऽएतामूर्जम॑पश्य॒न्समाप्तिं तां
मध्य॑त॒ आत्म॑न्न॒ ऊर्ज॑मदधत समा॑प्तिं॒ तया॒ समा॑प्नुवंस्तथो॒ऽए॒वैष ए॒तां मध्य॑त॒ आ-
त्मन्न॒ ऊर्जं॑ धत्ते समा॑प्तिं॒ तया॒ समा॑प्नोति ॥१०॥ सा वै शाणी भव॑ति । मुञ्चसदि॒ति॒
न्वेव॒ शाणी॒ यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तिर॒जायत॒ गर्भो भू॒त्वैतस्माद्य॒ज्ञात्तस्य॒ यन्निदि॑ष्ठमुल्बमा॒-
सीत्तच्छणास्तस्मा॑त्ते पूतयो वान्ति॒ यद्स्य॒ जरा॒य्वासीत्तद्दीक्षि॑तव॒सनमु॒त्तरं॒ वाऽउ

कां ३, अ० २, ब्रा० १, कं० ३-११ शतपथब्राह्मण / ३४७
का। या इसके विपरीत यों भी कह सकते हैं कि जो काले बाल हैं वे द्यौ का रूप हैं और जो श्वेत
बाल हैं वे इस पृथिवी का । जो भूरे पीले-पीले हैं वे अन्तरिक्ष का रूप हैं । इस प्रकार वह उसको
इन तीनों लोकों में दीक्षित करता है ॥३॥
अन्त में उसे उस (मृगचर्म) के पीछे को मुड़ना चाहिए। इन लोकों को जोड़कर वह
उसको उनमें दीक्षित करता है ॥४॥
अब वह मृगचर्मों के पीछे पूर्वाभिमुख और जानु को झुकाकर बैठ जाता है और जहाँ
सफेद और काले बाल मिलते हैं वहाँ इस प्रकार (श्वेत बाल अँगूठे से और काले अगली अँगुली
से एक-साथ) छूकर यह मन्त्र पढ़ता है-“ऋक् सामयोः शिल्पे स्थः” (यजु० ४।६) - "तुम ऋक्
और साम के प्रतिरूप हो ।” शिल्प कहते हैं प्रतिरूप को। इसका तात्पर्य यह है कि 'ऋचाओं और
सामों के प्रतिरूप* हो' ॥५॥
अब कहता है, "ते वामारभे" (यजु० ४।६)-"मैं तुमको छूता हूँ।" जो दीक्षित होता है
वह गर्भ बनकर छन्दों में घुस जाता है । इसलिए उसकी अंगुलियाँ सिकुड़ जाती हैं। गर्भ बँधी
हुई मुट्ठी के समान होते हैं ॥६॥
और जब वे कहते हैं 'मैं तुमको छूता हूँ' तो इसका तात्पर्य है कि 'मैं तुममें प्रवेश करता
हूँ।' अब कहता है- ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः” (यजु० ४।६) – “तुम मेरी इस यज्ञ के
अन्त तक रक्षा करो ।” इसका तात्पर्य है कि तुम यज्ञ के अन्त तक मेरी रक्षा करो ॥७॥
अब दाहिनी जानु से उठता है। और पढ़ता है-“शर्मासि शर्म मे यच्छ" (यजु० ४।६)-
"तू शरण (कल्याण) है, मुझे शरण दे'-"नमस्तेऽअस्तु मा मा हिंसी” (यजु० ४।६)-"तुझे
नमस्कार हो । तू मुझे पीड़ा न दे ।” मनुष्य के लिए तो वह काला मृग का चर्म है । देवताओं के
लिए यह 'शर्म' या 'शरण' है । जो अपने को यज्ञ के तल तक उठाता है वह मानो अपने को
उच्चतर तल तक उठाता है । यह काला मृगचर्म यज्ञ है । इस प्रकार वह उस यज्ञ को प्रसन्न
करता है जिससे वह यज्ञ उसे हानि न पहुँचावे । इसलिए कहता है- 'नमस्ते अस्तु मा मा
हिंसीः' ॥८॥
पहले वह मृगचर्म के पीछे की ओर बैठे । यदि पहले ही बीच में बैठ जावे और कोई
उसको शाप दे कि 'यह नष्ट हो जायगा' या 'इसका पतन हो जायगा' तो ऐसा हो ही जायगा ।
इसलिए उसको मृगचर्म के पिछले भाग में ही बैठना चाहिए ॥६॥
