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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०१
न्यायकदली
अथायमनर्थजः ? कुतश्चिन्निमित्तात् कदाचिद्भवति, असन्नेव वा प्रतीयते, तद्वदित-
राकारोऽपि भविष्यति, असन्नेव वा प्रत्येयते, न चाकारवादे ज्ञानाकाराणां
भ्रान्ताभ्रान्तत्वविवेकः सुगम इति निरूपितप्रायम् ।
किञ्च,तदानीं बोधाकारः सदृशमर्थं कारणं कल्पयति, यदि यादृशो बोधाकारस्ता-
दृश एवाकारस्य कारणमित्यवगतम् । न चार्थस्यासंवेद्यत्वे तथा प्रतीतिः सम्भवति,
हेतुत्वसादृश्ययोर्विनिश्चयस्योभयग्रहणाधीनत्वादिति नाकारादर्शिसिद्धिः । तदेवं न हेतुत्वं
ग्राह्यलक्षणं नाप्याकारार्पणक्षमस्य हेतुत्वम्, तस्माद् ग्राह्यलक्षणाभावाद् बुद्धेरन्योऽनुभाव्यो
नास्तीति साधूक्तम् ।
इतोऽपि बुद्धिव्यतिरिक्तोऽर्थो नास्ति, यद्यसौ जडो न स्वयं प्रकाशेत ।
न च तस्य प्रकाशकान्तरमुपलभामहे, सर्वदैकस्यैवाकारस्योपलम्भात् । अथास्ति-
प्रकाशम्, न तत्स्वयमप्रकाशमानमप्रकाशस्वभावं विषयमपि प्रकाशयेत् ।
यदव्यक्तप्रकाशं तद्व्यक्तम्, यथा कुड्यादिव्यवहितं वस्तु, अव्यक्तप्रकाशश्च परस्य
इस प्रकार एक विज्ञान में आकार के खण्डित हो जाने पर वह और विज्ञानों में
भी सम्भव नहीं है । (उ.) अगर नीलादि आकार के विज्ञान अर्थ के बिना ही
उत्पन्न होते हैं तो फिर और ही किसी कारण से कभी उत्पन्न होते हैं, या नीलादि
आकारों के अस्तित्व के बिना ही प्रतीत होते हैं, तो फिर और आकार भी वैसे
ही होंगे या बिना अस्तित्व के ही प्रतीत होंगे । यह तो उपपादित-सा है कि
'आकारवाद' में ज्ञान के आकारों से किसी आकार को भ्रान्त या अभ्रान्त समझना
सहज नहीं है ।
दूसरी बात यह है कि बोध का आकार अपने सदृश ही कारण की कल्पना
करता है तो फिर इससे यह समझा जाय कि 'इस बोध का जो आकार है उसी
तरह का आकार उसका कारण है'; किन्तु यह आकार को अग्राह्य मानने पर
सम्भव नहीं है; क्योंकि कारणत्व और सादृश्य इन दोनों का ग्रहण उनके प्रतियोगी
और अनुयोगी रूप दो सम्बन्धियों के ग्रहण के बिना सम्भव नहीं है । एवं विज्ञान
का कारण उससे ग्राह्य नहीं हो सकता एवं विज्ञान में जो आकार को उत्पन्न
करेगा वह विज्ञान का कारण नहीं हो सकता । अतः हमने ठीक कहा था कि
बुद्धि के ग्राह्य स्वरूप को छोड़कर और कोई बुद्धि का ग्राह्य नहीं है ।
बुद्धि से भिन्न अर्थ की स्वतन्त्र सत्ता इसलिए भी नहीं है कि अर्थ
अगर जड़ है तो फिर स्वयं प्रकाशित नहीं हो सकता एवं उसके दूसरे प्रकाशक
की उपलब्धि होती नहीं है, बराबर एक आकार की ही प्रतीति होती है ।
अगर कोई दूसरा प्रकाशक है तो फिर वह या तो स्वयं अप्रकाश स्वभाव
का होगा ? या प्रकाशस्वभाववाला होगा ? इन दोनों में से किसी से भी
अर्थों का प्रकाश सम्भव नहीं है; क्योंकि जो स्वयं अप्रकाश स्वभाव का
होगा वह अप्रकाशस्वभाव की ही किसी दूसरी वस्तु को कैसे प्रकाशित कर

३०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
बाह्योऽर्थः । तथा यत्परस्य प्रकाशकं तत्स्वप्रकाशे सजातीयपरानपेक्षम्, यथा प्रदीपः,
प्रकाशकं च परस्य ज्ञानमिति । अतः प्रकाशमानस्यैव बोधस्य विषयप्रकाशकत्वमिति
न्यायादनपेतम् । तथा सति सहोपलम्भनियमात् सर्वज्ञासर्वज्ञयोरिव वेद्यवेदकयोरभेदः,
भेदस्य सहोपलम्भनियमो व्यापको नीलपीतयोर्युगपदुपलम्भनियमाभावात् ।
सहोपलम्भनियमविरुद्धश्च सहोपलम्भनियम इति व्यापकविरुद्धोपलब्ध्या
भेदादनियमव्याप्त्या व्यावर्तमानो नियमोऽभेदे व्यवतिष्ठत इति प्रतिबन्धसिद्धिः । न
च 'सह'शब्दस्य साहाय्यं यौगपद्यं वार्थः, तयोश्च भेदेन व्याप्तत्वाद्विरुद्ध इति
वाच्यम्, आभिमानिकस्य सहभावस्य हेतुविशेषणत्वेनोपादानाद् दृष्टान्ते द्विचन्द्रे
आभिमानिकः सहभावो न तात्त्विकः, चन्द्रस्यैकत्वात् । सार्धज्य-
सकता है ? अगर यह कहें कि विज्ञान और उसके विषय दोनों ही प्रकाशस्वभाव
के ही हैं; किन्तु इनमें विज्ञान का यह स्वभाव व्यक्त है और विषयों का अव्यक्त,
अतः प्रकाशस्वभाववाले विज्ञान में विषयों के प्रकाशस्वभाव अभिव्यक्त होकर
विषयों को प्रकाशित करते हैं, तो इस विषय में यह कहना है कि जिसका प्रकाश
अव्यक्त रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है, जैसे दीवाल से घिरी हुई वस्तु ।
पूर्वपक्षवादी के मत से वस्तुओं का प्रकाशस्वभाव अव्यक्त है, अतः उनके मत से
वे वस्तु कभी प्रकाशित हो ही नहीं सकतीं । रही विज्ञान के प्रकाशस्वभाव की
बात-इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि जो दूसरे का प्रकाशक होता है, वह अपने
प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रकाशस्वभाववाले की अपेक्षा नहीं रखता है, जैसे
कि प्रदीप । ज्ञान भी दूसरे का प्रकाशक है, अतः विज्ञान 'स्वयं प्रकाश' है ।
विज्ञान दूसरे का प्रकाशक है, यह बात न्याय से विरुद्ध भी नहीं है । चूंकि
'सहोपलम्भनियम' के कारण अर्थात् ज्ञान और अर्थ नियमतः साथ ही प्रकाशित
होते हैं इस नियम के कारण (वे दोनों एक ही हैं) जैसे कि एक ही पुरुष
(काल भेद से) सर्वज्ञ एवं असर्वज्ञ दोनों होने पर भी अभिन्न ही होता है, सुतराम्
सहोपलम्भ का अनियम भेद का व्यापक है (अर्थात् यह अव्यभिचरित नियम
है कि जिन वस्तुओं का नियमतः साथ-साथ प्रकाशन नहीं होता वे अवश्य ही
परस्पर भिन्न होती हैं) जैसे कि नील और पीत नियमतः साथ प्रकाशित नहीं
होते और वे दोनों भिन्न होते हैं । सहोपलम्भ का यह अनियम कथित-सहोपलम्भ
नियम का विरोधी है, अतः (भेद के) व्यापक (सहोपलम्भ के अनियम) के
विरुद्ध (सहोपलम्भ की) उपलब्धि (ज्ञान) और अर्थों के भेद को मिटाकर
दोनों को अभिन्न रूप में व्यवस्थित कर देती है (अतः विज्ञान से भिन्न
किसी वस्तु की वास्तविक सत्ता नहीं है), इस प्रकार सहोपलम्भनियम में
अभेद की व्याप्ति सिद्ध है । (उ.) सहोपलम्भ शब्द में प्रयुक्त 'सह' शब्द का
साहाय्य अर्थ है ? या एककालिकत्व ? ये दोनों ही विषयों के भेद के
साथ सम्बद्ध हैं । (प्र.) 'सहोपलम्भ' में आभिमानिक (संवृत, अतात्त्विक) साहित्य
को ही विशेषण मानते हैं । इसके दृष्टान्त द्विचन्द्र ज्ञान में भी संवृत साहित्य

