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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

५३२ शतपथ ब्राह्मण
सं॒चर॑तीति॒ तदु॒ तथा॒ न कुर्या॒दुत्त॑रार्द्धऽए॒वैनꣳ॑ सादये॒न्नो ह्ये॑तस्या॒ आहु॑तेः का
च॒न परा॑स्ति॒ तꣳ सादयति प्रा॒णाय॑ त्वेति प्रा॒णो ह्य॑स्यै॒षः ॥ २७॥ अथो॑पा॒ꣳ॒श॒सव॑-
न॒माद॑त्ते । तं॒ न दशा॑भि॒र्न प॒वित्रे॑णोपस्पृशति य॒था व्य॒ह्निः प्र॒णिक्त॑मे॒वं तद्य॒द्य॑थ-
श्च॒राक्लि॑ष्टः स्यात्पा॒णिनै॑व प्र॒ध्र्क्ष्योध्व॑म॒पनि॑पादये॒द्याना॑य त्वेति व्या॒नो ह्य॑स्यै॒षः
॥ २८ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ १ ॥ ॥
प्रा॒णो ह्य॒ वाऽअ॑स्योपा॒ꣳ॒शुः । व्या॒न उपा॑ꣳश॒सवन॒ उदा॑न॒स्त्व॒न्तर्या॒मः ॥ १॥
अथ॒ यस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ । यो वै प्रा॒णः स॒ उ॑दानः स॒ व्यान॒स्तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्परा॑-
चं प्रा॒णं द॑धाति॒ यदु॑पा॒ꣳ॒शुं गृह्णा॑ति॒ तमे॒वास्मि॑न्नेत॒त्प्रत्यञ्च॑मुदा॒नं द॑धाति॒ यद॑न्तर्या॒मं
गृह्णा॑ति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्यत॑स्तद्यद॒स्यैषो॑ऽन्त॒रात्म॒न्यतो यद्वैनेनेमाः प्र॒जा
य॒तास्तस्मा॑दन्तर्या॒मो नाम॑ ॥ २॥ त॒मतः॑प॒वित्रा॑द्गृह्णाति । प्रत्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्नेत॒दुदा॑नं
द॑धाति॒ सो॑ऽस्यायमुदा॒नोऽन्त॒रात्म॒न्हित॒ श्तेनो॑ हास्याप्युपा॒ꣳ॒शुर॒तः॑प॒वित्रा॑द्गृही॒तो
भव॑ति स॒मानꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳ॒श्वन्तर्या॒मौ प्रा॒णोदा॒नौ ह्ये॑तेनो॒ हैवास्यैषो॑ऽपीत॒रेषु॑
ग्र॒हेष्व॑नाच्छिद्रवति ॥ ३॥ अथ य॒स्मात्सोमं॑ प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॑ । य॒त्र वै सोमः॑ स्वं
पु॒रोहि॑तं॒ बृह॒स्पति॑म॒जिज्ञा॑ तस्मै॒ पुन॑र्ददौ तेन सꣳशशास तस्मिन्पुनर्द॒ऽइवा॑-
तिशिष्ट॒मेनो॑ यद्दी॒क्षूंनं ब्रह्म॒ ड्यानायाभिद॒धौ ॥ ४॥ तं दे॒वाः प॒वित्रे॑णापावयन् ।
स मेध्यः॑ पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॒त्तथो॑ऽए॒वैन॑मे॒ष ए॒तत्प॒वित्रे॑ण पाव॒यति॒ स मे॑-
ध्यः पू॒तो दे॒वानाꣳ॑ ह॒विर्भव॑ति ॥ ५॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽअ॑-
दि॒तिस्तस्या॑ अदः प्रायणी॒यꣳ ह॒विरा॑सावादि॒त्यश्च॒रुस्तद्द्वे तत्पु॑रेव सु॒त्या॑यै सा हेयं
दे॒वेषु॑ सु॒त्याया॑मपिबन्मीषेऽस्त्वेव मे॑ऽपि प्रसु॒ते भा॒ग इ॑ति ॥ ६॥ ते ह देवा ऊ-
चुः । व्यादि॑ष्टोऽयं दे॒वता॑भ्यो य॒ज्ञस्त्वयै॑व ग्र॒हा गृ॒ह्यन्तां॑ दे॒वता॑भ्यो हूयन्ता॒मिति॑
तथे॑ति॒ सो॑ऽस्या ए॒ष प्रसु॑ते भा॒गः ॥ ७॥ तद्यदुपया॒मेन॒ ग्रहा॑ गृ॒ह्यन्ते॑ । इ॒यं वाऽउ॑-
पया॒म इ॒यं वाऽइ॒दमन्नाद्य॒मुप॑यच्छति प॒शुभ्यो॑ मनु॒ष्ये॑भ्यो॒ वन॒स्पति॑भ्य इ॒तो वाऽउ॑-

का० ४, अ० १, ब्रा० १-२, कं० २७-२८ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५३३