अब वह मेखला को पहनता है। पहले अंगिरा लोगों को दीक्षा दी जाने लगी तो उनमें
निर्बलता आ गई, क्योंकि उन्होंने व्रत के दूध के सिवाय और कुछ खाना नहीं तैयार किया था।
तब उन्होंने इस (मेखला-सम्बन्धी) बल को देखा और उसको प्राप्त करके शरीर के बीच
(कमर) में बाँधा। इससे इनको पूर्णता प्राप्त हो गई ॥१०॥
यह (मेखला) सन की बनाई जाती है। सन की इसलिए बनाई जाती है कि नर्म रहे ।
जब प्रजापति गर्भ होकर उस यज्ञ से निकला, तब जो उसका उल्ब था वह सन बन गया।
इसीलिए उनमें बू आती है। और जो जरायु था वह दीक्षित का वस्त्र हो गया। उल्ब जरायु के

  • सामानि यस्य लोमानि ।

३४८ शतपथ ब्राह्मण
ल्बं जरा॒युणो॑ भवति॒ तस्मा॑दे॒षान्त॑रा वास॑सो भवति॒ स यथै॒वातः॑ प्र॒जाप॑ति॒रजायत
ग॒र्भी भू॒त्वैत॒स्माद्य॒ज्ञादे॒वमे॒वैषो॒ऽतो॑ जायते ग॒र्भी भू॒त्वैत॒स्माद्य॒ज्ञात् ॥११॥ सा वै
त्रि॒वृद्भवति । त्रि॒वृद्ध्यान्नं॑ पश॒वो ह्यन्नं॑ पि॒ता मा॒ता यज्जाय॑ते॒ तत्त्कृती॑यं॒ तस्मा॑त्त्रि॒वृ-
द्भवति ॥ १२॥ मुञ्जवल्शेनान्त्वस्ता भवति । वज्रो वै शरो विरक्ष॒स्तायै॑ स्तुकासर्ग॒ꣳ
सृष्टा॑ भवति सा यत्प्रसक्ल॑वि सृ॒ष्टा स्याद्य॒द्द्ये॒दमन्या॑ र॒ञ्जवो मानुषी स्याद्यद्यपसल-
वि॒ सृष्टा स्यात्पितृ॑दे॒वत्या॑ स्या॒त्तस्मा॑त्स्तुकासर्ग॒ꣳ सृष्टा॑ भवति ॥ १३॥ तां परि॒कृ-
र्णते । ऊर्ग॑स्याङ्गिर॒सीत्यङ्गिर॑सो॒ ह्येतामूर्ज॒मप॑श्यन्नूर्णामदा ऊर्जं॒ मयि॑ धे॒हीति॒ नात्र॑
ति॒रोहि॑तमिव॒ास्ति ॥ १४॥ अथ नीविमुदूहते । सोम॑स्य नी॒विर॑सीत्य॒दीक्षि॑तस्य
वा॒ऽअन्य॑स्यै॒षायै नी॒विर्भव॑त्यथाय॒ दीक्षि॑तस्य॒ सोम॑स्य॒ तस्मा॑दाह सोम॑स्य नी॒विर॑सी-
ति ॥ १५॥ अथ प्रोर्णुते । गर्भी वा॒ऽए॒ष भ॑वति॒ यो दीक्ष॑ते प्रावृ॑ता॒ वै गर्भा॑ उ-
ल्बेनेव जरा॒युणे॑व॒ तस्मा॑दे प्रोर्णुते ॥ १६॥ स प्रोर्णुते । वि॒ष्णोः शर्म॑सि॒ शर्म॒ य-
जमान॒स्येत्यु॑भयं वा॒ऽए॒षो॒ऽत्र भ॑वति यो दीक्ष॑ते वि॒ष्णुश्च॒ यज॑मानश्च॒ यद्ध्य् दीक्ष॑ते
तद्विष्णुर्भव॑ति॒ यद्यज॑ते॒ तद्यज॑मान॒स्तस्मा॑दाह वि॒ष्णोः शर्म॑सि॒ शर्म॒ यज॑मानस्येति
॥ १७॥ अथ कृष्णविषाणाꣳ सिचि बध्नीते । दे॒वाश्च॒ वा॒ऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः
प्र॒जाप॑तेः पि॒तुर्दाय॒मुपे॑यु॒र्मन एव दे॒वा उ॒पाय॒न्वाच॒मसु॑रा य॒ज्ञमेव तद्दे॒वा उ॒पाय-
न्वाच॒मसु॑रा अमूमे॒व दे॒वा उ॒पाय॑न्निमा॒मसु॑राः ॥ १८॥ ते दे॒वा य॒ज्ञम॑ब्रुवन् । योषा
वा॒ऽइयं वागुप॑मन्त्रयस्व ह्वयि॒ष्यते वै नेति स्वयं वा ह्वेवेक्षत योषा वा॒ऽइयं वा-
गुप॑मन्त्रये ह्वयि॒ष्यते वै मेति तामुपाम॑न्त्रयत सा हास्मा॒ऽञ्चा॑रकादिवैवाग्र॒ऽआसू-
द्यत्तस्मा॑द् स्त्री पुं॑सोपमन्त्रिता॒रका॑दिवैवाग्रे॒ऽसूय॑ति स॒ होवा॑चारकादिव॒ वै म॒ऽञ्श्चा-
सूयी॒दिति॑ ॥ १९॥ ते होचुः । उपै॒व भग॑वो मन्त्रयस्व ह्वयि॒ष्यते वै नेति॒ तामुप॑ा-