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३०३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३०३
न्यायकन्दली
वित्तक्षणः स्वेनात्मना सह सर्वान् प्राणिनो युगपदुपलभ्यते । न च तेषां सार्वज्ञ्यज्ञानाभेद
इत्यनैकान्तिकत्वमिति चेत् ? न, अनियमात् । क्षणाभिप्रायेण तावद् ययोः सहोपलम्भस्त-
योरसौ नियत एव, क्षणयोः प्रत्येकं पुनरनुपलम्भात्; किन्तु स न विवक्षितः सन्ताना-
भिप्रायेण सहोपलम्भनियमः । न च सर्वज्ञसन्तानस्य चित्तान्तरसन्तानेन सह युगपदुप-
लम्भोऽस्ति, सर्वज्ञस्य कदाचित् स्वात्ममात्रप्रतिष्ठस्यापि सम्भवात् । न च तदानीमसर्वज्ञः,
सर्वज्ञात् सामर्थ्यसम्भवात् । अपचन्नपि पाचको यथा, तथा यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न
भिद्यते, यथात्मा ज्ञानस्य, वेद्यन्ते च नीलादयः । भेदे हि ज्ञानेनास्य वेद्यत्वं न स्यात् ,
तादात्म्यस्य नियमहेतोरभावात्, तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् । अन्येनान्यस्यासम्बद्धस्य
वेद्यत्वे चातिप्रसङ्गादिति भेदे नियमहेतोः सम्बन्धस्य व्यापकस्यानुपलब्ध्या भेदाद्विपक्षाद्
ही है, तात्त्विक नहीं; क्योंकि चन्द्र वस्तुतः एक ही है । (उ.) सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान
का क्षण तो अपने साथ सभी आत्माओं का ग्रहण करता है; किन्तु
सर्वज्ञत्वविषयक ज्ञान और आत्माओं में तो अभेद नहीं है, अतः 'सहोपलम्भ-
नियम' रूप हेतु व्यभिचरित है । (प्र.) यह व्यभिचार दोष नहीं है; क्योंकि यह
कोई नियम नहीं है कि सर्वज्ञ-चित्त-विषयक ज्ञान के साथ और सभी चित्त अवश्य
ही गृहीत हों । क्षण (प्रत्येक विज्ञान में भासित होनेवाले प्रत्येक क्षण में स्थित चित्त
या आत्मा) के अभिप्राय से जिन दोनों (सन्तानियों के समूह में स्थित प्रत्येक
व्यक्ति) के सहोपलम्भ का नियम है, उन दोनों में अभेद भी अवश्य ही है; क्योंकि
उन दोनों में से प्रत्येक की अलग से उपलब्धि नहीं होती है; किन्तु सर्वज्ञत्व ज्ञान
के समय जो और सभी आत्माओं की उपलब्धि होती है, वह सन्तान के अभिप्राय
से है, सन्तान (समूह) में स्थित प्रत्येक के अभिप्राय से नहीं; क्योंकि कभी सर्वज्ञत्व
की प्रतीति अगर आत्माओं को छोड़कर केवल स्वमात्रविषयक भी हो सकती है;
किन्तु इससे उस समय भी वह असर्वज्ञ नहीं हो जाता; क्योंकि उस समय भी उस
पुरुष से सर्वज्ञ पुरुष से होनेवाले असाधारण कार्य के सम्पादन की सम्भावना बनी
रहती है । जैसे कि पाक न करते समय भी रसोइया 'पाचक' कहलाता ही है ।
अतः जिस ज्ञान के द्वारा जो गृहीत होता है, वह उससे भिन्न नहीं है । जैसे कि
आत्मा ज्ञान से भिन्न नहीं है । नीलादि भी ज्ञात होते हैं । अतः नीलादि और
उनके ज्ञान अगर भिन्न हों तो फिर नीलादि उनसे ज्ञात ही नहीं होंगे । (घट-
विषयक ज्ञान से घट ही ज्ञात होता है इस) नियम का कारण (उक्त ज्ञान और
घटादि विषयों का) तादात्म्य तो है नहीं और उसकी उत्पत्ति भी नियामक नहीं है
(उत्पत्ति और अभेद ये दो ही व्याप्ति के ग्राहक हैं), परस्पर असम्बद्ध दो वस्तुओं
में से एक को अगर दूसरे का ज्ञापक मानें (घट ज्ञान से पट भी ज्ञात हो इत्यादि)
आपत्तियाँ होंगी, अतः ज्ञान और विषय इन दोनों में भेद का ज्ञापक और

३०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
व्यावर्तमानं वेद्यत्वमभेदेन व्याप्त इति हेतोः प्रतिबन्धसिद्धिरिति ।
एतेनाहमित्याकारस्यापि ज्ञानादभेदः समर्थितः । यच्चायं ग्राह्यग्राहकसंवित्तीनां पृथगव-
भासः स एकस्मिंश्चन्द्रमसि द्वित्वावभास इव भ्रमः । तत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहाभेद-
वासनैव निमित्तम् । यथोक्तम्-
"भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने दृश्यतेन्दाविव द्वये" इति ।
ननु बाह्याभावे येयं नीलाद्याकारवती बुद्धिरुदेति तस्याः किं कारणम् ? यथोक्तम्-
अर्थबुद्धिस्तदाकारा सा त्याकारविशेषणा ।
सा बाह्यादन्यतो वेति विचारमिममर्हति ॥
अत्रापि वदन्ति-बाह्यसद्भावेऽपि तस्याः किं कारणम् ? नीलादिरर्थ इति
चेत् ? न तावदयं दृश्यतेऽर्थस्य सदातीन्द्रियत्वात् । कार्यवैचित्र्येण
कल्पनीय-इचेत् ? दृश्यस्य समनन्तरप्रत्ययस्यैव शक्तिवैचित्र्यं कल्प्यताम्, येनस्वप्न
ज्ञानेऽप्याकारवैचित्र्यं घटते, न हि तत्र देशकालव्यवहितानामर्थानां
भेद का व्यापक दोनों के सम्बन्ध की उपलब्धि नहीं होती है । ज्ञान के द्वारा समझ
में आनेवाले घटादि ज्ञान से भिन्न नहीं हो सकते । इस प्रकार वेद्यत्व भेदरूप विपक्ष
से हट जाता है एवं अभेद के साथ व्याप्त हो जाता है । 'अहम्' इस आकार के
ज्ञान का विषय (आत्मा) और ज्ञान के अभेद का भी समर्थन हो जाता है ।
विषय, प्रमाण एवं ज्ञान इनमें जो परस्पर भिन्नत्व की प्रतीति होती है, वह एक ही
चन्द्रमा में द्वित्व के अवभास की तरह भ्रम है । इस भ्रम में भी अनादि एवं सतत
प्रवाहित होनेवाली वासना ही कारण है । जैसा कहा है कि भ्रान्तिरूप ज्ञान में ही
चन्द्रमा में द्वित्व की तरह भेद भासित होता है । अगर नीलादि बाह्य विषयों की
सत्ता ही नहीं है तो फिर नीलादि आकारों से युक्त इन विविध बुद्धियों का कारण
कौन है ? जैसा कहा है कि "अर्थविषयक बुद्धि अर्थाकार होती है", अतः बुद्धि
आकाररूप विशेषण से युक्त अवश्य है, अतः यह विचार उठता है कि यह
आकारविशिष्ट बुद्धि बाह्य वस्तु से होती है या और किसी वस्तु से ? इस
विषय में विज्ञानवादी कहते हैं कि (प्र.) बाह्य वस्तुओं की सत्ता मान लेने के पक्ष
में आकारविशिष्ट बुद्धि का कारण कौन होगा ? अगर नीलादि अर्थों को
कारण मानें तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि वे कभी देखे नहीं जाते ; क्योंकि
अर्थ सदा ही इन्द्रिय के अगोचर हैं । अगर कार्यों की विचित्रता से उसका
अनुमान करते हैं तो फिर अतीन्द्रिय अर्थ में उस शक्ति की कल्पना क्यों नहीं कर
लेते ? जिससे कि स्वप्नज्ञान में भी आकार की विचित्रता की उपपत्ति हो
सके । स्वप्नज्ञान में भासित होनेवाले एवं देश और काल से व्यवहित विषयों में

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०५
न्यायकन्दली
सामर्थ्यम्, अविद्यमानत्वात् । नन्वेवं विचित्रप्रत्ययोऽपि न स्याज्ज्ञानस्यैकत्वेन तद्व्यति-
रेकिणामप्येकत्वप्रसङ्गात्, प्रत्याकारं च ज्ञानभेदे ज्ञानानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात्,
तेभ्यो व्यतिरिक्तस्य सर्वाकारग्राहकस्याभावात् । अत्र ब्रूमः - न तावच्चित्रं रूपं न
प्रकाशते ? संवित्तिविरोधात् । जडस्य च प्रकाशायोगात् । तेनेदं ज्ञानात्मकमेव रूपम्, न
चाकारभेदेन ज्ञानभेदः, चित्ररूपस्यैकस्याकारभेदाभावात् । यथा नीलस्यैको नीलस्वभाव
आकारः, तथा वैचित्र्यस्यैकस्य चित्रस्वभाव एवाकारः । तस्मिंश्चालम्भूते ज्ञानं प्रवर्त्तमानं
कृत्स्न एव प्रवर्त्तते, यदि वा न प्रवर्त्तत एव । न तु भागेन प्रवर्त्तते, तस्य निर्भागत्वात् ।
ये त्वमी भागाः परस्परविविक्ताः प्रतिभान्ति, न ते चित्रं रूपमिति न काचिदनुपपत्तिः ।
स्थूलाकारोऽप्यनयैव दिशा समर्थनीयः । अवयवी त्वेकः स्थूलो वा नोपपद्यते ।
नानावयववृत्तित्वेन तस्य नानात्वापातात् । ज्ञानाकारस्त्वेकस्मिन् ज्ञाने वर्तमान
एकः स्थूलो भवत्येव । कम्पाकम्पादिविरोधस्तु संविद्विरोधो बौद्धसनीय इति केचित् ।
स्वन्ज्ञान की कारणता सम्भव ही नहीं है; क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व ही
नहीं है । (उ.) ज्ञान और अर्थ यदि एक हों तो फिर चित्र रूप की प्रतीति नहीं
हो सकेगी; क्योंकि चित्र रूप विषयक प्रतीति एक है, उससे अभिन्न रूप भी एक
ही होगा । आकार के भेद से यदि ज्ञानों का भेद मानें तो फिर प्रत्येक ज्ञान
आकार में नियत होगा, उनसे अतिरिक्त सभी रूपों का एक आकार का कोई एक
ग्राहक सम्भव नहीं होगा । (प्र.) यह कहना अनुभव से विरुद्ध है कि चित्र रूप
की प्रतीति ही नहीं होती है । चूँकि जड़ में प्रकाश का सम्बन्ध सम्भव नहीं है,
अतः प्रकाशित होनेवाला चित्र रूप भी ज्ञान रूप ही है । चित्र रूप एक है, उसके
विभिन्न आकार नहीं हैं । अतः यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चित्र रूप की
प्रतीति वस्तुतः अनेक रूपों की विभिन्न आकार की अनेक प्रतीतियाँ ही हैं । जैसे कि
नील का नीलस्वभाव रूप एक ही आकार है, वैसे ही वैचित्र्य का भी चित्र
स्वभाव रूप एक ही आकार है । इस स्वतन्त्र एक आकार की वस्तु में
यदि ज्ञान प्रवृत्त होगा तो सम्पूर्ण में ही प्रवृत्त होगा अथवा प्रवृत्त ही नहीं होगा;
किन्तु उसके किसी एक अंश में प्रवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि वह अंशों से शून्य
है, उसके जो परस्पर भिन्न भाग मालूम होते हैं वे चित्र रूप नहीं हैं । अतः कोई
अनुपपत्ति नहीं है । वस्तुओं के स्थूल आकारों का भी समर्थन इसी रास्ते से
करना चाहिए । किसी बौद्ध विशेष का मत है कि सभी अवयवों में रहनेवाले एक
स्थूल अवयवी का मानना ठीक नहीं जँचता; क्योंकि अनेक अवयवों से सम्बद्ध
रहने के कारण उसमें भी अनेकत्व की ही आपत्ति होगी । उसको अगर ज्ञान का
आकार मान लेते हैं तो फिर एक आकार के ज्ञान में आरूढ़ वस्तु में स्थूलत्व
और एकत्व दोनों का रहना असम्भव नहीं होता । नाना अवयवों से एक
स्थूलाकार वस्तु मानने में एक ही वस्तु में कम्प और अकम्प रूप होनेवाला विरोध
रूप दोष तो वस्तुतः ज्ञानों का ही विरोध है, जिसका परिहार कर लेना चाहिए ।

