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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३
न्यायकन्दली
थभासोऽस्तीति कुतोऽत्र सामान्यकल्पनेति चेत्? किं महीधरादिषु निखिलरूपानुगमो
नास्ति ? उत मात्रयाऽपि न विद्यते ? यदि निखिलरूपानुगमाभावात् तेषु सामान्य-
प्रत्याख्यानम् ? तर्हि गोत्वमपि प्रत्याख्येयम्, तयोः शाबलेयबाहुलेययोः सर्वथा साधर्म्या-
भावात् । अथ मात्रयाऽपि स्वरूपानुगमो नास्ति ? तदसिद्धम्, सर्वेषामपि तेषामभाव-
विलक्षणेन रूपेण तुल्यताप्रतिभासनात् । इयांस्तु विशेषः-गोपिण्डेषु झटिति तज्जातीयता-
बुद्धिः, भूयोऽवयवसामान्यनुगमात् । महीधरादिषु तु विलम्बिनी, स्तोकावयवसामान्यानु-
गमेन जातेरनुद्भूतत्वात्, यथा मणिकदर्शनाच्छरावे मृज्जातिबुद्धिः ।
एतेनार्थक्रियाकारित्वमपि सत्त्वं प्रत्युक्तम्, असतोऽर्थक्रियाया अभावात्, अर्थक्रिया-
याञ्च सत्यां तस्य सत्त्वात्, अर्थक्रियायाश्चार्थक्रियापेक्षया सत्त्वेनानवस्थाने सर्वस्यासत्त्व-
प्रसङ्गाच्च ।
(उ.) (इस आक्षेप के समाधानार्थ यह पूछना है कि) (१) क्या पर्वतादि के सभी
धर्म एक दूसरे में नहीं हैं ? (२) या पर्वतादि के कुछ धर्म एक दूसरे में नहीं
हैं ? अगर पहला पक्ष मानें तो फिर गायों में भी "ये गायें हैं" इस प्रकार का
अनुवृत्तिप्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक गाय में रहनेवाले शाबलेयत्वादि धर्म
दूसरी गायों में नहीं हैं। अगर दूसरा पक्ष मानें तो हम कहेंगे कि यह असत्य है,
क्योंकि अन्ततः भावभिन्नत्वरूप धर्म तो पर्वत और सरसो दोनों में अवश्य ही
प्रतीत होता है । इतना अन्तर अवश्य है कि एक गाय को देखने के बाद दूसरी
गाय को देखने पर सादृश्य की बुद्धि शीघ्र उत्पन्न होती है । क्योंकि दोनों गायों के
अवयवों में बहुत से सादृश्य हैं । किन्तु पर्वत और सर्षप के अवयवों में उतने
सादृश्य नहीं हैं । अतः पर्वत को देखने के बाद सर्षप में सादृश्य की बुद्धि देर से
उत्पन्न होती है । इससे इतना ही सिद्ध होता है कि पर्वत और सर्षप दोनों में
रहनेवाली जाति परिस्फुट नहीं है । जैसे हड़िया को देखने के बाद पुरवे में
मिट्टी में रहनेवाली पृथिवीत्व जाति की उपलब्धि होती है ।
कोई (बौद्ध) कहते हैं कि 'अर्थक्रियाकारित्व' ही 'सत्त्व' है । किन्तु
'परस्पराश्रयत्व' दोष से ग्रसित होने के कारण यह पक्ष भी असङ्गत ही है ।
शशविषाणादि असत् पदार्थों में सत्त्व इसलिए नहीं है कि उनमें अर्थक्रियाकारित्व
नहीं है और उनमें अर्थक्रियाकारित्व इसलिए नहीं है कि वे 'सत्' नहीं हैं । दूसरी
बात है कि घटादि पदार्थों की सत्ता जिस अर्थक्रिया के अधीन है, उस अर्थक्रिया
के सत्त्व की प्रयोजिका कोई दूसरी अर्थक्रिया नहीं है । (घटादि वस्तुओं के सत्त्व
की प्रयोजिका) अर्थक्रिया के असत् होने के कारण घटादि वस्तुओं की सत्ता ही
उठ जाएगी ।

३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
द्रव्यत्वाद्यपरम्, द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्म्मत्वञ्चापरम्, सत्तापेक्षयाल्पविषयत्वादित्यर्थः,
तथा द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरम्, तदपेक्षया घटत्वादिकमपरम्, गुणत्वाद्यपेक्षया
रूपत्वादिकमपरम्, कर्म्मत्वाद्यपेक्षया चोत्क्षेपणत्वादिकं व्याख्येयम् ।
जलमुपलभ्य वह्निमुपलभमानस्य तदित्यनुगमाभावाद् द्रव्यत्वं नास्तीति केचित् ।
तदसारम्, द्वयोरपि तयोः स्वप्राधान्येन प्रतीतिसम्भवात् । स्वप्राधान्यप्रतीतिरेव द्रव्यत्व-
प्रतीतिः । उत्क्षेपणादिष्वपि चलनात्मकताप्रतीतिरस्ति, सैव च कर्म्मप्रतीतिः । रूपादिषु तु
कृतसमयस्यानुवृत्तिप्रत्ययसम्भवाद् गुणत्वस्याप्रत्याख्यानम् । व्यक्तिग्रहणमिव समयग्रहणमपि
तस्य प्रतीतिकारणम्, ब्राह्मणत्वस्येव योनिसम्बन्धज्ञानम् । तत्रापि विशुद्धब्राह्मण-
सन्ततिज्योत्पत्तिमात्रानुबद्धमपि ब्राह्मणत्वमिन्द्रियपातमात्रेण क्षत्रियादिविलक्षणतया न
गृह्यते, अत्यन्तव्यक्तिसौसादृश्येनानुद्भूतत्वात् । यदा तु मातापित्रोस्तत्पूर्वेषाञ्च
वृद्धपरम्परया विशुद्धब्राह्मणत्वमवसितम्, तदा ब्राह्मणोऽयमिति प्रत्यक्षेणैव प्रतीयते ।
"द्रव्यत्वाद्यपरम्" द्रव्यत्वादि जातियाँ अपर हैं । अर्थात् द्रव्यत्व, गुणत्व,
कर्म्मत्व इत्यादि जातियाँ सत्ता की अपेक्षा 'अपर' हैं । इसी प्रकार यह व्याख्या भी
करनी चाहिए कि द्रव्यत्वादि जातियों की अपेक्षा पृथिवीत्वादि जातियाँ 'अपर' हैं ।
पृथिवीत्वादि की अपेक्षा घटत्वादि जातियाँ अपर हैं । एवं गुणत्वादि सामान्यों की
की अपेक्षा रूपत्वादि सामान्य अपर हैं ।
कोई कहते हैं कि जल की उपलब्धि के बाद वह्नि की उपलब्धि होने पर
"यह वही है" इस प्रकार की (प्रत्यभिज्ञात्मक) प्रतीति नहीं होती है । अतः
जलवह्न्यादि साधारण द्रव्यत्व नाम की कोई जाति नहीं है । किन्तु यह असङ्गत है,
क्योंकि स्वतन्त्ररूप से प्रतीति का विषय ही द्रव्य है । जल एवं वह्नि दोनों की ही
स्वतन्त्ररूप से प्रतीति होती है । अतः अवश्य ही दोनों में रहनेवाली एक द्रव्यत्व
जाति है । उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में चलनारूपत्व की प्रतीति होती है ।
चलनारूपत्व की प्रतीति ही वस्तुतः कर्म्मत्व की प्रतीति है । (अतः कर्म्मत्व
जाति भी अवश्य है) । रूपादि चौबीस गुणों में जिस व्यक्ति को 'गुण' पद की
शक्ति गृहीत है, उस व्यक्ति को रूपादि में भी अवश्य ही गुणत्व की प्रतीति होती
है । अतः गुणत्व जाति का भी खण्डन नहीं कर सकते । सामान्य (जाति) की
प्रतीति के लिए व्यक्ति के ज्ञान की तरह सामान्यवाचक शब्द की (व्यक्ति में)
शक्ति का ज्ञान भी कारण है । जैसे ब्राह्मणत्व जाति के ज्ञान में योनिसम्बन्ध का
ज्ञान कारण है । ब्राह्मणत्व जाति भी ब्राह्मणजातीय माता-पिता से उत्पन्न व्यक्ति
में उत्पत्ति के समय से ही सम्बद्ध रहती है, किन्तु क्षत्रियादि व्यक्तियों के अवयवों
के साथ ब्राह्मणजातीय व्यक्तियों के अवयवों का अत्यन्त सादृश्य होने के कारण

