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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-५

५४४ शतपथ ब्राह्मण
त्र॒मस्मि॒ न॒ मित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ भविष्या॒मीति॒ तं वै॑ वा यज्ञाद॒न्तरे॑ष्याम इत्यु॒तमे॒पि
कु॒र्व्वीति॒ होवाच॒ तस्मा॒त्पश॒वोऽपा॑क्रामन्नमित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ऽभूदिति॒ स प॒शुभि॒र्व्य्या॑-
र्धय॒त्तमे॒ते दे॒वाः प॒शुभिः॒ सम॑ार्धय॒न्यत्पय॑साश्रीणाँ॒स्तद्यो॒ऽस्यै॒नमे॒ष ए॒तत्प॒शुभिः॒ स-
र्मार्धयति॒ यत्पय॑सा श्री॒णाति॑ ॥८॥ तदाहुः । शश्व॒द् नैव॒ चकमे कॢप्त॒मिति॒ तद्य॒दे-
वात्र॑ पय॒स्तन्मित्र॑स्य॒ सोम॑ ए॒व वरु॑णस्य॒ तस्मा॒त्पय॑सा श्रीणाति॒ ॥ ९॥ स॒ श्रीणा-
ति । रा॒या वयँ॒ सस॑वा॒ँसो म॑देम ह॒व्येन॑ देवा॒ यव॑सेन॒ गावः॑ । तां धे॒नुं मि॑त्रा-
वरुणा यु॒वं नो॒ विश्वा॑हा धत्तम॒नप॑स्फुरन्तीमे॒ष ते॒ योनि॑र्ऋ॒तायुभ्यां॒ त्वेति॑ सादय-
ति॒ स यदा॒ह॒र्त्तायु॑भ्यां॒ त्वेति॒ ब्रह्म॒ वाऽऋ॒तं ब्रह्म॒ हि मित्रो॒ ब्रह्मो॒ त्ऋ॒तं वरु॑ण
ए॒वायुः सं॑वत्स॒रो हि वरु॑णः संवत्सर॒ आयु॒स्तस्मा॑दाहै॒ष ते॒ योनि॑र्ऋता॒युभ्यां॑ त्वेति॑
॥१०॥ ब्राह्मणम् ॥४॥॥
श्रोत्रँ॑ ह॒ वाऽअ॒स्याश्विनः॑ । तस्मा॒त्सर्व्वतः परिहारं॒ भज॑यति॒ सर्व्व॑तो ह्ये॒नेन
श्रोत्रे॑ण शृणोति॒ यत्र॒ वै भृग॑वो वाऽङ्गि॑रसो वा स्व॒र्गं लो॒कँ समा॑श्नुवत तच्च्यव॑-
नो वा भा॒र्गवश्च्यव॑नो वाऽङ्गि॑रसस्तद्दे॒व जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपो जहे ॥१॥ शर्या॑तो ह॒
वाऽइ॒दं मान॑वो ग्रामे॑ण चचार । स त॒देव प्रति॑वेशो निवि॑विशे॒ तस्य कुमा॒राः
क्रीड॑न्त इ॒मं जी॒र्णिं कृत्व्या॒रूपमनर्थ्यं॑ मन्य॑माना लो॒ष्टैर्वि॑पिपिषुः ॥२॥ स॒ शर्या॑ति॒-
र्भ्यचु॑क्रोध । तेभ्यो॒ऽसंज्ञां॑ चकार॒ पितेव॒ पुत्रे॑ण युयुधे॒ भ्राता भ्रात्रा॑ ॥३॥ शर्या॑तो
ह॒ वाऽई॒क्षां चक्रे । यत्किमक॑रं॒ तस्मा॑दिदमाप॒दीति॒ स गो॒पालाँ॒श्चावि॒पालाँ॒श्च
सँ॒हूयित्वा॑ऽउवाच ॥४॥ स होवाच । को वो॒ऽद्येह किं॑चिदद्राक्षी॒दिति॒ ते हो-
चुः पुरु॑ष ए॒वायं जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपः शेते॒ तमन॑र्ध्यं मन्य॑मानाः कुमा॒रा लो॒ष्टैर्व्वि॑-
पिपन्तीति॒ स वि॒दां च॑कार स वै च्यव॑न॒ इति॑ ॥५॥ स रथं॑ युक्त्वा । सुक॒न्याँ॒
शार्या॒तीमु॑पाधा॒य प्रति॑ष्यन्द॒ स आ॒जगाम॒ यत्र॒ऽर्षिरा॑स॒ तत् ॥६॥ स होवाच ।
ऋषे॒ नम॑स्ते यन्नावे॑दिषं॒ तेनाहिँ॑सिषमियँ॒ सुक॒न्या तया॑ तै॒ऽपह्नु॑वे॒ संजा॑नीतां मे

कां० ४, अ० १, ब्रा० ४-५, कं० ८-१० व १-७ शतपथब्राह्मण / ५४५