३०६ न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
अपरे तु ज्ञानाकारस्याप्यनादिवासनावशेन प्रतिभासमानस्य विचाराक्षमत्वमली-
कत्वमेव तत्त्वमाहुः । तथा च यः प्रत्ययः स बाह्यानालम्बनौ यथा स्वप्नादिप्रत्ययः,
प्रत्ययश्चायं जाग्रतः स्तम्भादिप्रत्ययः, निरालम्बनता हि प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी स्वप्नादिषु
दृष्टा, जाग्रतः प्रत्ययस्यापि प्रत्ययत्वमेव स्वभावः, स यदि निरालम्बनत्वं परित्यजति तदा
स्वभावमेव परित्यजेत् । ननु सर्वप्रत्ययानामालम्बनत्वे धर्मिहेतुदृष्टान्तादिप्रत्ययाना-
मनालम्बनत्वम्, ततश्च धर्मिहेत्वाद्यभावान्नानुमानप्रवृत्तिः । अथ ते सालम्बनास्तैरेवास्य
हेतोर्व्यभिचारः ? नैवम्, तेषां बहिरनालम्बनानां संवृत्तिमात्रेणानुमानप्रवृत्तिहेतुत्वात् । दृष्टा
ह्यविद्यातो विद्याप्राप्तिः, यथा लिप्यक्षरेभ्यो वर्णप्रतीतिः, वर्णप्रतिपादकरेखादयोऽपि
कोई (माध्यमिक) बौद्धमतावलम्बी कहते हैं कि ज्ञानाकार से वस्तुओं का
प्रतिभास भी अनादि वासना से ही होता है, अतः इसका निर्वचन भी असम्भव
है । अतः 'विचाराक्षमत्व' रूप 'शून्यत्व' ही तत्त्व है । जितने भी ज्ञान हैं, उनका
कोई बाह्य वस्तु विषय नहीं है । जैसे कि स्वप्न ज्ञान का कोई बाह्य विषय नहीं
होता । जाग्रदवस्था के पुरुषों का स्तम्भादि विषयक ज्ञान भी केवल ज्ञान होने के
नाते ही बाह्य विषयशून्य है; क्योंकि स्वप्नज्ञान को केवल ज्ञान होने के नाते ही
विषयशून्य और ज्ञान दोनों समझा जाता है । अतः जागते हुए व्यक्ति का ज्ञान भी
केवल ज्ञानत्व स्वभाव का ही है, उसका भी स्वभाव सविषयकत्व नहीं है (अर्थात्
स्वप्न ज्ञान की तरह जाग्रदवस्था का ज्ञान भी निर्विषय ही है, जिससे सभी विषयों
की सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती); अतः स्तम्भादि विषयक ज्ञान यदि निर्विषय-
कत्व को छोड़ेगा तो अपने ज्ञानत्व को भी खो बैठेगा । (प्र.) अगर सभी ज्ञान
निर्विषयक ही हों तो (आपके अभिमत का साधक) पक्ष, हेतु, दृष्टान्तादि विषयक
ज्ञान भी विषयशून्य ही होंगे, फिर पक्ष-साध्य प्रभृति के अभाव से (आपकी
अभिमत) अनुमिति की ही प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । वे पक्षादि यदि सविषयक हैं
तो फिर उन्हीं ज्ञानों में (निर्विषयकत्व का साधक ज्ञानत्व रूप) आपका हेतु
व्यभिचरित होगा । (उ.) नहीं, यह बात नहीं है; क्योंकि वे पक्षादि विषयक ज्ञान
वस्तुतः निर्विषयक होने पर भी केवल संवृति (अविद्या) के कारण ही अनुमान-
प्रवृत्ति के कारण हैं । अविद्या से भी विद्या (यथार्थज्ञान) की उत्पत्ति देखी जाती
है । जैसे कि लिपि से वर्णों की प्रतीति होती है । (प्र.) वर्ण की ज्ञापक रेखादि
रूप वे लिपियाँ भी तो स्वरूपतः सत्य ही हैं ? (उ.) यह सत्य है कि वे रेखादि
रूप से सत्य हैं; किन्तु वे अपने रेखात्व रूप से तो वर्णों के ज्ञापक नहीं हैं । उन
रेखाओं में जब ककारादि वर्णों का आरोप किया जाता है, तब उसी आरोपित
रूप से वे वर्ण की प्रतीति को उत्पन्न करती हैं । अतः स्वरूपतः सत्य होते हुए भी

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०७
न्यायकन्दली
स्वरूपेण सत्याः । सत्यं सत्याः, न तु तेन रूपेण प्रतिपादकाः । ककारादिरूपाध्यारोपेण
प्रतिपादकाः, तदेषां कार्योपयोगित्वमसत्यमेवेति पूर्वपक्षसंक्षेपः ।
यत्तावदुक्तं ग्राह्यलक्षणाद्योगादिति न तदर्थाभावसाधनसमर्थम्, ग्राह्यलक्षणो ह्यर्थो ग्राह्यो
न भवेन्न तु तस्यासद्भावः, ग्रहणाभावस्य पिशाचादिवत् स्वरूपविप्रकर्षेणाप्युपपत्तेः ।
ग्रहणयोग्ये सत्यग्रहणाद्भावसिद्धिरिति चेत् ? कथं पुनरस्य योग्यता संप्रधारिता ? न हि
तस्य ग्रहणं क्वचिदभूत, भूतं चेन्न ग्राह्यलक्षणांयोगः । किञ्च, ग्राहकाधीनं ग्रहणम्, ग्राहकं
च ज्ञानं स्वात्ममात्रनियतम्नित्येतावत्तैव तदन्यस्याग्राह्यता, ग्राह्याभावादेव चेदमग्रहणमिति
साध्याविशिष्टम् । अपि चेदं भवान् पृष्टो व्याचष्ट ! का ज्ञानाकारस्य ग्राह्यता ? न हि
तस्यास्ति ज्ञानहेतुत्वं तद्व्यतिरेकात् । नाप्याकाराधायकत्वम्, आकारद्वयाननुभवात् । न च
कार्योपयोगित्व रूप से असत्य ही हैं । इतना तक बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता
माननेवाले हम लोगों पर बाह्य अर्थ की यथार्थ सत्ता को न माननेवाले बौद्धों के
आक्षेपरूप पूर्वपक्ष का संक्षेप में वर्णन है ।
(अब इस प्रसङ्ग में हम लोगों का उत्तर सुनिये) यह जो कहा गया है कि
"ग्राह्यलक्षण' के अयोग से बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है", यह इसलिए गलत है
कि ग्राह्यलक्षण का अयोगरूप यह हेतु बाह्य वस्तु के स्वतन्त्र अस्तित्व के खण्डन
का सामर्थ्य नहीं रखता है । इससे इतना ही हो सकता है कि बाह्य वस्तुएँ ज्ञात न
हो सकेंगी; किन्तु इससे इनके अस्तित्व का लोप नहीं हो सकता; क्योंकि वस्तुओं
के ग्रहण (ज्ञान) का न होना स्वरूपविप्रकर्ष (ज्ञान होने की योग्यता के अभाव)
से भी हो सकता है । जैसे कि पिशाचादि की सत्ता रहते हुए भी उनका ग्रहण
नहीं होता । (प्र.) ग्रहण की योग्यता रहने पर भी कभी-कभी कोई विषय गृहीत
नहीं होता है, इससे समझते हैं कि उसकी सत्ता नहीं है । (उ.) आपने इसकी
योग्यता कैसे निश्चित की ? क्योंकि आपको तो उसका भी ज्ञान नहीं है । अगर
है तो फिर उसमें ग्राह्यलक्षण रूप हेतु ही नहीं है । और भी बात है, ग्रहण
ग्राहक से होता है । ज्ञान ही ग्राहक है । वह केवल अपने स्वरूप में ही नियत है
(अर्थात् उसमें किसी बाह्य वस्तु का सम्बन्ध नहीं है), केवल इसीलिए
ज्ञान से अतिरिक्त वस्तु को आप अग्राह्य कहते हैं । एवं (आप ही कहते हैं कि)
वस्तुओं का ग्रहण इसलिए नहीं होता कि वह अग्राह्य हैं । अतः यह ग्राह्य-
लक्षण का अयोगरूप हेतु साध्याविशिष्ट है (अर्थात् सिद्ध नहीं है, किन्तु हेतु को
सिद्ध होना चाहिए) । और भी मुझे पूछना है कि ज्ञानाकार में यह ग्राह्यता क्या
है ? उस आकार में ज्ञान की कारणता तो ग्राह्यता नहीं है; क्योंकि वह आकार
ज्ञान से अभिन्न है (अतः उक्त ग्राह्यता ज्ञानकारणत्व रूप नहीं है) । ज्ञान में
आकार सम्पादन की क्षमता भी ग्राह्यता नहीं हो सकती; क्योंकि विषयों के
आकार से भिन्न ज्ञानाकार नाम की किसी दूसरी वस्तु का अनुभव नहीं