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५
न्यायकन्दली
यथा हि सुविदितरत्नपरीक्षाशास्त्रो रत्नजातिभेदं प्रत्यक्षतः प्रत्येति, नापरः । न च तावता
रत्नजातिभेदो नास्ति, न च तत्प्रत्यक्षमप्रत्यक्षम् । यच्चोक्तम्-स्त्रीणां स्वभावचपलानां
विशुद्धिर्दुरवबोधैवेति । तदसत्, अभियुक्तैः सुरक्षितानां सुकरस्तद्वयबोधः, कथितश्च
तासां बहुविधो रक्षणोपाय इत्यास्तां तावदसक्तानुप्रसङ्गः ।
तच्च द्रव्यादिकं स्वविषयस्य विजातीयेभ्यो व्यावृत्तेरपि हेतुत्वाद्बिशेषाख्यां
विशेषसंज्ञामपि लभते, न केवलमनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यसंज्ञां लभते, व्यावृत्तेरपि
हेतुत्वाद्विशेषसंज्ञामपि लभत इत्यपिशब्दयोरर्थः । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्यत्वादिषु
सामान्यशब्दो मुख्यः, अनुवृत्तिहेतुत्वस्य सामान्यलक्षणस्य सम्भवात्, विशेषशब्दश्च
भाक्तः, स्वाश्रयो विशिष्यते सर्वतो व्यवच्छिद्यते येन स विशेष इति लक्षणस्यात्राभावात् ।
इदन्तु लक्षणमन्यविशेषेष्वस्ति ।
केवल प्रथम दर्शन में ही क्षत्रियादि व्यक्तियों से विलक्षण रूप से ब्राह्मणों की
प्रतीति नहीं होती है । क्योंकि ब्राह्मणत्व जाति व्यक्ति में सम्बद्ध रहने पर भी
उद्भूत नहीं है । जब यह ज्ञान हो जाता है कि यह व्यक्ति ब्राह्मण माता-पिता से
उत्पन्न है, तब उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष के साथ ही ब्राह्मणत्व जाति का भी प्रत्यक्ष हो
जाता है । जैसे कि रत्नों की परीक्षा में निपुण व्यक्ति रत्नों की जातियों को प्रत्यक्ष
ही देखता है । एवं उस परीक्षा से अनभिज्ञ व्यक्ति रत्नों की जातियों को समझाने
पर भी नहीं समझ पाता है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि रत्नों की
भिन्न जातियाँ ही नहीं हैं या उस निपुण पुरुष का प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष ही नहीं है । (प्र.)
कोई कहते हैं कि स्त्रियाँ चञ्चल होती हैं, अतः तन्मूलक वंशविशुद्धि का ज्ञान
दुर्लभ है । (उ.) किन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि आर्यों से सुरक्षित स्त्रियों
की सन्तानों में विशुद्धि का बोध कठिन नहीं है । स्त्रियों की रक्षा के बहुत से उपाय
शास्त्रों में कहे गये हैं । अब इस प्रसङ्ग से आये विषय को यहीं छोड़ देना चाहिये ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने आश्रयों को भिन्नजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से
भी समझाती हैं, अतः वे 'विशेष' नाम से भी कही जाती हैं । अपने विभिन्न
आश्रयों में एकाकारप्रतीतिरूप अनुवृत्तिप्रत्ययजनक होने से केवल 'सामान्य' शब्द
से ही व्यवहृत नहीं होती हैं । यही दोनों (व्यावृत्तेरपि विशेषाख्यामपि) 'अपि'
शब्दों का अभिप्राय है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? यही कि द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'सामान्य' शब्द के मुख्य अर्थ हैं । क्योंकि "अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्व" रूप
सामान्य का सम्पूर्ण लक्षण उनमें है । 'विशेष' शब्द का उनमें लाक्षणिक प्रयोग
होता है, क्योंकि "जो अपने आश्रय व्यक्ति को और सभी पदार्थों से भिन्न रूप से
समझावे वही 'विशेष' है"। विशेष का यह सम्पूर्ण लक्षण उनमें नहीं है, किन्तु
वह अन्य विशेषों में (ही) है ।

३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः । ते खल्व्यत्यन्तव्यावृत्तिहेतुत्वाद्विशेषा एव ।
सभी नित्य द्रव्यों में रहनेवाले 'अन्त्य' ही 'विशेष' हैं । वे (अपने
आश्रय की और पदार्थों से भिन्नत्व बुद्धिरूप) व्यावृत्ति के ही कारण
हैं । अतः वे 'विशेष' ही हैं (अपने आश्रयों को परस्पर समानरूप से
न समझाने के कारण 'सामान्य' शब्द के गौण अर्थ भी नहीं हैं) ।
न्यायकन्दली
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषा इति । नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तन्त एव ये ते विशेषा इति ।
नित्यद्रव्येष्वेवेति द्रव्यगुणकर्म्मसामान्यानां व्यवच्छेदः । द्रव्यगुणकर्माणि द्रव्येष्वेव वर्त्तन्ते,
न नित्येष्वेवेति । सामान्यानि तु न द्रव्येष्वेव । न नित्येष्वेव वर्त्तन्त एवेति बुद्धिशब्दादीनां
व्यवच्छेदः, तेषां समस्तनित्यद्रव्यप्राप्त्यभावात् । ननु किं विशेषा एव किं वा
द्रव्यत्वादिवदुभयरूपाः ? इति । तत्राह-ते खल्विति । खलुशब्दो निश्चये, नित्यद्रव्यवृत्तयो
ये विशेषास्ते विशेषा एव निश्चिता न तु सामान्यान्यपि भवन्तीत्यर्थः । अत्यन्तं सर्वदा,
व्यावृत्तेरेव स्वाश्रयस्येतरस्माद्व्यवच्छेदस्यैव, हेतुत्वात् कारणत्वादिति । यथा चेदं
तथोपरिष्टादुपपादनीयम् ।
जो (पदार्थ) केवल सभी नित्यद्रव्यों में रहें और अवश्य ही रहें वे ही 'विशेष'
हैं । 'नित्य द्रव्यों में ही रहें' (नित्यद्रव्येष्वेव) इस अंश से द्रव्य, गुण और कर्म्म
इन तीनों में विशेष के लक्षण की अतिव्याप्ति की शङ्का मिट जाती है, क्योंकि वे
यद्यपि द्रव्यों में ही रहते हैं, तथापि नित्य द्रव्यों में ही नहीं रहते (किन्तु अनित्य
द्रव्यों में भी रहते हैं) । सामान्य पदार्थ केवल द्रव्य में ही नहीं रहता है (गुणादि में
भी रहता है, अतः सामान्य में विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है) ।
'नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तत एव' इस वाक्य से शब्द और बुद्धि इन दोनों में विशेष
लक्षण की अतिव्याप्ति वारित होती है; क्योंकि शब्दादि यद्यपि नित्य द्रव्यों में
ही रहते हैं, किन्तु सभी नित्य द्रव्यों में नहीं रहते । क्या ये 'विशेष' ही हैं ?
या द्रव्यत्वादि की तरह सामान्य और विशेष दोनों ही हैं ? इस संशय को 'ते
खलु' इत्यादि वाक्य से हटाते हैं । यहाँ 'खलु' शब्द 'निश्चय' अर्थ का
बोधक है । अभिप्राय यह है कि नित्य द्रव्यों में रहनेवाले ये 'विशेष' निश्चित रूप
से केवल 'विशेष' ही हैं, ये कभी सामान्य नहीं होते । क्योंकि ये बराबर अपने
आश्रय को और पदार्थों से भिन्न रूप में ही समझाते हैं। यह जिस प्रकार उत्पन्न
होता है, वह आगे दिखाया जाएगा ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इह प्रत्ययहेतुः स समवायः ।
आधार और आधेयरूप अयुतसिद्धों का 'इह प्रत्यय.' अर्थात् इस
आधार में यह आधेय है, इस बुद्धि का कारण जो सम्बन्ध वही
समवाय है ।
न्यायकन्दली
समवायस्वरूपं निरूपयति-अयुतसिद्धानामिति । युतसिद्धिः पृथक्सिद्धिः,
पृथगवस्थितिरुभयोरपि सम्बन्धिनोः परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वम्, सा ययोर्नास्ति
तावयुतसिद्धौ, तयोः सम्बन्धः समवायः । यथा तन्तुपटयोः ।
यद्यपि तन्तवः पटव्यतिरिक्ताश्रये समवयन्ति, तथाप्युभयोः परस्पर-
परिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वं नास्ति, पटस्य तन्तुष्वेवाश्रयित्वात् । यत्र तु द्वयोरपि
सम्बन्धिनोः परस्परपरिहारेण व्यतिरिक्ताश्रयाश्रयित्वम्, तत्र युतसिद्धिः, यथा
त्वगिन्द्रियशरीरयोः । शरीरं हि त्वगिन्द्रियपरिहारेण पृथगाश्रये स्वावयवे
समाश्रितम्, तेनानयोः संयोगो न समवायः । नित्यानान्तु युतसिद्धिः पृथग-
'अयुतसिद्धानाम्' इत्यादि पङ्क्तियों से 'समवाय' के स्वरूप का निरूपण करते
हैं । 'युतसिद्धि' शब्द से पृथक्सिद्धि अर्थात् अलग-अलग स्वतन्तरूप से रहना
अभिप्रेत है । कहने का तात्पर्य है कि जिन दो सम्बन्धियों का आश्रयत्व या
आश्रितत्व एक-दूसरे को छोड़कर किसी तीसरी वस्तु में भी रहे उन दो वस्तुओं
की स्वतन्तरूप से विद्यमानता ही "युतसिद्धि" है । इस प्रकार की युतसिद्धि जिन
दो वस्तुओं की न रहे वे दोनों वस्तु 'अयुतसिद्ध' हैं । इसी प्रकार की
(अयुतसिद्धि) दो वस्तुओं का सम्बन्ध समवाय है । जैसे सूत और कपड़े का ।
यद्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवयवों के साथ भी सम्बद्ध है । फिर
भी परस्पर एक-दूसरे को छोड़कर वे न कहीं आश्रित हैं एवं न कोई उनमें आश्रित
है 1 । जिन दो वस्तुओं में परस्पर एक-दूसरे से असम्बद्ध होकर स्वतन्त्र रीति से
किसी तीसरी वस्तु का आश्रयत्व या आश्रितत्व है, उन दो वस्तुओं की स्वतन्त्र रूप से
विद्यमानता ही 'युतसिद्धि' है, जैसे कि त्वगिन्द्रिय और शरीर की विद्यमानता । शरीर
त्वगिन्द्रिय को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से अपने अवयवों में रहता है, अतः त्वगिन्द्रिय
और शरीर का सम्बन्ध संयोग ही है, समवाय नहीं । नित्य दो पदार्थों की 'युतसिद्धि'