अमित्र नहीं होना चाहता।' 'तो हम तुझे यज्ञ से निकाल देंगे।' तब उसने कहा 'अच्छा, मैं भी
मारूँगा।' तब पशु उसके पास से चले गये कि यह मित्र था, अमित्र हो गया। तब वह पशुओं से
वंचित रह गया। सोम में दूध मिलाने से देवों ने उसको पशुओं से युक्त कर दिया। इसी प्रकार
यह भी सोम में दूध मिलाकर इस यजमान या मित्र को पशुओं से युक्त कर देता है ॥८॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उसने तो मारना नहीं चाहा था। इसलिए इसमें जितना
दूध है वह मित्र का है और जितना सोम है वह वरुण का। इसलिए सोम में दूध मिलाता है ॥६॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है—“राया वयँ॒ ससवाꣳ॑सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः ।
तां धेनुं मित्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा” (यजु०
७।१०, ऋक् ४।४२।१०)—“जो सम्पत्ति हमको मिली है उससे हम आनन्दित हों। देव हव्य से
और गायें घास से। हे मित्र-वरुण, तुम हमको यह सदा दूध देनेवाली गाय दो।” यह कहकर वह
उस ग्रह को रख देता है—“यह तेरी योनि है। ऋत और आयु के लिए तुझको।” 'ऋत और आयु
के लिए' क्यों कहा ? अह्म ऋत है। अह्म मित्र है। वरुण आयु है। संवत्सर वरुण है, संवत्सर
आयु है। इसलिए कहा कि 'यह तेरी योनि है, ऋत और आयु के लिए तुझको' ॥१०॥
आश्विनग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण ५
आश्विन ग्रह इसका श्रोत्र हैं। इसलिए चारों ओर घुमाकर पीता है। इस श्रोत्र से चारों
ओर की बात सुनता है। जब अङ्गिरा-वंशी भृगु लोग स्वर्ग को गये, च्यवन भार्गव या च्यवन
आंगिरस जीर्ण और आकृति-मात्र पीछे छूट गया ॥१॥
उसी समय मनुवंशी शर्याति अपने स्वजनों के साथ उधर आया और वहीं बस गया।
उसके कुमारों ने खेलते हुए इस जीर्ण भयानक पुरुष को देखा और उसको अनर्थ्य या नाचीज
समझकर उस पर ढेले मारने लगे ॥२॥
उसने शर्याति वालों पर क्रोध किया और उनमें उसने विद्रोह उत्पन्न कर दिया। बाप
बेटे से और भाई भाई से लड़ने लगा ॥३॥
शर्याति ने सोचा कि मैंने कुछ किया है जिससे ऐसी आपत्ति आई है। उसने ग्वालों और
गडरियों को बुलाकर कहा—॥४॥
उसने कहा, 'अरे तुमने आज कोई नई बात देखी है?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'एक
जीर्ण और दीन पुरुष लेटा हुआ है, उसको नाचीज समझकर कुमारों ने उस पर ढेले फेंके थे।'
वह समझ गया कि यह च्यवन है ॥५॥
उसने रथ जोतकर उसमें अपनी सुकन्या नामक लड़की को बिठाया और वहाँ आया
जहाँ वह ऋषि था ॥६॥
और कहा, 'ऋषि, नमस्ते ! मैंने जाना नहीं इसलिए आपको दुःख दिया। यह सुकन्या है.