३०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
ज्ञानात्मकत्वमेव ग्राह्यत्वम्, सुषुप्तावस्थायां ज्ञानात्मभूतस्य ज्ञानसन्तानवदनुवर्तमानस्यापि
ग्रहणाभावात् । अवभासमानत्वमेव तस्य ग्राह्यत्वमिति चेत् ? कोऽयमाकारस्यावभासः ?
ज्ञानप्रतिबद्धहानादिव्यवहारयोग्यतापत्तिश्चेत् ? बाह्यस्यापि सैव योग्यता । तथा हि-नीलं
पीतमेतदिति संवादिना बाह्यमेवोपाददते जहत्युपेक्षन्ते वा, नान्तरमाकारमित्यसिद्धो
ग्राह्यलक्षणायोगः, कथमम्यस्योत्पत्यान्यस्य व्यवहारयोग्यतेति चेत् ? तस्य स्वरूप-
कारणसामग्रीनियमेन तद्विषयव्यवहारानुगुणस्वभावस्योत्पादनादिति यत्किञ्चिदेतत् ।
एतेन वेद्यत्वमपि प्रत्युक्तम् । भेदेऽपि ज्ञानस्वभावकारणसामग्रीनियमादेव
तस्योपपत्तेः, सन्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् । यदपि जडस्य प्रकाशायोग
इति, तदपि प्रकाशनात्मकत्वाभिप्रायेण । सिद्धसाधनं संसर्गाभिप्रायेण
निरुपपत्तिकम् । न हि जडस्य प्रकाशसंसर्गेण न भवितव्यमित्यस्ति राजाज्ञा, यथा
होता । ज्ञान रूपत्व भी ग्राह्यत्व नहीं है; क्योंकि सुषुप्ति अवस्था में ज्ञानरूप ज्ञान
समूह की तरह बराबर रहनेवाले विषयरूप ज्ञान की भी उपलब्धि नहीं होती है ।
यदि अवभासमानत्व को ही ग्राह्यत्व कहें तो फिर यह पूछना है कि आकारों का
यह अवभासमानत्व क्या वस्तु है ? यदि वह ज्ञान के साथ नियमित रूप से
सम्बद्ध ग्रहण करने की योग्यता या त्याग करने की योग्यता ही है तो फिर बाह्य
वस्तुओं में (अर्थात् वस्तुओं को बाह्य मान लेने पर) भी उक्त दोनों प्रकार की
योग्यतायें हैं ही; क्योंकि "यह नील है, यह पीत है" इत्यादि यथार्थ ज्ञानों से युक्त
पुरुष उन ज्ञानों से बाह्य वस्तुओं को ही लेता है, छोड़ता है या उपेक्षा कर देता
है, किसी आन्तर वस्तु से नहीं । तस्मात् 'ग्राह्यलक्षण' का अयोगरूप आपका हेतु
ही सिद्ध नहीं है । (प्र.) एक (ज्ञान) की उत्पत्ति से दूसरे (उस ज्ञान के विषय
बाह्य वस्तु) में व्यवहार की योग्यता कैसे होती है ? (उ.) इसमें कोई बात नहीं
है; क्योंकि अपनी सामग्री रूप नियमित कारणों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह
उसके विषय में व्यवहार योग्यता सम्पादन की क्षमता रूप स्वभाव को लेकर ही
उत्पन्न होता है ।
इसी से ज्ञान और विषय के अभेद का साधक वेद्यत्व हेतु भी खण्डित हो
गया; क्योंकि ज्ञान और विषय को भिन्न मान लेने पर भी ज्ञान का स्वभाव और
सामग्री का नियम इन दोनों से ही (घटज्ञान से ही घट समझा जाय) इस नियम
की उपपत्ति हो जाएगी । उक्त वेद्यत्व हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति भी सन्दिग्ध
है । एवं प्रकाश का 'योग' (सम्बन्ध) असम्भव है, इस कथन से (योग शब्द के
द्वारा) यदि जड़ और प्रकाश का अभेद (सम्बन्ध) आपको अभीष्ट है, तो फिर
यह सिद्धसाधन है । यदि इससे जड़ में प्रकाश के सम्बन्ध का असम्भव कहना
अभिप्रेत है, तो फिर इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि यह युक्ति से शून्य है, एवं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३०९
न्यायकदली
छिदिक्रिया छेद्येन सम्बध्यते भिद्यते च, तथा ज्ञानक्रियापि ज्ञेयेन सह संभन्त्स्यते भेत्स्यते
च । सहोपलम्भनियमस्यापि विपक्षाद् व्यावृत्तिः सन्दिग्धा, ज्ञानस्य स्वपरसंवेद्यतामात्रेणैव
नीलतद्धियोर्युगपद्ग्रहणनियमस्योपपत्तेः । बाह्याभावाज्ज्ञानं परस्य संवेदकं न भवतीति
चेत् ? बाह्याभावसिद्धौ हेतोर्विपक्षाद् व्यावृत्तिसिद्धिः, तत्सिद्धौ चास्य विपक्षाभावं प्रति
हेतुत्वमित्यन्योन्यापेक्षित्यम् ? तदेवास्तु किमनेन ? असिद्धश्च सहोपलम्भनियमो नीलमेतदिति
बहिर्मुखतयार्थेऽनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य तदनुभवस्यानुभवात्। ज्ञानस्य स्वसंवेदनतासिद्धौ
सहोपलम्भनियमसिद्धिरिति चेत् ? स्वसंवेदनसिद्धौ किं प्रमाणम् ? यत्प्रकाशं तत्स्वप्रकाशे
परानपेक्षं यथा प्रदीप इति चेत् ? प्रदीपस्य तद्देशवर्त्तितमोपनयने व्यापारः, स चानेन
स्वयमेव कृत इति तदर्थं प्रदीपान्तरं नापेक्षते, वैयर्थ्यात् । स्वप्रतिपत्तौ तु चक्षुरादि-
कमपेक्षत एवेति साध्यविकलता दृष्टान्तस्य । अथ प्रकाशकत्वं ज्ञानत्वमभिप्रेतम् ?
तस्मात् परानपेक्षा, तदानीमसाधारणो हेतुः ।
किसी राजा की आज्ञा भी नहीं है कि जड़ और प्रकाश में सम्बन्ध न हो, जैसे कि
छेदन क्रिया छेद्य वस्तु से भिन्न होती हुई भी उसके साथ सम्बद्ध होती है, उसी
प्रकार ज्ञानरूप क्रिया भी ज्ञेय वस्तु से भिन्न होने पर भी उसके साथ सम्बद्ध
होगी । एवं कथित 'सहोपलम्भ नियम' रूप हेतु में भी विपक्ष की व्यावृत्ति सन्दिग्ध
ही है; क्योंकि ज्ञान को 'स्व' एवं 'स्व' से भिन्न (अपना विषय) दोनों का
प्रकाशक मान लेने से ही उक्त 'सहोपलम्भ' नियम की उपपत्ति हो जाएगी । (प्र.)
बाह्य वस्तु की तो सत्ता ही नहीं है, फिर ज्ञान दूसरे का ज्ञापक कैसे होगा ? (उ.)
यह कहना तो स्पष्ट ही अन्योन्याश्रय से दूषित है; क्योंकि बाह्य वस्तु की सत्ता के
उठ जाने पर सहोपलम्भ रूप हेतु में विपक्षव्यावृत्ति का निश्चय होगा और
विपक्षव्यावृत्ति के सिद्ध हो जाने पर सहोपलम्भ नियम रूप हेतु के विपक्ष (बाह्य
वस्तु) के अभाव की सिद्धि होगी । (प्र.) उक्त हेतु में विपक्ष की व्यावृत्ति के न
रहने से ही क्या ? (उ.) वस्तुतः सहोपलम्भ नियम रूप हेतु ही असिद्ध है;
क्योंकि नील और नीलविषयक ज्ञान इन दोनों का अनुभव एक समय में नहीं
होता । नील की बहिर्मुख प्रतीति हो जाने के अव्यवहित उत्तर क्षण में नील ज्ञान
की अन्तर्मुखतया उपलब्धि होती है । (प्र.) ज्ञान को स्वतः प्रकाश मान लेने से ही
सहोपलम्भ नियम की सिद्धि होगी । (उ.) ज्ञान को स्वसंवेदन (स्वतः प्रकाश)
मानने में ही क्या युक्ति है ? (प्र.) जो प्रकाश रूप होता है वह अपने प्रकाश के
लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं रखता, जैसे कि प्रदीप । (उ.) प्रत्यक्ष के उत्पादन में
प्रदीप का इतना ही उपयोग है कि वह विषयदेश के अन्धकार को हटाता है ।
प्रदीप अपने प्रत्यक्ष के लिए भी अन्धकार को हटाने का काम स्वयं कर लेता है,
अतः प्रदीप के प्रत्यक्ष में दूसरे प्रदीप की आवश्यकता नहीं होती है; किन्तु चक्षुरादि

३१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या-
न्यायकन्दली
यच्चोक्तं यस्याव्यक्तः प्रकाशस्तत्स्वयमव्यक्तं यथा पिहितं वस्त्विति, तत्र पिहितस्या-
व्यक्ता अप्रकाशः, तन्न, स्वयमव्यक्तत्वात्; किन्त्वभावादेवेति व्याप्यसिद्धिः । यच्च प्रत्य-
यत्वादिति तदप्यसारं दृष्टान्तासिद्धेः । स्वप्नादिप्रत्यया अपि समारोपितबाह्यालम्बना न
स्वात्ममात्रपर्यवसायिनः, जाग्रदवस्थोपयुक्तानामेवार्थानां संस्कारवशेन तथा प्रतिभासनात्,
अन्यथा दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु तदुत्पत्तिनियमायोगात् । किञ्च, यदि बाह्यं नास्ति किमिदानीं
नियताकारं प्रतीयते नीलमेतदिति । विज्ञानाकारोऽयमिति चेत्, न, ज्ञानाद्वहिर्भूतस्य संवेद-
नात् । ज्ञानाकारत्वे त्वहं नीलमिति प्रतीतिः स्यान्न त्विदं नीलमिति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकार-
भेदात् कस्यचिदहमिति प्रतीतिः कस्यचिदिदं नीलमिति चेत् ? नीलाद्याकारवदहमित्या-
को अपेक्षा तो रहती ही है । अतः प्रदीपरूप दृष्टान्त में स्वतः प्रकाशकत्व का
ज्ञापक परानपेक्षत्व रूप हेतु नहीं है । यदि ज्ञानत्व को ही प्रकाशकत्व रूप मानें तो
फिर 'स्वतः प्रकाशत्व' का साधक परानपेक्षत्व हेतु उस समय असाधारण नाम
का हेत्वाभास होगा ।
यह जो आपने कहा कि- "ढँकी हुई चीज की तरह जिसका प्रकाश अव्यक्त
रहता है वह स्वयं भी अव्यक्त ही रहता है ।" इस प्रसङ्ग में कहना है कि आवृत्त
वस्तु का अप्रकाश ही उसकी अव्यक्तता है, जो वस्तुतः उस वस्तु के प्रकाश का
अभाव मात्र है । उस वस्तु के प्रकाशक की अव्यक्तता उस वस्तु की अव्यक्तता
नहीं है । अतः ज्ञान के स्वतः प्रकाशत्व की साधक उक्त व्यतिरेक व्याप्ति भी
सिद्ध नहीं है । (बाह्य वस्तुओं की असत्ता के साधक या ज्ञान में विषय शून्यत्व या
निरालम्बनत्व का साधक) प्रत्यक्त्व (ज्ञानत्व) हेतु में भी कुछ बल नहीं है; क्योंकि
इस हेतु का (स्वप्नज्ञान रूप ) दृष्टान्त ही असिद्ध है । स्वप्नज्ञान भी बाह्य-
विषयक है ही । वहाँ वे केवल अपने स्वरूप में नहीं हैं । जाग्रत् अवस्था
के ज्ञान में भासित होने योग्य विषयों का ही संस्कारवश स्वप्नज्ञान में भान
होता है । अगर यह बात न हो तो स्वप्नज्ञान में नियमतः उसी विषय का
भान कैसे हो, जो वस्तु पहले से ही श्रुत या दृष्ट हो । दूसरी बात यह है कि
अगर बाह्य वस्तु नहीं है तो फिर 'यह नील है' इत्यादि प्रतीतियों में नियमित
रूप से किसका भान होता है ? (प्र.) प्रतीतियों में भासित होनेवाले आकार
विज्ञान के हैं ? (उ) ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि उक्त प्रतीतियाँ ज्ञान से
भिन्न अर्थविषयक ही होती हैं । अगर उक्त प्रतीतियों में भासित होने वाले
आकार भी विज्ञान के ही हों तो फिर उन प्रतीतियों का अभिलाप 'यह नील
है' इस प्रकार का न होकर 'मै नील हूँ' इत्यादि आकार का होगा । (प्र.)
ज्ञानों के प्रत्येक आकार भिन्न-भिन्न हैं । इनमें से किसी आकार की प्रतीति
'अहम्' के साथ होती है एवं किसी आकार की प्रतीति 'इदम्' के साथ । (उ.)
ऐसी बात नहीं है; क्योंकि नीलादि आकारों की तरह 'अहम्' आकार नियमित