  1. अभिप्राय यह है कि यद्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवयवों में भी सम्बद्ध
    है, अतः तन्तु और पट में युतसिद्धि की शङ्का ठीक है । किन्तु पट चूँकि तन्तुओं में ही
    आश्रित है । अतः पट के आश्रयरूप तन्तु अंशु प्रभृति अन्य पदार्थों में सम्बद्ध भी हों
    तथापि पट को छोड़कर कहीं सम्बद्ध नहीं हो सकते । अतः पट समवाय से युत तन्तुओं
    की स्वतन्त्र सिद्धि सम्भव नहीं है ।

३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
वस्थितिः, पृथग्गमनयोग्यता, सा ययोर्नास्ति तावयुतसिद्धौ, तयोर्यः सम्बन्धः स समवायः,
यथाकाशद्रव्यत्वयोरिति । अयुतसिद्धयोः सम्बन्ध इत्युच्यमाने धर्मस्य सुखस्य च यः
कार्यकारणभावलक्षणः सम्बन्धः, सोऽपि समवायः प्रप्नोति, तयोरात्मैकाश्रितयोर्युतसिद्धय-
भावात् । तदर्थमाधार्याधारभूतानामिति पदम्, न त्वाकाशशकुनिसम्बन्धिनिवृत्त्यर्थम्,
अयुतसिद्धपदेनैव तस्य निवर्त्तितत्वात् । एवमप्याकाशस्याकाशपदस्य च वाच्यवाचकभावः
समवायः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थमिहप्रत्ययहेतुरिति । वाच्यवाचकभावे हि तस्माच्छब्दात् तदर्थो
ज्ञायते न त्विहेदमिति । आधार्याधारभूतानामिह प्रत्ययहेतुरिति कुण्डबदरसम्बन्धो न
व्यवच्छिद्यते, तदर्थमयुतसिद्धानामिति ।
अत्र केचिदयुतसिद्धिपदं विकल्पयन्ति-किं युतौ न सिद्धौ ? आहो-
स्विदयुतौ सिद्धौ ? यदि युतौ न सिद्धौ, कस्तयोः सम्बन्धः, धर्मिणोरभावात् ।
अर्थात् पृथक् सिद्धि का अर्थ है दोनों में परस्पर एक-दूसरे को छोड़कर जाने की
यह 'योग्यता' । यह जिन नित्य दो वस्तुओं में नहीं है, उनका सम्बन्ध भी
समवाय है, जैसे आकाश और द्रव्यत्व का अगर इतना ही कहें कि "अयुतसिद्ध
दो वस्तुओं का सम्बन्ध ही समवाय है" तो पुण्य और सुख इन दोनों का जो
कार्यकारणभाव सम्बन्ध है, उसमें समवाय लक्षण की अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि वे
दोनों केवल आत्मा में ही रहने के कारण युतसिद्ध नहीं हैं, अतः समवाय के
लक्षणवाक्य में "आधार्याधारभूतानाम्" यह पद देना आवश्यक है; किन्तु बाज
पक्षी और आकाश के संयोग में अतिव्याप्ति वारण के लिए "आधार्याधार-
भूतानाम्" यह पद नहीं है; क्योंकि इस अतिव्याप्ति का वारण 'अयुतसिद्ध' पद
से ही हो जाता है । इसी प्रकार आकाश पद और आकाशरूप अर्थ इन दोनों के
वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध में अतिव्याप्ति वारण के लिए प्रकृत समवाय लक्षण में
'इहप्रत्ययहेतुः' यह पद दिया गया है; क्योंकि आकाश पद से आकाशरूप अर्थ
की ही प्रतीति होती है । इससे यह प्रतीति नहीं होती कि 'आकाशरूप अर्थ में
आकाश पद है' या 'आकाशपद में आकाशरूप अर्थ है' । (प्रकृत समवाय लक्षण
में) 'आधार्याधारभूतानाम्' एवं 'इहप्रत्ययहेतुः' इन दोनों पदों का प्रयोग करने
पर भी कुण्ड और बदर के संयोग सम्बन्ध में अतिव्याप्ति नहीं हटती है, अतः
'अयुतसिद्धानाम्' यह पद है ।
यहाँ कुछ लोग अयुतसिद्ध पद के अर्थ के प्रसङ्ग में इन विरुद्ध पक्षों को
उठाते हैं कि अयुतसिद्ध पद का (१) 'युतौ न सिद्धौ' एवं 'अयुतौ सिद्धौ' इन दोनों
में कौन-सा विग्रह प्रकृत में इष्ट है ? इनमें प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं है
कि प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों अगर असिद्ध हैं तो फिर यह समवाय सम्बन्ध

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१
न्यायकन्दली
अथायुतौ सिद्धौ, तथापि कः सम्बन्धोऽपृथक्सिद्धत्वादेव । भिन्नयोर्हि सम्बन्धो यथा
कुण्डबदरयोरिति ।
तदपरे न मृषन्ति । न ह्यास्यायमर्थो युतौ न सिद्धौ न निष्पन्नाविति, असतोः समवा-
यानभ्युपगमात् । नाप्यस्यायमर्थः - अयुतौ सिद्धाविति, एकात्मकत्ये ह्येकमेव वस्तु स्यान्नो-
भयम्, परस्परात्मकत्वाभावलक्षणत्वादुभयरूपतायाः । न च तदेकं वस्तु परमार्थतः, पर-
स्परविलक्षणेन रूपेण तयोराकारयोः प्रतिभासनात् । विलक्षणाकारबुद्धिवेद्यत्वस्यैव भेद-
लक्षणत्वात्, अन्यथा भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्मान्न स्वरूपाभेदोऽप्युतसिद्धिः, किन्तु
अयुतसिद्धानामिति परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितानामित्यर्थः । तथा च सति सम्बन्धो
नानुपपन्नः, स्वरूपभेदस्य सम्भवात्, भिन्नयोश्च परस्परोपश्लेषस्य दहनायस्पिण्डयोरिव विना
सम्बन्धेनासम्भवात् । इयांस्तु विशेषः - वह्निरुत्पत्तेः पश्चादयस्पिण्डेन सह सम्बध्यते, इह
तु स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानमेव तत्र सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेत्यलम् ।
किसके साथ किसका होगा ? (क्योंकि सम्बन्ध से पहले सम्बन्धियों की सिद्धि
आवश्यक है), अगर 'जिन दोनों की पृथक् सिद्धि न हो वे अयुतसिद्ध हैं' यह
दूसरा पक्ष मानें तो भी असङ्गति है ही, क्योंकि जिन दो वस्तुओं की अलग-अलग
सिद्धि न हो, पृथक् सत्ता न रहे, उन दोनों का सम्बन्ध कैसा ? दो भिन्न वस्तुओं
का ही सम्बन्ध होता है, जैसे कुण्ड और बेर का ।
इन दोनों ही आक्षेपों को दूसरे सम्प्रद ही मानते । इन लोगों का कहना है
कि 'युतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य का अर्थ नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं
की (पृथक्) सत्ता न रहे, वे अयुतसिद्ध हैं", क्योंकि हम लोग असत् वस्तुओं का
समवाय नहीं मानते । "अयुतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य के अनुसार यह अर्थ
भी नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं की अभिन्नरूप से सिद्धि हो वे अयुतसिद्ध हैं",
क्योंकि एक स्वरूप की वस्तु एक ही होगी, दो नहीं । दो वस्तुओं के दोनों असाधारण
धम्मों का एक-दूसरे में अभाव ही 'उभयरूपत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
के अनुयोगी और प्रतियोगीरूप वे दोनों अयुतसिद्ध अभिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि
परस्पर विलक्षण रूप से दोनों की यथार्थ प्रतीति होती है । विलक्षण रूप से ज्ञात
होना ही वस्तुओं का (परस्पर) भेद है । अगर विलक्षण रूप से ज्ञात होने पर भी
वस्तुओं में भेद न मानें तो संसार से भेद और अभेद की बात ही उठ जाएगी ।
अयुतसिद्ध शब्द का अर्थ यह है कि जो अनेक वस्तुएँ परस्पर एक-दूसरे को
छोड़कर न रहें वे 'अयुतसिद्ध' हैं । (अयुतसिद्ध शब्द के) इस प्रकार के अर्थ में
सम्बन्ध की कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि इस प्रकार के अयुतसिद्धों के स्वरूप

४० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एवं धर्म्मैर्विना धर्म्मिणामुद्देशः कृतः ।
इस प्रकार धर्मों को छोड़कर केवल धर्मियों के नामों का उल्लेख
किया गया है।
न्यायकन्दली
ननु किमर्थं षडेव पदार्था उद्दिष्टा नापरे ? तेषामेव भावात्, तदन्येषामभावाच्च ।
तदभावश्च सर्व्वैः प्रमाणैरनुपलभ्यमानत्वाच्छशविषाणवत् । षण्णां सामान्यलक्षणं
विधिप्रत्ययविषयत्वम् । व्यावृत्तन्तु लक्षणम्-यथा गुणाश्रयो द्रव्यम् । सामान्यवान्गुणः
संयोगविभागयोरनपेक्षो न कारणं गुणः । एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं
कर्म । अनुवृत्तिप्रत्ययकारणं सामान्यम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतुर्विशेषः । अयुतसिद्ध-
योराश्रयाश्रयिभावः समवाय इति ।
अनुद्दिष्टेषु धर्मिषु धर्म्मा न शक्यन्ते वक्तुम्, अतो धर्म्माणामुद्देशं
प्रक्रमयितुं सङ्गतिं प्रदर्शयति-एवमिति । एवं पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन धर्मिर्विना
भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड का परस्पर सम्मिलन
बिना संयोग रूप सम्बन्ध के असम्भव है, उसी प्रकार किन्हीं भी विभिन्न दो
पदार्थों का बिना किसी सम्बन्ध के परस्पर सम्मिलन असम्भव है । अन्तर केवल
इतना ही है कि उत्पन्न होने के बाद वह्नि अयःपिण्ड के साथ सम्बद्ध होता है,
किन्तु समवाय का प्रतियोगी अपने कारणों के बल से अपने अनुयोगी में सम्बद्ध
ही उत्पन्न होता है जैसे कि काटने की क्रिया काटी जानेवाली वस्तु के साथ सम्बद्ध
ही उत्पन्न होती है । इस विषय में इतना ही विचार पर्याप्त है ।
(प्र.) छः पदार्थों का ही प्रतिपादन क्यों किया ? और पदार्थों का क्यों
नहीं ? (उ.) इसलिए कि पदार्थ उतने ही हैं, उससे अधिक नहीं, इन छः पदार्थों
से भिन्न पदार्थों का अभाव इसलिए है कि वे किसी भी स्वीकृत प्रमाण से उपलब्ध
नहीं हैं । जैसे कि खरहे की सींग । छः पदार्थों का सामान्य लक्षण यह है कि
किसी प्रतियोगी की अपेक्षा के बिना भावत्वरूप से ज्ञात होना । प्रत्येक पदार्थ का
औरों में न रहनेवाला लक्षण इस प्रकार है-(१) गुणों का आश्रय द्रव्य है ।
(२) जो सामान्य (जाति) से युक्त हो, गुणों से सर्वथा रहित हो, संयोग और
विभाग का स्वतन्त्र कारण न हो वही गुण है । (३) जो एक समय में एक ही
द्रव्य में रहे, गुणों से सर्वथा शून्य हो, एवं संयोग और विभाग का स्वतन्त्र कारण
हो. वही कर्म है । (४) अपने विभिन्न आश्रयों में एकाकारता प्रतीतिरूप
अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण 'जाति' है । (५) अपने आश्रय में औरों से भिन्नत्व
बुद्धिरूप व्यावृत्तिप्रत्यय का कारण 'विशेष' है । (६) अयुतसिद्धों के आधाराधेय-
भाव का नियामक सम्बन्ध 'समवाय' है ।
जब तक धर्मी न कहे जायँ तब तक उनके धर्म नहीं कहे जा सकते । अतः पदार्थों
के उद्देश के बाद पदार्थ के धर्म अर्थात् साधर्म्य क्यों कहे गये ? इस प्रश्न का

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१
प्रशस्तपादभाष्यम्
षण्णामपि पदार्थानामस्तित्वमभिधेयत्वञ्ज्ञेयत्वानि ।
(द्रव्यादि) छहों पदार्थों के १. अस्तित्व, २. अभिधेयत्व और
३. ज्ञेयत्व, ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
धर्म्मान् परित्यज्य धर्म्मिणामुद्देशः कृतः, धर्म्मिणां संज्ञामात्रेण सङ्कीर्तनं कृतमिदानीं धर्म्मा
उद्दिश्यन्त इति भावः । यद्यपि पूर्वं द्रव्यादीनां विभागः कृतस्तथाप्युद्देशः कृत इत्युक्तम्,
विभागस्य नामधेयसङ्कीर्तनमात्रेणोद्देशेऽन्तर्भावात् ।
यद्यपि धर्म्माः षट्पदार्थेभ्यो न व्यतिरिच्यन्ते, किन्तु त एव अन्योन्यापेक्षया धर्म्मा
धम्मिणश्च भवन्तीति । तथापि तेषां धर्मिरूपतया परिज्ञानार्थं पृथगुद्देशं करोति-
षण्णामपीति । अस्तित्वं स्वरूपवत्त्वम्, षण्णामपि साधर्म्यम्, यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं
तदेव तस्यास्तित्वम् । अभिधेयत्वमप्यभिधानप्रतिपादनयोग्यत्वम्, तच्च वस्तुनः स्वरूप-
मेव । भावस्वरूपमेवावस्थाभेदेन ज्ञेयत्वमभिधेयत्वञ्चोच्यते ।
आश्रितत्वञ्च परतन्त्रतयोपलब्धिः, न समवायलक्षणा वृत्तिः, समवाये
तदभावात् । इदञ्चाश्रितत्वं चतुर्विधेषु परमाणुषु आकाश-काल-
समाधान सङ्गति प्रदर्शन के द्वारा 'एवम्' इत्यादि पङ्क्ति से दिखलाते हैं । 'एवम्'
पहले कहे हुये सन्दर्भ से, 'धर्म्मार्थिना' धर्मों को छोड़कर 'धर्म्मिणामुद्देशः कृतः'
अर्थात् धर्म्मियों को ही केवल उनके नाम के द्वारा कहा है, अब उनके धर्मों को
उनके नाम से कहते हैं । यद्यपि पहले के ग्रन्थों से पदार्थों का विभाग भी किया
है, फिर भी 'उद्देशः कृतः' यही वाक्य कहा है, क्योंकि नामों के द्वारा पदार्थों के
कथन रूप उद्देश में ही विभाग का भी अन्तर्भाव हो जाता है ।
यद्यपि ये धर्म भी इन छः पदार्थों के ही अन्तर्गत हैं, तथापि वे ही
यथासम्भव अपने में एक-दूसरे के धर्म और धर्मी कहलाते हैं, फिर भी धर्मी
रूप से उनको समझाने के लिए 'षण्णाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अलग से उनको
कहते हैं । 'अस्तित्व' शब्द का अर्थ 'स्वरूप' है, अर्थात् वस्तुओं का अपना
असाधारण रूप ही अस्तित्व है । यह 'अस्तित्व' द्रव्यादि छहों पदार्थों में रहनेवाला
धर्म है । 'अभिधेयत्व' शब्द का अर्थ है अभिधान, अर्थात् शब्द से कहे जाने की
क्षमता, वह भी वस्तुओं का स्वरूप ही है । वस्तुओं का यह स्वरूप ही अवस्थाओं
के भेद से अभिधेयत्व, ज्ञेयत्व प्रभृति शब्दों से कहा जाता है ।
परतन्त्र रूप से ज्ञात होना ही 'आश्रितत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
से कहीं रहना (आश्रितत्व शब्द का अर्थ) नहीं है, क्योंकि समवाय कहीं पर भी समवाय
सम्बन्ध से नहीं रहता है । पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों पदार्थों के परमाणुओं