मन्त्रयत सा॒ हास्मै॑ निपलाशमि॒वोवा॑द॒ तस्मा॑द् स्त्री पुं॑सोपमन्त्रिता निपलाश-
मि॒वैव व॑दति स॒ होवा॑च निपलाशमिव वै मे॒ऽवादी॒दिति॑ ॥ २०॥ ते होचुः ।

कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० १-२० शतपथब्राह्मण / ३४६
भीतर होता है। इसीलिए यह (मेखला) वस्त्र के भीतर होती है। जैसे प्रजापति गर्भ होकर
उस यज्ञ से निकला, इसी प्रकार यह दीक्षित पुरुष भी गर्भ होकर उस यज्ञ से उत्पन्न होता
है ॥११॥
मेखला तीन लड़ी वाली होती है। क्योंकि अन्न तीन भागों वाला होता है। पशु अन्न
हैं। माता और पिता दो होते हैं, और तीसरा वह होता है जो पैदा होता है। इसीलिए मेखला
में तीन लड़ियां होती हैं ॥१२॥
वह मूंज से बँधी होती है। मूंज का शर वज्र है, इसलिए इससे राक्षस भाग जाते हैं।
यह केशों के समान गूँथी जाती है। अगर वह रस्सी के समान 'पसलवि' अर्थात् सूर्य की चाल के
समान बाएँ और से दाहिनी ओर को गूँथी जाय तो मानुषी हो जाय। यदि 'अपसलवि' अर्थात्
दाहिनी ओर से बाईं ओर को गूँथी जाय तो पितरों जैसी हो जाए। इसलिए केशों के समान
गूँथी जाती है ॥१३॥
उसको यह मन्त्र पढ़कर धारण करता है—"ऊर्गस्याङ्गिरसि” (यजु० ४।१०)। क्योंकि
अंगिरों ने इस 'ऊर्ज' को देखा था। “ऊर्णं म्रदाऽऊर्जं मयि धेहि” (यजु० ४।१०)—“तू ऊन के
समान नरम है, मुझे ऊर्ज दे।” यहाँ सब स्पष्ट है ॥१४॥
अब नीचे का मन्त्र पढ़कर नीवि को बाँधता है, “सोमस्य नीविरसि” (यजु० ४।१०)—
“तू सोम की नीवि है।” पहले अदीक्षित की नीवि थी, अब दीक्षित की नीवि हो गई। इसलिए
कहा 'सोम की नीवि है।' (यहाँ सोम का अर्थ 'दीक्षित' प्रतीत होता है। ऋग्वेद के ९वें मण्डल
में सोम इसी अर्थ में कई जगह आया है) ॥१५॥
अब वह (सिर को) ढकता है। जो दीक्षित होता है वह गर्भ बन जाता है। गर्भ उल्ब
ओर जरायुज से ढके होते हैं। इसलिए वह (सिर को) ढकता है ॥१६॥
वह यह मन्त्र पढ़कर ढकता है— “विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्य” (यजु० ४।१०)—
“तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण है।” जो दीक्षित होता है वह विष्णु और यजमान
दोनों होता है। चूँकि वह दीक्षित होता है इसलिए विष्णु बन जाता है, और चूंकि यज्ञ करता है
इसलिए यजमान हो जाता है। इसलिए कहा कि 'तू विष्णु की शरण है, यजमान की शरण
है' ॥१७॥
अब वह काले हिरण के सींग को (अपने वस्त्र के) सिरे से बाँधता है। देव और असुर
दोनों प्रजापति की सन्तान अपने पिता प्रजापति के दायभाग को प्राप्त हुए। देवों ने मन को
पाया और असुरों ने वाणी को। देवों ने उस (द्यौ) लोक को पाया और असुरों ने इस (पृथिवी)
लोक को ॥१८॥
उन देवों ने यज्ञ से कहा—'यह वाक् स्त्री है। तू इसको संकेत कर। वह तुझे अपने पास
बुलायेगी।' या शायद उसने स्वयं ही सोचा कि 'वाक् स्त्री है। मैं इसको संकेत करूँ। यह मुझे
