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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मणा च तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात्
तन्तुविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोर्विभागकर्मणोर्युगपद्विनाशः ।
और तन्तु की क्रिया से एक तन्तु का दूसरे तन्तु के साथ विभाग उत्पन्न
होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद कथित दोनों
अंशुओं के विभाग के द्वारा उत्पन्न दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश
से तन्तु का विनाश होता है एवं तन्तु के विनाश से उसमें रहनेवाले
विभाग और क्रिया, इन दोनों का एक ही समय विनाश हो जाता है ।
अतः इस पक्ष में क्रिया में चिरकालस्थायित्व की आपत्ति भी नहीं है ।
न्यायकन्दली
ततो विभागात् तन्त्वारम्भकस्यांशोःसंयोगस्य विनाशः, तन्तुकर्मणा च तस्य
तन्तोरुतस्तन्त्वन्तराद् विभाग इत्येकः कालः । तदनन्तरं संयोगस्य विनाशात् तदारब्धस्य
तन्तोर्विनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोर्विभागकर्मणोर्युगपद्विनाशः । यच्च नित्यसमवेतस्य
नित्यत्वमिति चोदितम्, तत्र प्रतिसमाधानं नोक्तम्, तस्यात्यन्तमसङ्गतार्थत्वात् । कार्याविष्टे
हि कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरविभागसमकालमाकाशादिदेशेन समं विभागं न करोति,
आकाशादिविभागकर्तृत्त्वस्य द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागोत्पादकत्वस्य च विरोधात् ।
अनारम्भके तु द्वयणुकसंयोगिनि परमाणौ कर्म द्वयणुकविभागसमकालं तस्याकाशदेशेन
के द्वारा तन्तु के उत्पादक अंशु के संयोग का विनाश होता है एवं तन्तु की क्रिया
से उस तन्तु का दूसरे तन्तु से विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय
में होते हैं । इसके बाद संयोग के विनाश से उस संयोग के द्वारा उत्पन्न तन्तु
का विनाश होता है । तन्तु के विनष्ट हो जाने से उसमें रहनेवाले विभाग
और कर्म दोनों ही एक ही समय नष्ट हो जाते हैं । नित्य द्रव्य में रहनेवाले कर्म
में नित्यत्व की जो शङ्का की गई है, उसका उत्तर इस कारण से नहीं दिया गया,
चूँकि वह अत्यन्त ही निःसार है । कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया
दूसरे अवयव के साथ विभाग के उत्पत्तिक्षण में आकाशादि देशों के साथ (अपने
आश्रय के) विभाग को नहीं उत्पन्न करती; क्योंकि आकाशादि देशों के साथ
विभाग का कर्तृत्व एवं द्रव्य के उत्पादक संयोग के विभाग का कर्तृत्व, ये
दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं (अतः एक समय एक आश्रय में दोनों नहीं रह
सकते), द्वयणुक के संयोग से युक्त (उस द्वयणुक के ) अनुत्पादक परमाणु में
(विद्यमान) क्रिया द्वयणुक की उत्पत्ति के समय ही आकाशादि देशों के साथ भी विभाग

३९२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनाश्रयविनाश-
संयोगाभ्यां तन्तुवीरणविभागविनाश इति ।
अथवा (इस स्थिति में भी आश्रय के नाश से विभाग का नाश हो
सकता है, जहाँ) तन्तु और वीरण (तृणविशेष) में संयोग होता है । इस
संयोग से किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती; क्योंकि यह विजातीय दो
द्रव्यों का संयोग है । पहले कथित रीति के अनुसार आश्रय का विनाश
और संयोग इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का नाश होता है ।
न्यायकन्दली
समं विभागं करोत्येव, ततो विभागाच्च परमाणोराकाशसंयोगनिवृत्तावुत्तरसंयोगे सति
तदाश्रितस्य कर्मणो विनाशो भवत्येव ।
समानजातीयसंयोगे सति द्रव्योत्पत्तावाश्रयविनाशाद् विभागकर्मणोर्विनाशः कथितः,
सम्प्रति विजातीयसंयोगे द्रव्यानुत्पत्तौ संयोगाश्रयविनाशाभ्यां विभागविनाशं कथयति-तन्तु-
वीरणयोर्वा संयोगे सतिद्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनेति । तन्त्वारम्भकांशौ कर्मोत्पत्ति-
समकालं वीरणे कर्म, ततोंऽशुक्रियया अंशान्तराद् विभागो वीरणकर्मणा च तस्य विभज्य-
मानावयवेन तन्तुना आकाशाद्देशेन च समं विभागः क्रियते, ततोंऽशुविभागादंशुसंयोगविनाशो
को अवश्य ही उत्पन्न करती है । इसके बाद विभाग के द्वारा परमाणु और
आकाश के संयोग के नष्ट हो जाने पर उत्तर संयोग के बाद परमाणु में
रहनेवाली क्रिया का भी अवश्य विनाश होता है ।
(समानजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने पर) द्रव्य की उत्पत्ति के बाद
आश्रय के विनाश से विभाग और क्रिया दोनों का ही नाश अभी कहा
गया है । अब विजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने के कारण द्रव्य की उत्पत्ति
न होने पर भी संयोग और आश्रय के विनाश, इन दोनों से विभाग का
विनाश 'तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेन' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा कहा गया है । इसकी यही प्रक्रिया है कि तन्तु के उत्पादक
अंशु में क्रिया की उत्पत्ति के समय ही वीरण (तृणविशेष) में भी क्रिया
उत्पन्न होती है । इसके बाद अंशु की क्रिया से दूसरे अंशु के साथ उसका
विभाग उत्पन्न होता है । वीरण की क्रिया से अवयव से विभक्त होते हुए
तन्तु के साथ एवं आकाशादि देशों के साथ भी विभाग उत्पन्न होते हैं ।