है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। उसको उत्तर की ओर रक्खे। क्योंकि इससे उत्तर (उत्कृष्ट)
कोई ग्रह है ही नहीं। इसको "प्राणाय त्वा" (यजु० ७।३) कहकर रखता है क्योंकि यह उसका
प्राण है ॥२७॥
अब वह उपांशु सवन को लेता है। वह इसको न झालर से छूता है न पवित्रे से। ऐसा
करने से तो पानी से धोने के तुल्य होगा। यदि कोई अंशु या सोमलता का टुकड़ा लगा हो तो
उसे हाथ से छुटा दे और उस (उपांशु सवन) को (उपांशु-ग्रह के) पास रख दे उत्तर की ओर
मुंह करके, इस मन्त्र से—"व्यानाय त्वा" (यजु० ७।३) क्योंकि यह यज्ञ का व्यान है ॥२८॥
अन्तर्यामग्रहः
अध्याय १—ब्राह्मण २
इस (यज्ञ) का प्राण उपांशु ग्रह है, व्यान उपांशु सवन है और अन्तर्याम ग्रह उदान
है ॥१॥
अन्तर्याम नाम यों पड़ा—जो प्राण है सो उदान, वही व्यान है, इसी में उस जाते हुए
प्राण को धारण करता है; जो उपांशु ग्रह को लेता है, और जो अन्तर्याम ग्रह को लेता है उसमें
लौटते हुए उदान को लेता है, यह उदान उसके अन्तरात्मा में ही है; यह जो उदान अन्तरात्मा
में है और चूंकि इसमें यह प्रजा 'यताः' अर्थात् व्याप्त है, इसलिए इस ग्रह का नाम 'अन्तर्याम'
पड़ गया ॥२॥
उसको पवित्रे के भीतर से निकालता है। इस प्रकार लौटके निकलते हुए उदान को
उसमें धारण करता है। यह उदान उसी में स्थित होता है। इसीसे उसकी उपांशु-आहुति पवित्रे
के भीतर से निकली हुई हो जाती है, क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम एक ही हैं, क्योंकि वे प्राण
और उदान हैं। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा उसका प्राण अन्य ग्रहों में भी निरन्तर स्थित हो
जाता है ॥३॥
सोम को पवित्रे से शुद्ध करने का कारण यह है-जब सोम ने अपने ही पुरोहित बृहस्पति
को सताया था तो पीछे से उसने उसका माल वापस कर दिया था और वह शान्त हो गया था।
माल लौटा देने पर भी कुछ दोष तो शेष रह ही गया क्योंकि उसने ब्राह्मण को सताने का विचार
कर लिया था ॥४॥
उसको देवों ने पवित्रे से शुद्ध किया। वह पवित्र होकर देवों की हवि बन गया। इसी
प्रकार यह भी इसे पवित्रे से शुद्ध करता है। यह पवित्र होकर देवों की हवि बन जाता है ॥५॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि यह पृथिवी आहुति है। आदित्य चरु
इसका प्रायणीय हवि है। वह सोम के बनाने से पूर्व की बात है। उसने चाहा कि देवों के साथ
मेरा भी भाग मिल जाय, और कहा कि निचोड़े हुए सोम में से मुझे भी भाग मिले ॥६॥
उन देवों ने कहा, 'यज्ञ तो देवताओं में बँट चुका। तेरे द्वारा ही ग्रह लिये जायेंगे, और
तेरे ही द्वारा देवताओं की आहुतियां दी जावेंगी।' उसने कहा 'अच्छा।' वस्तुतः यह उस अर्पित
सोम का उस (अदिति) का भाग है ॥७॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए भी लिये जाते हैं कि यह पृथिवी उपयाम है क्योंकि यह अन्न
