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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

वि॒द्धस्तत॒ उत्किर॑न्ति॒ तद॑स्या॒ऽश्वेन॑मेत॒त्पृथिव्यै॒ रसे॑न॒ समर्धयति॒ तस्मा॑दाखुकरी॒षꣳ
सम्भ॑रति पुरी॒ष श्इति॒ वै त॒माहु॑र्यः श्रियं॒ गच्छ॑ति समा॒नं वै पुरी॑षं च करी॒षं च॒
तदे॒तस्यै॒वाव॑रुद्धे॒ तस्मा॑दाखुकरी॒षꣳ सम्भर॑ति ॥ ७॥ अथ॒ शर्क॑राः स॒म्भर॑ति । दे॒-
वाश्च॒ वाऽअ॑सुराश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः पस्पृधिरे सा हेयं पृ॑थिव्य॑लेलाय॒द्यथा॑ पुष्कर-
प॒र्णमे॒वं ताँꣳ ह स्म॒ वातः॒ संवह॑ति सोपैव दे॒वान्जगामोपासु॑राꣳस्तद्यत्र॑ दे॒वा-
नुपजगाम ॥ ८॥ तदूचुः । हन्ते॒मां प्र॑ति॒ष्ठां दृꣳहामहै॒ तस्यां॑ ध्रु॒वाया॑मशिथि॒लाया-
म॒ग्नीऽआद॑धामहै॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्निर्भ॑क्ष्याम॒ इति॑ ॥ ९॥ तद्यथा॒ शङ्कुभि॒श्चर्म॒ वि-
ह॒न्यात् । ए॒वमि॒मां प्र॑ति॒ष्ठाꣳ पर्य॑बृꣳहन्त॒ सेयं ध्रु॒वाशि॑थिला प्रति॒ष्ठा तस्यां॑ ध्रुवा-
यामशि॑थिलायाम॒ग्नीऽआद॑धत॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्नि॑रभजन् ॥ १०॥ तथो॒ऽएवैष॒ ए-
तत् । इ॒मां प्र॑ति॒ष्ठाꣳ शर्क॑राभिः॒ परि॑बृꣳहते॒ तस्यां॑ ध्रु॒वाया॑मशिथि॒लायाम॒ग्नीऽआ-
धत्ते॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्निर्भ॑जति॒ तस्मा॒च्छर्क॑राः स॒म्भर॑ति ॥ ११॥ ता॒न्वाऽए॒तान् ।-
पञ्च॒ सम्भा॒रात्स॒म्भर॑ति पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः पञ्च॒ऽर्तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ ॥ १२॥ त॒-
दाहुः । षडेव॒ऽर्तवः॑ संवत्स॒रस्येति॒ न्यूनं॒ तर्हि॑ मिथु॒नं प्र॒जननं॑ क्रियते न्यूना॒द्धा
ऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ तद्भूय॑यसमुत्त॒राव॒त्तस्मा॒त्तच्च॒ भव॑ति॒ यद्यु॒ षडेव॒ऽर्तवः॑ संव-
त्स॒रस्येत्यति॒रेवैतेषां॒ षष्ठस्तथो॒ऽएवैतन्न्यूनं॒ भव॑ति ॥ १३॥ तदा॒हुः । नैवैकं॑ चन॒
सम्भा॒रꣳ सम्भ॑रे॒दित्य॒स्यां वाऽए॒ते सर्वे॑ पृथि॒व्यां भव॑न्ति॒ स य॑दे॒वास्या॑माध॒त्ते तत्स-
र्वाꣳत्सम्भा॒राना॑प्नोति॒ तस्मान्नैवैकं॑ च॒न सम्भा॒रꣳ सम्भ॑रे॒दिति॒ तदु॒ समे॑व॒ भरे॒द्यद्धे॒-
वास्या॑माध॒त्ते तत्सर्वाꣳत्सम्भा॒राना॑प्नोति॒ यदु॒ सम्भारैः सम्भृ॑ति॒र्भव॑ति॒ तदु॒ भव॑ति॒ त-
स्मादु॒ समे॑व॒ भरे॑त् ॥ १४॥ ब्राह्मणम् ॥ १॥