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११
न्यायकन्दली
कारस्य व्यवस्थितत्वाभावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदपरेण त्वमिति प्रतीयते,
स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रतिभास इति चेत् ? किं वै परस्यापि संवेदनमस्ति ?
स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत् ? प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदो वास्तवो न कस्मात् ?
भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? यथोक्तम्-
परिच्छेदान्तरं योऽयं भागो बहिरवस्थितः ।
ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्रतिभासो ह्युपप्लवः ॥ इति ।
कुत एतत् ? अनुमानेनाभेदसाधनादिति चेत् ? प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनाबाधित-
विषयत्वादनुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्या-
पेक्षितादोषः । अस्तु वा भेदो विप्लवो नियतदेशाधिकरणप्रतीतिः , कुतः ? न हि
तत्रायमारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः । वासनानियमात् तदारोप-
नियमः स्यादिति चेत्, न, तस्या अपि तद्देशनियमकारणाभावात् । सति
ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशानुभवस्तद्देशा च तत्पूर्विका वासना, बाह्याभावे
नहीं है । जिसको एक आकार की प्रतीति 'अहम्' रूप से होती है, उसी
आकार की प्रतीति किसी दूसरे को 'त्वम्' रूप से या 'इदम्' रूप से होती है ।
(प्र.) (यह नियम है कि) स्वयं की प्रतीति अपने को 'अहम्' आकार से
होती है । (उ.) 'स्वयं' से भिन्न का भी तो संवेदन होता है । (प्र.) वह संवेदन भी
वस्तुतः 'स्वरूप का ही है; किन्तु भ्रान्तिवश उसमें भेद की प्रतीति होती है ।
(उ.) प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाला यह भेद वास्तविक ही क्यों नहीं है । (प्र.)
चूँकि प्रत्यक्ष भ्रान्त है । जैसा कहा है कि जो अंश ज्ञान से भिन्न एवं बाह्य मालूम
होता है, वह भी ज्ञान से अभिन्न ही है, उसमें ज्ञान-भेद की प्रतीति भ्रान्ति है ।
(उ.) यह क्यों ? (प्र.) चूँकि अनुमान से ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध है ।
(उ.) उक्त कथन असङ्गत है; क्योंकि यह अन्योन्याश्रय से दूषित है । कथित
अभेद का साधक अनुमान इसलिए प्रमाण है कि भेद का साधक प्रत्यक्ष भ्रान्त
है । प्रत्यक्ष इसलिये भ्रान्त है कि अभेद का साधक अनुमान प्रमाण है । अगर
यह मान भी लें कि उक्त भेद की प्रतीति भ्रान्ति है, फिर भी नियमित देशरूप
अधिकरण की प्रतीति कैसे उपपन्न होगी ? क्योंकि इसका नियामक कोई नहीं
है कि अमुक आकार के विज्ञान का आरोप अमुक आकार के विज्ञान में ही हो,
विज्ञान के दूसरे आकारों में नहीं ? (प्र.) वासना के नियम से आरोप का नियम
होगा ? (उ.) वासना में भी तद्देशविषयकत्व का कोई नियामक नहीं है । बाह्य
वस्तुएँ जब रहती हैं, तब जो अर्थ जिस देश में रहता है उस अर्थविशिष्ट उस
देश का अनुभव होता है एवं उस देशविषयक इस अनुभव से ही उस देशविषयक
'वासना' (संस्कार) की उत्पत्ति होती है । अगर बाह्य अर्थ ही न रहेंगे तो फिर
वासना में भी यह विशेष किससे उपपन्न होगा ? बिना विशेष कारण के विशेष

३१२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् । गुण संख्या-
न्यायकन्दली
तु तस्याः किंकृतो देशनियमः ? न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते,
बाह्यार्थो नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं वैचित्र्यस्यार्थवत्तत्कारणानां
वैचित्र्यादित्यानादिरिति चेत् ? वासनावैचित्र्यं यदि बोधाकारादनन्यत् कस्तासां परस्परतो
विशेषः ? अथान्यदर्थे कः प्रद्वेषः ? येन सर्वलोकप्रतीतिरपहूयते । केन चायमाकारो
बहिरारोप्यते ? ज्ञानेन चेत् ? किं तस्य स्वात्मन्याकारसंवित्तिरेव बहिरारोपस्तदन्यो वा ?
आद्ये कल्पे सैव तस्य सम्यक्प्रतीतिः, सैव च मिथ्येत्यापतितम्, ज्ञानगतत्वेनाकारग्रहणस्य
सत्यत्वात्, बाह्यतासंवितेश्चायथार्थत्वात् । अन्यत्वे तु तयोर्न क्रमेण भावः, तत्कारणस्य
ज्ञानस्य क्षणिकत्वात् । न चैकस्य युगपत्सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन च प्रतीतिसम्भवः । न च
क्रमयौगपद्याभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, यत्र वर्तमानं ज्ञानं स्वात्मन्याकारं गृह्णीयाद्बहिश्च
तमारोपयति ।
अपि च यदि ज्ञानाकारो नीलादिरर्थो यस्यैवायमाकारः स एव तं
प्रतीयात्, न पुरुषान्तरं प्रतीयात् । प्रतीयते चायं बहुभिरेकः, सर्वेषां तदाभिमुख्येन
कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । (प्र.) चूँकि बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है,
अतः वासना में ही वैचित्र्य की कल्पना करते हैं । प्रयोजन से युक्त (उस पहली
वासना में स्थित) कारणों का वैचित्र्य ही उक्त वासना के वैचित्र्य का कारण है ।
(उ.) वासनाओं के ये वैचित्र्य भी अगर केवल विज्ञान रूप ही हैं तो फिर उनमें
परस्पर भेद क्या है ? अगर ये वैचित्र्य विज्ञान से भिन्न हैं तो फिर नीलादि
वस्तुओं को ही विज्ञान से भिन्न मानने में आपको क्यों द्वेष है ? जिससे कि
सर्वजनीन प्रतीतियों का आप अपलाप करते हैं । (एवं) विज्ञान के आकारों का
यह आरोप कौन करता है ? अगर ज्ञान ही ? अगर आकार से अभिन्न विज्ञान
में ही आकार का भान होता है और वही आरोप कहलाता है, तो फिर इस पक्ष
में एक ही ज्ञान को सत्य और मिथ्या दोनों ही कहने की आपत्ति होगी; क्योंकि
ज्ञान ही आकार के ग्रहण रूप होने से सत्य है एवं उसमें बाह्यत्व का आरोप होने
से मिथ्या है । अगर आकार विज्ञान और आकाराधायक विज्ञान दोनों को भिन्न
मानें तो फिर उक्त कारणविज्ञान और कार्यविज्ञान दोनों की क्रमशः सत्ता नहीं
रहेगी; क्योंकि कारणविज्ञान क्षणिक है । (अगर दोनों विज्ञानों को एक मानें तो
फिर) एक ही विज्ञान एक ही समय सत्य और मिथ्या दोनों नहीं हो सकता । क्रम
और यौगपद्य को छोड़कर कोई तीसरा प्रकार नहीं है कि जिस रूप में विद्यमान
आकार अपने से अभिन्न आकार का भी ग्रहण करे और अपने आकार को
बाहर आरोपित भी करे ।
और भी बात है । अगर ये नीलादि वस्तुएँ विज्ञान के ही आकार हों तो फिर
जिस पुरुष के विज्ञान के ये आकार होंगे केवल उसी पुरुष से गृहीत हो सकेंगे, दूसरे
पुरुषों से नहीं; किन्तु एक ही वस्तु अनेक पुरुषों से गृहीत होती है; क्योंकि एक