आदि को रखती है (उपयच्छति) - पशुओं के लिए, मनुष्यों के लिए और वनस्पतियों के लिए।

४. अध्य शतपथ ब्राह्मण
र्धी दे॒वा दि॒वि हि दे॒वाः ॥ ८॥ तद्य॒दुपया॒मेन ग्रहा गृह्य॑न्ते । अन्न॑मेव॒ तद्गृह्य॑न्ते
ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑तीयं वाऽअ॒स्य सर्व॑स्य॒ योनि॒रस्यै वाऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाताः
॥ ९॥ तं वाऽए॒तत् । रेतो भूतं सो॒ममृ॒त्विजो बिभ्रति॒ यद्वाऽअयोनौ रेतः॑ सिच्य॑-
ते प्र वै तन्मीयते॒ऽथ॒ यद्योनौ॑ सा॒दय॑त्य॒स्यामे॒व तत्सा॒दय॑ति ॥ १०॥ प्रा॒णो॒दा॒नौ
ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते॒ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रं प्रा॒णोदा॒नयो॒-
र्व्याकृ॑त्यै प्रा॒णोदा॒नावै॒वैतद्व्याक॑रोति॒ तस्मा॑देतौ समा॒नावेव सन्ता॒ नाने॑वाचक्षते
प्रा॒ण इति॒ चोदा॒न इति॑ च ॥ ११॥ अ॒हो॒रा॒त्रे ह वाऽअ॒स्यैतौ ग्रहौ॑ । तयो॒रुदि॑ते
ऽन्यत॑रं जुहो॒त्यनु॑दिते॒ऽन्यत॑रमहोरा॒त्रयो॒र्व्याकृ॑त्या॒ऽअहोरा॒त्रेऽए॒वैतद्व्याक॑रोति ॥ १२॥
अहः॒ सन्त॑मुपां॒शुम् । तं रात्रौ॑ जुहोत्य॒हरे॒वैतद्रात्रौ॑ दधाति॒ तस्मा॒दपि॑ सुतमि-
श्रायामिव॒ किंचि॑त्ख्यायते ॥ १३॥ रात्रिं॒ सन्त॑मन्तर्या॒मम् । तमुदि॑ते जुहोति॒ रात्रि॑-
मे॒वैतदु॒रुन्ध॑धाति॒ तेनो॒ हासा॒वादित्य उ॒द्यन्ने॒वेमाः प्र॒जा न प्रद॑हति॒ तेने॒माः प्र॒जा-
स्त्राताः ॥ १४॥ अथातो गृह्णात्येव । उपयामगृहीतोऽसीत्युक्त उपयामस्य बन्धु॒र्-
ऽए॒ह म॒घव॒न्पाहि सोम॒मितीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒दाह॑ मघ-
व॒न्निति॑ पा॒हि सोम॒मिती॑ गोपाय॒ सोम॒मित्ये॒वैतदा॒होरु॒ष्य रा॒य एषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑
प॒शवो॒ वै रा॒यो गोपाय॑ प॒शूनित्ये॒वैतदा॒हैषो॑ य॒ज्ञस्वेति॑ प्र॒जा वाऽइ॒षस्ता ए॒वैत-
द्यायजू॒काः क॑रोति॒ ता इ॒माः प्र॒जा यज॑माना अ॒र्चन्त्यः श्राम्य॑न्त्यश्चरन्ति ॥ १५॥ अ-
न्तस्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी द॑धामि । अन्त॑र्दधाम्यु॒र्वन्तरि॑क्षम् स॒जूर्दे॒वेभि॒रवरैः परैश्चेति॑ त॒-
देनं॑ वैश्वदे॒वं करोति तद्य॒देने॑ने॒माः प्र॒जाः प्राणा॒त्यञ्चोद॑न॒त्यश्चा॑न्त॒रिक्ष॒मनु॒चर॑न्ति ते-
न वैश्वदे॒वोऽन्त॑र्यामे मघवन्मा॒दय॑स्वेतीन्द्रो॒ वै म॒घवानिन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता तस्मा॒-
दाह॑ मघव॒न्नित्यथ॒ यद॒न्तरिति॑ गृह्णात्य॒न्तस्त्वा॒त्मन्द॑ध॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १६॥ तं गृ-
ही॒त्वा प॒रिमा॒ष्टि॑ । नेद्ब॒हिश्चोत॒दिति॒ तं न सा॒दय॑त्युदा॒नो ह्येष तस्मा॑दयमस॒न्न
उदा॒नः संचरति॒ यद्यु॑त्वभिचरे॒द्येने॑तं सा॒दये॑द॒मुष्य त्वोदा॒नं सादया॒मीति॑ ॥ १७॥ स

का० ४, अ० १, ब्रा० २. कं० ८-१७ शतपथब्राह्मण / ५३५
देव इससे ऊपर हैं क्योंकि वे द्युलोक में हैं ॥८॥
उपयाम के साथ ग्रह इसलिए लिये जाते हैं कि इसी पृथिवी के साथ लिये जाते हैं। इसी