कृत्तिकास्व॒ग्नीऽआद॑धीत । ए॒ता वाऽअ॒ग्नेर्नक्ष॑त्रं॒ यत्कृत्ति॑कास्त॒द्वै स॒लोम॒ यो
ऽग्निर्नक्ष॑त्रेऽ॒ग्नी आद॑धाते॒ तस्मा॑त्कृत्ति॑कास्वा॒दधी॑त ॥ १॥ एकं॑ द्वे त्रीणि॑ । च॒त्वा-
री॑ति॒ वाऽअ॒न्यानि॒ नक्ष॑त्राण्यथै॒ता ए॒व भूयि॑ष्ठा॒ यत्कृत्ति॑कास्तद्भूमा॑नमे॒वैतदुपै॑ति

कां० २, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / १६५
बाहर निकाल डाला। इसलिए वह अग्नि को पृथिवी के इस रस से युक्त करता है। यही कारण
है कि वह आखु-करीष को लाता है। जो श्री को प्राप्त कर लेता है, उसे पुरीष्य कहते हैं। पुरीष
और करीष एक ही बात है। इसलिए इसकी बढ़ोतरी के लिए आखु-करीष को लाता है ॥७॥
अब वह कंकड़ (शर्करा) लाता है। देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान अपनी
बड़ाई के लिए झगड़ने लगे। यह पृथिवी कमल के दल के समान कांपने लगी, क्योंकि वायु इसको
डगमगा रही थी। वह कभी देवों के पास जाती और कभी असुरों के। जब वह देवों के पास
पहुँची तो—॥८॥
उन्होंने कहा, लाओ हम इसको दृढ़ कर लें; और जब यह दृढ़ और अचल हो जाय तो
दोनों अग्नियों का आधान करें। इससे हम अपने शत्रुओं को यहाँ से बिल्कुल निकाल देंगे ॥९॥
इसलिए जैसे खूंटियों से चमड़े को तानते हैं, उसी प्रकार इसको दृढ़ किया; और यह
अचल और दृढ़ हो गई। उसी दृढ़ अचल भूमि पर दो अग्नियों का आधान किया; और तब
उन्होंने शत्रुओं को इसके भाग से बिल्कुल निकाल दिया ॥१०॥
इसी प्रकार यह (अध्वर्यु) भी कंकड़ों (शर्करा) से इसको दृढ़ करता है; और उस दृढ़
निश्चल पृथिवी में दो अग्नियों को स्थापित करता है; और शत्रुओं को मार भगाता है, इसलिए
कंकड़ों को लाता है ॥११॥
इस प्रकार ये पाँच तैयारियां हैं क्योंकि यज्ञ पाँच भागों वाला (पांक्त) और पशु भी
पाँच भागों वाला है; और वर्ष में पाँच ऋतुएं भी हैं ॥१२॥
इसके विषय में उनका कहना है कि साल में छः ऋतुएं हैं। न्यून के जोड़े से ही सन्तान
उत्पन्न होती है। न्यून शरीर (के नीचे के स्थान) से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। यह भी
(यजमान के लिए) श्रेयस्कर है। इसलिए पाँच तैयारियां होती हैं। और जब वर्ष की छः ऋतुएं
होती हैं तो छठी अग्नि होती है। इसलिए कोई न्यूनता नहीं हुई। [तात्पर्य यह है कि पाँच
संभारों में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं माननी चाहिए। पाँच ऋतुओं के लिए पाँच संभार हो
