सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 302

३४२ न्यायकदलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
न्यायकदली
भावात् सतोऽप्यनुपलब्धिरिति ? न, कारणव्यापारस्यापि सर्वदा तत्र सम्भवात्,
व्यापारोऽपि पूर्वमनभिव्यक्तः सम्प्रति कारणैरभिव्यज्यमानो भावमुपलम्भयतीति चेत् ?
अभिव्यक्तिरपि यद्यसती ? कथं तस्याः कारणम् ? सतीति चेद्भावोपलम्भप्रसङ्गस्तदवस्थ
एवेति कस्यचिदपूर्वस्य विशेषस्योपजनन मन्तरेण प्रागनुपलब्धस्य पश्चादुपलम्भो दुर्घटः ।
यच्चोक्तम्- असदशक्यकरणं व्योमकुसुमवदिति, तत्र स्वभावभेदाद् असदेकस्वभावं
गगनकुसुमम्, सदसत्स्वभावं तु घटादिकम् ? तत्पूर्वमसत् पश्चात्सद्भवति । कथं
सदसतोरेकत्र न विरोध इति चेत् ? कालभेदेन समावेशात् । प्रागुत्पत्तेः पटस्य
धर्मिणोऽभावात् कथमसत्त्वं तस्य धर्म इति चेत् ? यादृशो यक्षस्तादृशो बलिः,
सत्त्वमसतो धर्मो न स्यादसत्त्वं त्वसत एव युक्तम् । यदसत् पूर्वमासीत् तस्य
कथं सत्त्वमिति चेत् ? कारणसामर्थ्यात्, अस्ति स कोऽपि महिमा तुर्यादीनां
रहने से ही उत्पत्ति से पहले तन्तुओं में विद्यमान रहने पर भी पट का प्रत्यक्ष नहीं
होता है । (उ.) ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि आपके मत से सभी कार्य
उत्पत्ति से पहले भी सत् हैं, अतः जुलाहे प्रभृति का व्यापार भी सत् है, अतः वे
भी सर्वदा रहेंगे ही । (प्र.) कारणों का वह व्यापार भी पहले से अनभिव्यक्त ही
रहता है, उन्हीं कारणों से अभिव्यक्त होकर पटादि कार्यों के प्रत्यक्ष में सहायक
होता है । (उ.) कारणों की यह अभिव्यक्ति सत् है ? या असत् ? अगर असत्
है तो फिर वह उस प्रत्यक्ष का कारण कैसे हो सकती है ? अगर सत् है तो
पटादि प्रत्यक्ष की उक्त आपत्ति है ही । अतः किसी अपूर्व विशेष की उत्पत्ति के
बिना पहले से अनुपलब्ध वस्तु की पीछे उपलब्धि सम्भव नहीं है ।
यह जो आपने कहा कि 'आकाशकुसुम' की तरह असत् वस्तु का उत्पादन
असम्भव है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वस्तु भिन्न-भिन्न स्वभाव की होती है ।
आकाश-कुसुम का केवल 'असत्त्व' ही स्वभाव है । घटादि वस्तुओं के सत्त्व और
असत्त्व दोनों ही स्वभाव हैं । वे पहले असत् रहते हैं, पीछे से सत् हो जाते हैं ।
(प्र.) एक आश्रय में सत्त्व और असत्त्व दोनों में विरोध क्यों नहीं होता
है ? (उ.) (यद्यपि वे दोनों एक ही समय एक आश्रय में नहीं रह
सकते फिर भी) कालभेद से वे दोनों एक आश्रय में रह सकते हैं । (प्र.) उत्पत्ति
से पहले तो पटरूप धर्मी ही नहीं है, फिर असत्त्व उसका धर्म किस प्रकार होगा ?
(उ.) 'जैसा देवता वैसा ही उसका भोग' (इस न्याय से) असत् वस्तुओं का सत्त्व
धर्म तो होगा नहीं, अतः यही ठीक है कि असत्त्व ही उसका धर्म है । (प्र.) जो
पहले असत् रहा कभी भी सत्त्व उसका धर्म कैसे हो सकता है ? (उ.) कारणों के
सामर्थ्य से (असत् वस्तुओं का भी सत्त्व धर्म हो सकता है) तुरीवेमादि
कारणों की ही यह अपूर्व महिमा है कि जब ये मिलकर काम