सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

०२-द्वितीय काण्ड-०२

ओम् । स य॒द्वाऽइ॒तश्चे॒तश्च॒ सम्भर॑ति । त॒त्सम्भा॒राणाꣳ सम्भा॒रत्वं य॑त्र-यत्रा॒ग्ने-
र्न्य॑क्तं तत॒स्ततः सम्भर॑ति तद्यश॑सेव तद्दे॒वैन॑मेतत्सम॑र्धयति प॒शुभि॑रिव तन्मि॒थुने॑-
नेव व॒त्सम्भर॑न् ॥ १॥ अथो॒ल्लिख॑ति । तद्यद्दे॒वास्ये॑ पृथि॒व्याऽअ॒भिषि॑क्तं वा॒भिष्यु॑तं
वा तद्दे॒वास्या॑ऽएतदु॒दल्ल्य॑थ य॒ज्ञिया॑यामे॒व पृ॑थि॒व्यामाध॑त्ते॒ तस्माद्वाऽउ॒ल्लिख॑ति ॥ २॥
अ॒थाद्भि॑र॒भ्युक्ष॑ति । ए॒ष वा अ॒पाꣳ सम्भा॒रो यद॒द्भिर॒भ्युक्ष॑ति तद्यद॒पः सम्भर॑त्यन्नं॒
वाऽअ॒पापो॒ऽन्नꣳ हि वाऽअ॒पास्तस्मा॒द्यदे॒मं लो॒कमाप॒ आग॑च्छन्त्यथै॒हान्नाद्यं॑ जायते
तद॒न्नाद्ये॑नै॒वैन॑मेतत्सम॑र्धयति ॥ ३॥ योषा वाऽआपः॑ । वृषा॒ग्निर्मिथु॒नेनै॒वैन॑मेतत्प्रज॑-
ननेन सम॑र्धयत्य॒द्भिर्वाऽइ॒दꣳ सर्व॒माप्तम॒द्भिरै॒वैन॑मेतदा॒प्त्वाध॑त्ते॒ तस्मा॒दपः॑ सम्भर॑ति ॥४॥
अथ॒ हिर॑ण्यꣳ सम्भर॑ति । अ॒ग्निर्ह॒ वाऽअ॒पो॒ऽभिदध्यौ॑ मिथु॒न्याभिः॑ स्या॒मिति॑ ताः
सम्ब॑भूव तासु॒ रेतः॒ प्रासि॑ञ्चत्तद्धिर॑ण्यमभवत्तस्मादेतद॒ग्निसं॑काशम॒ग्नेर्हि रेत॑स्तस्माद॒-
प्सु वि॑न्दन्त्य॒प्सु हि प्रासि॑ञ्चत्तस्मा॑द्दिनेन॒ न धाव॑यति॒ न किं च॒न क॑रोत्यथ॒ यशो॑
दैवे॒रेत॒सꣳ हि तद्यश॑सैवै॒नमे॑तत्सम॑र्धयति सरैतसमै॒व कृ॑त्स्नम॒ग्निमाध॑त्ते॒ तस्मा॒द्धि-
र॑ण्यꣳ सम्भर॑ति ॥ ५॥ अथो॒षांत्सम्भर॑ति । अ॒सौ ह॒ वै द्यौर॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽए॒तान्य॑-
श्रून्प्र॒ददौ॒ तस्मा॒त्पश॒व्यमू॑षर॒मित्या॑हुः प॒शवो॒ ह्येवै॒ते साक्षा॑देव तत्प॒शुभि॑रै॒वैन॑मे-
तत्सम॑र्धयति तेऽमुत॒ आग॑ता अ॒स्यां पृ॑थि॒व्यां प्र॑तिष्ठि॒तास्तम॒नयो॑र्द्यावापृथि॒व्यो रसं॑
म॑न्यन्ते॒ तदन॒योरे॒वैन॑मेतद्यावापृथि॒व्यो र॒सेन॒ सम॑र्धयति॒ तस्मा॑दू॒षांत्सम्भर॑ति ॥६॥
अ॒थाखु॑करी॒षꣳ सम्भर॑ति । आ॒खवो॒ ह वाऽअ॒स्यै पृ॑थि॒व्यै रसं॑ विदु॒स्तस्मा॒त्तेऽधो॑
ऽध इ॒मां पृ॑थि॒वीं च॑रन्तः॒ प्रवि॑ष्टा अ॒स्यै हि रसं॑ विदु॒स्ते यं ते॒ऽस्यै पृ॑थि॒व्यै रसं॑