अपने पास बुला लेगी।' उसने उसकी ओर संकेत किया। परन्तु उसने दूर से उसको तिरस्कृत
कर दिया। इसीलिए स्त्री पहले पुरुष का दूर से तिरस्कार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
दूर से ही तिरस्कृत कर दिया' ॥१९॥
वे देवता बोले, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने इशारा
किया, लेकिन (वाक् ने) उसकी ओर सिर हिलाकर इनकार कर दिया। इसीलिए जब कोई
पुरुष स्त्री को बुलाता है तो वह सिर हिलाकर इनकार कर देती है। उसने कहा, 'इसने मुझे
सिर हिलाकर इनकार कर दिया' ॥२०॥

३५० शतपथ ब्राह्मण
उपै॑व॒ भग॑वो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते॒ वै मेति॒ तामुपामन्त्रयत॒ सा हैनं॑ शुश्रू॒व तस्मा॑दु
स्त्री पुमांꣳसꣳ ह्वय॑तऽनूवोत्त॑मꣳ स॒ होवा॑चाकूत॒ वै मेति॑ ॥ २१॥ ते दे॒वा ई॒क्षां
चक्रि॒रे । योषा॒ वाऽइयं वाग्यदे॒नं न युवि॒तेहैव॑ मा ति॒ष्ठन्तम॒भ्येहीति॑ ब्रूहि॒ तां
तु न॒ आग॑तां प्रति॒प्रब्रूता॒दिति॒ सा हैनं॒ तदैव ति॒ष्ठन्तम॒भ्येयाय॒ तस्मा॑दु स्त्री पु-
मां॑सꣳ सꣳस्कृ॒ते ति॒ष्ठन्तम॒भ्येति॒ ताꣳ ह्येभ्य॒ आग॑तां प्रति॒प्रोवाचेयं वाऽआगा॒दिति॑
॥ २२॥ तां दे॒वाः । असुरि॒भ्योऽसु॑रायैस्ताꣳ स्वीकृ॒त्याग्रा॑वेव॒ परि॑गृह्य॒ सर्व॑हुतमजु-
ह्ववुराहु

कां० ३, अ० २, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ३५१
उन्होंने कहा, 'भले आदमी, फिर संकेत कर, वह तुझे बुला लेगी।' उसने उसकी ओर
इशारा किया। अब उस (वाणी) ने उसको बुला लिया। इसलिए जब मनुष्य इशारा करता है
तो स्त्री उसको बुला ही लेती है। उसने कहा, 'इसने मुझे बुला लिया' ॥२१॥
अब देवों ने सोचा— 'यह वाणी स्त्री है। यह कहीं इसको रिझा न ले (और कहीं यज्ञ
भी इस प्रकार असुरों के पास न चला जाय)। उससे कहा कि 'जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहीं आ' और
जब वह आ जाय तों सूचना दे। अब वह वहीं चली आई जहाँ वह खड़ा था। इसलिए स्त्री
उसी घर में चली जाती है जहाँ पुरुष स्थित रहता है। उस (यज्ञ) ने उन (देवताओं) को
सूचना दी कि वास्तव में वह आ गई ॥२२॥
तब देवों ने उसे असुरों से अलग कर लिया। अब देवों ने उस स्वीकार करके अग्नि में
लपेटकर उसको देवताओं के लिए आहुति दे दी। और चूंकि अनुष्टुभ् छन्द से आहुति दे दी,
इसलिए उसको अपनी सत्ता में शामिल कर दिया (क्योंकि अनुष्टुभ् वाणी है)। जब वाणी को
देवों ने स्वीकार कर लिया तो असुर लोग कुछ न कह सके और 'हेऽलवो हेऽलवः' कहकर
पराजित हो गये, (हाय वाक्, हाय वाक्) ॥२३॥
इस प्रकार उन्होंने अर्थहीन वाणी बोली। और जो ऐसी वाणी बोलता है वह म्लेच्छ
है। इसलिए कोई ब्राह्मण म्लेच्छ भाषा न बोले, क्योंकि यह आसुरी भाषा है। इसी प्रकार वह
शत्रु को भाषा से वंचित कर सकता है। और जो इस रहस्य को समझता है उसके शत्रु भाषा से