गये। यदि कोई कहे कि ऋतुएं छः होती हैं इसलिए पाँच संभारों से न्यूनता पाई जायगी, तो
इसका उत्तर यह है कि न्यूनता बुरी नहीं, क्योंकि न्यून से ही तो सन्तान होती है। दूसरी बात यह
है कि यदि छः ऋतुएं मानो तो पाच संभारों के साथ-साथ (अर्थात् जल, स्वर्ण, नमक, आखु-
करीष और शर्करा) छठा अग्नि भी तो है। इससे छः संख्या भी पूरी हो गई और पाँच ही
संभार ठीक ठहरे ॥१३॥
कुछ लोगों का मत है कि एक भी संभार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस पृथिवी में तो
सभी चीजें हैं। जब इसी पृथिवी में अग्नि को स्थापित किया तो मानो सभी संभार प्राप्त हो गये।
इसलिए किसी संभार की आवश्यकता नहीं। परन्तु उसको संभारों को एकत्रित करना ही
चाहिए। क्योंकि जब वह इस पृथिवी में अग्नि का आधान करता है तब सभी संभारों को प्राप्त
होता है और जो कुछ संभारों का लाभ है वह उसको भी प्राप्त हो जाता है। इसलिए संभारों को
इकट्ठा करना ही चाहिए ॥१४॥
अध्याय १—ब्राह्मण २
अग्नियों का आधान कृत्तिका नक्षत्रों में करे। कृत्तिका अग्नि के नक्षत्र हैं। जो अग्नि के
नक्षत्र में अग्नियों का आधान करता है वह सलोम (अनुकूलता) स्थापित करता है। इसलिये
कृत्तिका नक्षत्र में अग्न्याधान करे ॥१॥
अन्य नक्षत्र एक, दो, तीन अथवा चार होते हैं (जबकि कृत्तिका सात होते हैं), इसलिए
कृत्तिका बहुल हुए। इस प्रकार बहुत्व को प्राप्त होता है इसलिए अग्न्याधान कृत्तिका नक्षत्र में

१६६ शतपथ ब्राह्मण
त॒स्मात्कृत्तिकासु॒वादधी॑त ॥२॥ ए॒ता ह॒ वै प्राच्यै॒ दिशो॒ न॒ च्यव॑न्ते । सर्वा॑णि ह
वा॒ऽअन्या॑नि॒ नक्ष॑त्राणि प्राच्यै॒ दिश॒श्च्यव॑न्ते तत्प्राच्या॑मे॒वास्यै॒तद्दि॒श्याहि॑तौ भवत-
स्त॒स्मात्कृ॒त्तिकासु॒वादधी॑त ॥३॥ अथ॒ यस्मान्न॒ कृत्तिका॑स्वा॒दधी॑त । ऽर्क्षाणाꣳ ह
वा॒ऽए॒ता अग्रे॒ पत्न्य॑ आसुः स॒प्तऋ॑षीनु॒ ह॒ स्म॒ वै पु॒रऽर्क्षा इत्याच॑क्षते ता मि॒थु-
नेन॒ व्या॑र्ध्यन्तामी ह्युत्त॒राहि स॒प्तऋ॑षय उद्य॑न्ति पु॒र ए॒ता अ॒शमिव॒ वै तद्यो॑ मि-
थुने॑न॒ व्यृद्धः॒ स नेन्मि॑थुनेन॒ व्यृध्या॒ऽइति॒ तस्मान्न॒ कृत्तिका॑स्वा॒दधी॑त ॥४॥ तद्वै॑व
दधीत । अ॒ग्निर्वाऽए॒तासां॑ मिथुन॒मग्नि॑नैता म॒िथुने॑न॒ समृ॑द्धास्त॒स्माद्दै॑व दधीत ॥५॥
रो॒हि॒ण्याम॒ग्नीऽआद॑धीत । रो॒हि॒ण्याꣳ ह॒ वै प्र॒जाप॑तिः प्रजाकामो॒ऽग्नीऽआ॑दधे॒ स
