वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रज्वलनात्मको द्वेषः । यस्मिन् सति प्रज्वलितमिवात्मानं मन्यते स द्वेषः ।
स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । यत्न-
स्मृतिधर्माधर्मस्मृतिहेतुः । क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः ।
द्वेष प्रज्वलन रूप है । (अर्थात्) जिसके रहते हुए प्राणी अपने को
जलता हुआ सा अनुभव करे, वही 'द्वेष' है । दुःख या स्मृति से सापेक्ष
आत्मा और मन के संयोग से यह उत्पन्न होता है । प्रयत्न, स्मृति, धर्म
और अधर्म का यह कारण है । क्रोध, द्रोह, मन्यु, अक्षमा और अमर्ष
ये (पाँच) द्वेष के प्रभेद हैं ।
न्यायकन्दली
प्रज्वलनात्मको द्वेषः । एतद् विवृणोति—यस्मिन् सतीत्यादिना । तद् व्यक्तम् । स चात्म-
मनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अतीते दुःखहेतौ तज्जदुःखस्मृतिजो
द्वेषः । प्रयत्नधर्माधर्मस्मृतिहेतुः । एनमहं हन्मीति प्रयत्नो द्वेषात्, वेदार्थविप्लवकारिषु
द्वेषाद् धर्मः, तदर्थपरिपालनपरेषु द्वेषादधर्मः । स्मृतिरपि द्वेषादुपजायते, यो यं द्वेष्टि स तं
सततं स्मरति । क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः । शरीरेन्द्रियादिविकार-
हेतुः क्षणमात्रभावी द्वेषः क्रोधः । अलक्षितविकारश्चिरानुबद्धोऽपकारावसानो द्वेषो द्रोहः ।
जाने की इच्छा ही 'जिगमिषा' है । क्रियाओं की इस विभिन्नता से ही ये इच्छायें
विभिन्न होती हैं ।
'प्रज्वलनात्मको द्वेषः' इस लक्षणवाक्य की ही व्याख्या 'यस्मिन् सति' इत्यादि से की
गयी है । 'स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वा उत्पद्यते' । जहाँ दुःख के
कारणों का नाश हो गया रहता है, ऐसे स्थलों में उन कारणों से उत्पन्न दुःख की
स्मृति से ही उन कारणों में द्वेष उत्पन्न होता है । 'प्रयत्नधर्माधर्मस्मृतिहेतुः' 'मैं इसे
मारता हूँ' इस प्रकार का प्रयत्न द्वेष से उत्पन्न होता है । वेदों से प्रतिपादित अर्थों को
विपरीत दिशा में ले जानेवाले के ऊपर किये गये द्वेष से धर्म उत्पन्न होता है । वेदों
की आज्ञा पालनेवाले के ऊपर द्वेष करने से अधर्म उत्पन्न होता है । द्वेष से स्मृति
भी उत्पन्न होती है; क्योंकि जिसके ऊपर जिसे द्वेष रहता है, उसे उसका सदा स्मरण
होता रहता है । "क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्ष इति द्वेषभेदाः" एक क्षण मात्र रहनेवाले
'द्वेष' का नाम ही 'क्रोध' है, जिससे शरीर एवं इन्द्रियादि अपने स्वरूप से च्युत दीख
पड़ते हैं । जिससे शरीरादि में विकार परिलक्षित न हो; किन्तु जिसका बहुत दिनों
के बाद अपकार में पर्यवसान हो, उस द्वेष को ही 'द्रोह' कहते हैं । 'मन्यु' उस 'द्वेष'
६३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे प्रयत्न-
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधः - जीवनपूर्वकः, इच्छा-
द्वेषपूर्वकश्च । तत्र जीवनपूर्वकः सुप्तस्य प्राणापानसन्तानप्रेरकः, प्रबोधकाले
चान्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद्
धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः । इतरस्तु हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः
शरीरविधारकश्च । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छापेक्षाद् द्वेषापेक्षाद् वोत्पद्यते ।
प्रयत्न, संरम्भ, उत्साह ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं । यह (प्रयत्न)
१. जीवनपूर्वक (जीवनयोनि) और २. इच्छाद्वेषपूर्वक भेद से दो प्रकार
का है । प्राणियों की सुप्तावस्था में प्राणवायु, अपानवायु प्रभृति
(शरीरान्तर्वर्ती) वायु समूह को (उचित रूप से) प्रेरित करनेवाला एवं
अन्तःकरण (मन) को दूसरी इन्द्रियों से सम्बद्ध करनेवाला प्रयत्न ही
जीवनपूर्वक प्रयत्न है । धर्म और अधर्म से साहाय्यप्राप्त आत्मा और
मन के संयोग से इस (जीवनपूर्वक प्रयत्न) की उत्पत्ति होती है । दूसरा
(इच्छा-द्वेषमूलक) प्रयत्न हितों की प्राप्ति एवं अहितों का परिहार इन
दोनों की उपयुक्त क्रिया एवं शरीर की स्थिति इन दोनों का कारण है ।
यह (इच्छाद्वेषमूलक प्रयत्न) इच्छा या द्वेष से साहाय्य प्राप्त आत्मा और
मन के संयोग से उत्पन्न होता है ।
न्यायकन्दली
अपकृतस्य प्रत्यपकारासमर्थस्यान्तर्निगूढो द्वेषो मन्युः । परगुणद्वेषोऽक्षमा । स्वगुणपरिभव-
समुत्थो द्वेषोऽमर्षः ।
प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधो जीवनपूर्वक
इत्यादि । सदेहस्यात्मनो विपच्यमानकर्माशयसहितस्य मनसा सह संयोगः
सम्बन्धो जीवनम्, तत्पूर्वकः प्रयत्नः कामर्थक्रियां करोति ? इत्यत आह-तत्र
का नाम है, जो प्रतीकार करने में असमर्थ व्यक्ति में अत्यन्त गूढ़ रूप से रहता है ।
दूसरे के गुण के प्रति द्वेष को ही 'अक्षमा' कहते हैं । अपने गुण के पराजय से
जो द्वेष उत्पन्न होता है, उसे 'अमर्ष' कहते हैं ।
'प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः, स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि' देहसम्बद्ध
आत्मा का मन के साथ उस अवस्था का संयोग अर्थात् सम्बन्ध ही 'जीवन' है, जिस
अवस्था में वर्तमानकालिक विपाक से युक्त कर्माशय की सत्ता उसमें रहे । जीवनपूर्वक
प्रयत्न से कौन-सा विशेष कार्य होता है ? इसी प्रश्न का समाधान 'तत्र जीवनपूर्वकः'
इत्यादि से किया गया है । (जीवनपूर्वक प्रयत्न का साधक यह अनुमान है कि) सोते