योनि में वे रक्खे जाते हैं क्योंकि पृथिवी योनि है, इसी से प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥९॥
ऋत्विज लोग रेत (वीर्य) के रूप में सोम को रखते हैं। जो रेत योनि के बाहर जाता
है वह खराब हो जाता है और जो योनि में रहता है वह ठीक रक्खा जाता है ॥१०॥
ये दोनों ग्रह उसके प्राण और उदान हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे देता है और
दूसरे की पहले, जिससे प्राण और उदान अलग-अलग रहें। इस प्रकार वह प्राण और उदान को
अलग-अलग रखता है। इसलिए ये दोनों अर्थात् प्राण और उदान एक होते हुए भी अलग-अलग
कहे जाते हैं ॥११॥
ये दोनों ग्रह उसके लिए रात और दिन हैं। एक की आहुति सूर्योदय के पीछे दी जाती
है और दूसरे की पहले-रात और दिन को अलग-अलग करने के लिए। इस प्रकार वह रात और
दिन को अलग-अलग करता है ॥१२॥
उपांशु दिन है, उसकी आहुति रात में देता है। इस प्रकार दिन को रात्रि में रखता है।
इसलिए अन्धकार-से-अन्धकार में भी कुछ तो दिखाई देता ही है ॥१३॥
अन्तर्याम रात है। उसकी आहुति दिन में देता है। इस प्रकार रात को दिन में रखता
है। इसलिए यह सूर्य उदय होकर इन प्रजाओं को नहीं जलाता। इसी से यह प्रजा सुरक्षित रहती
हैं ॥१४॥
वह उसमें से अन्तर्याम ग्रह को इस मन्त्र से लेता है—"उपयामगृहीतोऽसि” (यजु०
७।४)—"तू उपयाम अर्थात् 'सहारे (आश्रय)' के साथ लिया हुआ है।" यह 'उपयाम' का योग
कहा। "अन्तर्यच्छ मघवन् पाहि सोमम्” (यजु० ७।४)—'मघवा' है इन्द्र या यज्ञ का नेता,
इसलिए कहा कि "हे इन्द्र, सोम की रक्षा कर।" "उरुष्य राय एषो यजस्व" (यजु० ७।४)—
"पशु राय हैं अर्थात् पशुओं की रक्षा कर।" प्रजा इष हैं, इस प्रकार प्रजा को यज्ञ के इच्छुक
बनाता है जिससे ये प्रजा यज्ञ करते हुए, अर्चन करते हुए और श्रम करते हुए रहें ॥१५॥
“अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधामि । अन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम् । सजूर्देवैभिरवरैः परैश्च"
(यजु० ७।५)—"तेरे भीतर द्यौ और पृथिवी को रखता हूँ। तेरे भीतर विस्तृत अन्तरिक्ष को।
देवों से युक्त निचले और ऊँचे।" इस प्रकार इस ग्रह को सब देवों से सम्बन्धित करता है। यह
सब देवों का इसलिए है कि इसी से यह प्रजा प्राण और उदान लेती है और अन्तरिक्ष में चलती
हैं। "अन्तर्यमि मघवन् मादयस्व" (यजु० ७।५)—"हे मघवन् ! अन्तर्याम में आनन्द करो।"
मघवा इन्द्र है। इन्द्र यज्ञ का नेता है इसलिए कहा 'मघवा'। यह जो "अन्तः-अन्तः” कहकर उसे
लेता है इसका अर्थ यह है कि 'मैं तुझे आत्मा के भीतर रखता हूँ' ॥१६॥
उस ग्रह को लेकर पोंछता है कि इसमें से कुछ सोम टपक न जाय। वह इसको रखता
नहीं। यह उदान है। इसीलिए उदान निरन्तर चलता रहता है। यदि उसको कुछ पुरश्चरण
करना हो तो कहे, 'अमुक पुरुष के उदान ! मैं तुझको रखता हूँ' ॥१७॥

५३६ शतपथ ब्राह्मण