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१३

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१३
न्यायकन्दली
युगपत्प्रवृत्तेः, यस्त्वया दृष्टः स मयापीति प्रतिसन्धानात् । तस्मादर्थोऽयं न ज्ञानाकारः ।
ये तु ज्ञानाकारमप्यपह्नुवाना अलीका एव नीलादयः प्रतिभासन्त इत्याहुः, तेषां
कारणनियमादुत्पत्तिनियमोऽर्थक्रियानियमश्च न प्राप्नोति, अर्थाभावेन किञ्चित् कस्यचित्
कारणम्, सर्वं वा सर्वस्य, नार्थक्रियासंवादो न वा विसंवादो विशेषाभावात् । यथोक्तं
गुरुभिः -
आशामोदकतृप्ता ये ये चोपार्जितमोदकाः ।
रसवीर्यविपाकादि तेषां तुल्यं प्रसज्यते ॥ इति ।
वासनाविशेषात् तद्विशेषसिद्धिरिति चेत् ? सा यदि बाह्यार्थक्रियाविशेषहेतुः ?
संज्ञाभेदमात्रम्, अर्थो वासनेति । अथ ज्ञानात्मिका ? अर्थाभावे तस्या विशेषो निर्निबन्धनो
बोधमात्रस्योपादानस्य सर्वत्राविशेषात्, बोधाकारस्य व्यतिरिक्तस्य
च विशेषस्याभ्युपगमेऽर्थसद्भावमभ्युपगमप्रसङ्गादित्युक्तम् । न चास्मिन् पक्षे नीलादि-
प्रत्ययस्य कादाचित्कत्वं स्यात्, तज्जननसमर्थक्षणसन्तानस्य सर्वदाऽनुवृत्तेः, अननुवृत्तौ
वा कालान्तरेऽपि तदुत्पत्त्यनुपपत्तिः, स्वव्यतिरिक्तस्यापेक्षणी-
ही वस्तु की ओर एक ही समय अनेक व्यक्ति प्रवृत्त दीख पड़ते हैं । एवं इस
प्रकार की प्रतीति भी होती है कि 'जिसको मैंने देखा था उसी को तुमने भी देखा
है', अतः नीलादि (कोई भी) बाह्य वस्तु ज्ञानरूप नहीं हैं ।
जो कोई (माध्यमिक) विज्ञान के इस आकार का भी अपलाप करते हुए
'अलीक' (शून्य) वस्तु को ही नीलादिबुद्धि का विषय मानते हैं, उनके मत से
कारण के नियम से (कपालादि कारण समूह से घट की ही उत्पत्ति हो पटादि की
नहीं) कार्य के (इस) नियम की उपपत्ति नहीं होगी । एवं अर्थ-क्रिया (प्रवृत्ति) का
नियम भी अनुपपन्न हो जाएगा; क्योंकि अर्थक्रिया की सत्ता ही नहीं है । अतः
यही कहना पड़ेगा कि किसी का कोई कारण नहीं है या सभी वस्तुएँ सभी
वस्तुओं की कारण हैं । एवं अर्थक्रिया की सफलता भी नहीं होगी, विफलता भी
नहीं होगी; क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । जैसा कि गुरुओं ने कहा है कि
(अगर शून्यता ही तत्त्व हो तो) मन के लड्डू खाने से तृप्त पुरुष के एवं यथार्थ
मोदक का उपार्जन कर उसे खानेवाले पुरुष के रस, वीर्य और विपाकादि सभी
समान ही होने चाहिए ।
(प्र.) वासना के विशेष से दोनों में जो विशेष है, उससे उन दोनों पुरुषों
के रस-वीर्यादि के अन्तर की उपपत्ति होगी । (उ.) वासना अगर प्रयोजन
विशेष के सम्पादन में समर्थ है ? तो फिर नाम का ही अन्तर रह जाता है
कि हम उसे अर्थ कहते हैं और आप वासना कहते हैं । अगर वह भी ज्ञान
स्वरूप ही है तो अर्थों के न रहने के कारण उसमें वैशिष्ट्य असम्भव है;
क्योंकि बोधरूप कारण सभी जगह समान है । पहले कहा जा चुका है कि
बोधाकार से भिन्न किसी विशेष को प्रयोजक मानना वस्तुतः बाह्य वस्तुओं

३१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परिमाणं मानव्यवहारकारणम् । तच्चतुर्विधम्-अणु, महत्,
दीर्घम्, ह्रस्वं चेति । तत्र महत् द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्य-
मान (तौल और नाप) के व्यवहार का असाधारण कारण ही 'परि-
माण' है । वह अणु, महत्, दीर्घ और ह्रस्व भेद से चार प्रकार का है ।
न्यायकन्दली
यस्याभावात् । कारणपरिपाकस्य कादाचित्कत्वात् तत्कार्यस्य कादाचित्कत्वमिति चेत् ?
कारणस्य परिपाकः कार्यः, कार्यजननं प्रत्याभिमुख्यम्, सोऽपि स्वसंवेदनमात्राधीनो न
कादाचित्को भवितुमर्हति । अस्ति चायं कादाचित्कः प्रत्यक्षप्रतिभासः, स एव प्रतीतिविषयं
देशकालकारणस्वभावानियतं बाह्यं वस्तु व्यवस्थापयंस्तदभावसाधनं बाधत इति
कालात्ययापदिष्टत्वमपि हेतूनामित्युपरम्यते । समधिगता संख्या ।
सम्प्रति परिमाणनिरूपणार्थमाह- परिमाणं मानव्यवहारकारणमिति । मानव्यवहा-
रोऽणु महत् दीर्घ ह्रस्वमित्यादिज्ञानं शब्दश्च, तस्य कारणं परिमाणमित्यनेन प्रत्यक्ष-
सिद्धस्यापि परिमाणस्य विप्रतिपन्नं प्रति कार्येण सत्तां दर्शयति । यथा तावज्ज्ञानस्य
ज्ञेयप्रसाधकत्वं तथोक्तम् ।
को ही मानना है । एवं इस पक्ष में नीलादि प्रतीतियों का कादाचित्कत्व (कभी
होना कभी न होना) की उपपत्ति भी ठीक नहीं बैठती है; क्योंकि नीलादि विज्ञान
के प्रयोजक क्षणसन्तान की सत्ता तो बराबर है ही । अगर सदा उसकी अनुवृत्ति
नहीं रहती है तो फिर आगे नीलादि की प्रतीतियाँ नहीं होंगी । (प्र.) (यद्यपि)
कार्य को अपने से भिन्न किसी की अपेक्षा नहीं है, फिर भी कारण का परिपाक
कदाचित् ही होता है, अतः कार्य भी कभी होता है कभी नहीं । (उ.) कार्य के
प्रति उन्मुख होना ही कारणों का परिपाक है, वह भी स्वसंवेदन रूप विज्ञान से
भिन्न कुछ भी नहीं है, अतः उसका भी कादाचित्कत्व उचित नहीं है; किन्तु कार्यों
का कादाचित्कत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है । यह प्रत्यक्ष ज्ञान देश, काल और स्वभाव से
नियत अपने बाह्य विषय का स्थापन करते हुए उसके अभाव के साधक को भी
बाधित करता है । इस प्रकार बाह्य अर्थ की सत्ता का लोप करनेवाले ये सभी हेतु
कालात्यापदिष्ट हैं । (इस प्रकार) संख्या को अच्छी तरह समझा ।
'परिमाणं मानव्यवहारकारणम्' इत्यादि से अब परिमाण का निरूपण करते
हैं । अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व इन सबों के ज्ञान एवं इन सबों के प्रतिपादक शब्दों
के प्रयोग ये दोनों ही प्रकृत 'मानव्यवहार' शब्द से अभिप्रेत हैं । प्रत्यक्ष के द्वारा
सिद्ध परिमाण को जो नहीं मानना चाहते, उन्हें (परिमाण के उक्त व्यवहार रूप)
कार्य-लिङ्गक अनुमान की सूचना 'तस्य परिमाणम्' इत्यादि से देते हैं । जिस प्रकार
ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का साधक है, उसे (संख्याप्रकरण में) दिखला चुके हैं ।

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ३१५
न्यायकन्दली
शब्दस्य तु कथम् ? न ह्यसावर्थात्मा, अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे मुखस्य पूरणदाह-
पाटनप्रसङ्गात् । नाप्यर्थजः, कौष्ठ्यवायुकण्ठाद्यभिघातजन्यत्वात्, अतदात्मनोऽतदुत्पन्नस्य
प्रतिपादकत्वं चातिप्रसङ्गात् । तद्युक्तम्, यदि कण्ठाद्यभिघातमात्रज एव शब्दो न
वक्तुर्विवक्षामपि प्रतिपादयेत् तदुत्पत्त्यभावात् । तथा च वक्तुर्विवक्षामपि न सूचयेयुः शब्दा
इति प्रमत्तगीतं स्यात् । पारम्पर्येण विवक्षापूर्वकत्वाच्छब्दस्य विवक्षाप्रतिपादकत्वमिति
चेत्? एवमर्थानुभवप्रतिपादकत्वमपि, विवक्षाया अर्थानुभवपूर्वकत्वात् । असत्यप्यर्थानुभवे
विप्रलम्भकस्य तदर्थविवक्षाप्रतीतिरिति चेत् ? असत्यामपि तदर्थविवक्षायां भ्रान्तस्य
तदर्थविषयं वाक्यमुपलब्धम् । यदाहुराचार्याः -
'भ्रान्तस्यान्यविवक्षायामन्यद् वाक्यं हि दृश्यते' । इति ।
नान्यविवक्षातोऽन्याभिधानसम्भवः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यद् यस्य कारणमव-
गतं तस्य तद्व्यभिचारे विश्वस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गात्, अतो भ्रान्तस्याप्रतीयमानाऽपि
(प्र.) किन्तु 'शब्द' अपने बोध्य अर्थ का साधक किस तरह से है ? शब्द
स्वयं अर्थ स्वरूप नहीं है, अगर ऐसी बात हो तो अन्न शब्द के उच्चारण से ही
पेट भर जाय, 'अग्नि' शब्द के उच्चारण से मुँह जल जाय एवं असि (तलवार)
शब्द के उच्चारण से मुँह कट जाय । अर्थ से शब्द की उत्पत्ति भी नहीं होती है;
क्योंकि कोष्ठसम्बन्धी वायु के कण्ठादि देशों के साथ अभिघात से शब्द की उत्पत्ति
होती है । शब्द से भिन्न होने पर भी एवं शब्द का कारण न होने पर भी अगर
शब्द से अर्थ का प्रतिपादन माना जाय तो अतिप्रसङ्ग होगा । (उ.) किन्तु यह ठीक
नहीं है; क्योंकि अगर शब्द की उत्पत्ति कण्ठादि के अभिघात से ही हो (विवक्षा
वक्ता के अर्थ प्रतिपादन की इच्छा से नहीं), तो फिर शब्द विवक्षा का भी ज्ञापक
नहीं होगा; क्योंकि विवक्षा से उसकी उत्पत्ति नहीं होती है । अगर विवक्षा की
सूचना भी शब्दों से नहीं होगी तो फिर शब्दों का प्रयोग केवल पागल का प्रलाप
ही होगा । (प्र.) (विवक्षा साक्षात् शब्द की उत्पादक न होने पर भी) परम्परा से
शब्द की उत्पादक है, अतः शब्द विवक्षा का ज्ञापक है । (उ.) इस प्रकार तो
शब्द अर्थानुभव का भी सूचक है ही; क्योंकि विवक्षा अर्थानुभव से ही उत्पन्न होती
है । (प्र.) अर्थ का अनुभव न रहने पर भी वञ्चक पुरुष में अर्थ की विवक्षा
देखी जाती है । (उ.) विवक्षा के न रहने पर भी भ्रान्त व्यक्ति के द्वारा उस अर्थ
के बोधक शब्द का प्रयोग भी तो देखा जाता है ।
जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि 'भ्रान्त पुरुष कहना कुछ चाहता है,
किन्तु कहता कुछ और ही है' । (प्र.) एक की विवक्षा से दूसरा पुरुष
शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से जिसमें
कारणता निश्चित है, उसके रहते हुए भी अगर कार्य की उत्पत्ति
कभी न भी हो तो फिर संसार की सभी रचनाएँ अनियमित हो जाएँगी ।