४२ न्यायकन्दलीसम्बलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
आश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः ।
द्रव्यादीनां पञ्चानां समवायित्वमनेकत्वञ्च ।
नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का आश्रितत्व साधर्म्य है ।
द्रव्य, गुण, कर्म्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों के
समवायित्व और अनेकत्व ये दो साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
दिगात्ममनःसु नास्तीत्याह- अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति ।
ये तु धर्म्मान् व्यतिरिक्तानिच्छन्ति तेषामेकस्मिन् समस्तवस्तुव्यापिन्यस्तीतिप्रत्ययहेता-
वस्तित्वे कल्पिते द्रव्यादिषु सत्तावैय्यर्थम् । अथास्तित्वं प्रतिवस्तु भिद्यते तदा
तत्कल्पनावैयर्थ्यम्, सत्तायाः स्वरूपसत्तायाश्च सदिति प्रत्ययोपपत्तेः । येषान्तु भावस्व-
रूपमेवास्तित्वं न तेषां व्यर्था सत्ता, स्वरूपस्यानुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाभावात् । नाप्यस्तित्व-
मनर्थकं निःस्वरूपे सत्तायाः समवायाभावादित्युभयमुपपद्यते ।
द्रव्यादीनां विशेषान्तानां साधर्म्यं साधयति । समवायित्वं
समवायलक्षणा वृत्तिः । अनेकत्वं परस्परविभक्तत्वमितरेतरव्यावृत्तं स्वरूपमेव ।
में तथा आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन इन नौ नित्य द्रव्यों में (इतने ही
द्रव्य नित्य हैं) यह 'आश्रितत्व' नहीं है, अतः "अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः" यह वाक्य
कहा गया है ।
जो समुदाय व्यक्तिभेद से धर्म्मों को भिन्न ही मानना चाहते हैं (वे भी अनेक
वस्तुओं में रहनेवाले और धर्म्मों को न भी मानें, किन्तु) सभी वस्तुओं में एक
प्रकार की 'अस्ति' प्रतीति को उत्पन्न करनेवाला 'अस्तित्व' नाम का धर्म्म उन्हें भी
मानना ही पड़ेगा, किन्तु ऐसा मानने पर द्रव्यादि तीन पदार्थों में ही सत्त्व प्रतीति
के लिए 'सत्ता' जाति की कल्पना व्यर्थ हो जाएगी । अगर अस्तित्व धर्म्म को
प्रतिव्यक्ति भिन्न मानें तो फिर इस प्रकार के अस्तित्व की कल्पना ही व्यर्थ हो
जाती है, क्योंकि 'सत्ता' जाति एवं तत्तद्व्यक्तिगत तद्व्यक्तित्व (रूप स्वरूपसत्ता) से
ही 'सत्प्रतीति' उपपन्न हो जाएगी । जो कोई 'अस्तित्व' को वस्तुओं का स्वरूप ही
मानते हैं, उनके मत में भी 'सत्ता' जाति की कल्पना व्यर्थ नहीं है, क्योंकि (बिना
सत्ता जाति माने) भिन्न रूप से प्रतीत होनेवाले द्रव्यादि तीन पदार्थों में एक
आकार की सत्त्व की प्रतीति नहीं हो सकेगी । अस्तित्व की कल्पना भी व्यर्थ नहीं
है, क्योंकि अपने-अपने व्यक्तिगत स्वरूप (अस्तित्व) से शून्य वस्तुओं में सत्ता
जाति का समवाय भी सम्भव नहीं है, अतः सत्ता जाति और सभी प्रकार की
वस्तुओं में 'अस्ति' प्रतीति का कारण अस्तित्व, इन दोनों को ही मानना
आवश्यक है ।
द्रव्य से लेकर विशेष तक पाँच पदार्थों के साधर्म्य का उपपादन करते हैं । 'समवा-
यित्व' शब्द का अर्थ है समवायरूप सम्बन्ध, (अर्थात्) समवाय सम्बन्ध से कहीं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुणादीनां पञ्चानामपि निर्गुणत्वनिष्क्रियत्वे ।
द्रव्यादीनां त्रयाणामपि सत्तासम्बन्धः, सामान्यविशेष-
गुण से लेकर समवाय तक अर्थात् गुण, कर्म्म, सामान्य, विशेष
और समवाय इन पाँच पदार्थों के निर्गुणत्व और निष्क्रियत्व साधर्म्य हैं ।
द्रव्यादि तीन वस्तुओं के अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीन पदार्थों
के ये पाँच साधर्म्य हैं- १. सत्ता का सम्बन्ध, २. सामान्यवत्त्व, ३. विशेषवत्त्व
(अर्थात् पर और अपर दोनों जातियोंका सम्बन्ध), ४. इस शास्त्र के सङ्केत-
न्यायकन्दली
द्रव्यादीनामित्युक्ते समवायोऽपि गृह्येत, तदर्थं पञ्चानामित्युक्तम् । पञ्चानामित्युक्ते च
केषामिति न ज्ञायते तदर्थं द्रव्यादीनामिति ।
गुणादीनां समवायान्तानां साधर्म्यमाह-गुणादीनामिति । निर्गुणत्वं गुणाभाव-
विशिष्टत्वम्, निष्क्रियत्वं क्रियाभावविशिष्टत्वम्, यथा भावोऽभावस्य विशेषणं स्वविशिष्ट-
प्रत्ययजननादेवमभावोऽपि । तथा चोपनिबद्द्मघटं भूतलमिवि । भावाभावयोरसम्बन्धात्
कथमभावो विशेषणमिति चेदस्ति तावदयं विशिष्टप्रत्ययः, तद्दर्शनात् सम्बन्धमपि कल्प-
यिष्यामः । यदि सम्बद्धमेव विशेषणं मन्यसे ।
रहना । 'अनेकत्व' शब्द का अर्थ है विभिन्नत्व । वह परस्पर एक-दूसरे में न
रहनेवाला उन वस्तुओं का स्वरूप ही है । 'द्रव्यादीनाम्' केवल इतना कह देने से
समवाय का भी ग्रहण हो जाता, अतः 'पञ्चानाम्' यह पद है । केवल
'पञ्चानाम्' इतना ही कहने से 'कौन पाँच' यह समझ में नहीं आता, अतः
'द्रव्यादीनाम्' यह पद है ।
'गुणादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से गुण से लेकर समवाय तक के पाँच पदार्थों
का साधर्म्य कहते हैं । 'निर्गुणत्व' शब्द का अर्थ है गुणों का अभाव और
'निष्क्रियत्व' शब्द का अर्थ है क्रियाओं का अभाव । जिस प्रकार 'भाव' अपने से
युक्त अभाव प्रतीति का जनक होने से अभाव का विशेषण होता है, उसी प्रकार
एवं उसी हेतु से अभाव भी भाव का विशेषण हो सकता है । एवं उसी के
अनुकूल 'अघटं भूतलंम्' इत्यादि विशिष्टप्रतीति के जनक प्रयोग भी होते हैं। (प्र.)
भाव और अभाव दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः उन दोनों में परस्पर सम्बन्ध
असम्भव है, एवं दोनों में परस्पर सम्बन्ध न रहने से विशेष्यविशेषणभाव सुतराम्
असम्भव है । (उ.) उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि भावविशिष्ट अभाव की,
एवं अभावविशिष्ट भाव की दोनों ही प्रतीतियाँ अवश्य हैं । अगर परस्पर सम्बद्ध
दो वस्तुओं में से ही एक को विशेष्य और दूसरे को विशेषण मानना हो तो फिर
उक्त विशिष्ट प्रतीतियों के बल से भाव और अभाव इन दोनों में भी किसी
अनुकूल सम्बन्ध की कल्पना करनी ही पड़ेगी ।

४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वत्त्वम्, स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वम्, धर्म्माधर्म्मकर्त्तृत्वञ्च ।
रूप अभिधावृत्ति के द्वारा 'अर्थ' शब्द के द्वारा समझा जाना,
५. धर्म्माधर्म्मकर्त्तृत्व ।
न्यायकन्दली
द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः सत्तया सामान्येन सबन्धः समवायरूपो द्रव्यगुण-
कर्म्मणां साधर्म्यम् । यथा चैतेषु सत्तासम्बन्धस्तथोपपादितम् । इदन्त्विह निरूप्यते-किं
सत्तासम्बन्धः सतोऽसतो वा ? सतश्चेत् प्राक् सत्तासम्बन्धात् सद्भावात्सैवार्था इति व्यर्था
सत्ता ? अथासतः सम्बन्धः ? खरविषाणादिष्वपि सत्ता स्यात् । नित्येषु तावत्पूर्वापर-
भावानभ्युपगमः । अनित्येषु प्रागसत एव सत्ता, कारणसामर्थ्यात् । न च
खरविषाणादिष्व- तिप्रसङ्गः , तदुत्पत्तौ कस्यचित् सामर्थ्याभावात् ।
अन्यदपि साधर्म्यं द्रव्यादीनां त्रयाणां कथयति – सामान्यविशेषवत्त्वञ्चेति ।
अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषा द्रव्यत्वादयस्तैः सह सम्बन्धो द्रव्यादीनाम्, स च
समवाय एव ।
"द्रव्यादीनां त्रयाणां सत्तासम्बन्धः" अर्थात् सत्ता नाम की जाति के साथ
समवाय नाम का सम्बन्ध द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों का साधर्म्य है । इन
तीनों में सत्ता जाति का सम्बन्ध किस प्रकार है ? यह कह चुके हैं । (प्र.) अब
यहाँ विचार करना है कि सत्ता जाति 'सत्' अर्थात् पहले से विद्यमान वस्तुओं के
साथ सम्बद्ध होती है ? या असद्वस्तुओं के साथ ? अगर सत्ता सद्वस्तुओं के साथ
सम्बद्ध होती है तो फिर सत्ता जाति की कल्पना ही व्यर्थ हो जाती है, क्योंकि
सत्ता सम्बन्ध के बिना भी वे सत् हैं ही । अगर असत् वस्तुओं के साथ सत्ता
सम्बद्ध होती है तो फिर गदहे के सींग प्रभृति पदार्थों की भी सत्ता माननी पड़ेगी ।
(उ.) नित्य वस्तुओं में तो पहले-पीछे की कोई बात ही नहीं उठती है । अनित्य
वस्तुओं के प्रसङ्ग में यह कहना है कि पहले से अविद्यमान वस्तुओं के साथ ही
कारणों के (विशिष्ट) बल से सत्ता सम्बद्ध होती है । गदहे के सींग प्रभृति अलीक
पदार्थों की आपत्ति का भी प्रसङ्ग नहीं आता है, क्योंकि किसी भी वस्तु में उनके
उत्पादन का बल ही नहीं है ।
'सामान्यविशेषवत्त्वञ्च' इत्यादि से द्रव्यादि तीन पदार्थों के और भी साधर्म्य
कहते हैं । द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने विभिन्न आश्रयों में 'द्रव्यम्' इस एक आकार
की (अनुवृत्ति) बुद्धि का कारण होने से 'सामान्य' हैं एवं अपने आश्रयों को
औरों से भिन्न रूप में समझाने के कारण 'विशेष' भी हैं । सामान्य एवं विशेष
इन दोनों शब्दों से समझी जानेवाली द्रव्यत्वादि जातियों के साथ द्रव्यत्वादि तीनों
वस्तुओं का सम्बन्ध है । वह सम्बन्ध समवाय ही है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५
न्यायकन्दली
स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्चेति । वैशेषिकैः स्वयं व्यवहाराय यः सङ्केतः
कृतोऽस्मिन् शास्त्रे 'अर्थशब्दाद् द्रव्यगुणकर्म्माणि प्रतिपत्तव्यानि' इति, तेन द्रव्यादीनि
त्रीणि निरुपपदेनार्थशब्देनोच्यन्ते ।
धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्चेति । धर्म्माधर्म्मयोर्निमित्तत्वं त्रयाणाम्, यथा हि भूमिरैकैव
दीयमानापह्रियमाणा च धर्म्माधर्म्मयोः कारणम् । एकः संयोगो द्वयोः कारणम्, यथा
कपिलास्पर्शो नरस्थिस्पर्शश्च । एवं कर्म्माप्युभयकारणम्, यथा तीर्थगमनं शौण्डिकगृह-
गमनञ्च, एवमन्यदप्यूह्यम् । धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वमिति त्वप्रत्ययेन धर्म्माधर्म्मजननं प्रति तेषां
निजा शक्तिरुच्यते । ननु जातिरपि तयोः कारणम् ? न, तस्याः स्वाश्रयव्यवच्छेदमात्रेण
चरितार्थत्वात् ।
'स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्वञ्च' अर्थात् वैशेषिक शास्त्र के आचार्यों ने सङ्केत
किया है कि 'अर्थ' शब्द से द्रव्यादि तीन समझे जायें । इस सङ्केत के बल से
विशेषण से शून्य केवल 'अर्थ' शब्द से द्रव्यादि तीन ही समझे जाते हैं । (इस
प्रकार वैशेषिक शास्त्र के सङ्केत सम्बन्ध से 'अर्थ' शब्दवत्ता द्रव्यादि तीन पदार्थों
में है), अतः स्वसमयार्थशब्दाभिधेयत्व द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य है ।
'धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्च' अर्थात् द्रव्यादि तीनों पदार्थों में धर्म्म और अधर्म्म दोनों
की कारणता है, एक ही भूमि जब किसी को दी जाती है, तब वह धर्म्म का
कारण होती है, वही भूमि जब किसी से छीनी जाती है, तब अधर्म्म का कारण
होती है । इसी तरह कपिला गो का स्पर्श (गुण) धर्म्म का एवं मनुष्य की अस्थि
का स्पर्श (गुण) अधर्म्म का कारण है । इसी प्रकार तीर्थगमन क्रिया से धर्म्म और
मद्य बेचनेवाले के गृह में जाने की क्रिया से अधर्म्म होता है । इसी प्रकार और
स्थलों में भी कल्पना करनी चाहिए । 'धर्म्माधर्म्मकर्तृत्वञ्च' इस वाक्य में प्रयुक्त
'त्व' प्रत्यय से द्रव्यादि तीनों वस्तुओं में धर्म्म और अधर्म्म के उत्पादन करने की
अपनी शक्ति कही गयी है । (प्र.) ¹ जाति भी तो उन दोनों का कारण है ? (उ.)
जाति धर्म्म और अधर्म्म का कारण नहीं है, क्योंकि वह अपने आश्रय को
विजातीय वस्तुओं से भिन्न समझाकर ही चरितार्थ हो जाती है, (अर्थात्) उक्त
शब्द से धर्म्म और अधर्म्म का साक्षात् कारणत्व ही विवक्षित है, (उक्त धर्म्माधर्म्म)
के तो ब्राह्मणादि व्यक्ति ही कारण हैं । जाति का काम वहाँ इतना ही है कि
ब्राह्मणादि से भिन्नजातीय व्यक्तियों से प्रकृत धर्म्म और अधर्म्म की उत्पत्ति का
प्रतिषेध करे, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