य॒द्यु॑पा॒ꣳशु॑ꣳ सा॒दये॑त् । अथैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ न सा॒दये॒न्नैन॑ꣳ सादये॒द्यद्यु॑पा॒ꣳशु-
म॑पिद॒ध्याद्ये॑नं द॒ध्याद्यद्यु॑पा॒ꣳशुं॒ नापि॑दध्या॒न्नैन॑मपिदध्या॒द्यथो॑पा॒ꣳशोः कर्म॑ तथै॒तस्य॑
समा॒नꣳ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि ॥ १८ ॥ ताण्ड ह चरकाः । ना-
नैव म॒न्त्राभ्यां॑ जुह्वति प्रा॒णो॒दानौ वा॒ऽअस्यै॒तौ ना॑नावी॒र्यौ प्रा॒णो॒दानौ॑ कुर्म॒ इति॑
वद॑न्त॒स्तदु॑ तथा॒ न कु॑र्यान्मो॒हुर्य॑न्ति ह ते यज॑मानस्य प्रा॒णो॒दानावपी॒द्वाऽए॑नं तू-
ष्णीं जु॑हुयात् ॥ १९ ॥ स यद्वा॒ऽउपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तदे॑वास्ये॒ष्टोऽपि॒ मन्त्रे॑ण
हु॒तो भ॑वति॒ किमु॒ तत्तू॒ष्णीं जु॑हुयात्स॒मानꣳ॒ ह्ये॑तद्य॒दुपा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मौ प्रा॒णो॒दानौ हि॑
॥ २० ॥ स येनै॒वोपा॒ꣳशुं मन्त्रे॑ण जु॒होति॑ । तेनै॒वैतं मन्त्रे॑ण जुहोति॒ स्वांकृ॑तोऽसि
विश्वे॑भ्य इन्द्रि॒येभ्यो॑ दि॒व्येभ्यः॒ पार्थि॑वेभ्यो॒ मन॑स्त्वाष्टु॒ स्वाहा॑ सु॒भव॒ सूर्या॑ये॒त्युक्तो॑
यजु॑षो॒ बन्धुः॑ ॥ २१ ॥ अथ ध्रु॒वावा॑चं॒ ग्रहम॑वमा॒र्ष्टि । इदं॒ वाऽउ॑पा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोᳵर्द्ध-
मु॒न्मा॒र्क्ष्यथा॒त्रावा॑चमवमा॒र्ष्टि प्र॒त्यञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति ॥ २२ ॥ अथ॒ नीचा॑
पाणि॑ना । मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टीदं॒ वा उपा॒ꣳशुं॒ ध्रुवोत्ताने॑न पाणि॑ना म-
ध्य॑मे परि॒धौ प्रागु॑पमा॒र्क्ष्यत्र॒ नीचा॑ पाणि॑ना मध्य॑मे परि॒धौ प्र॒त्यगु॑पमा॒र्ष्टि प्र॒त्य-
ञ्च॑मे॒वास्मि॑न्ने॒तदु॑दा॒नं द॑धाति दे॒वेभ्य॑स्त्वा मरीचि॒पेभ्य॒ इति॒ सोऽसा॑वे॒व बन्धुः॑ ॥२३॥
तं प्र॒त्याक्र॑म्य सा॒दय॑ति । उदा॒नाय॑ त्वे॒त्युदा॒नो ह्य॑स्यै॒ष तानि॒ वै सृ॒ष्ट्य॒ष्टानि॑ सा-
दयति प्रा॒णो॒दाना॒वेवैतत्सꣳ॑स्प॒र्शय॑ति प्रा॒णो॒दाना॒न्त्सन्द॑धाति ॥ २४॥ तानि॒ वाऽग्र-
नि॒ङ्ग्यमा॑नानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ स्वप॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑-
स्तृ॒तीय॑सवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मे म॑नु॒ष्याः॑ सु॒प्ता प्र॒बुध्य॑न्ते॒ तेऽनि॑शिताश्चराच॒रा य-
ज्ञस्यै॒वैतद्वि॑धा॒मनु॒ वय॒-इव॑ ह॒ वै य॒ज्ञो वि॑धी॒यते॒ तस्यो॑पा॒ꣳश्व॑न्तर्या॒मावे॑व प॒क्षावा-
त्मो॑पा॒ꣳशु॒सवनः॑ ॥ २५ ॥ तानि॒ वाऽअनि॑ङ्ग्यमानानि॒ शेरॆ॑ । आ तृ॒तीय॑सवना॒त्ता-
यते य॒ज्ञ इति॑ वै॒ तद्यत्ताय॑ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि वि॒गृह्य॑ प॒क्षाव॒नायु॑वानानि
पत॑न्ति॒ तानि॒ पुन॑स्तृतीयसवने प्र॒युज्य॑न्ते॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ वया॑ꣳसि समा॒सं प॒क्षावा-

का० ४, अ० १, ब्रा० २, क० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५३७ -