वंचित होकर पराजित हो जाते हैं ॥२४॥
अब इस यज्ञ ने चाहा कि वाणी के साथ प्रसंग करूँ। उसने प्रसंग किया ॥२५॥
अब इन्द्र ने सोचा कि यज्ञ और वाणी के प्रसंग से एक भीषण राक्षस उत्पन्न होगा
और मुझे हरा देगा। इसलिए इन्द्र स्वयं गर्भ होकर उसमें प्रविष्ट हो गया ॥२६॥
जब वह एक साल बाद पैदा हुआ तो सोचने लगा, 'जिस योनि ने मुझे धारण किया,
वह तो 'महावीर्या' है। अब मैं ऐसी तरकीब करूँ कि इसमें कोई बड़ा राक्षस न पैदा हो जाय जो
मुझे हरा दे' ॥२७॥
उसको पकड़कर और अच्छी तरह भींचकर उसने तोड़ डाला और यज्ञ के सिर पर रख
दिया। कृष्णमृग यज्ञ है। कृष्ण मृगचर्म भी यज्ञ ही है और कृष्णमृग का सींग योनि है। और
चूंकि इन्द्र ने खूब भींचकर योनि को तोड़ा, इसलिए सींग को बड़ी मजबूती से वस्त्र से बाँधते हैं।
और जैसे इन्द्र गर्भ होकर उस जोड़े से उत्पन्न हुआ, इसी तरह यजमान भी गर्भ होकर उस
(सींग और चर्म) के जोड़े से उत्पन्न होता है ॥२८॥
वह इस सींग को इस प्रकार बाँधता है कि खुला भाग ऊपर को रहे, क्योंकि योनि में
गर्भ इसी प्रकार रहता है। अब दाहिनी भौं के ऊपर ललाट को (इस सींग से) छुआता है, यह
मन्त्र पढ़कर—"इन्द्रस्य योनिरसि" (यजु० ४।१०)-"तू इन्द्र की योनि है।" यह इन्द्र की योनि
ही तो है क्योंकि इसमें प्रवेश होकर ही वह यजमान उसमें प्रवेश करता है और यहाँ से उत्पन्न
होकर ही वहाँ से उत्पन्न होता है। इसीलिए कहता है कि 'तू इन्द्र की योनि है' ॥२६॥ [शतम्
१५००]
अब वह उस सींग से एक लकीर खींचता है यह मन्त्रांश पढ़कर- "सुसस्याः कृषीस्कृधि"

३५२ शतपथ ब्राह्मण
त॒ज्जन॑यति य॒दा वै सु॒षणं॑ भव॒त्यथा॒लं य॒ज्ञाय॑ भवति य॒दो दुःष॑णं भवति॒ न त-
र्था॒त्मने॒ चनालं॑ भवति॒ तद्यश॑मे॒वैतज्जन॑यति ॥ ३०॥ अथ॒ न दी॒क्षितः॑ । काष्ठे॑न
वा न॒खेन॑ वा कण्डू॒येत॒ गर्भो वाऽए॒ष भव॑ति यो दी॒क्षते॒ यो वै गर्भ॑स्य काष्ठे॑न
वा न॒खेन॑ वा कण्डू॒येद॒पास्य॒न्त्स्ये॑त्ततो दी॒क्षितः॑ पा॒मनो॑ भवि॒तोर्दी॒क्षितं॒ वाऽअ॒-
नु रेता॑ꣳसि॒ ततो॒ रेता॑ꣳसि पा॒मना॑नि जनि॒तोः स्वा वै योनी॒ रेतो॒ न हि॑न॒स्त्ये-
षा वाऽए॒तस्य॒ स्वा योनि॑र्भवति॒ यत्कृ॑ष्णविषा॒णा तथो॒ हैन॑मे॒षा न हि॑नस्ति॒ त-
स्माद्दी॒क्षितः॑ कृष्णविषाण॒यैव क॑ण्डू॒

का० ३, अ०, २, ब्रा० १, कं० ३०-४० शतपथब्राह्मण / ३५३
(यजु० ४।१०)-"कृषि को धान्य-पूरित कर।" इस प्रकार वह यज्ञ को उत्पन्न करता है क्योंकि
जब सुकाल होता है तो यज्ञ के लिए पुष्कल सामग्री होती है। और जब दुष्काल होता है तो
अपने लिए भी काफी नहीं होता। इसलिए यज्ञ को उत्पन्न करता है ॥३०॥
दीक्षित को खुजलाना नहीं चाहिए, न लकड़ी से, न नाखून से। जो दीक्षित होता है
वह गर्भ हो जाता है। गर्भ को यदि कोई नाखून से या लकड़ी से खुजलावे तो वह बाहर निकल-