कां० २, अ० १, ब्रा० १, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / १६३
द्वितीय काण्ड
अथ एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डम्
[अग्न्याधानम्, पुनराधेयम्, अग्निहोत्रम्, पिण्डपितृयज्ञः,
आग्रयणेष्टिः, दाक्षायणयज्ञः, चातुर्मास्यानि]
अग्न्याधानम्
अध्याय १—ब्राह्मण १
वह इधर-उधर से इकट्ठा करता है। यही (भिन्न-भिन्न आवश्यक) वस्तुओं का इकट्ठा
करना तैयारी है। जिस-जिस वस्तु में अग्नि रहता है उसी-उसी वस्तु में तैयारी की जाती है।
इस तैयारी में यश से, पशुओं से और मिथुन अर्थात् जोड़े से युक्त करता है ॥१॥
अब वह रेखा खींचता है। इस पृथिवी के जिस भाग पर चला या जहाँ थूका उस भाग को
निकाल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ के योग्य पृथिवी में ही अग्न्याधान किया जाता है। इसीलिए
रेखा खींची जाती है ॥२॥
अब जल छिड़कता है। यह जो जल से छिड़कना है मानो (अग्नि की) जल के साथ
तैयारी है। जल लाया इसलिए जाता है कि जल अन्न है। अन्न ही जल है। इसलिए जब जल
इस लोक में आ जाता है, तभी अन्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार वह अग्नि को अन्न आदि से
युक्त करता है ॥३॥
'आपः' जल स्त्री है। अग्नि पुरुष है। इस प्रकार वह अग्नि के लिए एक सन्तान-उत्पादक
जोड़ा देता है। और चूँकि जल इस सब लोक में व्यापक है, इसलिए अग्नि को पहले जल के द्वारा
तैयार करके ही स्थापित करता है। इसीलिए वह जल को लाता है ॥४॥
अब वह सोना (सुवर्ण) लाता है। एक बार अग्नि ने जल की ओर देखा और सोचा कि
मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने जल के साथ प्रसंग किया और जो वीर्य सींचा वह स्वर्ण हो
गया। इसीलिए वह अग्नि के समान चमकता है, क्योंकि वह अग्नि का ही बीज है। वह (सोना)
जल में पाया जाता है, क्योंकि जल में ही उसने वीर्य सींचा था। इसलिए इससे न कोई उसको
धोता है और न कोई और काम करता है! अब (आग के लिए) यश है। क्योंकि देव-वीर्य अर्थात्
यश से वह उसको समृद्ध करता है और वीर्यरूप पूर्ण अग्नि को आधान करता है। इसलिए वह
स्वर्ण को लाता है ॥५॥
अब वह नमक को लाता है। उस द्यौ ने इस पृथिवी के लिए इन पशुओं को दिया। इस-
लिए कहते हैं कि नमक की भूमि (ऊषरम् या ऊसर) पशुओं के योग्य है। ये पशु ही इसलिए
नमक हैं। इस प्रकार वह साक्षात् रूप से अग्नि को पशुओं से युक्त करता है। और पशु उस लोक
(द्यौ) से आकर इस पृथिवी में प्रतिष्ठित हुए। उस (नमक) को इन द्यौ और पृथिवी का रस
मानते हैं। इसलिए इन्हीं द्यौ और पृथिवी के रस से अग्नि को समृद्ध करता है। इसलिए नमक को
लाता है ॥६॥
अब वह आखु-करीष (चूहों द्वारा निकाली हुई मिट्टी को) लाता है। चूहे इस पृथिवी के
रस को जानते हैं, इसलिए यह इस पृथिवी को गहरा खोदते चले जाते हैं। इस पृथिवी के रस को
प्राप्त करके वे मोटे हो गये, और जहाँ पृथिवी में उनको रस प्रतीत हुआ उन्होंने उसे खोदकर