३१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
न्यायकन्दली
तदर्थविवक्षा सहसोपजाता गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानवदस्पष्टरूपा कार्येण कल्पनीयेति चेत् ?
विप्रलम्भकस्यापि विवक्षाविशेषेण तदर्थानुभवः कल्प्यताम्, असंविदितेऽर्थे तद्विषयस्य
विवक्षाविशेषस्यायोगात् । तदानीं विप्रलम्भकस्य तदर्थानुभवो नास्तीति चेत् ? मा स्म
भूत्, स्मरणं तावद्विद्यते, विप्रलम्भको हि पूर्वानुभूतमेवार्थमन्यथाभूतमन्यथा च कथयति ।
तत्रास्य तदर्थविवक्षा स्मरणकारणिका भवन्ती पारम्पर्येण तदनुभवकारणिकेति नास्ति
व्यभिचारः, मिथ्यानुभवपूर्विकाया अपि विवक्षायाः पारम्पर्येण सत्यानुभवपूर्वकत्वात् ।
अनुभवश्वार्थाव्यभिचारीति शब्दार्थसिद्धिः । अन्यथा वाक्यश्रुतौ श्रोतुरर्थप्रतीत्यभावाद्
विवक्षामात्रप्रतीतेश्चापुरुषार्थत्वाच्छब्दो व्यवहार उच्छियेत, वादिप्रतिवादिनोर्जयपराजय-
व्यवस्थानुपपत्तिः, विवक्षामात्रं प्रत्युभयोरपि भूतार्थवादित्वात् ।
यच्चोक्तं द्रव्याद्व्यतिरिक्तं परिमाणम्, द्रव्याग्रहे तद्बुद्ध्यभावादिति, तदसिद्धम् । दूराद्
द्रव्यग्रहणेऽपि तत्परिमाणविशेषास्याग्रहणात् । अत एव महानयंपुरियं भ्रान्त्या दृश्यते ।
अतः (भ्रान्त पुरुष के शब्दप्रयोगरूप) कार्य से ही यह अनुमान करते हैं कि
(शब्दप्रयोग से पहले) भ्रान्त पुरुष को भी अज्ञात अर्थविषयक अस्फुट विवक्षा
सहसा उत्पन्न होती है । जैसे कि राह चलते आदमी को तृण के स्पर्श का हठात्
अस्पष्ट प्रतिभास होता है । (उ.) तो फिर उस प्रतारक के विशेष प्रकार की
विवक्षा से उसके उस अर्थविषयक अनुभव की कल्पना कीजिए; क्योंकि अज्ञात
अर्थ की विवक्षा कभी भी नहीं उत्पन्न होती । (प्र.) उस समय ठगनेवाले पुरुष को
उस विषय का अनुभव तो नहीं है । (उ.) अनुभव न रहे, स्मरण तो रह सकता
है । पहले समझी हुई वस्तु को ही प्रतारक दूसरों से कहता है । इस प्रकार
प्रकृत में भी चूँकि अर्थविषयक विवक्षा स्मरण का कारण है, अतः परम्परा से वह
अनुभव का भी कारण होती है । सुतराम् (शब्द और विवक्षा के कार्यकारणभाव
में) व्यभिचार नहीं है । अतः मिथ्या अनुभव से उत्पन्न होनेवाली विवक्षा का
सत्यानुभव भी परम्परा से कारण है । तस्मात् विवक्षा एवं यथार्थानुभव इन दोनों
के कार्यकारणभाव में भी व्यभिचार नहीं है । अगर ऐसी बात न होती तो
वाक्य के सुनने से सुननेवाले को अर्थ की प्रतीति न होकर विवक्षा की ही
प्रतीति होती; किन्तु यह वाक्य का प्रयोग करनेवाले को अभीष्ट नहीं है, अतः
शब्द से होनेवाले व्यवहार का ही उच्छेद हो जाएगा । वादी एवं प्रतिवादी में
हार-जीत की व्यवस्था भी उठ जाएगी; क्योंकि विवक्षा के प्रसङ्ग में तो दोनों
बराबर ही कहते हैं ।
यह जो आपने कहा कि (प्र.) द्रव्य और उसके परिमाण दोनों अभिन्न हैं; क्योंकि
द्रव्यज्ञान के बिना उसके परिमाण का ज्ञान नहीं होता है, (उ.) सो ठीक नहीं है;

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३१७
न्यायकन्दली
एवं व्यवस्थिते परिमाणे तस्य भेदं कथयति-तच्चतुर्विधमिति । येन रूपेण
चातुर्विध्यं तद्दर्शयति--अणु महत् दीर्घं ह्रस्वं चेति । चतुरस्रादिकं त्ववयवानां
संस्थानविशेषो न परिमाणान्तरम् । दीर्घत्वादयोऽपि तथा भवन्तु ? न,
अवयवसंस्थानानुपलम्भेऽपि दूराद् दीर्घादिप्रत्ययस्य दर्शनात् । अपि च भोः !
द्व्यणुकपरिमाणं तावदणु, महत्परिमाणोत्पत्तौ कारणाभावात् । तस्माच्च
परमाणुपरिमाणमपकृष्टम्, कार्यपरिमाणात् कारणपरिमाणस्य हीनत्वदर्शनात् । ततश्च
परमाणोः परिमाणं द्व्यणुकपरिमाणाद्भिन्नम् । एवं घटादीनां परिमाणादन्यदेव
प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तमाकाशादिपरिमाणम्, तथा दीर्घ ह्रस्वं चेति परिमाणमष्टविधमेव,
कुतश्चातुर्विध्यमित्याह-तत्रेति । तेषु चतुर्षु परिमाणेषु मध्ये महद् द्विविधं नित्यमनित्यं
चेति । केषु नित्यमित्याह-नित्यमाकाशाकालदिगात्मसु । तच्च परममहत्त्वमित्युच्यते ।
क्योंकि दूर से द्रव्य का ज्ञान होने पर भी विशेष प्रकार के परिमाण का ज्ञान नहीं
होता है, अतः भूल से बड़ी चीज भी छोटी प्रतीत होती है ।
इस प्रकार परिमाण की सत्ता सिद्ध हो जाने पर 'तच्चतुर्विधम्' इत्यादि से
उसके भेद कहे गये हैं । जिन भेदों से परिमाण के चार भेद हैं, यह 'अणु महद्दीर्घ
ह्रस्वञ्चेति' .इस पङ्क्ति से कहा गया है । चौकोर आदि आश्रय द्रव्यों के अवयवों
के विशेष प्रकार के विन्यास ही हैं, कोई स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.) फिर
दीर्घत्वादि भी अवयवों के विशेषविन्यास ही हों, स्वतन्त्र परिमाण नहीं । (उ.)
संस्थान की अर्थात् अवयवों के विशेष विन्यास की प्रतीति दूर से नहीं होती है;
किन्तु दीर्घत्वादि की प्रतीति दूर से भी होती है । (प्र.) द्व्यणुक 'अणु' परिमाण
वाला है; क्योंकि वह महत्परिमाण का कारण नहीं है । एवं परमाणु का परिमाण
(अणु होते हुए भी) द्व्यणुक के परिमाण से न्यून है; क्योंकि कार्य के परिमाण से
कारण का परिमाण न्यून ही देखा जाता है । अतः परमाणु के परिमाण और
द्व्यणुक के परिमाण (दोनों ही अणु होते हुए भी) भिन्न प्रकार के हैं । एवं
घटादि के महत्परिमाण एवं महत्परिमाण के अन्तिम अवधि आकाशादि का
महत्परिमाण दोनों ही (महत्त्वत्वेन समान होने पर भी) भिन्न प्रकार के हैं ।
इसी प्रकार दीर्घ और ह्रस्व में भी समझना चाहिए । अतः परिमाण का
आठ भेद होना ही उचित है, चार भेद नहीं¹ । इसी प्रश्न का उत्तर 'तत्र' इत्यादि

  1. मुद्रित न्यायकन्दली पुस्तक में 'षड्विधमेव' ऐसा पाठ है, किन्तु वह असङ्गत मालूम होता
    है; क्योंकि जैसे द्व्यणुक और परमाणु के अणुत्व में अन्तर है, वैसे ही दोनों के ह्रस्वत्व में
    भी अन्तर है । एवं जैसे कि घट और आकाशादि के महत्परिमाण में अन्तर है, वैसे ही
    दोनों की दीर्घता में भी । फलतः ह्रस्वत्व एवं अणुत्व के दो-दो भेद एवं महत्त्व और दीर्घत्व
    के दो-दो भेद सब मिलाकर आठ भेद की ही आपत्ति ठीक बैठती है और यह बात