प्र॒जा असृ॑जत ता अस्य प्रजाः सृ॒ष्टा रु॒करू॑पा॒ उप॑स्तब्धास्तस्थू रो॒हिण्य इ॑वैव॒ तद्वै
रो॒हि॒ण्ये॑ रो॒हि॒णीत्वं बहु॒र्हैव प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भवति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्रो॑हि॒ण्यामाद॑ध॒त्ते
॥६॥ रो॒हि॒ण्यामु॒ ह॒ वै प॒शवः॑ । अ॒ग्नीऽआ॑दधिरे मनु॒ष्याणां॒ काम॒ꣳ रोहे॑मेति॒ ते
मनु॒ष्याणां॒ काम॒मरो॑ह॒न्यमु॒ हैव॒ तत्प॒शवो॑ मनु॒ष्ये॑षु॒ काम॒मरो॑हँस्त॒मु॒ हैव॒ प॒शुषु॑
काम॒ꣳ रो॑हति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्रो॑हि॒ण्यामाध॒त्ते ॥७॥ मृ॒ग॒शी॒र्षेऽग्नीऽआद॑धीत । ए-
तद्वै प्र॒जाप॑तेः शि॒रो यन्मृ॑गशी॒र्षꣳ श्रियै॒ शिरः॒ श्रीर्हि वै शिर॒स्तस्मा॒द्योऽर्ध॑स्य॒ श्रे-
ष्ठो भव॑त्यसावमु॒ष्यार्ध॑स्य॒ शिर॒ इत्या॑हुः श्रियꣳ ह गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्मृ॑गशी॒र्ष
ऽआ॒धत्ते॑ ॥८॥ अथ॒ यस्मान्न मृ॒ग॒शी॒र्षऽआद॑धीत । प्र॒जाप॒तेर्वाऽए॒तच्छरी॑रं यत्र॒ वा
ऽए॒नं तदवि॑ध्यंस्तद्द्विषु॒णा त्रि॒काण्डे॒नेत्या॑हुः स॒ एतच्छरी॑रमजहाद्वा॒स्तु वै शरी॑रम॒य-
ज्ञियं॒ निर्वी॑र्य्यं॒ तस्मान्न मृ॒ग॒शी॒र्षऽआ॒दधी॑त ॥९॥ तद्वै॑व दधीत । न वाऽए॒तस्य॑ दे॒-
वस्य॒ वास्तु॒ नाय॑ज्ञियं॒ न शरी॑रमस्ति॒ यत्प्र॒जाप॑तेस्त॒स्माद्दै॑व दधीत पुनर्वस्वोः पु॒-
नराधेय॒माद॑धी॒तेति॑ ॥१०॥ फल्गुनीष्व॒ग्नीऽआ॒दधी॑त । ए॒ता वाऽइन्द्र॒नक्ष॑त्रं॒ यत्फ-
ल्गुन्योऽस्य॑स्य॒ प्रतिनाम्न्यो॒ऽर्जुनी ह॒ वै ना॒मेन्द्रो॒ यद॒स्य गुह्यं॒ नामा॒र्जुन्यो॑ वै ना-
मैता॒स्ता ए॒तत्परो॑ऽक्ष॒माच॑क्षते फल्गुन्य॒ इति॒ को ह्ये॒तस्या॒र्हति गुह्यं॒ नाम॒ ग्र-

कां० २, अ० १, ब्रा० २, कं० २-११ शतपथब्राह्मण / १६७
करे ॥२॥
ये (कृत्तिका) पूर्व दिशा से हटते नहीं; अन्य सब नक्षत्र पूर्व दिशा से हटते हैं। इस
प्रकार उसकी दोनों अग्नियां पूर्व की दिशा में ही स्थापित होती हैं, इसलिए कृत्तिका नक्षत्रों में
ही अग्न्याधान करे ॥३॥
परन्तु कुछ लोग युक्ति देते हैं कि कृत्तिकाओं में अग्न्याधान नहीं करना चाहिए। क्योंकि
ये कृत्तिका पहले ऋक्षों की पत्नियां थीं। सात ऋषियों को पहले ऋक्ष कहते थे। उनको मैथुन
करने नहीं दिया गया, इसलिए उत्तर में सप्त-ऋषि निकलते हैं और ये (कृत्तिकाएँ) पूर्व में।