  1. प्रश्न का अभिप्राय है कि द्रव्यादि तीनों पदार्थों की तरह जाति भी धर्म और
    अधर्म का कारण है, क्योंकि ब्राह्मणों के लिए विहित क्रिया के अनुष्ठान से क्षत्रियादि

४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कार्य्यात्वनित्यत्वे कारणवतामेव ।
कारणों से उत्पन्न पदार्थों के कार्यत्व और अनित्यत्व ये दो साधर्म्य
हैं ।
न्यायकन्दली
कार्य्यात्वानित्यत्वे कारणवतामेव । येषां द्रव्यादीनामुत्पत्तिकारणमस्ति तेषां कार्यत्व-
मनित्यत्वञ्च धर्म्मो न सर्वेषामित्यर्थः । स्वकारणे समवायः , प्रागसतः सत्तासमवायो वा
कार्यत्वमित्येके । तदयुक्तम् , प्रध्वंसे तदभावात् । तस्मात् कारणाधीनः स्वात्मलाभः
कार्यत्वमिति लक्षणम्, व्यापकत्वात् । प्राक्प्रध्वंसाभावोपलक्षिता वस्तुनः सत्तैवानित्य-
त्वमिति केचित् । तदयुक्तम्, अप्रतीतेः । अनित्य इति विनाशीत्येवं लोकः प्रत्येति, न तु
सत्ताविशिष्टताम् । उत्पत्तिविनाशयोगित्वमित्यपरः । तदप्यसारम्, प्रागभावे उत्पत्ते-
रभावात्, तस्याप्यनित्यत्वेन लोके सम्प्रतिपत्तेः । तस्मात् स्वरूपविनाश एवानित्यत्वमिति ।
यथोक्तम्-"अनित्यत्वं विनाशाख्यं क्रियासामान्यमुच्यते" इति ।
'कार्य्यात्वानित्यत्वे कारणवतामेव' अभिप्राय यह है कि कारणों से जिन
द्रव्यादि वस्तुओं की उत्पत्ति होती है, कारणत्व और अनित्यत्व उन्हीं पदार्थों के
साधर्म्य हैं, सभी पदार्थों के नहीं । कोई कहते हैं कि (प्र.) कारणों में कार्यों का
समवाय ही उनका 'कार्यत्व' है या पहले से अविद्यमान कार्यों में 'सत्ता' (जाति)
का समवाय सम्बन्ध ही 'कार्यत्व' है । (उ.) किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं,
क्योंकि ध्वंसात्मक कार्य में इन दोनों में से एक प्रकार का भी कार्यत्व नहीं है,
अतः कार्यत्व लक्षण के सभी लक्ष्यों में रहने के कारण "कारणों से अपने स्वरूप
का लाभ ही" कार्यत्व का लक्षण है । कोई कहते हैं कि (प्र.) जिन वस्तुओं का
कभी प्रागभाव रहे और कभी जिनका ध्वंस भी हो उनमें रहनेवाली 'सत्ता' ही
'अनित्यत्व' है । (उ.) किन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि अनित्यत्व की प्रतीति इस
आकार की नहीं होती है । 'अनित्यत्व' शब्द से विनाशशीलत्व की ही प्रतीति
होती है, किसी प्रकार की सत्ता की नहीं । (प्र.) कोई कहते हैं कि उत्पत्ति और
विनाश दोनों का सम्बन्ध ही 'अनित्यत्व' है । (उ.) किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं
है, क्योंकि प्रागभाव में अनित्यत्व की सार्वजनीन अबाधित प्रतीति होती है,
किन्तु उसमें उत्पत्ति का सम्बन्ध नहीं है । अतः वस्तुओं के स्वरूप का नाश
ही अनित्यत्व है । जैसा कहा भी है कि विनाश नाम की सामान्य क्रिया
ही 'अनित्यत्व' शब्द से कही जाती है । (प्र.) यद्यपि वस्तुओं की वर्त्तमान
को पुण्य नहीं होता, एवं ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध सुरापानादि से शूद्रादि को अधर्म्म नहीं
होता, अतः यह कथन असङ्गत है कि उक्त धर्म्माधर्म्मकर्तृत्व केवल द्रव्यादि तीन के ही
साधर्म्य हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्यः ।
परिमाण्डल्य प्रभृति पदार्थों को छोड़कर और सभी पदार्थों का
कारणत्व साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
यद्यपि विनाशो वस्तुकाले नास्ति, तथापि प्रमाणान्तरसिद्धसद्भावो भवत्येव विशेषणम्,
अनित्यो घट इति प्रत्येतुरेकत्वात् । तथा लोके विनाशि शरीरमध्रुवा विषया इति
कारणत्वञ्चान्यत्र पारिमाण्डल्यादिभ्य इति । पारिमाण्डल्यमिति
परमाणुपरिमाणम्, आदिशब्दाद् द्व्यणुकपरिमाणम्, आकाशकालदिगात्मनां
विभुत्वमन्त्यशब्दमनःपरिमाणं परत्वापरत्वे द्विपृथक्त्वमन्त्यावयविपरिमाणञ्चेत्यादि
दशा में विनाश नहीं रहता है¹ । (उ.) तथापि² जिसकी सत्ता प्रमाण से सिद्ध है,
वह भी अवश्य विशेषण ही होता है । साधारण जनों को भी इस प्रकार की
स्वारसिक प्रतीतियाँ होती हैं कि शरीर विनाशशील है, सभी वस्तु चिरकाल तक
रहनेवाली नहीं है ।
'पारिमाण्डल्य' शब्द का अर्थ है परमाणुओं का परिमाण । (पारिमाण्डल्यादि
पद में प्रयुक्त) 'आदि' पद से आकाश, काल, दिशा और आत्मा इन चार पदार्थों का
'विभुत्व' अर्थात् परममहत्परिमाण, अन्तिम शब्द मन का परिमाण तथा उसी का
परत्व और अपरत्व, द्विपृथक्त्व, अन्त्यावयवी द्रव्य (जो अवयवी किसी दूसरे अव-
यवी का अवयव न हो, जैसे घट) का परिमाण, ये सभी अभिप्रेत हैं । इनसे भिन्न द्रव्यादि

  1. पूर्वपक्षी का आशय है कि विनाश ही अगर अनित्यत्व हो तो 'घटोऽनित्यः' इस प्रकार की
    विशिष्ट प्रमाबुद्धि नहीं होगी, क्योंकि विशिष्ट प्रमा के लिए विशेष्य में विशेषण का रहना
    आवश्यक है । जब तक घटरूप विशेष्य रहेगा, तब तक उसमें विनाशरूप अनित्यत्व नहीं
    रहेगा और जब घट विनष्ट हो जाएगा, तब अनित्यत्वरूप विशेषण रहेगा कहाँ ? सुतराम्,
    चूँकि विद्यमान वस्तु और विनाश दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः उनमें विशेष्यविशेषण-
    भाव नहीं हो सकता ।
  2. इस समाधान ग्रन्थ का आशय है कि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों का एक समय में
    रहना आवश्यक नहीं है, केवल इतना ही आवश्यक है कि दोनों प्रमाणसिद्ध हों एवं
    परस्पर सम्बद्ध हों । इसका भी कोई बन्धन नहीं है कि वह सम्बन्ध आधाराधेयभाव का
    नियामक ही हो । अतः 'घटो विनष्टः' इत्यादि विशिष्ट प्रतीति के अनुरोध से घट और
    विनाश में भी प्रतियोगितादि सम्बन्ध की कल्पना करेंगे । अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ।