अगर वह उपांशु को रक्खे तो इस अर्थात् अन्तर्याम को भी रक्खे । यदि उपांशु को न
रक्खे तो इसको भी न रक्खे । यदि उपांशु को (हाथ से) ढके तो इस अन्तर्याम को भी ढके । वह
उपांशु को न ढके तो इस अन्तर्याम को भी न ढके । जैसा उपांशु के लिए, वैसा इसके लिए, क्योंकि
उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं । वे प्राण और उदान हैं ॥१८॥
चरक लोग इन आहुतियों को दो और मन्त्रों से देते हैं । उनका कहना है कि दोनों यज्ञ
के प्राण और उदान हैं। हम इन दोनों को भिन्न-भिन्न पराक्रमवाले बनाते हैं। परन्तु ऐसा न
करना चाहिए। इससे यजमान के प्राण और उदान बिगड़ जाते हैं। इस आहुति को चुपचाप भी
दिया जा सकता है ॥१९॥
जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति दी जाती है उसी से इसकी भी दी हुई समझ ली जाती
है। फिर इसको चुपचाप कैसे दिया जाय ? क्योंकि उपांशु और अन्तर्याम दोनों एक ही हैं। ये
उसके प्राण और उदान हैं ॥२०॥
वह जिस मन्त्र से उपांशु की आहुति देता है उसी से इस (अन्तर्याम) की भी देता है—
“स्वाङ्कृतोऽसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा सुभव सूर्याय”
(यजु० ७।६)—"तू स्वयं-बना हुआ है, सब पार्थिव और दिव्य शक्तियों के लिए । मन तेरा
हो । हे स्वयं होनेवाले ! सूर्य के लिए।" इस मन्त्र का महत्त्व कहा जा चुका ॥२१॥
आहुति देकर ग्रह को नीचे से पोंछ डालता है । उपांशु की आहुति देकर उसने ग्रह को
ऊपर से पोंछा था। इसको नीचे से पोंछता है। इस प्रकार उदान को उसमें निर्धारित करता
है ॥२२॥
अब हथेली को नीचे को करके बीच की परिधि (समिधा) में सोम मलता है । उपांशु
की आहुति देकर उसने हथेली को ऊपर को करके पश्चिम से पूर्व की ओर मध्य समिधा को मला
था । परन्तु अब की बार पूर्व से पश्चिम की ओर हथेली को नीचा करके मलता है, इस मन्त्र से,
“देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यः” (यजु० ७।६)—इसका महत्त्व वही है जो पहले का ॥२३॥
(हविर्धान की ओर) चलकर वह ग्रह को इस मन्त्र से रख देता है, “उदानाय त्वा”
(यजु० ७।६)—यह उसका उदान है। वह इस प्रकार रखता है कि वे एक-दूसरे को छूते हैं। इस
प्रकार वह प्राण और उदान को छुआता है। उन दोनों में संसर्ग उत्पन्न करता है ॥२४॥
ये (उपांशु और सवन) सायंकाल के सवन तक वैसे ही रक्खे रहते हैं जैसे मनुष्य भूमि
पर सोते हैं। इनका सायंकाल के सवन में प्रयोग होता है। जैसे ये मनुष्य सोकर उठते हैं, और
कारबार में लगते हैं। यह यज्ञ के अनुसार है। यज्ञ एक पक्षी है। उपांशु और अन्तर्याम इसके
पक्ष हैं। उपांशु-सवन इसका आत्मा (शरीर) है ॥२५॥
सायंकाल के सवन तक वे वैसे ही रहते हैं। यज्ञ ताना जाता है। जो ताना जाता है उसमें
गति होती है। जैसे पक्षी पंख खोलकर उड़ते हैं, सिकोड़कर नहीं उड़ते । सायंकाल के सवन में
इनका फिर प्रयोग होता है। ये पक्षी अपने पंखों को सिकोड़कर उड़ते हैं जब उड़ान को बन्द