सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१
न्यायकन्दली
अथायुतौ सिद्धौ, तथापि कः सम्बन्धोऽपृथक्सिद्धत्वादेव । भिन्नयोर्हि सम्बन्धो यथा
कुण्डबदरयोरिति ।
तदपरे न मृषन्ति । न ह्यास्यायमर्थो युतौ न सिद्धौ न निष्पन्नाविति, असतोः समवा-
यानभ्युपगमात् । नाप्यस्यायमर्थः - अयुतौ सिद्धाविति, एकात्मकत्ये ह्येकमेव वस्तु स्यान्नो-
भयम्, परस्परात्मकत्वाभावलक्षणत्वादुभयरूपतायाः । न च तदेकं वस्तु परमार्थतः, पर-
स्परविलक्षणेन रूपेण तयोराकारयोः प्रतिभासनात् । विलक्षणाकारबुद्धिवेद्यत्वस्यैव भेद-
लक्षणत्वात्, अन्यथा भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्मान्न स्वरूपाभेदोऽप्युतसिद्धिः, किन्तु
अयुतसिद्धानामिति परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितानामित्यर्थः । तथा च सति सम्बन्धो
नानुपपन्नः, स्वरूपभेदस्य सम्भवात्, भिन्नयोश्च परस्परोपश्लेषस्य दहनायस्पिण्डयोरिव विना
सम्बन्धेनासम्भवात् । इयांस्तु विशेषः - वह्निरुत्पत्तेः पश्चादयस्पिण्डेन सह सम्बध्यते, इह
तु स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानमेव तत्र सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेत्यलम् ।
किसके साथ किसका होगा ? (क्योंकि सम्बन्ध से पहले सम्बन्धियों की सिद्धि
आवश्यक है), अगर 'जिन दोनों की पृथक् सिद्धि न हो वे अयुतसिद्ध हैं' यह
दूसरा पक्ष मानें तो भी असङ्गति है ही, क्योंकि जिन दो वस्तुओं की अलग-अलग
सिद्धि न हो, पृथक् सत्ता न रहे, उन दोनों का सम्बन्ध कैसा ? दो भिन्न वस्तुओं
का ही सम्बन्ध होता है, जैसे कुण्ड और बेर का ।
इन दोनों ही आक्षेपों को दूसरे सम्प्रद ही मानते । इन लोगों का कहना है
कि 'युतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य का अर्थ नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं
की (पृथक्) सत्ता न रहे, वे अयुतसिद्ध हैं", क्योंकि हम लोग असत् वस्तुओं का
समवाय नहीं मानते । "अयुतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य के अनुसार यह अर्थ
भी नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं की अभिन्नरूप से सिद्धि हो वे अयुतसिद्ध हैं",
क्योंकि एक स्वरूप की वस्तु एक ही होगी, दो नहीं । दो वस्तुओं के दोनों असाधारण
धम्मों का एक-दूसरे में अभाव ही 'उभयरूपत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
के अनुयोगी और प्रतियोगीरूप वे दोनों अयुतसिद्ध अभिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि
परस्पर विलक्षण रूप से दोनों की यथार्थ प्रतीति होती है । विलक्षण रूप से ज्ञात
होना ही वस्तुओं का (परस्पर) भेद है । अगर विलक्षण रूप से ज्ञात होने पर भी
वस्तुओं में भेद न मानें तो संसार से भेद और अभेद की बात ही उठ जाएगी ।
अयुतसिद्ध शब्द का अर्थ यह है कि जो अनेक वस्तुएँ परस्पर एक-दूसरे को
छोड़कर न रहें वे 'अयुतसिद्ध' हैं । (अयुतसिद्ध शब्द के) इस प्रकार के अर्थ में
सम्बन्ध की कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि इस प्रकार के अयुतसिद्धों के स्वरूप