मैथुन करने न देना यह दुर्भाग्य (अशम्) है। इसलिए कृत्तिका नक्षत्रों में अग्न्याधान न करे कि
कहीं मैथुन से वंचित न हो जाय ॥४॥
परन्तु कृत्तिका में अग्न्याधान किया जा सकता है, क्योंकि इनका जोड़ा तो अग्नि है।
अग्नि जोड़े के साथ ही इनकी वृद्धि होती है। इसलिए अग्नि का आधान (कृत्तिका में)
करे ॥५॥
रोहिणी नक्षत्र में भी अग्न्याधान करे, क्योंकि रोहिणी नक्षत्र में ही सन्तान के इच्छुक
प्रजापति ने अग्न्याधान किया था। उसने प्रजा सृजी और वह प्रजा एक-रूप और ठीक रही,
रोहिणी (लाल गाय) के समान। इसलिए रोहिणी नक्षत्र रोहिणी गौ के समान है। इसलिए
जो कोई इस रहस्य को समझकर रोहिणी नक्षत्र में अग्न्याधान करता है वह सन्तान और पशुओं
से फूलता-फलता है ॥६॥
रोहिणी नक्षत्र में ही पशु अग्नियों का आधान करते हैं कि मनुष्यों की इच्छा तक चढ़
सकें (रोहेम)। उन्होंने मनुष्यों की कामनाओं तक रोहण किया। और जो कामना पशुओं की
मनुष्यों के प्रति पूरी हुई, वही पशुओं के प्रति उसकी पूरी होगी जो इस रहस्य को समझकर
रोहिणी नक्षत्र में अग्न्याधान करता है ॥७॥
मृगशीर्ष नक्षत्र में भी अग्न्याधान हो सकता है, क्योंकि मृगशीर्ष प्रजापति का सिर
है। श्री ही शिर है। इसलिए जो मनुष्य-जाति में श्रेष्ठ होता है उसको कहते हैं कि यह जाति का
शिर है। जो इस रहस्य को समझकर मृगशीर्ष नक्षत्र में अग्न्याधान करता है वह श्री को प्राप्त
होगा ॥८॥
अब मृगशीर्ष नक्षत्र में अग्न्याधान न करने की (युक्ति कुछ लोग यह देते हैं) कि यह
प्रजापति का शरीर है। जब इसको देवों ने त्रिकाण्ड तीर से बींधा तो कहते हैं कि उसने शरीर
त्याग दिया। इसलिए यह शरीर केवल वास्तु, अयज्ञिय (यज्ञ न करने योग्य) और निर्वीर्य हो
गया। इसलिए मृगशीर्ष में अग्न्याधान न करे ॥९॥
परन्तु वह कर सकता है। यह जो प्रजापति का शरीर है, न तो वास्तु है, न ही अयज्ञिय
और न निर्वीर्य (इसलिए मृगशीर्ष में अग्न्याधान करे)। पुनर्वसु नक्षत्र में पुनराधेय कर्म करे।
ऐसा आदेश है ॥१०॥
फल्गुनी नक्षत्र में अग्न्याधान करे। ये फल्गुनी इन्द्र के नक्षत्र हैं और उसी के नाम
पर हैं। इन्द्र का नाम अर्जुन भी है। यह उसका गुह्य (गुप्त) नाम है, और इन (फल्गुनी
नक्षत्रों) का भी नाम अर्जुनी है। इसलिए वह परोक्ष रीति से इनको फल्गुनी कहता है, क्योंकि
(इन्द्र का) गुह्य नाम कौन ले सकता है ? इसके अतिरिक्त यजमान भी इन्द्र है। वह अपने ही