४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः ।
नित्य द्रव्यों को छोड़कर और सभी पदार्थों का द्रव्य में आश्रित
रहना साधर्म्य है ।
न्यायकन्दली
ग्राह्यम्। एतानि परित्यज्यापरेषां द्रव्यादीनां त्रयाणां कारणत्वं समवाय्यसमवायिकारण-
त्वम् । यद्यपि द्रव्यस्य नासमवायिकारणत्वम्, न च समवायिकारणत्वं गुणकर्म्मणोः,
तथापि निमित्तकारणविलक्षणतयेदं साधर्म्यमुक्तम् ।
द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति । नन्वाश्रितत्वं षण्णामित्युक्तं तेनेदं पुनरु-
क्तम् ? न पुनरुक्तम्, द्रव्योपलक्षितस्याश्रितत्वस्यात्र विवक्षितत्वादिति कश्चित् । तदयुक्तम्,
सामान्यादीनामपि द्रव्योपलक्षितस्याश्रितत्वस्य सम्भवान्नेदं द्रव्यादित्रयसाधर्म्यकथनं स्यात् ।
तस्मादित्थं व्याख्येयम् । अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य इति द्रव्यग्रहणमुपलक्षणम्, तद्वृत्तयोऽन्त्या
विशेषास्तेऽपि गृह्यन्ते । नित्यद्रव्याणि तद्गतांश्च विशेषान् परित्यज्य द्रव्य एवाश्रितत्वं
द्रव्यादीनां त्रयाणां साधर्म्यं नापरेषामित्यर्थः ।
तीन पदार्थों का 'कारणत्व' साधर्म्य है । यहाँ कारणत्व शब्द से समवायिकारणत्व
और असमवायिकारणत्व ही इष्ट है । यद्यपि द्रव्यों में असमवायिकारणत्व नहीं है,
एवं गुण और कर्म्म में समवायिकारणत्व नहीं है, किन्तु यहाँ 'कारणत्व' शब्द से
'निमित्तकारणभिन्नकारणत्व' रूप साधर्म्य ही विवक्षित है (यह साधर्म्य द्रव्यादि
तीनों वस्तुओं में समान रूप से है) ।
"द्रव्याश्रितत्वञ्चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः" । (प्र.) पहले कह चुके हैं कि आश्रि-
तत्व (नित्य द्रव्यों को छोड़कर) छः पदार्थों का साधर्म्य है । फिर वही बात कहते
हैं, अतः इसमें पुनरुक्ति दोष है । (उ.) इस दोष का परिहार कोई इस प्रकार
करते हैं कि पहले केवल 'आश्रितत्व' साधर्म्य का उल्लेख है, अब 'द्रव्याश्रितत्व'
साधर्म्य कहते हैं । दोनों में कुछ अन्तर अवश्य है, अतः पुनरुक्ति दोष नहीं है ।
किन्तु यह समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि यह द्रव्यादि तीन वस्तुओं के साधर्म्य
का प्रकरण है, अतः द्रव्याश्रितत्वरूप प्रकृत साधर्म्य सामान्यादि पदार्थों में अति-
प्रसक्त होगा, इसलिए प्रकृत पङ्क्ति की व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रकृत
"अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः" इस वाक्य में प्रयुक्त 'द्रव्य' पद उपलक्षण है ('द्रव्याश्रितत्व'
शब्द का अर्थ है, द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना, तदनुसार) नित्य द्रव्य
और उनमें रहनेवाले 'विशेष' अर्थात् नित्य गुणों को छोड़कर द्रव्यादि तीन वस्तुओं
का (फलतः अनित्य द्रव्य, अनित्य गुण और कर्म्म इन तीन वस्तुओं का) 'द्रव्या-
श्रितत्व' अर्थात् द्रव्यरूप समवायिकारण से उत्पन्न होना साधर्म्य है, औरों का नहीं ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यादीनां त्रयाणां स्वात्मसत्त्वं बुद्धिलक्षणत्वमकार्यत्वमकारणत्वम-
सामान्यविशेषवत्त्वं नित्यत्वमर्थशब्दानभिधेयत्वञ्चेति ।
सामान्य प्रभृति तीन पदार्थों का अर्थात् सामान्य विशेष और
समवाय इन तीन पदार्थों का 'स्वात्मसत्त्व' अर्थात् सत्ता जाति के बिना
सत्ता, बुद्धिलक्षणत्व, अकार्यत्व, अकारणत्व, असामान्यविशेषवत्त्व,
नित्यत्व और 'अर्थ शब्द' का अभिधेय न होना ये सात साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
सम्प्रति सामान्यादीनां साधर्म्यमाह-सामान्यादीनामिति। स्वात्मैव सत्त्वं स्वरूपं
यत्सामान्यादीनां तदेव तेषां सत्त्वम्, न सत्तायोगः सत्त्वम् । एतेन सामान्यादीनां त्रयाणां
सामान्यरहितत्वं साधर्म्यमुक्तमित्यर्थः । कथमेतत् ? बाधकसद्भावात्, सामान्ये सत्ता
नास्ति, अनिष्टप्रसङ्गात् । विशेषेष्वपि सामान्यसद्भावे संशयस्यापि सम्भवात् । निर्णयार्थं
विशेषानुसरणेऽप्यनवस्थैव । समवायेऽपि सत्ताभ्युपगमे तद्वृत्त्यर्थं समवायाभ्युपगमाद-
निष्ठापत्तिरेव दूषणम् । गोत्वादिष्वपरजातिमत्त्वेन व्याप्तस्य सत्तासम्बन्धस्य तन्निवृत्तौ
निवृत्तिसिद्धिः । कुतस्तर्हि सामान्यादिषु सत्सदित्यनुगमः ? स्वरूपसत्त्वसाधर्म्येण सत्ताध्यारो-
द्रव्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहकर अब 'सामान्यादीनाम्' इत्यादि से
सामान्यादि तीन पदार्थों का साधर्म्य कहते हैं । अर्थात् सामान्यादि का 'आत्मा'
अर्थात् स्वरूप ही 'सत्त्व' है । (द्रव्यादि तीनों की तरह) सत्ता जाति का सम्बन्ध
उनकी 'सत्ता' नहीं है । इससे सत्ता जाति से रहित होना सामान्यादि तीन पदार्थों का
साधर्म्य कथित होता है । (प्र.) सामान्यादि में सत्ता क्यों नहीं है ? (उ.) सामान्यादि
तीन पदार्थों में सत्ता मानने में यह बाधा है कि इससे 'अनवस्था' होगी । विशेषों में
भी अगर सामान्य की सत्ता मानें तो वहाँ संशय हो सकता है कि ये विशेष एकजातीय
हैं या विभिन्न-जातीय ? और तब फिर सभी नित्य द्रव्यों में यह संशय होगा ।
निश्चय करने के लिए अगर और विशेष निश्चयों के पीछे दौड़ेंगे तो अनवस्था होगी ।
समवाय में अगर सत्ता जाति मानेंगे तो उसके सम्बन्ध के लिये दूसरे समवाय की
कल्पना करनी पड़ेगी । इस प्रकार इसमें भी अनवस्था होगी । और भी बात है,
जहाँ-जहाँ सत्ता जाति रहती है, उन सभी स्थानों में गोत्वादि अपर जातियों
में से भी कोई जाति अवश्य ही रहती है । सत्ता और गोत्वादि अपर जातियों की यह
व्याप्ति गोप्रभृति वस्तुओं में सिद्ध है । सामान्यादि में कोई भी अपरजाति नहीं है,
अतः सत्ता जाति भी उनमें नहीं है । (प्र.) फिर सामान्यादि में 'ये सत् हैं' इस प्रकार
की प्रतीति क्यों होती है ? (उ.) सामान्यादि में रहनेवाली 'स्वरूपसत्ता' और
सत्ता जाति इन दोनों के सादृश्य से सामान्यादि पदार्थों में सत्ता जाति का आरोप

५० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
न्यायकन्दली
पात् । तर्हि मिथ्याप्रत्ययोऽयम् ? को नामाह नेति । भिन्नस्वभावेष्येकानुगमो मिथ्यैव,
स्वरूपग्रहणंन्तु न मृषा, स्वरूपस्य यथार्थत्वात् । द्रव्यादिष्वपि सत्ताध्यारोपकृत एवास्तु
प्रत्ययानुगमः ? नैवम्, सति मुख्येऽध्यारोपस्यासम्भवात् । न चेयं सामान्यादिष्वेव मुख्या,
बाधकसम्भवादू द्रव्यादिषु च तदभावात् ।
बुद्धिलक्षणत्वमिति । बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः, विप्रतिपन्न-
सामान्यादिसद्भावे बुद्धिरेव लक्षणं नान्यत्, द्रव्यादिसद्भावे त्वन्यदपि तत्कार्यं प्रमाणं
स्यादित्यर्थः । कश्चित् पुनरेवमाह- बुद्धया लक्ष्यन्ते प्रतीयन्त इति बुद्धिलक्षणाः,
तदयुक्तम्, द्रव्यादेरपि स्वबुद्धिलक्षणत्वान्नेदं वैधर्म्यमुक्तं स्यात् ।
होता है । इसी आरोप से सामान्यादि पदार्थों में भी एक प्रकार की 'ये सत् हैं' इस
आकार की प्रतीति होती है । (प्र.) तो फिर सामान्यादि में उक्त एक आकार की
सत्त्व की प्रतीति भ्रमरूप है ? (उ.) कौन कहता है कि भ्रम रूप नहीं है ? भिन्न
स्वभाव की वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति अवश्य ही भ्रम है । किन्तु उनके
स्वरूपों का ज्ञान यथार्थ ही है, क्योंकि वे उनमें ठीक ही हैं । (प्र.) फिर द्रव्यादि
तीनों पदार्थों में भी (सामान्यादि की तरह) स्वरूपसत्त्व के आरोप से सत्ता की
एक आकार की प्रतीति को भी मिथ्या क्यों नहीं मान लेते ? (उ.) इसलिए कि
मुख्य प्रतीति के सम्भव होने पर आरोप मानना अनुचित है । यह भी सम्भव नहीं
है कि सामान्यादि में ही सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को ही मुख्य मान
लें, क्योंकि ऐसा मानने में अनवस्था आ जाती है । द्रव्यादि तीनों पदार्थों में
सत्त्व की एक आकार की प्रतीति को मुख्य मानने में इस प्रकार की कोई
बाधा नहीं है ।
'बुद्धिलक्षणत्वम्', "बुद्धिरेव लक्षणं प्रमाणं येषां ते बुद्धिलक्षणाः" इस व्युत्पत्ति
के अनुसार बुद्धि ही जिनका प्रमाण है, वे ही बुद्धिलक्षण कहे जाते हैं । अभिप्राय
यह है कि द्रव्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों को द्रव्यादि के कार्यों से भी
समझाया जा सकता है । किन्तु सामान्यादि के प्रसङ्ग में विरुद्ध मत रखनेवालों
को समझाने के लिए बुद्धि ही एक अवलम्ब है । (प्र.) किसी सम्प्रदाय के व्यक्ति
"बुद्ध्या लक्ष्यन्ते प्रतीयन्ते इति बुद्धिलक्षणाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत
'बुद्धिलक्षण' शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि "जो बुद्धि से ही प्रतीत हों
वे ही बुद्धिलक्षण हैं" । (उ.) किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकार
का बुद्धिलक्षणत्व तो द्रव्यादि में भी है, फिर यह 'बुद्धिलक्षणत्व' का रूप
सामान्यादि तीन पदार्थों के साधर्म्य को द्रव्यादि पदार्थों का वैधर्म्य कहना सम्भव न
होगा¹ ।

