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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

६३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे प्रयत्न-
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधः - जीवनपूर्वकः, इच्छा-
द्वेषपूर्वकश्च । तत्र जीवनपूर्वकः सुप्तस्य प्राणापानसन्तानप्रेरकः, प्रबोधकाले
चान्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद्
धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः । इतरस्तु हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः
शरीरविधारकश्च । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छापेक्षाद् द्वेषापेक्षाद् वोत्पद्यते ।
प्रयत्न, संरम्भ, उत्साह ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं । यह (प्रयत्न)
१. जीवनपूर्वक (जीवनयोनि) और २. इच्छाद्वेषपूर्वक भेद से दो प्रकार
का है । प्राणियों की सुप्तावस्था में प्राणवायु, अपानवायु प्रभृति
(शरीरान्तर्वर्ती) वायु समूह को (उचित रूप से) प्रेरित करनेवाला एवं
अन्तःकरण (मन) को दूसरी इन्द्रियों से सम्बद्ध करनेवाला प्रयत्न ही
जीवनपूर्वक प्रयत्न है । धर्म और अधर्म से साहाय्यप्राप्त आत्मा और
मन के संयोग से इस (जीवनपूर्वक प्रयत्न) की उत्पत्ति होती है । दूसरा
(इच्छा-द्वेषमूलक) प्रयत्न हितों की प्राप्ति एवं अहितों का परिहार इन
दोनों की उपयुक्त क्रिया एवं शरीर की स्थिति इन दोनों का कारण है ।
यह (इच्छाद्वेषमूलक प्रयत्न) इच्छा या द्वेष से साहाय्य प्राप्त आत्मा और
मन के संयोग से उत्पन्न होता है ।
न्यायकन्दली
अपकृतस्य प्रत्यपकारासमर्थस्यान्तर्निगूढो द्वेषो मन्युः । परगुणद्वेषोऽक्षमा । स्वगुणपरिभव-
समुत्थो द्वेषोऽमर्षः ।
प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधो जीवनपूर्वक
इत्यादि । सदेहस्यात्मनो विपच्यमानकर्माशयसहितस्य मनसा सह संयोगः
सम्बन्धो जीवनम्, तत्पूर्वकः प्रयत्नः कामर्थक्रियां करोति ? इत्यत आह-तत्र
का नाम है, जो प्रतीकार करने में असमर्थ व्यक्ति में अत्यन्त गूढ़ रूप से रहता है ।
दूसरे के गुण के प्रति द्वेष को ही 'अक्षमा' कहते हैं । अपने गुण के पराजय से
जो द्वेष उत्पन्न होता है, उसे 'अमर्ष' कहते हैं ।
'प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः, स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि' देहसम्बद्ध
आत्मा का मन के साथ उस अवस्था का संयोग अर्थात् सम्बन्ध ही 'जीवन' है, जिस
अवस्था में वर्तमानकालिक विपाक से युक्त कर्माशय की सत्ता उसमें रहे । जीवनपूर्वक
प्रयत्न से कौन-सा विशेष कार्य होता है ? इसी प्रश्न का समाधान 'तत्र जीवनपूर्वकः'
इत्यादि से किया गया है । (जीवनपूर्वक प्रयत्न का साधक यह अनुमान है कि) सोते