५४६ शतपथ ब्राह्मण
ग्रा॒म इति॒ तस्य॑ ह॒ तत॑ ए॒व ग्रामः॒ संज॑ज्ञे॒ स ह॒ तत॑ ए॒व शर्या॑तो मान॒व उच्चु॑-
यु॒जे नेद॒पर॑ꣳ हि॒नसा॒नीति॑ ॥ ७॥ अ॒श्विनौ॑ ह वाऽइ॒दं भि॒षज्य॑न्तौ चेरतुः। तौ सु॒-
क॒न्या॑मुपेयतु॒स्तस्यां॑ मिधु॒नमी॑षाते॒ तन्न ज॑ह्रौ ॥ ८॥ तौ॒ होच॑तुः। सुकन्ये॒ कनिमं
जी॒र्णिं कृ॒त्यारू॑पमु॒पशे॒षऽश्रावा॒मनु॒प्रेहीति॒ सा हो॑वाच॒ यस्मै॒ मां पि॒तादा॒न्नैवाहं
तं जी॒वन्त॑ꣳ हास्या॒मीति॒ तद्धायमुषि॒राज्ञौ॑ ॥ ९॥ स॒ होवा॑च । सुकन्ये॒ किं वैत॒-
द॑वोचता॒मिति॒ तस्मा॑ऽए॒तद्व्या॑चचक्षे॒ स ह॒ व्या॑ख्यात उवाच॒ यदि॑ वैत॒त्पुन॑र्ब्रूवतः॒
सा त्वं॒ ब्रूता॒न्न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ
यदि॑ वा ब्रूवतः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा त्वं॑ ब्रूतात्प॒तिं नु मे॒ पु-
न॑र्युवाणं कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॒ तां॒ पुन॒रुपे॑यतु॒स्ताꣳ हैत॒द्वेवो॑चतुः ॥ १०॥ सा॒
हो॑वाच । न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ॒
हो॑चतुः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा॒ हो॑वाच॒ पतिं॑ नु मे पुन॑र्युवाणं
कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॑ ॥ ११॥ तौ॒ हो॑चतुः । ए॒तं ह्र॒दम॒भ्यव॑हर॒ स येन॒ व-
यसा कमि॒ष्यते॒ तेनोदे॒ष्यतीति॒ तꣳ ह्र॒दम॒भ्यव॑जहार॒ स येन॒ वय॑सा चक॒मे तेनो-
दे॑याय ॥ १२॥ तौ॒ हो॑चतुः । सुकन्ये॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒र्-
षिरि॑व प्र॒त्युवा॑च कुरु॒क्षेत्रे॑ऽमी दे॒वा य॒ज्ञं त॑न्वते॒ ते वां य॒ज्ञाद॒न्तर्य॑न्ति॒ तेनासर्वौ॑
स्थ॒स्तेनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒ तत॑ ए॒वाश्विनौ॑ प्रेयतु॒स्तावा॑जग्मतु॒र्देवान्य॒ज्ञं त॒न्वाना-
ꣳस्तु॑ते ब॒हिष्प॑वमाने ॥ १३॥ तौ॒ हो॑चतुः । उप॒ नौ व्ह॑यध्व॒मिति॒ ते ह॒ देवा॑ ऊ-
चुर्न॑ वामुप॒ह्वयि॑ष्यामहे॒ बहु म॑नु॒ष्येषु॒ सꣳसृ॑ष्टमचारिष्टं भि॒षज्य॑न्ताविति॑ ॥ १४॥
तौ॒ हाचतुः । वि॒शीर्णा॒ वै य॒ज्ञेन य॒ज्ञधु॒ऽइति॒ कथं॑ वि॒शीर्णेत्युप॒ नु नौ व्हय॑ध्व॒मथ॑
वो वक्ष्याव॒ इति॒ तथेति॑ ताऽउपा॒ह्वयन्त ताभ्यामे॒तमा॑श्वि॒नं ग्र॒हम॑गृह्ण॒न्तावध्व॒र्यू प-
ज्ञ॒स्याभ॑वतां॒ तावेतद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रत्य॑धत्तां॒ तद्गद॑स्तद्दिवाकीर्त्यानां॒ ब्राह्म॑णे व्या-
ख्यायते॒ यथा॒ तद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रति॑दधु॒स्तस्मा॑दे॒ष स्तु॒ते ब॒हिष्प॑वमाने ग्र॒हो गृ-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ५, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ५४७