  1. अभिप्राय यह है कि ग्रन्थ के आदि में पदार्थ एवं उनके साधर्म्य-वैधर्म्य के निरूपण
    की प्रतिज्ञा कर चुके हैं । उसके बाद पदार्थ एवं उनके साधर्म्यों का विस्तार से निरूपण

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१
न्यायकन्दली
अकार्यत्वं कारणानपेक्षस्वभावत्वम्, तच्च सामान्ये तावद्
व्यक्तेः पूर्वमूर्ध्वं व्यक्तिकाले चावस्थितिग्राहकेण कारणाभावोपलब्धिसहकारिणा
भूयोदर्शनजसंस्कारानुगृहीतेन प्रत्यक्षेणैव व्याप्तिवद् गृह्यते । समवायस्याप्यकार्यत्वं
पूर्वापरसहभावानवक्लृप्तेः, यदि हि पटस्य समवायः पटात् पूर्वं सम्भवति, असति
अकार्यत्व शब्द का अर्थ है-अपनी (स्वरूप) सत्ता के लिए कारणों की
अपेक्षा न रखना । सामान्यादि के आश्रय द्रव्यादि व्यक्तियों में तीनों कालों
में ही सामान्य की सत्ता के ज्ञापक एवं सामान्यादि के कारणों के अभाव-
ज्ञान का सहायक तथा बार-बार के देखने से उत्पन्न संस्कार के द्वारा विशेष
बलप्राप्त प्रत्यक्ष के द्वारा ही व्याप्ति की तरह इस अकार्यत्व का ज्ञान होता
है । समवाय में भी अकार्यत्व है ही, क्योंकि समवाय को कार्य मानने की
कोई रीति उपपन्न नहीं होती है । समवाय को अगर कार्य मानें तो फिर उसकी
किया है । वैधर्म्यनिरूपण के लिए साधर्म्यनिरूपण के अन्त में लिखा है कि "एवं सर्वत्र
साधर्म्यविपर्ययाच्च वैधर्म्यम्" अर्थात् इस प्रकार ये साधर्म्य हैं और (ये ही साधर्म्य) उनसे
भिन्न वस्तुओं में न रहने के कारण उनके वैधर्म्य हैं । तदनुसार "सामान्यादीनाम्" इत्यादि
प्रकृत पङ्क्ति का एक यह भी अर्थ मानना पड़ेगा कि ये सभी स्वात्मसत्त्वादि तीन पदार्थों
से भिन्न पदार्थों के वैधर्म्य भी हैं । अगर बुद्धिलक्षणत्व शब्द की ऐसी व्याख्या करें जिसके
अनुसार यह द्रव्यादि में भी रह सके तो फिर प्रकृत पङ्क्ति से उक्त वैधर्म्य का आक्षेप
सम्भव न हो सकेगा ।
अभिप्राय यह है कि एक घट व्यक्ति की उत्पत्ति के पहले भी उससे पहले के घट में घटत्व
की प्रतीति होती है । एवं एक घट व्यक्ति के नष्ट हो जाने पर भी दूसरे अविनष्ट घट में
घटत्व की प्रतीति होती है । वर्तमान घट में घटत्व की प्रतीति में तो कोई विवाद ही नहीं
है, अतः यह समझते हैं कि व्यक्ति के तीनों कालों में ही जाति की सत्ता रहती है । ऐसी
स्थिति में सामान्य को अगर किसी कारण का कार्य मानें तो वह कारण उसके आश्रयीभूत
व्यक्तियों के कारणों में से ही होगा या उसके सदृश ही कोई दूसरा होगा, किन्तु किसी भी
प्रकार से सामान्य में कार्यत्व मान लेने से उसकी उक्त त्रैकालिक प्रतीति की उपपत्ति नहीं
होगी, अतः उक्त त्रैकालिक प्रतीति के कारणभूत प्रमाणों से ही यह भी समझते हैं कि
सामान्यादि का कोई कारण नहीं है, अतः जिस प्रकार धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य
के भूयोदर्शनजनित संस्कार से युक्त पुरुष को धूम को देखते ही उसकी व्याप्ति भी दिखती
है, उसी प्रकार व्यक्तियों में सामान्य का प्रत्यक्ष होते ही उसी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसमें रहने
वाले अकार्यत्व का भी ज्ञान हो जाता है ।

५२ न्याय्कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य-
न्याय्कन्दली
सम्बन्धिनि कस्यासौ सम्बन्धः स्यात् ? अथ पटेन सहोत्पद्यते, तदा पटस्यानाधारत्वं
प्राप्नोति । अथ पश्चाद्भवति, तथापि पटस्यानाधारत्वमेव, न च कार्य्यत्वमनाधारं युक्तम्,
तस्मादकृतकः समवायः । विशेषाणाञ्चाकार्य्यत्वं वस्तुत्वे सति द्रव्यगुणकर्म्मान्यत्वात्
सामान्यसमवायवत् सिद्धम् ।
अकारणत्वं समवाय्यसमवायिकारणत्वाभावः, न तु निमित्तकारण-
त्वप्रतिषेधः, बुद्धिनिमित्तत्वाभ्युपगमात् । असामान्यविशेषवत्त्वम् अपर-
जातिरहितत्वमित्यर्थः । सामान्येषु सामान्यन्नाम नापरं सामान्यमस्ति, अत्रापि
सामान्यप्राप्त्याऽनवस्थानात् । विशेषसमवाययोस्तु सामान्याभावे कथित एव
निम्नलिखित तीन ही गति हो सकती है कि (१) समवाय अपने पटादिरूप
प्रतियोगी से पूर्व ही उत्पन्न हो, या (२) अपने प्रतियोगी से पीछे उत्पन्न हो अथवा
(३) प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी प्रकार सम्भव नहीं
है; (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है । अगर समवाय की
उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व उत्पन्न वह समवाय
किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न
नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न
न हो, (३) अथवा प्रतियोगी के साथ ही उत्पन्न हो । किन्तु इनमें से कोई भी
प्रकार सम्भव नहीं है, (१) क्योंकि सम्बन्ध बिना प्रतियोगी के नहीं होता है ।
अगर समवाय की उत्पत्ति के पूर्व पट की सत्ता नहीं रहेगी तो फिर पट से पूर्व
उत्पन्न वह समवाय किसका सम्बन्ध होगा ? अतः समवाय अपने पटादि
प्रतियोगियों के पहले उत्पन्न नहीं हो सकता । (२) समवाय अपने पटादि
प्रतियोगियों के साथ-साथ भी उत्पन्न नहीं हो सकता है; क्योंकि इससे पटादि कार्य
समवाय के आधार ही नहीं हो सकते, क्योंकि आधार को आधेय से पूर्व रहना
आवश्यक है । सुतराम्, एक ही क्षण में उत्पन्न दो वस्तुओं में आधाराधेयभाव
असम्भव है । (३) समवाय की उत्पत्ति अगर पटादि कार्यों की उत्पत्ति के बाद
मानें फिर भी पटादि की अनाधार उत्पत्ति की आपत्ति रहेगी, क्योंकि पट की
उत्पत्ति के समय अगर समवाय ही नहीं है तो तन्तु में किस सम्बन्ध से पट की
उत्पत्ति होगी ? अतः समवाय अकार्य ही है । वह कारणों से उत्पन्न नहीं होता
है । विशेष भी कार्य नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों से भिन्न होने
पर भी वह भाव पदार्थ है, जैसे कि सामान्य और समवाय ।
यहाँ 'अकारणत्व' शब्द से समवायिकारणत्व और असमवायिकारणत्व इन दोनों
का ही निषेध इष्ट है, निमित्तकारणत्व का नहीं, क्योंकि सामान्यादि में भी बुद्धि की
निमित्तकारणता स्वीकृत है । 'असामान्यविशेषवत्त्व' शब्द का अर्थ है अपरजातियों का
न रहना । सामान्यों में सामान्यत्व नाम का कोई अपर सामान्य नहीं है, क्योंकि इससे
अनवस्था¹ होगी । समवायो और विशेषों में सामान्य के न रहने की युक्ति दिखला
१. जातियों में जातित्व नाम का सामान्य मानने में अनवस्था इस प्रकार होती
है कि द्रव्यत्व गुणत्वादि जितने सामान्य पहले से स्वीकृत हैं उन सभी सामान्यों
में जातित्व या सामान्यत्व नाम का एक और सामान्य मानना पड़ेगा, किन्तु यह