३१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
माकाशकालदिगात्मसु परममहत्त्वम् । अनित्यं त्र्यणुकादावेव । तथा
चाण्यपि द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्यं परमाणुमनस्सु तत् पारि-
इनमें महत् (परिमाण) नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का
है । नित्य महत्परिमाण आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन
चार द्रव्यों में है; क्योंकि वे परममहत्त्व रूप हैं। इसी तरह
अणु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । इन
दोनों में से नित्य अणु (परिमाण) परमाणुओं और मनों में है ।
न्यायकन्दली
अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादित्यर्थः । यथा महद् द्विविधं तथाण्वपि
द्विविधं नित्यमनित्यं च । उभयत्रापि चकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । नित्यमणुपरिमाणं
परमाणुमनःसु, उत्पत्तिविनाशकारणाभावात् । पारिमाण्डल्यमिति सर्वापकृष्टं परिमाणम् ।
अनित्यमणुपरिमाणं द्व्यणुक एव नान्यत्रेत्यर्थः । एतेनैतदुक्तं भवति, अणुपरिमाणप्रभेद एव
परमाणुपरिमाणं महत्परिमाणप्रभेदश्च परममहत्परिमाणम्, अन्यथा परमशब्देन विशेषणा-
योगात् । यत् खलु परिमाणं रूपसहायं स्वाश्रयं प्रत्यक्षयति तत्र महदिति व्यपदेशः, यच्च
से देते हैं । 'तत्र' अर्थात् उन चारों प्रकारों के परिमाणों में 'महत्' नित्य और
अनित्य भेद से दो प्रकार का है । किन द्रव्यों में वह नित्य है ? इस आकाङ्क्षा
की पूर्ति 'नित्यमाकाशकालदिगात्मसु' इस वाक्य से की गयी है । आकाशादि द्रव्यों
में रहनेवाले 'महत्त्व' को ही 'परममहत्त्व' कहते हैं । अनित्य महत्परिमाण
त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में ही है, आकाशादि द्रव्यों में नहीं । जिस प्रकार महत्त्व
नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार 'अणु' भी दो प्रकार का
हैं । दोनों वाक्यों के 'च' शब्द परिमाण की और प्रकार की सम्भावनाओं को
हटाने के लिए हैं । परमाणुओं और मनों में केवल नित्य अणुपरिमाण ही रहता है;
क्योंकि उनके परिमाणों का कोई विनाशक नहीं है । सब से छोटे परिमाण को
पारिमाण्डल्य कहते हैं । अनित्य अणुपरिमाण केवल द्व्यणुकों में ही है, और
कहीं नहीं । इससे यह अर्थ निकला कि परमाणुओं का परिमाण भी अणुपरिमाण
का ही एक भेद है । एवं आकाशादि का परममहत्परिमाण भी महत्परिमाण का ही
एक भेद है । अगर आकाशादि का परिमाण महत् न हो तो फिर उसमें
'परम' विशेषण ही व्यर्थ हो जाएगा । रूप के साहाय्य से जो परिमाण अपने
आश्रय के प्रत्यक्ष का कारण होता है, उसे महत्परिमाण कहते हैं । जिससे यह

न्यायकन्दली के 'दीर्घं ह्रस्वञ्चेति' इस वाक्य से भी स्पष्ट होती है अतः मैंने 'षड्विधमेव'
के स्थान पर 'अष्टविधमेव' ऐसा ही पाठ रखना उचित समझा ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९
प्रशस्तपादभाष्यम्
माण्डल्यम् । अनित्यं द्वयणुक एव । कुवल्यामलकबिल्वादिषु महत्त्वपि
तत्प्रकर्षभावाभावमपेक्ष्य भाक्तोऽणुत्वव्यवहारः । दीर्घत्वह्रस्वत्वे
यही अणुपरिमाण पारिमाण्डल्य कहलाता है । अनित्य (अणुपरिमाण)
केवल द्वयणुक रूप द्रव्य में ही है । कुवलय, आमला और बेल
प्रभृति के महत्परिमाणों में अणुत्व का जो व्यवहार होता है,
वह महत्परिमाणों के न्यूनाधिकभाव के कारण गौण है ।
जिन आश्रयों के महत् (परिमाण) और अणु (परिमाण) उत्पत्ति-
न्यायकन्दली
नो प्रत्यक्षयति तत्राण्विति व्यवहारः । न चैवं सति त्र्यणुकस्याप्यणुत्वप्रसक्तिः ? तस्यापि
प्रत्यक्षत्वात्, त्र्यणुकमस्मदादिप्रत्यक्षं बहुभिः समवायिकारणैरारब्धत्वात्, घटवत् । यस्य च
प्रत्यक्षस्य द्रव्यस्यावयवा न प्रत्यक्षास्तदेव त्र्यणुकम् । आकाशपरिमाणस्य तु
प्रत्यक्षहेतुत्वाभावेऽपि महत्त्वमेव, तदाश्रयस्य द्व्यणुकव्याप्तितोऽधिकव्यापित्वात्,
घटादिपरिमाणवत् ।
अनित्यमणुपरिमाणं द्वयणुक एवेत्ययुक्तम्, कुवल्यामलकबिल्वादिषु परस्परा-
पेक्षयाणुव्यवहारदर्शनादत आह-कुवल्यामलकबिल्वादिष्विति । बिल्वे यः
प्रकर्षभावो महत्परिमाणातिशययोगित्वं तस्यामलकेऽभावमपेक्ष्याणुव्यवहारो
भाक्तः । उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः सादृश्यम्, तस्यायमिति
भाक्तः, सादृश्यमात्रनिबन्धनो गौण इत्यर्थः । एवमामलकपरिमाणातिशयाभावं
काम नहीं होता है, उस परिमाण को 'अणु' कहते हैं । इसी से त्र्यसरेणु के
परिमाण में अणुत्व की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि उसका प्रत्यक्ष होता है ।
त्र्यणुक की उत्पत्ति घटादि की तरह अनेक अवयवों से होती है, अतः वह हम
लोगों के प्रत्यक्ष का भी विषय है । प्रत्यक्ष दीखने वाले जिस द्रव्य के अवयवों का
प्रत्यक्ष न हो उसे 'त्र्यणुक' कहते हैं । घटादि के परिमाणों की तरह आकाशादि के
परिमाण की व्याप्ति द्वयणुक के परिमाण की व्याप्ति से अधिक है, अतः
आकाशादि के परिमाण भी महत् ही हैं ।
(प्र.) यह कहना ठीक नहीं कि 'अनित्य अणुपरिमाण' केवल द्वयणुक
में ही हैं; क्योंकि कुवलय, आँवला और बेल इन सबों में 'आपेक्षिक अणुत्व'
का व्यवहार देखा जाता है । इसी प्रश्न का उत्तर 'कुवल्यामलकबिल्वादिषु'
इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं । बेल में जो प्रकर्षभाव अर्थात् विलक्षण महत्परिमाण का
सम्बन्ध है वह आँवले में नहीं है, इसी से आँवले में 'अणुत्व' का भाक्त
व्यवहार होता है । अभिप्राय यह है कि 'उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार केवल सादृश्य से होनेवाले व्यवहार को 'भाक्त' कहते
हैं । इसी प्रकार आँवले में जिस उत्कृष्ट महत्परिमाण का सम्बन्ध है, उस
प्रकार के महत्परिमाण का सम्बन्ध कुवलय में नहीं है । इसी से कुवलय

३२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
चोत्पाद्ये महदणुत्वैकार्थसमवेते। समिदिक्षुवंशादिष्वञ्जसा दीर्घेष्वपि
तत्प्रकर्षाभावाभावमपेक्ष्य भाक्तो ह्रस्वत्वव्यवहारः । अनित्यं चतुर्विध-
शील हैं, उन आश्रयों में ह्रस्वत्व और दीर्घत्व भी समवाय
सम्बन्ध से उत्पत्तिशील ही हैं । लकड़ी, ईख, बाँस प्रभृति दीर्घ
वस्तुओं में भी उनके उत्कर्ष और अपकर्ष से ह्रस्वत्व
का गौण व्यवहार होता है। चारों प्रकार के अनित्य परिमाण
न्यायकन्दली
कुवलयेऽपेक्ष्याणुव्यवहारः । यत्र हि मुख्यमणुत्वं द्वयणुके तत्र महत्परिमाणस्याभावो दृष्टः ।
आमलकेऽपि यादृशं बिल्वे महत्परिमाणं तादृशं नास्तीत्येतावता साधर्म्येणोपचारप्रवृत्तिः ।
दीर्घत्वह्रस्वत्वयोर्विशेषं दर्शयति-दीर्घत्वह्रस्वत्वे इति । महच्चाणुत्वं च महदणुत्वे, उत्पाद्ये
च ते महदणुत्वे चेत्युत्पाद्यमहदणुत्वे, ताभ्यामेकस्मिन्नर्थे समवेते ह्रस्वत्वदीर्घत्वे । यत्रोत्पाद्यं
महत्त्वं त्र्यणुकादौ तत्रोत्पाद्यं दीर्घत्वम्, यत्र चोत्पाद्यमणुत्वं द्वयणुके तत्रोत्पाद्यं ह्रस्वत्वमि-
त्यर्थः । तत्र परमाणोः परिमण्डलत्वाद्ध्रस्वत्वाभावो व्यापकत्वाच्चाकाशस्य दीर्घत्वाभाव
में अणुत्व का व्यवहार होता है । जहाँ अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है, जैसे
कि द्वयणुक में, वहाँ महत्परिमाण के अभाव की भी प्रतीति होती है । आँवले में
भी अणुत्व के गौण व्यवहार की प्रवृत्ति केवल इतने ही सादृश्य से होती है कि
बिल्व में जिस प्रकार का उत्कृष्ट महत्परिमाण है, वह आँवले में नहीं है ।
'दीर्घत्वह्रस्वत्वे' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दीर्घत्व एवं ह्रस्वत्व रूप दोनों परिमाणों
का अन्तर दिखलाते हैं । 'महच्चाणुत्वञ्च महदणुत्वे' कथित इस व्युत्पत्ति के द्वारा
'दीर्घत्वह्रस्वत्वे' इत्यादि वाक्य का यह अर्थ है कि जिन द्रव्यों में उत्पत्तिशील महत्त्व
एवं उत्पत्तिशील अणुत्व रहते हैं, उन्हीं में उत्पत्तिशील दीर्घत्व एवं उत्पत्तिशील
ह्रस्वत्व भी समवाय सम्बन्ध से रहते हैं । अर्थात् त्र्यणुकादि द्रव्यों में चूँकि
उत्पत्तिशील महत्त्व ही है, अतः वहाँ दीर्घत्व भी उत्पत्तिशील ही है । एवं द्वयणुक
में चूँकि उत्पत्तिशील अणुत्व है तो फिर वहाँ ह्रस्वत्व भी उत्पत्तिशील ही है । इस
प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (अणुपरिमाण के आश्रय) परमाणुरूप 'परिमण्डल'
सभी से अल्पपरिमाण के होने के कारण ह्रस्वत्व परिमाण का आश्रय नहीं है ।

  1. द्वयणुक में अणुत्व का मुख्य व्यवहार होता है, वहाँ महत्त्व नहीं है । कुवल्यादि द्रव्यों में
    एक विशेष प्रकार का उत्कृष्ट महत्त्व न रहने के कारण महत्त्व के रहते हुए भी अणुत्व
    का गौण व्यवहार होता है । गौण व्यवहार वस्तु की सत्ता का साधक नहीं है, अतः
    कुवल्यादि द्रव्यों में अणुत्व नहीं है । तस्मात् यह कहना ठीक है कि अनित्य अणुपरिमाण
    केवल द्वयणुक में ही है ।