इससे मैं उसका प्रतीकार करता हूँ । अब मेरे लोग ठीक रहें।' तब से वे लोग ठीक रहे । लेकिन
मनुवंशी शर्याति वहाँ से चलता बना कि कहीं मैं इसे फिर अप्रसन्न न कर दूँ ॥७॥
उसी समय चिकित्सा करते-करते अश्विन आ निकले । उन्होंने सुकन्या को ग्रहण करना
चाहा परन्तु वह राजी न हुई ॥८॥
वे दोनों बोले, 'सुकन्या, तू किस जीर्ण नाचीज पुरुष के पास रहती है ? हमारे पास
आ।' वह बोली, 'मेरे पिता ने मुझे जिसके साथ ब्याहा है उसी के पास रहूँगी, जब तक यह जीवित
है।' ऋषि को यह बात मालूम हो गई ॥६॥
वह बोला, 'सुकन्या, इन दोनों ने तुझसे क्या कहा ?' उसने उससे सब-कुछ कह दिया ।
यह सुनकर उसने कहा, 'अगर तुझसे ये फिर कहें तो उनसे कहना कि तुम दोनों पूर्ण तो हो नहीं
फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ? यदि वे पूछें कि किस बात में हम कम हैं या निर्बल हैं
तो कहना कि पहले मेरे पति को युवा कर दो तब कहूँगी।' वे फिर उसके पास आये और उससे
वही बात कही ॥१०॥
वह बोली, 'तुम न तो पूर्ण हो, न समृद्धवान् । फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ?'
वे दोनों बोले, 'हम किस बात में कम हैं ? किस बात में निर्बल हैं ?' वह बोली, 'मेरे पति को
युवा कर दो तब मैं बताऊँ' ॥११॥
वे बोले, 'उस तालाब में इसको ले जा, यह जिस अवस्था की कामना करेगा उसी
अवस्था का होकर निकलेगा।' वह उसको तालाब पर ले गई। उसने जिस आयु की कामना की,
उसी आयु का होकर निकला ॥१२॥
वे बोले, 'सुकन्या, हम किस बात में अधूरे हैं, किसमें कम हैं?' तब ऋषि ने स्वयं
उत्तर दिया, 'कुरुक्षेत्र में देव यज्ञ करते हैं और तुमको बाहर निकाल दिया है। यही तुममें
अधूरापन है, यही कमी है।' यह सुनकर ये दोनों अश्विन लौट गये । वे वहाँ पहुँचे जहाँ देवों ने
बहिष्पवमान स्तुति करने के पश्चात् यज्ञ रच रक्खा था ॥१३॥
वे बोले, 'हमको भी यज्ञ में बुलाओ।' देव बोले, 'हम नहीं बुलाते। तुम तो चिकित्सा
करते-करते सब प्रकार मनुष्यों में फिरते रहे हो' ॥१४॥
वे बोले, 'अरे तुम तो बे-सिर के यज्ञ को करते हो?' 'बे-सिर का कैसे?' 'हमको बुलाओ
तब हम बतायेंगे।' 'अच्छा।' उन्होंने उन अश्विनों का आवाहन कर लिया और उनके लिए
इस आश्विन-ग्रह को लिया । ये दोनों यज्ञ के अध्वर्यु हो गये । उन्होंने यज्ञ को सिर-वाला बना
दिया । 'दिवाकीत्यों' के ब्राह्मण में लिखा है कि उन्होंने यज्ञ के सिर को किस प्रकार सम्पादित
किया । इसलिए बहिष्पवमान की स्तुति के पश्चात् यह ग्रह लिया जाता है, क्योंकि बहिष्पवमान