कर मर जायगा। इससे दीक्षित पुरुष को खुजली हो जायगी और उसके बाद उसकी जो सन्तान
(रेत का अर्थ यहाँ सन्तान है) होगी वह भी खू़जलीवाली पैदा होगी। अपनी ही योनि अपनी
सन्तान को हानि नहीं पहुँचाती। और यह जो कृष्णमृग का सींग है यह उसकी योनि है। इस-
लिए वह उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए दीक्षित को चाहिए कि कृष्णमृग के सींग से ही
खुजलावे। कृष्णमृग के सींग के सिवाय किसी अन्य चीज से न खुजलावे ॥३१॥
अब (अध्वर्यु) उसको दण्ड (डण्डा) देता है। राक्षसों को दूर करने के लिए, क्योंकि
डण्डा वज्र है ॥३२॥
यह उदुम्बर का होता है। तेज और अन्न की प्राप्ति के लिए, क्योंकि उदुम्बर अन्न
और तेज है। इसलिए डण्डा उदुम्बर लकड़ी का होता है ॥३३॥
यह डण्डा उसके मुख तक पहुँचना चाहिए। उतना ही उसका वीर्य (बल) होता है।
जो डण्डा मुख तक पहुँचता है वह उसके वीर्य (पराक्रम की शक्ति) के बराबर होता है ॥३४॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर उसको खड़ा करता है—"उच्च्छ्रयस्व वनस्पतऽऊर्ध्वो मा
पाह्यँहसऽआस्य यज्ञस्योदृचः" (यजु० ४।१०)—"हे डण्डे, तू खड़ा हो। इस यज्ञ के अन्त तक
पहुँचने के लिए मुझे पाप से बचा।" इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ की समाप्ति तक खड़ा होकर
मेरी रक्षा कर ॥३५॥
इसी अवसर पर कुछ लोग अंगुलियों को चटकाते और वाणी को बोलते हैं, क्योंकि
अब इसके पीछे कुछ भी न बोल सकेगा। परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि अगर कोई भाग
जाय और दूसरा उसको पकड़ने दौड़े और न पकड़ पावे, इस प्रकार यहाँ वह यज्ञ को नहीं पकड़
पावेगा। इसलिए उसी (पहले कहे अवसर पर) अँगुलियों को चटकावे और वाणी को
बोले ॥३६॥
जब दीक्षित पुरुष (वाणी को रोकने के पश्चात्) या तो कोई ऋचा बोले, या साम या
यजुः, तो वह यज्ञ को स्थिर बनाता है। इसलिए उसी अवसर पर अँगुलियों को चटकाता और
वाणी को रोकता है ॥३७॥
और जब वह वाणी को रोकता है तो मानो यज्ञ को उसी के आत्मा में स्थापित करता
है क्योंकि वाणी यज्ञ है। परन्तु जब वाणी को रोककर उससे यज्ञ से इतर कोई बात कहता है तो
यज्ञ छूटकर भाग जाता है। उस समय विष्णु-सम्बन्धी ऋचा या यजुः का पाठ करना चाहिए,
क्योंकि यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को प्राप्त कर लेता है। यही उस भूल का
प्रायश्चित्त है ॥३८॥
इस पर कोई पुकारता है, 'यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया, यह ब्राह्मण दीक्षित हो गया।'
इस प्रकार घोषित करके वह इसको देवताओं के प्रति घोषित करता है, 'यह महावीर्य है। इसने
यज्ञ को पा लिया। यह तुममें से एक हो गया। इसकी रक्षा कीजिए।' वह तीन बार कहता है
क्योंकि यज्ञ तीन भागों वाला है ॥३६॥
उसे अब तक 'ब्राह्मण' कहते हैं। उसका ब्राह्मण होना अनिश्चित है, क्योंकि ऐसा