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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

३१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
माकाशकालदिगात्मसु परममहत्त्वम् । अनित्यं त्र्यणुकादावेव । तथा
चाण्यपि द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्यं परमाणुमनस्सु तत् पारि-
इनमें महत् (परिमाण) नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का
है । नित्य महत्परिमाण आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन
चार द्रव्यों में है; क्योंकि वे परममहत्त्व रूप हैं। इसी तरह
अणु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है । इन
दोनों में से नित्य अणु (परिमाण) परमाणुओं और मनों में है ।
न्यायकन्दली
अनित्यं महत्परिमाणं त्र्यणुकादावेव नाकाशादित्यर्थः । यथा महद् द्विविधं तथाण्वपि
द्विविधं नित्यमनित्यं च । उभयत्रापि चकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । नित्यमणुपरिमाणं
परमाणुमनःसु, उत्पत्तिविनाशकारणाभावात् । पारिमाण्डल्यमिति सर्वापकृष्टं परिमाणम् ।
अनित्यमणुपरिमाणं द्व्यणुक एव नान्यत्रेत्यर्थः । एतेनैतदुक्तं भवति, अणुपरिमाणप्रभेद एव
परमाणुपरिमाणं महत्परिमाणप्रभेदश्च परममहत्परिमाणम्, अन्यथा परमशब्देन विशेषणा-
योगात् । यत् खलु परिमाणं रूपसहायं स्वाश्रयं प्रत्यक्षयति तत्र महदिति व्यपदेशः, यच्च
से देते हैं । 'तत्र' अर्थात् उन चारों प्रकारों के परिमाणों में 'महत्' नित्य और
अनित्य भेद से दो प्रकार का है । किन द्रव्यों में वह नित्य है ? इस आकाङ्क्षा
की पूर्ति 'नित्यमाकाशकालदिगात्मसु' इस वाक्य से की गयी है । आकाशादि द्रव्यों
में रहनेवाले 'महत्त्व' को ही 'परममहत्त्व' कहते हैं । अनित्य महत्परिमाण
त्र्यसरेणु प्रभृति द्रव्यों में ही है, आकाशादि द्रव्यों में नहीं । जिस प्रकार महत्त्व
नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार का है, उसी प्रकार 'अणु' भी दो प्रकार का
हैं । दोनों वाक्यों के 'च' शब्द परिमाण की और प्रकार की सम्भावनाओं को
हटाने के लिए हैं । परमाणुओं और मनों में केवल नित्य अणुपरिमाण ही रहता है;
क्योंकि उनके परिमाणों का कोई विनाशक नहीं है । सब से छोटे परिमाण को
पारिमाण्डल्य कहते हैं । अनित्य अणुपरिमाण केवल द्व्यणुकों में ही है, और
कहीं नहीं । इससे यह अर्थ निकला कि परमाणुओं का परिमाण भी अणुपरिमाण
का ही एक भेद है । एवं आकाशादि का परममहत्परिमाण भी महत्परिमाण का ही
एक भेद है । अगर आकाशादि का परिमाण महत् न हो तो फिर उसमें
'परम' विशेषण ही व्यर्थ हो जाएगा । रूप के साहाय्य से जो परिमाण अपने
आश्रय के प्रत्यक्ष का कारण होता है, उसे महत्परिमाण कहते हैं । जिससे यह

न्यायकन्दली के 'दीर्घं ह्रस्वञ्चेति' इस वाक्य से भी स्पष्ट होती है अतः मैंने 'षड्विधमेव'
के स्थान पर 'अष्टविधमेव' ऐसा ही पाठ रखना उचित समझा ।